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जाति जैसी संस्था को शुरू करना मनु की हैसियत के बाहर 0

जाति जैसी संस्था को शुरू करना मनु की हैसियत के बाहर

शेष नारायण सिंह ♦ डॉ अंबेडकर की राजनीतिक सोच को लेकर कुछ और भ्रांतियां भी हैं। कांशीराम और मायावती ने इस क़दर प्रचार कर रखा है कि जाति की पूरी व्यवस्था का ज़हर मनु ने ही फैलाया था, वही इसके संस्थापक थे और मनु की सोच को ख़त्म कर देने मात्र से सब ठीक हो जाएगा। लेकिन बाबा साहेब ऐसा नहीं मानते थे। उनके एक बहुचर्चित, और अकादमिक भाषण के हवाले से कहा जा सकता है कि जाति व्यवस्था की सारी बुराइयों को लिए मनु को ही ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। मनु के बारे में उन्होंने कहा कि अगर कभी मनु रहे भी होंगे तो बहुत ही हिम्मती रहे होंगे। डॉ अंबेडकर का कहना है कि ऐसा कभी नहीं होता कि जाति जैसा शिकंजा कोई एक व्यक्ति बना दे और बाक़ी पूरा समाज उसको स्वीकार कर ले।

कलाओं पर ये कैसा पहरा…? 17

कलाओं पर ये कैसा पहरा…?

उत्तमा दीक्षित ♦ स्टूडेंट लाइफ में जब मैं न्यूड फिगर बनाती थी, तब अपने ही घर में मुझे लगता था कि सभी अच्छा फील नहीं कर रहे। हर सीखने वाले स्टूडेंट के साथ ऐसा ही होता होगा। न्यूड स्टडी करने के लिए किताबों का ही सहारा लेना पड़ता है चाहें वो मार्केट से ली जाएं या लाइब्रेरी से। स्टूडेंट को यह किताबें छिपाकर रखनी पड़ती हैं। डर ऐसा होता है कि कोई क्राइम कर रहा हो। मॉडल न्यूड हो या कपड़ों में, आर्टिस्ट के लिए महज एक आब्जेक्ट है। उसी तरह जैसे सामने कोई चीज़ रखी हो और उसका उसे चित्रांकन करना हो। जयशंकर प्रसाद की कामायनी पर पेंटिंग करने के दौरान जब मैंने श्रद्धा और मनु को कैनवास पर उतारा तो मुझे लगा कि कपड़ों के बिना दोनों पात्रों को ज़्यादा बेहतर अभिव्यक्त किया जा सकता है। ग्वालियर में इस सीरीज़ की पेंटिंग्स की एक्जीबिशन पर मैंने खूब हंगामा झेला। स्त्री होकर भी एक स्त्री को मैंने इस रूप में क्यों बनाया, यह सवाल मुझसे पूछा गया। मैं परेशान और दुखी थी।

उत्तमा की कामायनी : मनु और श्रद्धा के कुछ चित्र-प्रसंग 69

उत्तमा की कामायनी : मनु और श्रद्धा के कुछ चित्र-प्रसंग

उत्तमा दीक्षित ♦ प्रलय के दौरान मनु और श्रद्धा का प्रेम मुझे प्रेरक लगा। कल्पना की उस समय की। मैं जैसे खो सी गयी। मैंने तत्काल पेपर पर स्केच बनाना शुरू किया और देखते ही देखते मनु का चित्र उतर आया। बेशक, अन्य कल्पनाओं की तरह यह कल्पना भी मुश्किल नहीं थी। पहले चित्र का स्केच मनमुताबिक आना शुरू हुआ तो उत्साह बढ़ा। हालांकि विषय की संवेदना और भाव-भंगिमा को चित्र में उतारने में बाद में खासी मेहनत करनी पड़ी। प्रलय के कारण भावशून्य हुए मनु के रूप में मुझे मन दिखाना था और श्रद्धा के रूप में दिल। रहस्य, स्वप्न, आशाएं, कर्म, काम, वासना, आनंद, लज्जा, ईर्ष्या और चिंता के भावों का चित्रण करना सचमुच चुनौतीपूर्ण है।