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Articles tagged with: मीडिया मंडी

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[14 Jun 2010 | 5 Comments | ]
साहित्‍यकार मीडिया में गुमनाम क्‍यों हैं?

रवीश कुमार ♦ दो ही बातें हो सकती हैं। मीडिया इतनी बड़ी हो गयी है कि साहित्यकारों की हैसियत तय करना चाहती है या फिर साहित्यकार इतने कमतर हो गये हैं कि मीडिया से उद्धार चाहते हैं। माध्यम की ठसक देखिए। पर ऐसा क्या है जहां आकर हमारे साहित्यकार मीडिया को रचनात्मकता से भर देंगे। हू हा.. हुंकार की बोली युग में मैं किसी केदारनाथ सिंह जी को स्टुडियो में भयभीत बैठे देखने की कल्पना नहीं कर सकता। मुझे नहीं लगता कि जो आज की मीडिया है उसमें साहित्यकारों की कोई जगह और ज़रूरत है। मैं जहां है जैसा है के आधार पर बोल रहा हूं। एक कारण यह है कि अब पत्रकार रघुवीर सहाय या अज्ञेय होने की ख्वाहिश लेकर नहीं आता है।

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[31 May 2010 | 9 Comments | ]
झूठ बोलने पर अगर मीडिया पर हमला कर दें माओवादी!

चंद्रिका ♦ खड़गपुर की पटरियों से रेलगाड़ियां फिर से गुजरने लगी हैं। आइबीएन सेबन का पत्रकार पटना से चलकर वहां सबसे पहले पहुंचा था। ऐसा दावा उस चैनल का है। बस थोड़ी सी चूक हुई और उस थोड़ी सी चूक और थोड़ी देरी का अफसोस हर चैनल को रहेगा और रहना भी चाहिए… कि वे उन माओवादियों की तस्वीर नहीं ले पाये जिन्होंने हमले किये थे। शायद किसी चैनल के पत्रकार ने इन्हें भागते हुए भी देखा हो। पर सबूत का अभाव। खैर सबूत कोई मायने नहीं रखते। खबर हमारी और फैसला आपका। देश के गृहमंत्रालय के पास इस बात की खबर भले न हो, देश की आईबी को इस बात की जानकारी रही हो या नही, अलबत्ता माओवादी पार्टी के नेताओं को भी इस बात की भनक नहीं थी कि इस घटना को वे अंजाम दे रहे हैं…

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[30 May 2010 | 6 Comments | ]
खामोश, मीडिया में दलितों के लिए कोई जगह नहीं है!

संजय कुमार ♦ बिहार की राजधानी पटना में काम कर रहे मीडिया हाउसों में 87 प्रतिशत सवर्ण जाति के हैं। इसमें ब्राह्यण 34, राजपूत 23, भूमिहार 14 एवं कायस्‍थ 16 प्रतिशत है। हिंदू पिछड़ी-अति पिछड़ी जाति, अशराफ मुसलमान और दलित समाज से आने वाले मात्र 13 प्रतिशत पत्रकार हैं। इसमें सबसे कम प्रतिशत दलितों की है। लगभग एक प्रतिशत ही दलित पत्रकार बिहार के मीडिया से जुड़े हैं। वह भी कोई ऊंचे पद पर नहीं हैं। महिला सशक्‍तीकरण के इस युग में दलित महिला पत्रकार को ढूंढना होगा। बिहार के किसी मीडिया हाउस में दलित महिला पत्रकार नहीं के बराबर है। हालांकि आंकड़े बताते हैं कि दलित महिला पत्रकारों का प्रतिशत शून्य है।

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[14 Dec 2009 | 4 Comments | ]
दलित था, डराया गया, छोड़ दी मीडिया की नौकरी

