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रवीश कुमार ♦ दो ही बातें हो सकती हैं। मीडिया इतनी बड़ी हो गयी है कि साहित्यकारों की हैसियत तय करना चाहती है या फिर साहित्यकार इतने कमतर हो गये हैं कि मीडिया से उद्धार चाहते हैं। माध्यम की ठसक देखिए। पर ऐसा क्या है जहां आकर हमारे साहित्यकार मीडिया को रचनात्मकता से भर देंगे। हू हा.. हुंकार की बोली युग में मैं किसी केदारनाथ सिंह जी को स्टुडियो में भयभीत बैठे देखने की कल्पना नहीं कर सकता। मुझे नहीं लगता कि जो आज की मीडिया है उसमें साहित्यकारों की कोई जगह और ज़रूरत है। मैं जहां है जैसा है के आधार पर बोल रहा हूं। एक कारण यह है कि अब पत्रकार रघुवीर सहाय या अज्ञेय होने की ख्वाहिश लेकर नहीं आता है।
फ फ फोटो फोटो, मीडिया मंडी, मोहल्ला दिल्ली »
डेस्क ♦ आज नई दुनिया ने एक ब्लंडर किया है। दिल्ली, इंदौर सहित कई शहरों से प्रकाशित होने वाले नई दुनिया के दिल्ली के संस्करण में सातवें नंबर पन्ने पर एक तस्वीर छपी है। तस्वीर में यूपीए सरकार के एक साल पूरे होने पर रिपोर्ट कार्ड जारी करने वाली सभा में कांग्रेसी लीडरों की कतार है। इसमें यूपीए सरकार के मौजूदा मंत्रियों के साथ राहुल गांधी भी हैं, लेकिन उनका नाम राहुल गांधी की जगह राजीव गांधी छपा हुआ है। यह राहुल गांधी में राजीव गांधी की छवि देखने का मसला है, या डेस्क की लापरवाही से हो गयी एक सामान्य सी गलती – इस बारे में हम कुछ नहीं कह सकते। सिवा इसके कि इस गलती को हम वर्चुअल स्पेस के लोगों के साथ शेयर कर सकते हैं।
नज़रिया, मीडिया मंडी »
डेस्क ♦ नई दुनिया की संडे पत्रिका में कवि-पत्रकार विष्णु नागर इस पूरी घटना में प्रोफेसर को दोषी ठहरा रहे हैं और एक अश्लील तर्क ये दे रहे हैं कि प्रोफेसर अगर सही था, तो आंध्र के राजभवन में तीन महिलाओं से यौन क्रीड़ा में लिप्त नारायण दत्त तिवारी कैसे गलत थे? विष्णु नागर यह भी मानते हैं कि एक प्रोफेसर और एक रिक्शा चालक में वर्गीय असमानता के चलते कभी प्रेम हो ही नहीं सकता। जबकि विश्व इतिहास के कई पन्नों में इस तरह के प्रेम दर्ज हैं।
नज़रिया, मीडिया मंडी »
ओम थानवी ♦ ‘पेड न्यूज’ अकेली बीमारी नहीं है। नयी और ज्यादा मुखर जरूर है। कुछ चीजें और हैं, जिन्हें लगे हाथ निराकरण प्रयासों के दायरे में ले आना चाहिए। जैसे राजनीतिक दलों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों के हाथों मीडिया के जाने-अनजाने इस्तेमाल होने का कुचक्र। मीडिया को कीमत मिलती है और समाज के सामने प्रायोजित सामग्री परोस दी जाती है। यह काम इतनी चतुराई से होता है कि उसे आसानी से नहीं पकड़ा जा सकता। हालांकि पकड़ना नामुमकिन नहीं है। एक पूरा तंत्र विकसित है, जो पेशेवराना तौर पर मीडिया को ‘मैनेज’ करता है। निजीकरण के दौर में भी नेहरू जी की रूसी प्रेतछाया सरकारी प्रचार तंत्र पर कायम है।
ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया, मीडिया मंडी »
डेस्क ♦ जब पूरा देश आंध्र के राजभवन में एक पतित परिघटना पर हैरान है, एक अख़बार है, जो उसको भी जस्टीफाई करने की कोशिश में है। एक संवैधानिक जगह पर अय्याशियों को लेकर उस अख़बार ने अपना रुख़ तो नहीं ही रखा है, बल्कि इसके पर्दाफ़ाश के पीछे वो राजनीतिक साज़िश बता रहा है। आपने अंदाज़ा लगा लिया होगा कि उस अख़बार का नाम है नई दुनिया। वही नई दुनिया, जो पुरानी कांग्रेस पार्टी के मुखपत्र की तरह दिल्ली से निकल रही है। इस मामले में इस अख़बार ने संपादकीय लिखा, जिसका लब्बोलुआब यह है कि इस बुजुर्ग नेता को संदेह का लाभ तक नहीं दिया गया।
ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया, मीडिया मंडी »
