Articles tagged with: मोहल्ला मुंबई
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प्रणव प्रियदर्शी ♦ जलेस की महाराष्ट्र ईकाई का पत्र देखा। बतौर कवि विजय शंकर चतुर्वेदी के आकलन के लिए वह स्वतंत्र हैं, व्यक्ति के तौर पर भी विजय के अपने व्यक्तित्व और स्वभाव के आधार पर उनके प्रति अपना रवैया तय करने का अधिकार अन्य सभी व्यक्तियों की तरह जलेस के साथियों को भी है। लेकिन जलेस की भूमिका पर की गयी एक टिप्पणी के जवाब मे करीब दस साल पुरानी व्यक्तिगत जीवन की एक दुखद घटना को आधार बना कर उन पर हमला बोलना और उसमें भी तथ्यात्मक रूप से ग़लत आरोप लगाना कम से कम जलेस जैसे संगठन को शोभा नहीं देता।
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अरविंद शेष ♦ ऐसे तमाम तथाकथित लेखक मिल जाएंगे जो कथित तौर पर कविताएं लिखते हैं और कविता के मंचों पर क्रांतिकारी होने का तमगा लटकाये नाचते फिरते हैं – लेकिन घर में अपनी पत्नी और बच्चों को जूते की नोंक बराबर नहीं समझते। कविताई करने की महानता ओढ़ लेने के बाद शादी करते हैं और मौका मिलते ही कुत्तों की तरह दूसरी स्त्रियों के पीछे दुम हिलाने लगते हैं। फिर शुरू होता है पहले पत्नी को यह समझाने का दौर कि लेखक तो चार-चार स्त्रियों से संबंध रखते ही हैं, यही उनकी उपलब्धि है। और यह नहीं समझ पाने के बाद पत्नी पर मानसिक-शारीरिक अत्याचार। घर में जल्लादी और गोष्ठियों-बैठकों में कवि-लेखक और मानव-गुणी होने की मुनादी। पाखंडी क्रांतिकारिता और प्रतिबद्धता-निष्ठा का गौरवगान।
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विभा रानी ♦ रोशनी की एक लकीर के सहारे ट्रेन की पटरी, तेज भागती ट्रेन की आवाज़, ट्रेन के हेडलाइट्स की पास आती रोशनी और तखत के बीच में बैठी तीनों बहनें ये बता देते हैं कि यहां आत्महत्या होने जा रही है। यह आपको जड़ बना देने के लिए काफी है। इसी तरह से तखत पर ही बैठे लोगों के ट्रेन में बैठने का आभास दे कर आत्महत्या से लेकर धार्मिक अंधत्व को बड़ी कुशलता से बुना गया है। मन के अंतर्द्वद्व और बेचैनी को प्रकाश के जरिये ही पूरी की पूरी ट्रेन और उसके कंपार्टमेंट के सहारे दिखाना और उसके साथ-साथ दर्शक के मन में भी वह अंतर्द्वद्व और बेचैनी पैदा करना एक कुशल निर्देशन की मांग करता है। बीच-बीच में चुटीले संवाद और हालात हास्य बिखेरने का काम करते रहे।
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जनवादी लेखक संघ ♦ हिंदी पाठकों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि इस तथाकथित महाकवि ने घर में ऐसी परिस्थिति पैदा की, जिससे तंग आकर पत्नी ने आत्महत्या जैसा क़दम उठाया। पत्नी की मृत्यु का कोई भी खेद उसे नहीं है। विजय शंकर चतुर्वेदी के सामने उसकी शालीन समर्पिता पत्नी ने शरीर पर घासलेट छिड़क कर आग लगा ली। और बकौल खुद विजय शंकर चतुर्वेदी, उसमें इतनी भी ताव न थी कि वह उठ कर उसे रोक पाता। वह जलती रही, उसकी अबोध बच्ची वहीं रोती रही और विजयशंकर उसे बचाने के लिए हाथ तक न उठा सका। क्योंकि रात के दो-तीन बजे विजयशंकर शराब के नशे में धुत होकर घर आया था।
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अब्राहम हिंदीवाला ♦ कमाल अमरोही ने 1953 में अपनी प्रोडक्शन कंपनी खड़ी की। 1958 में उन्होंने कमालिस्तान की नींव रखी। कहते हैं कि इस स्टूडियो में मीना कुमारी की रूह और पैसे लगे थे। मियां-बीवी के बीच की सच्चाई जो भी रही हो… कमालिस्तान एक शानदार स्टूडियो के रूप में चला। इस स्टूडियो में रजिया सुलतान की शूटिंग के लिए कमाल साहब ने बाग़-बगीचे लगवाये। वे आज भी फिल्मकारों के काम आते हैं। रेलवे स्टेशन की ज़्यादातर शूटिंग कमालिस्तान में ही होती है। कमालिस्तान हरा-भरा और खूबसूरत स्टूडियो है। यह आज भी चल रहा है। इसे उनके बेटे-बेटी चला रहे है।