कृष्‍णकांत ♦ वह लखनऊ गया। बॉस ने पूछा, सीवी लाये हो? उसने हां कहते हुए सीवी उन्हें पकड़ा दी। बॉस ने नाम पढ़ते ही उसे घूरते हुए पूछा, अच्छा मौर्या हो? बड़े होशियार लगते हो! तुमने पहले नहीं बताया कि तुम मौर्या हो? उसने कहा, सर बताया तो था पूरा नाम, आपने ध्यान न दिया होगा। बॉस के चेहरे की शिकन देख कर उसे भी समझ नहीं आया कि ऐसी क्या बात है, जो इन्‍हें इतना परेशान कर रही है? वह थोड़ी देर तक सर झुकाये बैठा रहा, फिर सीवी अपने बगल में बैठे जूनियर को पकड़ा दिया और कहा, ठीक है। तुम्हारा मामला ये देखेंगे… और उठकर जाने लगा। जूनियर ने कहा, अरे सर, मैं क्या देखूंगा, आप यहां के हेड हैं। आप ही देखिए। उसने अनसुना कर दिया और चला गया।

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[2 Oct 2009 | One Comment | ]
मध्‍यप्रदेश में पत्रकारों के नाम की ज़मीन पर घोटाला

डेस्‍क ♦ भोपाल में ग़रीब पत्रकारों को आशियाना अलॉट करने के मामले में भारी घपलेबाज़ी हो रही है। पिछले साल विधानसभा चुनाव के वक्‍त मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राजधानी के ग़रीब पत्रकारों को घर देने का एलान किया था। यह एलान ऐसे पत्रकारों के लिए था, जिनके पास अपना घर, अपनी ज़मीन नहीं है। इस‍के लिए भोपाल में प्रस्‍तावित अंतर्राष्‍ट्रीय हवाई अड्डे के पास 11 एकड़ के प्‍लॉट को लोकेट कर लिया गया था। इस प्‍लॉट का बाज़ार भाव 30 करोड़ का था, जबकि कोऑपरेटिव सोसाइटी के लिए इसकी क़ीमत रखी गयी महज तीन करोड़ रुपये। फिर तो इसके टुकड़े पाने के लिए होड़ मच गयी। एक मीडिया हाउस के मालिक ने अपने रिश्‍तेदारों के लिए औने-पौने दाम में एक प्‍लॉट अलॉट करवा लिया।

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[19 Sep 2009 | 78 Comments | ]
एक शिक्षक की कृपा पर टिका आईआईएमसी का कैंपस

IIMC का एक पूर्व छात्र ♦ देश के प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान आईआईएमसी के हिंदी पत्रकारिता विभाग के सत्र 2008-09 के छात्रों के बीच इन दिनों कई हलचलें हैं। छात्रों की परीक्षा लेने और उन्हें नौकरी देने के लिए बीएचईएल (भारत हैवी इलैक्ट्रिकल्‍स लिमिटेड) संस्थान के प्रांगण में आ रही है। मगर बात यह है कि कौन इस परीक्षा में बैठ सकता है और कौन नहीं – इसके पैमाने बदल गये हैं। कोई पुराने मानदंड नहीं, कोई वर्तमान मानदंड नहीं, कोई अंकों का, आरक्षण का और बेरोज़गार होने का क्राइटेरिया नहीं। जिसे सरजी चाहेंगे, वही बैठेगा। सरजी कहते हैं कि कक्षा के बदतर या वाहियात माल को मैं इस बार अपनी स्टाल पर नहीं लगाऊंगा। जो मुझे पसंद होगा, वही बैठेगा।

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[16 Sep 2009 | 10 Comments | ]
बिहार की पत्रकारिता में जाति की सड़ांध पर सर्वे

प्रमोद रंजन ♦ इस तथ्य को कैसे अनदेखा किया जा सकता है कि बिहार जैसे बड़े राज्य के हिंदी-अंग्रेजी मीडिया संस्थानों में ‘फैसला लेने वाले पदों’ पर न कोई आदिवासी है, न दलित, न पिछड़ा, न ही कोई महिला। कुछ कागजी अपवादों को छोड़ दें तो एक लाख वर्ग किलोमीटर में गंगा, फल्गु, सोन, कोसी, गंडक, बागमती, कमला, महानंदा, कर्मनाशा आदि नदियों के बीच फैली 9 करोड़ से अधिक की विशाल आबादी की सामाजिक, सांस्कृतिक विवधिता का कोई संकेत यहां मौजूद नहीं है। सब के सब हिंदू, सबके सब द्विज और सबके सब पुरुष!

