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कृष्णकांत ♦ वह लखनऊ गया। बॉस ने पूछा, सीवी लाये हो? उसने हां कहते हुए सीवी उन्हें पकड़ा दी। बॉस ने नाम पढ़ते ही उसे घूरते हुए पूछा, अच्छा मौर्या हो? बड़े होशियार लगते हो! तुमने पहले नहीं बताया कि तुम मौर्या हो? उसने कहा, सर बताया तो था पूरा नाम, आपने ध्यान न दिया होगा। बॉस के चेहरे की शिकन देख कर उसे भी समझ नहीं आया कि ऐसी क्या बात है, जो इन्हें इतना परेशान कर रही है? वह थोड़ी देर तक सर झुकाये बैठा रहा, फिर सीवी अपने बगल में बैठे जूनियर को पकड़ा दिया और कहा, ठीक है। तुम्हारा मामला ये देखेंगे… और उठकर जाने लगा। जूनियर ने कहा, अरे सर, मैं क्या देखूंगा, आप यहां के हेड हैं। आप ही देखिए। उसने अनसुना कर दिया और चला गया।
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डेस्क ♦ भोपाल में ग़रीब पत्रकारों को आशियाना अलॉट करने के मामले में भारी घपलेबाज़ी हो रही है। पिछले साल विधानसभा चुनाव के वक्त मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राजधानी के ग़रीब पत्रकारों को घर देने का एलान किया था। यह एलान ऐसे पत्रकारों के लिए था, जिनके पास अपना घर, अपनी ज़मीन नहीं है। इसके लिए भोपाल में प्रस्तावित अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के पास 11 एकड़ के प्लॉट को लोकेट कर लिया गया था। इस प्लॉट का बाज़ार भाव 30 करोड़ का था, जबकि कोऑपरेटिव सोसाइटी के लिए इसकी क़ीमत रखी गयी महज तीन करोड़ रुपये। फिर तो इसके टुकड़े पाने के लिए होड़ मच गयी। एक मीडिया हाउस के मालिक ने अपने रिश्तेदारों के लिए औने-पौने दाम में एक प्लॉट अलॉट करवा लिया।
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IIMC का एक पूर्व छात्र ♦ देश के प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान आईआईएमसी के हिंदी पत्रकारिता विभाग के सत्र 2008-09 के छात्रों के बीच इन दिनों कई हलचलें हैं। छात्रों की परीक्षा लेने और उन्हें नौकरी देने के लिए बीएचईएल (भारत हैवी इलैक्ट्रिकल्स लिमिटेड) संस्थान के प्रांगण में आ रही है। मगर बात यह है कि कौन इस परीक्षा में बैठ सकता है और कौन नहीं – इसके पैमाने बदल गये हैं। कोई पुराने मानदंड नहीं, कोई वर्तमान मानदंड नहीं, कोई अंकों का, आरक्षण का और बेरोज़गार होने का क्राइटेरिया नहीं। जिसे सरजी चाहेंगे, वही बैठेगा। सरजी कहते हैं कि कक्षा के बदतर या वाहियात माल को मैं इस बार अपनी स्टाल पर नहीं लगाऊंगा। जो मुझे पसंद होगा, वही बैठेगा।
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प्रमोद रंजन ♦ इस तथ्य को कैसे अनदेखा किया जा सकता है कि बिहार जैसे बड़े राज्य के हिंदी-अंग्रेजी मीडिया संस्थानों में ‘फैसला लेने वाले पदों’ पर न कोई आदिवासी है, न दलित, न पिछड़ा, न ही कोई महिला। कुछ कागजी अपवादों को छोड़ दें तो एक लाख वर्ग किलोमीटर में गंगा, फल्गु, सोन, कोसी, गंडक, बागमती, कमला, महानंदा, कर्मनाशा आदि नदियों के बीच फैली 9 करोड़ से अधिक की विशाल आबादी की सामाजिक, सांस्कृतिक विवधिता का कोई संकेत यहां मौजूद नहीं है। सब के सब हिंदू, सबके सब द्विज और सबके सब पुरुष!
