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Articles tagged with: namwar singh

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[6 Feb 2010 | 8 Comments | ]
पत्रकारिता ईश्‍वरीय पाठ्यक्रम नहीं है, उसे बदलो!

जेयूसीएस ♦ देशभर में पढ़ाये जा रहे पत्रकारिता के पाठ्यक्रम की समीक्षा हो। पत्रकारिता “ईश्वरीय कार्य है” (राजर्षि टंडन ओपन यूनिवर्सिटी, इलाहाबाद के पाठ्यक्रम के अनुसार) की बजाय इसे विशुद्ध रूप से मानवीय कार्य ही रहने दिया जाए। पाठ्यक्रम में ज्यादा से ज्यादा व्यावहारिक पक्ष को शामिल किया जाए। पत्रकारिता के पाठ्यक्रम के साथ ही इसे पढ़ने वाले शिक्षकों, प्रोफेसरों और पत्रकारों की भी समीक्षा हो और यह सुनिश्चित किया जाए कि पत्रकारिता को व्यावहारिक रूप से जानने-समझाने वाला व्यक्ति ही इस क्षेत्र में आये। हम यूजीसी से मांग करते हैं कि कम से कम पत्रकारिता जैसे पाठ्यक्रमों में नेट/पीएचडीधारियों की बाध्यता समाप्त की जाए और इसे पढ़ने की जिम्मेदारी पत्रकारों को ही सौंपी जाए ताकि इसके विद्यार्थियों को भी ज्यादा से ज्यादा व्यावहारिक जानकारी मिल सके।

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[23 Dec 2009 | 3 Comments | ]
वर्धा जाकर कुछ प्रगतिशील बुद्धिजीवी सवर्ण हो गये हैं…

चंद्रिका ♦ हिंदी विश्वविद्यालय में एकमात्र छात्रावास है, जिसका नाम सावित्री बाई फुले के नाम पर है, एकमात्र अस्पताल अंबेडकर के नाम पर, एकमात्र अतिथि गृह कामिल बुल्के के नाम से। कुल 327 छात्रों में से 100 से अधिक छात्र दलित हैं। इस वाह्य संरचना से यह लग सकता है कि नामवर जी कई बार सही बयान भी देते हैं पर आंतरिक संरचना में दलितों पर हो रही ज़्यादतियों को बाहर से समझना थोड़ा मुश्किल है, जिससे कम-ओ-बेस विभूतिनरायण राय वाक़‍िफ हैं। यहां समस्या दलित उत्पीड़न के स्वरूप को लेकर है। बीते दशकों में उत्पीड़न के जो तौर-तरीक़े थे, आज वही तौर-तरीक़े समाज में लागू नहीं होते। इतने वर्षों में दलित वर्ग और प्रगतिशीलों ने जो संघर्ष किया है, जिसमें सांस्‍कृतिक रूप से विभूति नारायण राय ने खुद योगदान दिया है, समाज पर उसका असर जाया तो नहीं जा सकता।

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[15 Dec 2009 | One Comment | ]
हर कदम पर ‘बोलना तो है!’

दुर्गानाथ स्‍वर्णकार ♦ प्रसिद्ध आलोचक डॉ नामवर सिंह ने बोलना तो है पुस्‍तक के विमोचन समारोह में कहा कि इक्कीसवीं सदी में उन्हीं चीज़ों का बाज़ार तेज़ी से फैल रहा है जो लिखने और पढ़ने से ज़्यादा बोलने और सुनने से जुड़ी हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया इसकी उम्दा मिसाल है। पुरानी कहावत भी है कि बातन हाथी पांव – बातन हाथी पीठ। यानी आपकी उपलब्धि बहुत हद तक आपकी शैक्षिक योग्यता के साथ ही आपके बोलने और सुनने की तरीके पर निर्भर है। लेकिन हैरत की बात है कि ‘पढ़ो-लिखो’ की सीख देने वाले समाज में अब भी बोलने-सुनने की कला की व्यावहारिक और औपचारिक शिक्षा देने की कोई व्यवस्था नहीं है।

