Home » Archive

Articles tagged with: maoist

नज़रिया, मीडिया मंडी »

[4 Sep 2010 | 15 Comments | ]
हत्‍या के सभी मामलों में मीडिया को चीखना चाहिए

डेस्‍क ♦ बिहार के लखीसराय में माओवादियों ने अपने साथियों को छुड़ाने के एवज में तीन पुलिसकर्मियों को बंधक बना लिया। इनमें से एक की हत्‍या कर देने के बाद माओवादियों के अमानवीय किस्‍सों से पटी मीडिया की खबरों ने पूरे देश को हिला दिया। माओवादियों के इस कृत्‍य की चारों ओर निंदा हुई और हो रही है। ऐसे में लेखिका अरुंधती राय ने भी अपना बयान जारी किया है। अरुंधती के मुताबिक मीडिया की ओर से निंदा-बुलेटिन में बांट-बखरा नहीं होना चाहिए। मीडिया को फर्जी पुलिस मुठभेड़ में मारे जा रहे माओवादियों के बारे में भी ऐसी ही संवेदनशीलता से बातें करनी चाहिए।

नज़रिया, मोहल्ला दिल्ली, शब्‍द संगत »

[14 Aug 2010 | 7 Comments | ]
इस्‍लामिक हिंसा के बरक्‍स मैं राज्‍य की हिंसा का समर्थक हूं

विभूति नारायण राय ♦ राज्य अलोकतांत्रिक होता है। ये कल्पना करना कि राज्य इतना उदार होगा कि अपने अस्तित्व को ख़तरे में डाल कर हथियारबंद लोगों को खड़े होने की इजाजत देगा, भोलापन है। मैं राज्य की हिंसा का समर्थक नहीं हूं। लेकिन यहां कश्मीर का सवाल उठाया गया है। मुझे नहीं लगता कि आपमें से किसी ने वैसी हिंसा देखी है, जो हिंसा मैंने देखी है। मैं साफ तौर पर कह सकता हूं कि कश्मीर में इस्लामिक आतंकवाद और भारतीय राज्य के बीच मुकाबला है। और मैं हमेशा राज्य की हिंसा का समर्थन करुंगा। राज्य की हिंसा से हम मुक्त हो सकते हैं। इस्लामिक आतंकवाद से हम मुक्त नहीं हो सकते। वहां पर जो भी लोग उनसे असहमति रखते थे, उन सबको आतंकवादियों ने धीरे-धीरे मार दिया।

असहमति, नज़रिया, मोहल्ला दिल्ली, शब्‍द संगत »

[28 Jul 2010 | 23 Comments | ]
यह विचारों का लोकतंत्र नहीं, बौद्धिक तानाशाही है!

राजेंद्र यादव ♦ बुद्धिजीवियों का यह कौन सा आचरण है कि वे दूसरे पक्ष की बात सुनेंगे ही नहीं। यह विचारों का लोकतंत्र नहीं, बौद्धिक तानाशाही है। “मैं तुम्‍हारे विचारों को एक सिरे से खारिज करता हूं, मगर मरते दम तक तुम्‍हारे ऐसा कहने के अधिकार का समर्थन करूंगा।” यह कहा-बताया जाता है लोकतंत्र के पुरोधा वॉल्‍टेयर का। दूसरे को बोलने ही न दो, यह कैसा फासीवाद है? क्‍या हमारे तर्क इतने कमजोर हैं कि “दुश्‍मन” के सामने ठहर ही नहीं पाएंगे? इस वैचारिक तानाशाही का एक कुत्सित रूप कुतर्कों का पिंजड़ा खड़ा करना भी है। आप किसी भी विषय पर बात कीजिए, वे तर्क देंगे कि जब किसान हजारों की संख्‍या में आत्‍महत्‍याएं कर रहे हों, तब आप एसी कमरों में बैठकर एक फालतू मुद्दे पर मगजपच्‍ची कर रहे हैं – यह भयानक देशद्रोह है।

नज़रिया, मोहल्ला दिल्ली, शब्‍द संगत »

[22 Jul 2010 | 2 Comments | ]
परिवर्तनकामी टोली ने सार्वजनिक किया राजेंद्र जी का पक्ष