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जगदीश्वर चतुर्वेदी ♦ सलमान और अशोक वाजपेयी जानते हैं कि विगत साठ सालों में हॉलीवुड ने सारी दुनिया को सांस्कृतिक तौर पर रौंदा है। हॉलीवुड की पराजय का महाकाव्य मुंबई ने ही लिखा है। हॉलीवुड की सांस्कृतिक दुर्बलता अगर किसी के सामने नजर आती है, तो वह है मुंबई का सिनेमा उद्योग। आज हॉलीवुड से लेकर पाकिस्तान तक के कलाकार, चाहे वे मुसलमान हों या क्रिश्चियन हों, मुंबई को अपना घर मानते हैं। हम सलमान को याद दिलाना चाहेंगे, भारत विभाजन के समय मंटो रह नहीं पाये थे मुंबई में। उन्हें पाकिस्तान जाना पड़ा था। भारत विभाजन के बाद, खासकर 90 के मुंबई के बदनाम दंगों, शिवसेना और दाउद के उत्पातों के कारण किसी भी कलाकार ने मुंबई नहीं छोड़ा है।
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अब्राहम हिंदीवाला ♦ मुंबई के बदनसीब दर्शक आज ‘कमीने’ नहीं देख पाएंगे। नसीब और बदनसीब हिंदी फिल्मों की प्रिय शब्दावली है, इसलिए मैंने इनका इस्तेमाल किया। मुंबई में मीडिया के सदस्यों ने ‘कमीने’ के विशेष शो देखे। सभी अभिभूत हैं। विशाल भारद्वाज की ‘कमीने’ का जादू सभी के सिर चढ़ कर बोल रहा है। मैं भी अभिभूत हूं, लेकिन विशाल भारद्वाज के प्रशंसकों को सावधान करना अपना फर्ज समझता हूं। विशाल भारद्वाज को किसी सिंहासन पर बिठाने और श्रेष्ठ घोषित करने के बाजए उनकी फिल्मों का आनंद लें। इस फिल्म को थिएटर में जाकर देखें और अपनी तारीफ की वजह खोजें।
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रवीश कुमार ♦ पिछले साल रीगल सिनेमा पचहत्तर साल का हो गया। चर्चगेट का इरोस भी सत्तर का हो गया है। इस साल लिबर्टी अपने साठवें साल में प्रवेश कर रहा है। एक विशिष्ठ कला शैली में बनी ये इमारतें सिर्फ बांबे की कंक्रीट पहचान नहीं हैं बल्कि ये बांबे वालों के भीतर किसी इमेज की तरह बनी हुई हैं। शिखा इसी बांबे के अहसास को दिखाने की कोशिश कर रही हैं। आप इसे पंद्रह अगस्त के दिन NDTV 24X7 पर दोपहर तीन बजे और सोलह अगस्त को दोपहर एक बजे देख सकते हैं। थोड़ा वक्त निकालिएगा। मजा आयेगा। एक घंटे की इस डाक्यूमेंट्री का दूसरा हिस्सा दलित स्थापत्य और माया महात्म्य पर भी प्रस्तुति है।
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अब्राहम हिंदीवाला ♦ कमीने पहले सैफ अली खान कर रहे थे। विशाल भारद्वाज ने पहले उनसे बात की थी। यह खबर किसी पत्रकार की खोज नहीं थी। शाहिद कपूर और विशाल भारद्वाज ऐसी खबर देकर भला अपनी फिल्म का नुकसान क्यों करते। यह खबर और किसी ने नहीं शाहिद कपूर की पूर्व प्रेमिका के वर्तमान प्रेमी सैफ अली खान ने ही चलायी थी। क्यों, यह तो वही बता सकते हैं। शाहिद की छूट गयी प्रेमिका को अपनाने वाले सैफ कहीं न कहीं यह जताना चाह रहे थे कि उन्हें उनकी छोड़ी फिल्म मिली है। शाहिद ने न तो तब मुंह खोला जब उनकी प्रेमिका किसी और के साथ चली गयी और न अभी मुंह खोला और सच की सफाई दी। अपनी उम्र से ज्यादा समझदारी का परिचय देते हुए वे खामोश रहे।
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अब्राहम हिंदीवाला ♦ जिसेल को हिंदी नहीं आती। क्या फर्क पड़ता है? श्रीदेवी को हिंदी नहीं आती थी। कैटरीना कैफ को हिंदी नहीं आती है। वैसे ढेर सारी हीरोइनों को हिंदी नहीं आती। हीरो लोग भी हिंदी नहीं जानते। पर्दे पर जो हिंदी बोलते हीरो-हीरोइन दिखाई पड़ते हैं, वह वास्तव में तकनीकी जुगत होती है। हिंदीवाला हूं, तो हिंदी फिल्मों में हिंदी को लेकर उलझा रहता हूं। उस पर कभी विस्तार से लिखूंगा। कुछ हिंदी पत्रकार लोग तो लिखते ही रहते हैं। फिलहाल जिसेल की बातें… अब देखना है कि यहां उसका गॉडफादर कौन बनता है? कैटरीना को तो सलमान खान मिल गये थे। बिना गॉडफादर के हिंदी फिल्मों में लड़कियां कुछ से कुछ हो जाती हैं। खास कर विदेशों से आयी लड़कियों के प्रति फिल्मवालों का नज़रिया आम लंपट हिंदुस्तानी से अलग नहीं होता। उन्हें भोग्या समझा जाता है।