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[14 Dec 2009 | 4 Comments | ]
वर्धा में भूख हड़ताल जारी, कुलपति वीएन राय बेफिक्र

वर्धा मेल ♦ हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति वीएन राय कोई भी बात समझने को तैयार नहीं। आंदोलन को पुलिसिया तरीके से हैंडल करना चाहते हैं। कुछ दिनों पहले विश्वविद्यालय के एक कार्यक्रम में कहा था कि दमन सत्ता का मूल चरित्र है, कहीं-कहीं यह थोडा़-बहुत जायज़ होता है। पिछले चार दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे छात्रों से मिलना उन्‍हें गवारा नहीं। सूत्रों से पता चला है कि वे किसी भी कीमत पर आंदोलनकारियों की बात नही मानेंगे। वर्धा अंडर ट्रेनिंग पुलिस अधीक्षक अविनाश कुमार वीएन राय के मित्र हैं। आंदोलन को कुचलने के लिए ग्‍यारह दिसंबर को दल-बल के साथ विश्वविद्यालय परिसर में आ धमकते हैं। आंदोलनकारी छात्रों को आंदोलन समाप्त करने के लिए डराते-धमकाते हैं। पूरे मामले के प्रति कुलपति की उदासीनता उनके मूल व्यक्तित्व को उजागर करती है।

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[27 Oct 2009 | No Comment | ]
जेएनयू में मिल रहे हैं हिंदी उर्दू के पुराने दिग्‍गज

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी ♦ जेएनयू के हिंदी-उर्दू के पूर्व छात्रों का समागम 27-29 अक्‍टूबर 2009 को हो रहा है। यह समागम इस अर्थ में महत्‍वपूर्ण है कि‍ इसमें पहली बार नामवरजी नहीं हैं। जेएनयू का भारतीय भाषा केंद्र नामवर के बि‍ना सूना लगता है। लगता है प्रो चमनलाल ने नामवरजी की उस बात का ख्‍याल रखा है जो उन्‍होंने जेएनयू में नामवर पुस्‍तक के लोकार्पण के समय दि‍ल्‍ली के त्रि‍वेणी सभागार में कही थी। नामवरजी ने कहा था, मैं चाहता हूं कभी मुझे सुनने के लि‍ए भी बुलाया जाए। नामवर जी के छात्रों ने लगता है, उनकी बात रख ली है। देखते हैं आगे क्‍या होता है। आशा है इस मौके पर आदरणीय गुरुवर सुनने तो कम से कम ज़रूर आयेंगे। वैसे भी यदि‍ वे कार्यक्रम में आ धमके और छात्रों ने मांग कर दी तो उन्‍हें मंच पर आने से कौन रोक पाएगा।

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[2 Oct 2009 | One Comment | ]
लेखक की प्रतिबद्धता कैसे तय होगी, कौन तय करेगा?

रंगनाथ सिंह ♦ संसदीय प्रणाली ऐसी प्रणाली है कि आप को हमेशा अपने राजनीतिक विपक्षी के साथ एक ही छत के नीचे बैठना पड़ता है। ऐसे में कौन किसके साथ किस मंच पर जाकर बैठता है, इसको अत्यधिक तूल देना कहीं न कहीं ब्राह्मणवादी शुचितावाद और अछूतवाद से प्रेरित दिखता है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया में आस्था जताने के बाद साझा मंच शेयर करने का सवाल उठाने वालों की राजनीतिक दृष्टि को समझना कठिन हो जाता है। एक ही मंच से कोई वामपंथी अपनी बात कहे और दक्षिणपंथी भी अपनी बात कहे, तो यह राजनीतिक रूप से सही है या ग़लत, इस पर एक खुली बहस होनी ही चाहिए।

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[27 Sep 2009 | 7 Comments | ]
क्‍या शिमला में संस्मरण सेशन भी चल रहा है?

