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Articles tagged with: maoist

नज़रिया »

[15 Apr 2011 | 2 Comments | ]

विश्वजीत सेन ♦ पश्चिम बंगाल के अब तक के घटनाक्रम को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि इस समझौते का नतीजा दुखदायी ही होगा, चूंकि ममता बनर्जी स्वभाव से कम्युनिस्ट विरोधी हैं। सिद्धार्थ शंकर राय के मुख्यमंत्रित्व काल में नक्सल-विरोधी दमन अभियान को नेतृत्व देनेवालों में एक वह भी थीं। गुजरात दंगे के दौरान भी वह एनडीए मंत्रिमंडल में बनी रहीं। फिर तहलका प्रकरण के दौरान मंत्रिमंडल से अलग हुईं। उनका एक प्रिय नारा है – पश्चिम बंगाल को लाल-मुक्त करो। लाल यानी कि कम्युनिस्ट। जिनके रग रग में कम्युनिस्ट विरोध समाया है, उनसे आप क्या उम्मीद कर सकते हैं?

असहमति, मोहल्‍ला रायपुर »

[21 Feb 2011 | No Comment | ]

विश्वरंजन ♦ आभार कि आपने मुझे छापा। बंधुवर, आपने मेरे बारे में लिखा – नक्‍सलियों के खिलाफ सत्ता अभियान के रणनीतिकार, लीडर। भाई इसमें ‘सत्ता अभियान के रणनीतिकार’ विशेषण क्या अनुचिति का इशारा नहीं है? एक पुलिस महानिदेशक सत्ता का नहीं, अपने कर्तव्यों का रणनीतिकार होता है, जो किसी राज्य की कानून और व्यवस्था की सुव्यवस्था के लिए जिम्मेदार है। आप भी सोचें – नक्सली क्या प्रचलित तंत्र के खिलाफ अपनी सत्ता के लिए अभियान नहीं चला रहे हैं? किंतु उन्हें हम सत्ता अभियान के रणनीतिकार नहीं कहते। क्यों?

नज़रिया »

[21 Feb 2011 | One Comment | ]

विश्वजीत सेन ♦ क्या रविलाल सिंह मुड़ा का पेट कभी भरा-पूरा रहा? लकड़ियां, पत्ते चुनने वाले का पेट क्या कभी भरा-पूरा रह सकता है? उनके परिवारवालों का? इसीलिए तो माओवादी उन्हें अपने दस्ते में शामिल करना चाहते थे और देखिए रविलाल की उद्दंडता। उन्होंने माओवादियों को नकार दिया। तभी तो उन्हें मरना पड़ा।माओवादी दोषी नहीं हैं। वे तो रविलाल के सामने विकल्प रख ही चुके थे – उनकी ‘क्रांति’ में शामिल होने का। दोषी हैं तो रविलाल जिन्होंने इस विकल्प को ठुकरा दिया। अब आप ही बताएं जनाब, ऐसे नासमझ लोगों के साथ कैसा बर्ताव किया जाना चाहिए? माओवादियों की आचार संहिता कहती है, उन्हें गोली से उड़ा देना चाहिए।

नज़रिया »

[10 Feb 2011 | 6 Comments | ]

विश्वरंजन ♦ नक्सली-माओवादी की एक खासियत यह है कि वे अपने सिद्धांत, दांव-पेंच, रणनीति, सभी कुछ अपने गोपनीय दस्तावेजों में विस्तार से अंकित कर देते हैं। दरअसल माओवादी अपने को घोर बौद्धिक मानते आये हैं और शायद सोचते हैं कि हर बात दस्तावेजों के सुपुर्द करना बौद्धिकता की निशानी है। पर ऎसा करते हुए वे अपने असल मनसूबों को भी उजागर कर देते हैं। यह दूसरी बात है कि उनके दस्तावेज चूंकि गोपनीय रहते हैं और सिर्फ उनके नेता एवं कैडर के पास तथा उनके शहरी सहयोगियों के पास होते हैं, आम जनता तक वे पहुंच नहीं पाते। पुलिस के पास बहुत बार ये दस्तावेज नक्सली शिविरों पर पुलिस कार्यवाही या मुखबिरों के जरिये पहुंच जाते हैं। इन दस्तावेजों के जरिये सीपीआई (माओवादी) का उद्देश्य बहुत साफ-साफ समझा जा सकता है।

असहमति, नज़रिया »

[10 Feb 2011 | 3 Comments | ]

विश्वजीत सेन ♦ मार्क्‍स ने जब अपने दर्शन की नींव रखी थी, तब उन्होंने सर्वहारा को संबोधित करते हुए कहा था – ‘तुम्हारे पास खोने के लिए बेड़ियों के सिवा कुछ भी नहीं है’… पर बेड़ियां सिर्फ हाथ और पैर में नहीं दिमागों में भी होती है, इस बात का अंदाजा मार्क्‍स को भी नहीं था। उन्होंने‘दिमाग’ के संदर्भ में हद से हद धर्म की बात की थी, जिसकी तुलना उन्होंने ‘अफीम’ से की थी। अफीम तो आदमी जब चाहे छोड़ सकता है, लेकिन उनके मस्तिष्क को जिन बेड़ियों ने जकड़ रखा है, उनको केौन तोड़ेगा? वैज्ञानिक चिंतन से दूर-दूर का रिश्‍ता नहीं, ऐसी बातें करना और सिर्फ करना ही नहीं, उन पर पूरी निष्ठा के साथ अमल करना, माओवादियों की फितरत में है।

नज़रिया, पुस्‍तक मेला »

[27 Jan 2011 | No Comment | ]

