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डेस्क ♦ जब पूरा देश आंध्र के राजभवन में एक पतित परिघटना पर हैरान है, एक अख़बार है, जो उसको भी जस्टीफाई करने की कोशिश में है। एक संवैधानिक जगह पर अय्याशियों को लेकर उस अख़बार ने अपना रुख़ तो नहीं ही रखा है, बल्कि इसके पर्दाफ़ाश के पीछे वो राजनीतिक साज़िश बता रहा है। आपने अंदाज़ा लगा लिया होगा कि उस अख़बार का नाम है नई दुनिया। वही नई दुनिया, जो पुरानी कांग्रेस पार्टी के मुखपत्र की तरह दिल्ली से निकल रही है। इस मामले में इस अख़बार ने संपादकीय लिखा, जिसका लब्बोलुआब यह है कि इस बुजुर्ग नेता को संदेह का लाभ तक नहीं दिया गया।
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डेस्क ♦ जब भारतीय मीडिया का बड़ा हिस्सा कोपेनहैगन सम्मेलन में आम सहमति न बन पाने के लिए विकासशील देशों के राजनीतिक नेतृत्वों को आंखें दिखा रहा था, हमारे प्रधानमंत्री की कमज़ोर इच्छाशक्ति को कोस रहा था – ठीक उसी वक्त नई दुनिया के प्रधान संपादक आलोक मेहता सरकार के गुन गा रहे थे। वह भी अपने अख़बार की लीड स्पेस में। विकासशील देशों की अपनी बैठक में ज़बर्दस्ती चले आये ओबामा को जहां इस बात के लिए फटकारना चाहिए कि उन्होंने उन देशों की चिंता को विषयांतर करने की कोशिश की, आलोक मेहता ने इसे भारत को महत्व देना बताया। साफ है कि आलोक मेहता देश को गुमराह कर रहे हैं और अपने अख़बार को सरकार का मुखपत्र बनाने में लगे हुए हैं।
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नई दुनिया ♦ सफाईकर्मी मोंटू पर उनके शक की वजह यह है कि सोसाइटी में आने पर उन्होंने हमेशा की तरह उसे सफाई के लिए घर बुलाया, मगर वह इस बार यहां पहुंचने से आना-कानी करने लगा। वह ताला खोल कर अंदर गयीं, तो पहले सब कुछ सामान्य नज़र आया। पीछे वाले कमरे में जाकर लाइट जलायी और चिक उठायी तो हैरत में प़ड़ गयीं। पिछले दरवाज़े की जाली करीब छह इंज कटी हुई थी। उससे चिटकनी खोली गयी थी। कमरे में बाकी सब सामान अपनी जगह नज़र आ रहा था। उन्होंने अपने ज़ेवरों का डिब्बा और कैरी बैग खोला तो असमंजस में पड़ गयीं। उसमें मंगलसूत्र समेत कई जेवर रखे थे, मगर उनसे लॉकेट ग़ायब थे। उसी डिब्बे में पद्मभूषण की अनुकृति का बॉक्स भी रखा था।
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डेस्क ♦ देर रात प्रभाष जी का इंतक़ाल हुआ। दिल्ली के अख़बार तो नहीं, लेकिन कई क्षेत्रीय अख़बारों ने अपने शहरी संस्करणों में इस मनहूस ख़बर को छापी। लेकिन दूसरे दिन लगभग अख़बारों ने सम्मानपूर्वक प्रभाष जी को याद किया। उन पर पूरा का पूरा पन्ना निकाला। प्रभात खबर से लेकर नई दुनिया तक में उनके साहस से भरे पत्रकारीय जीवन को भावपूर्ण तरीके से याद किया। लगभग अख़बारों के प्रधान-समूह संपादकों ने उन पहले पन्ने पर एडिटोरियल लिखा। लेकिन खबरों के धंधे में जागरण की खबर लेने वाले प्रभाष जोशी से इस अखबार ने उनकी मौत की खबर अंडरप्ले करके बदला लिया। ये एक अख़बार की छोटी मानसिकता का परिचय देता है।
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पुनीत कुमार ♦ वसुधा के संपादक मंडल ने कबीर चेतना सम्मान लौटा दिया है। इस आशय की ख़बर आज नई दुनिया के इंदौर संस्करण में छपी है। खबर में यह पढ़ कर ताज्जुब हुआ कि पुरस्कार लौटाने का निर्णय वरिष्ठ साहित्यकार ज्ञानरंजन द्बारा जतायी नाराज़गी के चलते उठाया गया। हालांकि मोहल्ला पर चल रही बहस में और समूचे मध्यप्रदेश में भी इसका बीडा सत्यनारायण पटेल ने उठा रखा था, उसका क्या? तो क्या सत्यनारायण को ज्ञानरंजन ने मोहरा बनाया? हालांकि यह प्रश्न अब भी अनुत्तरित है कि सम्मान लौटाने की वजह क्या है। ज्ञानजी की नाराज़गी या उसका फोर्ड फाउंडेशन से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष संबंध?