डेस्क ♦ जब भारतीय मीडिया का बड़ा हिस्सा कोपेनहैगन सम्मेलन में आम सहमति न बन पाने के लिए विकासशील देशों के राजनीतिक नेतृत्वों को आंखें दिखा रहा था, हमारे प्रधानमंत्री की कमज़ोर इच्छाशक्ति को कोस रहा था – ठीक उसी वक्त नई दुनिया के प्रधान संपादक आलोक मेहता सरकार के गुन गा रहे थे। वह भी अपने अख़बार की लीड स्पेस में। विकासशील देशों की अपनी बैठक में ज़बर्दस्ती चले आये ओबामा को जहां इस बात के लिए फटकारना चाहिए कि उन्होंने उन देशों की चिंता को विषयांतर करने की कोशिश की, आलोक मेहता ने इसे भारत को महत्व देना बताया। साफ है कि आलोक मेहता देश को गुमराह कर रहे हैं और अपने अख़बार को सरकार का मुखपत्र बनाने में लगे हुए हैं।
मोहल्ला दिल्ली, शब्द संगत, समाचार »
नई दुनिया ♦ सफाईकर्मी मोंटू पर उनके शक की वजह यह है कि सोसाइटी में आने पर उन्होंने हमेशा की तरह उसे सफाई के लिए घर बुलाया, मगर वह इस बार यहां पहुंचने से आना-कानी करने लगा। वह ताला खोल कर अंदर गयीं, तो पहले सब कुछ सामान्य नज़र आया। पीछे वाले कमरे में जाकर लाइट जलायी और चिक उठायी तो हैरत में प़ड़ गयीं। पिछले दरवाज़े की जाली करीब छह इंज कटी हुई थी। उससे चिटकनी खोली गयी थी। कमरे में बाकी सब सामान अपनी जगह नज़र आ रहा था। उन्होंने अपने ज़ेवरों का डिब्बा और कैरी बैग खोला तो असमंजस में पड़ गयीं। उसमें मंगलसूत्र समेत कई जेवर रखे थे, मगर उनसे लॉकेट ग़ायब थे। उसी डिब्बे में पद्मभूषण की अनुकृति का बॉक्स भी रखा था।
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डेस्क ♦ देर रात प्रभाष जी का इंतक़ाल हुआ। दिल्ली के अख़बार तो नहीं, लेकिन कई क्षेत्रीय अख़बारों ने अपने शहरी संस्करणों में इस मनहूस ख़बर को छापी। लेकिन दूसरे दिन लगभग अख़बारों ने सम्मानपूर्वक प्रभाष जी को याद किया। उन पर पूरा का पूरा पन्ना निकाला। प्रभात खबर से लेकर नई दुनिया तक में उनके साहस से भरे पत्रकारीय जीवन को भावपूर्ण तरीके से याद किया। लगभग अख़बारों के प्रधान-समूह संपादकों ने उन पहले पन्ने पर एडिटोरियल लिखा। लेकिन खबरों के धंधे में जागरण की खबर लेने वाले प्रभाष जोशी से इस अखबार ने उनकी मौत की खबर अंडरप्ले करके बदला लिया। ये एक अख़बार की छोटी मानसिकता का परिचय देता है।
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पुनीत कुमार ♦ वसुधा के संपादक मंडल ने कबीर चेतना सम्मान लौटा दिया है। इस आशय की ख़बर आज नई दुनिया के इंदौर संस्करण में छपी है। खबर में यह पढ़ कर ताज्जुब हुआ कि पुरस्कार लौटाने का निर्णय वरिष्ठ साहित्यकार ज्ञानरंजन द्बारा जतायी नाराज़गी के चलते उठाया गया। हालांकि मोहल्ला पर चल रही बहस में और समूचे मध्यप्रदेश में भी इसका बीडा सत्यनारायण पटेल ने उठा रखा था, उसका क्या? तो क्या सत्यनारायण को ज्ञानरंजन ने मोहरा बनाया? हालांकि यह प्रश्न अब भी अनुत्तरित है कि सम्मान लौटाने की वजह क्या है। ज्ञानजी की नाराज़गी या उसका फोर्ड फाउंडेशन से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष संबंध?
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जगदीश्वर चतुर्वेदी ♦ नेट पर हिंदी बड़ी कमज़ोर है। सारे ज्ञान के कोश अभी नेट पर बनने बाकी हैं। दूसरी बात यह कि नेट लेखन से भाषा नहीं बनती। नेट लेखन खासकर ब्लाग लेखन वर्चुअल लेखन है, यह ‘है भी और नहीं भी।’ इसके लेखन से भाषा न तो समृद्ध होगी और न भाषा मरेगी। नेट के विचार सिर्फ विचार हैं और वह भी बासी और मृत विचार हैं। उनमें स्वयं चलने की शक्ति नहीं होती, आप नेट पर महान क्रांतिकारी किताब लिखकर और उसे करोड़ लोगों को पढ़ा कर दुनिया नहीं बदल सकते। नेट लेखन सिर्फ संचार है और संचार से ज़्यादा इसकी कोई अन्य भूमिका भी नहीं है।