अभय ♦ विमल जैसी लेखिका का संस्मरण पुराण देख कर धक्का लगा। पुराण इसलिए कहा कि पुराण शैली में ही लेखिका ने अपनी राम कहानी कही है। इस सेमिनार में संस्मरण का भी सेशन भी रखा गया है, यह जानकर अच्छा लगा। लेखिका ने अपनी निजी खुन्नस को सिद्धांत का जामा पहनाना चाहा है। जो हर लिहाज से भर्त्‍सना योग्य है। कहते हैं कि हिंदी वाले निजी खुन्नस को जनम-जन्मांतर तक निभाते हैं। विमल थोराट ने इसे सही साबित कर दिया है। विमल थोराट को इतना तो समझना चाहिए कि संस्मरणों के आधार पर कुछ भी साबित किया जा सकता है। विमल थोराट से जुड़े संस्मरण सुनाने वाले भी ढेरों मिल जाएंगे।

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[5 Aug 2009 | 5 Comments | ]
वे बेख़बर ही सही, इतने बेख़बर भी नहीं

रंगनाथ सिंह ♦ मैंने अपने चार साल के दिल्ली प्रवास में सिर्फ दो साहित्यिक समारोह में शिरकत की है, जिनमें हंस का समारोह ही दूसरा समारोह था। मैं कहानी, कविता भी नहीं लिखता की हिंदी साहित्य के माफियाओं के आशीर्वाद की मुझे ज़रूरत पड़े। मैं जिस सेंटर में हूं, वहां हिंदी साहित्य का इकलौता पृष्ठपेषक मैं ही हूं। जिस दुनिया में मेरे सरोकार हैं, वहां नामवर सिंह या सुधीश पचौरी जैसे लोग कोई वजूद नहीं रखते। उस दुनिया में हम सबका एक ही नाम है, हिंदी वालाज़। इस अपमानजनक जुमले की चोट खाकर मुझमें नान-हिंदीवालाज़ (मैंने उन्हें यही नाम दिया है) का सामना करने की हिम्मत बढ़ती है, घटती नहीं।

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[4 Aug 2009 | 6 Comments | ]
मेरी पीठ को एमसीडी की दीवार मत बनाइए प्‍लीज़!

विनीत कुमार ♦ नामवर सिंह जैसा आलोचक युवा का मतलब राहुल का मुहावरा इस्तेमाल किये बिना समझ नहीं पाते और युवा रचनाकार का मतलब सिर्फ अजय नावरिया से लगा लेते हैं। मैं अपनी उसी मानसिकता पर तो बात कर रहा था, जहां हिंदी समाज एक बड़े संदर्भ को कैसे संकुचित करता जाता है। अरुंधति राय ने भाषा के सवाल पर जो बात कही, उसकी चर्चा न करते हुए हम आलोचक नामवर सिंह की चुटकुलेबाज़ी में फंस कर रह जाते हैं क्योंकि उसमें हमारी व्यक्तिगत स्तर पर की जानेवाली चुगली का सार्वजनिक रूप दिखायी दे रहा था, हमें मज़ा आ रहा था। क्या हम साहित्य पढ़ते हुए चुगलखोर होते चले जाते हैं।

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[3 Aug 2009 | 8 Comments | ]
एंचोर पाका… साहित्यिक चमचे और चमचों के आका

रंगनाथ सिंह ♦ विनीत, आपने अपने लेख में व्यक्तिवाद नामक शब्द का खुल कर प्रयोग किया है। व्यक्तिवाद क्या है – फिलहाल इस पर बहस नहीं करूंगा लेकिन जिस एक व्यक्ति का नामवर सिंह ने मंच से कई बार नाम लिया, मेरी समझ से नामवर सिंह ने उसकी समूचे हिंदी जगत में फूलत-फलते तैल-संप्रदाय के युवा प्रतिनिधि के रूप में मंच पर विराजमान होने के कारण आलोचना की। अगर गांधी अहिंसा के प्रतीक, भगत सिंह प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में स्वीकार किये जा सकते हैं तो किसी को तैल-संप्रदाय के प्रतीक के रूप में स्वीकार करने में मुझे कोई आपत्ति नहीं है। प्रतीकों के सहारे बात रखना आसान हो जाता है।