Tagged: mukesh kumar

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एमजे अकबर के अधोपतन को यहां से देखें

♦ मुकेश कुमार एक अच्छा खासा पत्रकार और लेखक सिर्फ सत्ता प्रतिष्ठान का अंग बनने के प्रलोभन में किस तरह प्रतिक्रियावादी हो जाता है, इसकी मिसाल हैं एमजे अकबर। दस जनवरी के टाइम्स ऑफ...

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एक कविता, अनेक भारत [ViA Tagore]

अरुण माहेश्‍वरी ➡ पिछले दिनों कृष्ण कल्पित की कविता की एक पंक्ति ने चौंका दिया था, मैं चाहे कबूतर की सूखी हुई बीट हूं, पर मैं कवि नहीं हूं…, आज मुकेश कुमार की पूरी...

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हां, हम सब हरामजादे हैं! #MukeshKumar

पिछले महीने, दिल्ली में, केंद्रीय मंत्री निरंजन ज्योति ने ‘रामजादे’ बनाम ‘हरामजादे’ वाला चर्चित घोर सांप्रदायिक वक्तव्य अपने एक भाषण में दिया था, उससे कितनों की ‘भावनाएं आहत हुईं’ इसका हिसाब कौन रखेगा? लेकिन...

पत्रकार फूंकेंगे पेड न्यूज के खिलाफ बिगुल 9

पत्रकार फूंकेंगे पेड न्यूज के खिलाफ बिगुल

मुकेश कुमार ♦ बिहार और झारखंड के पत्रकारों ने पेड न्यूज के खिलाफ कमर कस ली है। पत्रकारों और पत्रकारिता की साख को चौपट करने वाली इस बीमारी का विरोध करने के लिए वे एकजुट हो रहे हैं और आगामी 28 अगस्त को बाकायदा अपनी आवाज भी बुलंद करेंगे। पत्रकारों ने पेड न्यूज को रोकने की दिशा में सक्रिय हस्तक्षेप करने की गरज से एंटी पेड न्यूज फोरम का गठन किया है। ये संगठन पेड न्यूज के कारोबार पर नजर रखेगा और इस तरह की तमाम गतिविधियों को लोगों के सामने लाने की कोशिश भी करेगा। संगठन में कोई भी पद नहीं रखा गया है। केवल एक कोर कमेटी होगी, जो सबसे सलाह-मशवरा करके काम करेगी। पेड न्यूज पर लगाम लगाने की दिशा में एंटी पेड न्यूज फोरम 28 अगस्त को महासम्मेलन करने जा रहा है।

मीडिया खड़ा बाजार में, सबको ग्‍लैमर देय… 2

मीडिया खड़ा बाजार में, सबको ग्‍लैमर देय…

मुकेश कुमार ♦ लोग यह समझने लगे हैं कि प्रेस ऐसी ताकत है, जिसके सहारे दूसरों के गलत कामों की तरफ उंगली उठायी जा सकती है, और अपने गलत कामों पर पर्दा डाला जा सकता है। भारत में अंग्रेज छापाखाना लेकर आये ताकि गुलामी की जंजीर को और मजबूती से जकड़ा जाए। लेकिन हमारे जुझारू नेताओं ने छापाखाने को हथियार की तरह प्रयोग किया। पिछले लोकसभा चुनावों में मीडिया के एक बड़े हिस्से ने जिस तरह बड़े पैमाने पर पैसे लेकर विज्ञापनों को खबर की शक्‍ल में छापा, उसे एक मिशन की नीलामी नहीं, तो और क्‍या कहा जाएगा? तब प्रभाष जोशी और विनोद दुआ जैसे कुछ पत्रकारों ने इस मसले को जोर-शोर से उठाया था। लेकिन आंदोलन से व्यवसाय बन चुकी पत्रकारिता के कथित कर्णधारों को कोई खास फर्क नहीं पड़ा।

बिहार को छवियों का बंधुआ नहीं बनना चाहिए 1

बिहार को छवियों का बंधुआ नहीं बनना चाहिए

डेस्‍क ♦ नवभारत टाइम्स, पटना के पूर्व संपादक अरुण रंजन ने कहा कि मीडिया में बिहार की दो छवियां हैं – एक प्रगट है तो दूसरी अप्रगट। इन दोनों के बीच अंदर ही अंदर टकराहट चलती रहती है। जेपी आंदोलन के समय और आपातकाल के बाद बिहार में एक नयी पत्रकारिता का उदय हुआ, जिसने भूमि संघर्ष, बूथ कैप्चरिंग, अवैध हथियार के बारे में खुल कर लिखा। सामाजिक मान्यता प्राप्त अपराधियों के खिलाफ भी लिखा गया। इससे बिहार की खून खराबे वाली तस्वीर तो बनी, बदनामी भी हुई लेकिन उससे बड़ी एक और छवि बनी वह थी प्रतिरोध करने के जुझारूपन की। इसी जुझारूपन से राज्य और देश में बड़े बदलाव का रास्ता तैयार हुआ। नेगेटिव इमेज के डर से बड़े मकसद को छोड़ा नहीं जा सकता है।