मीडिया मंडी, मोहल्ला दिल्ली »
डेस्क ♦ बड़ी कंपनियों में फर्जी़वाड़ा होता रहा है और उसकी ख़बरें भी दिखायी, छापी जाती रही हैं। लेकिन मीडिया कंपनियों के फर्जी़वाड़े आम तौर पर छिपे-छिपाये ही रहते हैं। वीओआई सहित कई मामलों में हमने इस रीति-नीति को सोदाहरण देखा। लेकिन एक घटना जो 7 सितंबर को बाराखंभा रोड थाने में दर्ज की गयी है, क्या उसे भी मीडिया अनदेखा ही रखेगा? हुआ यह है कि मशहूर टीवी पत्रकार नलिनी सिंह की दिल्ली के बाराखंभा रोड पर कंचनजंघा अपार्टमेंट के छठें फ्लोर पर मौजूद प्रोडक्शन कंपनी टीवी लाइव इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के खाते से 50 लाख रुपये का गबन कर लिया है।
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मीडिया मार्ग ♦ दिल्ली के इंटरकांटिनेंटल होटल में आज इंडियन न्यूज़ ब्रॉडकास्टिंग अवार्ड की घोषणा कर दी गयी। कई न्यूज चैनलों के टीवी पत्रकारों को ये अवार्ड दिया गया। हिंदी और अंग्रेजी न्यूज चैनलों के लिए कुल 11 कैटेगरी के अवार्ड के लिए नॉमिनेशन मंगाये गये थे। कुल 44 मीडियाकर्मी नॉमिनेट हुए थे, जिनमें से विजेताओं के नाम का आज एलान किया गया। इसके अलावा कुछ ऐसी कैटेगरी भी थी, जिसके लिए नॉमिनेशन नहीं मंगायी गयी थी, उनके बारे में फैसला ज्यूरी ने किया। जैसे एडिटर इन चीफ ऑफ द इयर (हिंदी और अंग्रेजी), सीईओ ऑफ द इयर, एंटरप्रेन्योर ऑफ द इयर। दिल्ली के पांच सितारा होटल रात करीब नौ बजे अवार्ड समारोह की शुरुआत हुई।
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अरविंद शेष ♦ ये सिर्फ दो दृश्य नहीं हैं। इसीलिए इसका अर्थ भी सिर्फ इन दृश्यों से न लें। मोहल्ले में जो बहस अजीत अंजुम की टीवी मीडिया के बारे में राय से शुरू हुई और जिन दो नौजवान मीडिया-नागरिकों ने बाज़ार में खड़े टीवी मीडिया के मौजूदा कंटेंट का बचाव किया – ये दृश्य उन्हीं के जवाब में तलाशे गये हैं। हम बताएं कि ये काल्पनिक दृश्य नहीं हैं – पटना के गांधी मैदान और कई दूसरे शहरों के सार्वजनिक मैदानों में ऐसे दृश्य भरी दोपहरी में उपस्थित रहते हैं। इन दृश्यों के माध्यम से शायद लेखक टीवी मीडिया के मौजूदा दौर की दुर्दशा बताना चाह रहा है। बाक़ी आप प्रबुद्ध पाठक हैं, अपनी तरह से भी इन दृश्यों के अर्थ निकाल सकते हैं।
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विवेक सत्यमित्रम ♦ मुझे लगता है आलोचना का भी अपना एक बाज़ार है। हो सकता है इस बाज़ार में टीआरपी, विज्ञापन या फिर ब्रांडिंग जैसी मजबूरियां न हों। लेकिन हाजमा दुरुस्त रखना क्या कम बड़ी वजह है, जिसके लिए आलोचक बिरादरी के लोग तल्लीन होकर लगे रहते हैं। समस्या ये है कि कोई भी शख्स अगर अपनी बात रखने की कोशिश करता है, तो इस खास बिरादरी के लोग ये मान बैठते हैं मानो वो अपने किये हुए पापों की कनफेशन कर रहा है। और फिर… छीछालेदर का जो शानदार कार्यक्रम शुरु होता है, उसकी मिसाल यहां भी आपको दिख जाएगी। पता नहीं क्यों, ये लोग समाज की थॉट डाइवर्सिटी को स्वीकार नहीं करना चाहते। इन्हें लगता है, जैसे वो सोच रहे हैं… पूरी दुनिया को उनके जैसी सोच डेवलप कर लेनी चाहिए।
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अजीत अंजुम ♦ मैं एक पत्रकार हूं तो एक मैंने ‘पोल खोल’ भी बनाया और ‘सनसनी’ भी। मैंने राजनीति और अपराध पर भी कार्यक्रम बनाये। मुझे ‘सनसनी’ पर एतराज नहीं है। आप इतेफाक नहीं रखते होंगे, जिसमें एक दाढ़ी वाला एंकर हो। लेकिन उसमें दस ऐसी चीज़ है जो मुझे लगता है कि हमने नया किया। जिसमें स्टिंग ऑपरेशन हो और खास किस्म की आक्रामकता हो, समाज में जो लोग गलत काम कर रहें हैं, चाहे वह साधु हो या फ्रॉड बाबा हो या भ्रष्ट नौकरशाह- हमने एक कैंपेन चलाया था कि ‘बच नहीं सकेंगे वो, घूस लेते है जो।’ दो सौ से ज्यादा ऑफिसर, मैं सिपाही हवलदार की बात नहीं कर रहा हूं, क्योंकि इसमें भी आलोचक लिख देंगे कि हवलदार और सिपाही को पकड़वाये।
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मृणाल वल्लरी ♦ वैसे मुझे रविशंकर जी के भाषण से ज्यादा वेबसाइट संचालक की इस बात में जिज्ञासा जगी कि भाजपा के सांसद के मुंह से ऐसी बातें। इस आलेख के निचले हिस्से को पढ़ते ही पता चल जाएगा कि यह किसी भाजपाई नेता के ही विचार हो सकते हैं। यहीं पर आकर एक प्रबुद्ध राजनीतिज्ञ की रचनात्मकता का अंत हो जाता है। समाज और संस्कृति की चिंता की आड़ में वही हिंदुत्वादी नीति। टीवी पर रामदेव और कृष्णा दिखाओ। भारतीय समाज और भारतीय दर्शक को इससे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए। मॉनिटरिंग का यही मतलब होगा कि टीवी पर योग और अध्यात्म का शिकंजा होगा। टीआरपी के केंद्र में होंगे हिंदुत्व के झंडाबरदार बाबा रामदेव।