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[12 Sep 2009 | 7 Comments | ]
नलिनी सिंह के साथ 50 लाख का धोखा, एफआईआर दर्ज

डेस्‍क ♦ बड़ी कंपनियों में फर्जी़वाड़ा होता रहा है और उसकी ख़बरें भी दिखायी, छापी जाती रही हैं। लेकिन मीडिया कंपनियों के फर्जी़वाड़े आम तौर पर छिपे-छ‍िपाये ही रहते हैं। वीओआई सहित कई मामलों में हमने इस रीति-नीति को सोदाहरण देखा। लेकिन एक घटना जो 7 सितंबर को बाराखंभा रोड थाने में दर्ज की गयी है, क्‍या उसे भी मीडिया अनदेखा ही रखेगा? हुआ यह है कि मशहूर टीवी पत्रकार नलिनी सिंह की द‍िल्‍ली के बाराखंभा रोड पर कंचनजंघा अपार्टमेंट के छठें फ्लोर पर मौजूद प्रोडक्‍शन कंपनी टीवी लाइव इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के खाते से 50 लाख रुपये का गबन कर लिया है।

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[27 Aug 2009 | No Comment | ]
इंडियन न्‍यूज़ ब्रॉडकास्टिंग अवार्ड 2009 का एलान, समारोह

मीडिया मार्ग ♦ दिल्ली के इंटरकांटिनेंटल होटल में आज इंडियन न्यूज़ ब्रॉडकास्टिंग अवार्ड की घोषणा कर दी गयी। कई न्यूज चैनलों के टीवी पत्रकारों को ये अवार्ड दिया गया। हिंदी और अंग्रेजी न्यूज चैनलों के लिए कुल 11 कैटेगरी के अवार्ड के लिए नॉमिनेशन मंगाये गये थे। कुल 44 मीडियाकर्मी नॉमिनेट हुए थे, जिनमें से विजेताओं के नाम का आज एलान किया गया। इसके अलावा कुछ ऐसी कैटेगरी भी थी, जिसके लिए नॉमिनेशन नहीं मंगायी गयी थी, उनके बारे में फैसला ज्यूरी ने किया। जैसे एडिटर इन चीफ ऑफ द इयर (हिंदी और अंग्रेजी), सीईओ ऑफ द इयर, एंटरप्रेन्योर ऑफ द इयर। दिल्ली के पांच सितारा होटल रात करीब नौ बजे अवार्ड समारोह की शुरुआत हुई।

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[9 Aug 2009 | One Comment | ]
बीच बहस में रुहानी और सातों इल्मों के बेताज बादशाह

अरविंद शेष ♦ ये सिर्फ दो दृश्‍य नहीं हैं। इसीलिए इसका अर्थ भी सिर्फ इन दृश्‍यों से न लें। मोहल्‍ले में जो बहस अजीत अंजुम की टीवी मीडिया के बारे में राय से शुरू हुई और जिन दो नौजवान मीडिया-नागरिकों ने बाज़ार में खड़े टीवी मीडिया के मौजूदा कंटेंट का बचाव किया – ये दृश्‍य उन्‍हीं के जवाब में तलाशे गये हैं। हम बताएं कि ये काल्‍पनिक दृश्‍य नहीं हैं – पटना के गांधी मैदान और कई दूसरे शहरों के सार्वजनिक मैदानों में ऐसे दृश्‍य भरी दोपहरी में उपस्थित रहते हैं। इन दृश्‍यों के माध्‍यम से शायद लेखक टीवी मीडिया के मौजूदा दौर की दुर्दशा बताना चाह रहा है। बाक़ी आप प्रबुद्ध पाठक हैं, अपनी तरह से भी इन दृश्‍यों के अर्थ निकाल सकते हैं।