परिवर्तनकामी टोली ♦ अरुंधती ने ‘हंस’ के जलसे में न जाने का फैसला सार्वजनिक करने से पहले राजेंद्र यादव से किसी तरह की पुष्टि नहीं की। अगर उन्होंने ये फैसला करने से पहले राजेंद्र यादव से एक बार बात कर ली होती या यह पता लगा लिया होता कि क्या विश्वरंजन को भी बुलाया गया है, तो उनका भ्रम तभी दूर हो जाता। इस संवादहीनता ने दो जनपक्षधर व्यक्तित्वों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा की। अरुंधती और राजेंद्र यादव की जनपक्षधरता असंदिग्ध रही है। भ्रम की ये स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण है। अरुंधति राय का जो कद है और जो विश्वसनीयता है, उसमें उन्हें सुनी-सुनाई बातों के आधार पर इस तरह का कोई फैसला सार्वजनिक करने से बचना चाहिए। राजेंद्र यादव का कहना है कि वे अब भी चाहते हैं कि अरुंधती इस कार्यक्रम में शामिल हों।

नज़रिया, मोहल्ला दिल्ली »

[15 Jul 2010 | 21 Comments | ]
हंस की गोष्‍ठी नहीं भी होगी तो क्‍या फर्क पड़ जाएगा

अविनाश ♦ कहीं जाकर या नहीं जाकर, किसी को सुन कर या नहीं सुन कर हम अपनी प्रतिबद्धताएं, अपने आचरण की शुद्धता साबित कर सकते हैं – लेकिन इस सबूत से कुछ फर्क नहीं पड़ता। मैं अभी भी इस बात पर कायम हूं कि अरुंधती मान जाएं और विश्‍वरंजन छत्तीसगढ़ से चल कर हंस की गोष्‍ठी में आ जाएं तो पूरे आंदोलनी हिलोर का एक नया संदेश प्रसारित किया जा सकता है। विश्‍वरंजन को घेर कर, उनको सामने खड़ा करके हत्‍यारा बता कर, उनके सामने उनका पुतला जला कर, उन्‍हें जूतों की माला पहना कर। और ऐसा करते हुए अगर उस वक्‍त तमाम बुद्धिजीवियों की गिरफ्तारी हो जाती है – तो इस भारतीय स्‍टेट को एक्‍सपोज करने का कितना आसान अवसर आपके पास है, ये आप ही तय कीजिए।

नज़रिया, मोहल्‍ला रायपुर, समाचार »

[13 Jul 2010 | One Comment | ]
अरुंधती और मेधा के ख़िलाफ भूमिका बना रही है पुलिस

डेस्‍क ♦ यह पहला मौका नहीं है जब छत्तीसगढ़ पुलिस ने मानवाधिकार की आवाज उठाने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं पर निशाना साधा है। इससे पहले भी पुलिस के आला अधिकारी अरुंधती रॉय और हिमांशु कुमार पर नक्सलियों से साठगांठ के आरोप लगाते रहे हैं। लेकिन अब उन्होंने मेधा पाटकर को भी इसमें लपेट लिया है। मतलब साफ है… जो भी नक्सलवाद के खिलाफ चल रहे अभियान में पुलिस और प्रशासन के साथ नहीं है, बारी-बारी उन सभी के खिलाफ कार्रवाई की भूमिका तैयार की जा रही है।

नज़रिया, मीडिया मंडी, मोहल्ला दिल्ली, मोहल्‍ला रायपुर, समाचार »

[13 Jul 2010 | 2 Comments | ]
मैं माओवादी नहीं हूं, मुझे फंसाया जा रहा है : लिंगाराम