विश्‍वजीत सेन ♦ कबीर सुमन की पुस्तक से यह साफ है कि सिंगूर-नंदीग्राम आंदोलन की शुरुआत से ही ममता के नेतृत्व में राजनीतिक सट्टेबाज, माओवादियों से गठजोड़ बना चुके थे। कबीर सुमन की सोच रही होगी कि इस गठजोड़ का एकमात्र उद्देश्‍य था, ममता बनर्जी को सत्ता में लाना। उसके बाद किसे फिक्र रह जाती जनता की? कबीर सुमन को ममता बनर्जी की बेरूखी नहीं पची। अगर वह राजनीतिज्ञ होते, तो यही बेरुखी उन्हें भलीभांति पच जाती। कबीर सुमन की धारणा यह थी कि सत्ता में आने के बाद भी ममता उन्हें पूर्ववत सम्मानित करती रहेंगी। लेकिन राजनीतिज्ञ सट्टेबाजों के शब्‍दकोष में इस प्रकार के बर्ताव को मूर्खता की संज्ञा दी जाती है। अब तक की घटनाएं प्रमाणित कर चुकी हैं, ममता और जो कुछ भी हो, मूर्ख तो कतई नहीं है।

नज़रिया »

[7 Jan 2011 | 2 Comments | ]

चंद्रिका ♦ बिनायक सेन के आजीवन कारावास पर बहस का केंद्रीय बिंदु माओवादी हो रहे देश में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, लेखकों व बुद्धिजीवियों की भूमिका पर है। नारायण सान्याल, कोबाद गांधी, अभिषेक मुखर्जी जैसे बुद्धिजीवियों के माओवादी हो जाने का प्रश्न है। कि आखिर तेरह भाषाओं का जानकार और जादवपुर विश्वविद्यालय का स्‍कॉलर छात्र माओवादी क्यों बना? एक मानवाधिकार कार्यकर्ता छत्तीसगढ़ या पश्चिम बंगाल में आज अपनी भूमिका कैसे अदा करे? क्या यह सलवा-जुडुम की सरकारी हिंसा को वैध करके या फिर इसके प्रतिरोध में जन आंदोलन के साथ खड़े होकर। क्या इन जनांदोलनों को इस आधार पर खारिज किया जा सकता है कि यह माओवादियों के नेतृत्व में चल रहे हैं?

नज़रिया, बात मुलाक़ात »

[1 Jan 2011 | 9 Comments | ]

अरुंधती राय ♦ आप एक ऐसी अवस्था का निर्माण कर रहे हैं जिसमें राष्ट्रविरोधी की परिभाषा यह हो जाती है कि जो अधिक से अधिक लोगों की भलाई के लिए काम कर रहा है, यह अपने आप में विरोधाभासी और भ्रष्ट है। विनायक सेन जैसा आदमी जो सबसे गरीब लोगों के बीच काम करता है अपराधी हो जाता है, लेकिन न्यायपालिका, मीडिया तथा अन्यों की मदद से जनता के एक लाख 75 हजार करोड़ रुपये का घोटाला करने वालों का कुछ नहीं होता। वे अपने फार्म हाउसों में, अपने बीएमडब्ल्यू के साथ जी रहे हैं। इसलिए राष्ट्रविरोधी की परिभाषा ही अपने आप में भ्रष्ट हो चुकी है… जो कोई भी न्याय की बात कर रहा है, उसको माओवादी घोषित कर दिया जाता है। यह कौन तय करता है कि राष्ट्र के लिए क्या अच्छा है।

नज़रिया, मोहल्ला पटना »

[31 Oct 2010 | 12 Comments | ]

विश्‍वजीत सेन ♦ जाति या वर्ण को आधार बनाकर रणनीति तय करने का जो बुरा नतीजा सामने आया, वह यह है कि माओवादी संगठन जाति के आधार पर बंटने लगा। केवल वही नहीं, माओवादी नेताओं की मानसिकता भी उसी के अनुरूप ढलने लगी। इसका ज्वलंत उदाहरण तब सामने आया, जब कजरा मामले में माओवादी कमांडर अरविंद यादव ने अभय यादव की जगह लुकस टेटे को मार गिराया। लूकस टेटे आदिवासी थे और ईसाई भी। ये दोनों पहचान वर्ण व्यवस्था के बाहर की है। इस हत्या के विरोध में माओवादी कमांडर बगावत पर उतर आये। दोनो पक्षों के बीच जमकर गोलियां चलीं। इस आपसी संघर्ष को अगर आप ‘लोकयुद्ध’ कहें तो किसी को क्या आपत्ति हो सकती है?

नज़रिया, मोहल्ला पटना »

[20 Oct 2010 | 15 Comments | ]

विश्‍वजीत सेन ♦ ममता बनर्जी की महत्वाकांक्षा सीमित है। प बंगाल अनकी जूतियों तले रहे, बस। इतना ही हो जाए, तो वो फूल कर बाग-बाग हो जाएंगी। देश में क्या हो रहा है, अर्थतंत्र में क्या हो रहा है, यहां तक कि रेल मंत्रालय में क्या हो रहा है, इससे उन्हें कुछ भी लेना-देना नहीं है। उनकी स्थिति एक घरेलू झगड़ालू औरत जैसी है, जो अपने जेठ के परिवार को नीचा दिखाकर खुश रहती है, उसे और कुछ नहीं चाहिए। लेकिन माओवादियों को क्या कहें? इस नीच, गंदी महत्वाकांक्षा की बलिवेदी पर खुद को जो कुर्बान कर रहे हैं, क्या उन्हें हम क्रांतिकारी कह सकते हैं? विगत डेढ़ वर्षों में जंगलमहल में सैकड़ों लोगों की जान गयी है। मगर क्यों? इसलिए की ममता बनर्जी प बंगाल की मुख्यमंत्री बनें। वैसा अगर हो भी गया तो क्या हो जाएगा?