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जगदीश्वर चतुर्वेदी ♦ नेट पर हिंदी बड़ी कमज़ोर है। सारे ज्ञान के कोश अभी नेट पर बनने बाकी हैं। दूसरी बात यह कि नेट लेखन से भाषा नहीं बनती। नेट लेखन खासकर ब्लाग लेखन वर्चुअल लेखन है, यह ‘है भी और नहीं भी।’ इसके लेखन से भाषा न तो समृद्ध होगी और न भाषा मरेगी। नेट के विचार सिर्फ विचार हैं और वह भी बासी और मृत विचार हैं। उनमें स्वयं चलने की शक्ति नहीं होती, आप नेट पर महान क्रांतिकारी किताब लिखकर और उसे करोड़ लोगों को पढ़ा कर दुनिया नहीं बदल सकते। नेट लेखन सिर्फ संचार है और संचार से ज़्यादा इसकी कोई अन्य भूमिका भी नहीं है।
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रमेश उपाध्याय ♦ इंटरनेट का सदुपयोग किया जाए, तो वह अपनी भाषा और साहित्य के विकास तथा व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए बेहतरीन माध्यम हो सकता है। लेकिन बड़े खेद की बात है कि इसका दुरुपयोग अपनी भाषा और साहित्य से लोगों को विमुख करने के लिए किया जा रहा है। और यह काम हिंदी वाले स्वयं कर रहे हैं! नैतिकता की बात करने में कोई बुराई नहीं है। लेखकों के अनैतिक आचरण की आलोचना अवश्य की जानी चाहिए। लेकिन ऐसा करने की पहली शर्त यह है कि आलोचना का सैद्धांतिक तथा मूल्यगत आधार स्पष्ट रहे तथा आलोचक जो कसौटी दूसरों के लिए अपनाए, वही अपने लिए भी अपनाए।
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अनिल ♦ हंस की वार्षिक संगोष्ठी में हिंदी के लगभग सभी बड़े-बुज़ुर्ग, प्रतिनिधि रचनाकारों के बीच प्रख्यात लेखिका अरुंधती रॉय ने जो कुछ कहा, वह अगर आप चाहें, तो आंख खोल देने वाली स्थिति थी। यह संभवतः पहली बार है कि हिंदी के इतने बड़े मंच से देश के भीतर राजसत्ता द्वारा अपनी जनता पर छेडे़ गये आंतरिक युद्ध के बारे में, अरुंधती की मार्फ़त, इतनी पुख़्ता और विश्वसनीय जानकारियां मिली हैं। अन्यथा, हिंदी शिक्षित समाज में जो हालात हैं, उनमें इन मुद्दों को लेकर सामान्यतः कोई व्यापक चिंता, बेचैनी और प्रतिरोध के स्वर नहीं मिलते। ऐसे में आलोक मेहता ने अरुंधती के बारे में जो गरिमाहीन और कुत्सित बातें की हैं उनका जवाब देने की दरकार इसलिए नहीं है क्योंकि ऐसे ’आलोक मेहता’ राज्य द्वारा पोषित एवं संरक्षित प्रोपेगैंडा, ’सूचना उत्पादों’ को ही अपना नीति निदेशक तत्त्व मानते हैं।
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अनुभव ♦ परम आदरणीय आलोक मेहता जी का आकलन करने में आप लोग थोड़ी ग़लती कर रहे हैं। दरअसल बात यह है कि आलोक जी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आईएनसी) उर्फ़ कांग्रेस के सच्चे सिपाही है। निष्ठावान कार्यकर्ता हैं (यह बात अलग है कि उनके पास सदस्यता की रसीद न हो)। वे पूरी निष्ठा, लगन और ईमानदारी से कांग्रेस पार्टी की सेवा करते हैं। मैं उनको बहुत दिनों से तो नहीं जानता या पढ़ता रहा हूं लेकिन जब वे दैनिक हिंदुस्तान में थे, तबसे मैं उनको देख-सुन रहा हूं। हिंदुस्तान से वे भास्कर चले गये। वहां से आउटलुक के प्रधान संपादक बनकर गये और फिर नई दुनिया में लौट आये हैं। इतनी कूद-फांद करने के बाद भी उन्होंने पार्टी के प्रति अपनी निष्ठा में रत्ती भर भी कमी नहीं होने दी।
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शिरीष खरे ♦ जिस आलोक मेहता से यह कहलवाना था कि अरुंधती को ज़मीनी वास्तविकता मालूम नहीं, दरअसल उसी आलोक मेहता की छवि ज़मीनी पत्रकार की कभी नहीं रही। मतलब भरोसेमंद दावेदार न होने से तीर चले तो लेकिन भरोसेमंद निशाने तक पहुंचने से बहुत पहले ही नीचे गिर गये। उधर, आलोक मेहता से भी पीछे के रास्ते सांसद बनने की छटपटाहट छिपायी नहीं गयी। और इधर दूसरी तरफ का मोर्चा संभालने वालों को पूरा खेल समझने में देर न लगी।