बिहार की ‘मीडियावी’ छवि पर सेमिनार 28 को 4

बिहार की ‘मीडियावी’ छवि पर सेमिनार 28 को

डेस्‍क ♦ बिहार और बिहारियों के बीच ये सवाल अकसर उठता रहा है कि क्या मीडिया बिहार की वास्तविक तस्वीर दिखाता है या फिर कहीं वह पहले से बनी बनाई स्टीरियोटाइप इमेज को ध्यान में रखकर चीज़ों को पेश तो नहीं करता रहता? बिहार के लोग तो ये भी शिकायत करते मिल जाएंगे कि मीडिया ने बिहार की एक नकारात्मक छवि गढ़ी है जिससे ग़ैर बिहारियों की नज़र में वे दीन-हीन बन जाते हैं। उनका कहना है कि बिहार के बारे में मीडिया अपराध, जातिवाद, बाढ़, सूखा, भ्रष्टाचार, राजनीतिक अराजकता, हिंसा और पलायन आदि की ख़बरें ही प्रमुखता से प्रकाशित करता है जबकि राज्य में सब कुछ बुरा ही हो रहा हो ऐसा नहीं है।

अब मुकेश कुमार संभालेंगे मौर्या टीवी की कमान 2

अब मुकेश कुमार संभालेंगे मौर्या टीवी की कमान

डेस्‍क ♦ देशकाल के संपादक मुकेश कुमार लॉन्चिंग की प्रतीक्षा कर रहे प्रकाश झा के टीवी चैनल मौर्या टीवी की कमान संभालेंगे। वे ‘मौर्य टीवी’ के डायरेक्टर बनाये गये हैं। मुकेश को चैनल लांचिंग कराने से लेकर इसके न्यूज, मार्केटिंग, डिस्ट्रीब्यूशन समेत सभी विभागों का ज़‍िम्मा दिया गया है। मुकेश कुमार पुराने टीवी पत्रकारों में से रहे हैं और सुबह सबेरे के लोकप्रिय दूरदर्शनी दिनों में वे टीवी पर न्‍यूज़ पढ़ते थे और वरिष्‍ठ आलोचक नामवर सिंह से पुस्‍तक चर्चा करते थे। उनके पत्रकारीय सफ़र में जो कुछ अहम पड़ाव रहे हैं, उनमें गोहाटी का अख़बार द सेंटीनल, सहारा समय, वॉयस ऑफ इंडिया, एस वन का ज़‍िक्र किया जा सकता है।

ये 21वीं सदी में भी जातीय श्रेष्‍ठता की बात करते हैं :-) 9

ये 21वीं सदी में भी जातीय श्रेष्‍ठता की बात करते हैं :-)

दिलीप मंडल ♦ ये बेखबर लोग अगर अपनी बात खुद तक ही रखें तो हमें धेले भर की परवाह नहीं। लेकिन वो बोल रहे हैं और बेहद बेतुका और बेहूदा बोल रहे हैं। ये दोनों लोग ऐसी बातें बोल रहे हैं, जो उनके चेलों के अलावा हर किस को अखर रही है। मैं एक भी ऐसे आदमी को नहीं जानता, जो जातिवाद के समर्थन में उनके विचारों का कम से कम सार्वजनिक तौर पर समर्थन करें। इन दोनों महान लोगों के चेलों के पास भी बचाव में देने को कोई तर्क नहीं हैं। आखिर इनके चेलों में से भी कई ने जाति से बाहर शादी की है। उन्हें मालूम है कि उनकी अगली पीढ़ी क्या करने वाली है। हर जाति के लोगों को ये लेखन आउटडेटेड और सड़ा हुआ लग रहा है।

फिर शुरू होगा पहल का रुका हुआ सफ़र 3

फिर शुरू होगा पहल का रुका हुआ सफ़र

साहित्य और विचार-प्रेमियों के लिए एक खुशखबरी है। कुछ समय पहले स्थगित कर दी गयी सुप्रतिष्ठित पत्रिका पहल का प्रकाशन फिर से शुरू होने जा रहा है। लगभग पैंतीस साल तक पहल निकालने के बाद संपादक ज्ञानरंजन ने कुछ समय पहले इसे स्थगित कर दिया था। मगर अब ये पत्रिका फिर से शुरू हो रही है। अब यह पुस्तकाकार में प्रकाशित न होकर इंटरनेट पर उपलब्ध होगी। जल्दी ही इसे देशकाल.कॉम पर पढ़ा जा सकेगा।