डेस्‍क ♦ छत्तीसगढ़ पुलिस की तरफ से घोषित किये गये माओवादी मास्टरमाइंड लिंगाराम कोडोपी ने खुद को बेगुनाह बताया है। नम आंखों के साथ दिल्ली के प्रेस क्लब में एक प्रेस कानफ्रेंस में लिंगाराम ने कहा कि वो बेगुनाह हैं और उनका कांग्रेस नेता अवधेश सिंह गौतम के घर पर हुए हमले से कोई लेना-देना नहीं है। लिंगाराम नोएडा के इंटरनेशनल मीडिया इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया से पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे हैं और उनके मुताबिक मई के बाद से वो एनसीआर छोड़ कर कहीं नहीं गये। एक दिन पहले छत्तीसगढ़ में दंतेवाड़ा के एसएसपी एसआरपी कल्लुरी ने दावा किया था कि छह जुलाई को कांग्रेस नेता के घर पर हुए हमले का मास्टरमाइंड लिंगाराम कोडोपी है।

नज़रिया, मोहल्‍ला रायपुर »

[1 Jul 2010 | 3 Comments | ]
भेड़ के बीच भेड़‍ियों (नक्‍सलियों) को कैसे पहचानें?

दिवाकर मुक्तिबोध ♦ …जब ऐसी स्थितियां हों तो ग्रामीण नक्सलियों के खिलाफ होने के बावजूद पुलिस के सूचनादूत कैसे बन सकते हैं? इसीलिए पुलिस का सूचना तंत्र कमजोर है और नक्सलियों का मजबूत। पुलिस जब तब इसे ठीक नहीं कर पाएगी, नक्सलियों के खिलाफ जंग जीतना मुश्किल है। जाहिर है, लड़ाई बहुत लंबी है। यदि इसे जीतना है तो पुलिस या अर्द्धसैनिक बलों के जवानों को आम आदमी बनकर गांवों में आदिवासियों के बीच रहना होगा। जंगलों को ठीक से जानना होगा तथा ग्रामीणों का विश्वास जीतना होगा। तभी वे भेड़ों के बीच भेड़िये की पहचान कर पाएंगे और फिर उन्हें मारने में आसानी होगी। वरना नक्सलियों के हमले इसी तरह जारी रहेंगे और जानें जाती रहेंगी।

समाचार, सिनेमा »

[22 Jun 2010 | 2 Comments | ]
नेपाली माओवादियों पर बनी फिल्‍म के प्रदर्शन पर रोक

डेस्‍क ♦ सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टीफिकेशन यानी सेंसर बोर्ड ने नेपाल पर बने वृत्तचित्र फ्लेम्स ऑफ दि स्नो को सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए प्रमाणपत्र देने से इनकार कर दिया है। बोर्ड का मानना है कि ‘यह फिल्म नेपाल के माओवादी आंदोलन की जानकारी देती है और उसकी विचारधारा को न्यायोचित ठहराती है।’ बोर्ड की राय में हाल के दिनों में देश के कुछ हिस्सों में फैली माओवादी हिंसा को देखते हुए इस फिल्म के सार्वजनिक प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी जा सकती। ‘ग्रिन्सो’ और ‘थर्ड वर्ल्ड मीडिया’ के बैनर तले बनी 125 मिनट की इस फिल्म के निर्माता नेपाल मामलों के विशेषज्ञ वरिष्ठ पत्रकार आनंद स्वरूप वर्मा हैं और इसका निर्देशन किया है, आशीष श्रीवास्तव ने। फिल्म की पटकथा भी आनंद स्वरूप वर्मा ने लिखी है।

नज़रिया »

[16 Jun 2010 | 8 Comments | ]
जिन्‍हें माओवाद का मतलब समझ में नहीं आता…

आनंद स्‍वरूप वर्मा ♦ ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की पत्रकार अनोहिता मजुमदार ने एक दिसंबर 2001 को नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के अध्यक्ष प्रचंड (पुष्प कमल दहाल) से बातचीत की, जिसका विवरण इस अखबार के दो दिसंबर के अंक में प्रमुखता से प्रकाशित हुआ। बातचीत के दौरान इस प्रतिनिधि ने सवाल किया कि माओवादी योद्धाओं और आतंकवादियों में क्या फर्क है? इस सवाल का जवाब देते हुए कामरेड प्रचंड ने कहा कि ‘दोनों की किसी भी तरह से तुलना ही नहीं की जा सकती। आतंकवादी लोग निरीह और निहत्थी जनता के खिलाफ विवेकशून्य और आत्मघाती हमले करते हैं।