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Articles tagged with: namwar singh

नज़रिया, शब्‍द संगत »

[19 Mar 2012 | One Comment | ]
ऐसे साथी पालते क्यों हैं, जो आपकी ही आजादी नहीं चाहते?

ओम थानवी ♦ एक मार्क्सवादी मित्र-संपादक ने जब मेरी इस बात पर विश्वास नहीं किया कि अज्ञेय ने मजदूरों-किसानों के हक में भी कविताएं लिखी हैं और आहत-वंचित तबके के हक में भी, तो मैंने अगले रोज उन्हें अज्ञेय की पचास “जनोन्मुखी” कविताएं भिजवा दी थीं; करीब तीस उन्होंने बाद में अपनी पत्रिका में प्रकाशित भी कीं, पर इस कलगी के साथ कि “हालांकि ये अज्ञेय कि प्रतिनिधि कविताएं नहीं हैं”!! … मजे की बात यह है कि अज्ञेय ने “प्रतिनिधि कविताएं” नाम से कोई संचयन कभी पेश ही नहीं किया। “प्रिय कविताएं” जरूर मिल जाएंगीं। पर वे उनको प्रिय रही कविताएं हैं, आपको कोई दूसरी प्रिय हो सकती हैं, क्यों नहीं कोई प्रिय न हों! यह आपकी स्वाधीनता है, और अज्ञेय के लिए सबसे बड़ा मूल्य यही था।

मोहल्ला दिल्ली, शब्‍द संगत »

[3 Aug 2011 | 4 Comments | ]

डेस्क ♦ अरसे बाद वेदव्‍यास का एक मेल आया, तो पता चला कि ये वे वेदव्‍यास नहीं हैं, जो पहले मोहल्‍ला में महाभारत लिखा करते थे और बाद में पारिश्रमिक की लालसा में लखनऊ से प्रकाशित होने वाले किसी मायावी अखबार जनसंदेश टाइम्‍स में लिखने लगे। मॉडरेटर ने उन वेदव्‍यास से तस्‍दीक भी करनी चाही कि आईडी बदल ली क्‍या – और जब संदर्भ सुना तो उनके पैरों तले से जमीन खिसक गयी।

नज़रिया, मोहल्ला दिल्ली, शब्‍द संगत »

[2 Aug 2011 | 34 Comments | ]

शुभम श्री ♦ इस कार्यक्रम का अच्छा न होना सिर्फ अक्षर प्रकाशन, राजेंद्र यादव या अजय नावरिया की असफलता नहीं है, यह हिंदी साहित्य की भी असफलता है। यही वह जगह है, जहां से हिंदी को दोयम दर्जे का मानने की जड़ें मजबूत होती हैं।

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[2 Aug 2011 | 3 Comments | ]

ब्रजेश कुमार झा ♦ हंस ने अपने 25 साल पूरे करने पर गंभीर गोष्ठी की कल्पना की थी। भूमिका तो राजेंद्र यादव ने ऐसी ही बांधी थी। हंस पत्रिका ने “साहित्यिक पत्रकारिता और हंस” विषय पर बोलने के लिए प्रो नामवर सिंह से कहा था। वे आये। बोले भी। पर उक्त विषय पर कोई बात नहीं की। कुछ चुटकियां लीं।

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[2 Aug 2011 | 3 Comments | ]

रंगनाथ सिंह ♦ नावरिया के मंच पर आने के साथ ही हंस के कार्यक्रम की गत बिगड़नी शुरू हो गयी। अपने भौंडे मंच-संचालन से नावरिया ने श्रोताओं को इतना अधिक पका दिया कि लोग उनके खिलाफ हूटिंग करने लगे। और अंत में जब नामवर जी के बोलने की घोषणा करने के नाम पर नावरिया सस्ती-चापलूस बयानबाजी करने लगे, तो लोगों ने सामूहिक रूप से हूटिंग कर दी।

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[1 Aug 2011 | 50 Comments | ]

विनीत कुमार ♦ हंस जैसी पत्रिका के 25 साल के इतिहास को इतने लिजलिजे और पनछोट तरीके से याद किया जाएगा, ये देख-सुनकर भारी निराशा हुई। हम हंस की रजत जयंती कार्यक्रम से लौटकर सदमे में हैं।

शब्‍द संगत »

[29 Jul 2011 | 28 Comments | ]

विनीत कुमार ♦ मेरी ईर्ष्‍या की तो छोड़ ही दीजिए, आप उनसे दस-पंद्रह साल कम उम्र के आलोचकों और साहित्यकारों के बारे में सोचिए न जिनके नाम के आगे वयोवृद्ध शब्द जोड़ दिया जाता है और वो जब नामवर के आगे कभी भी ये शब्द जुड़ा न देखते होंगे तो उन पर क्या बीतती होगी? नामवर सिंह हिंदी आलोचना और साहित्य की दुनिया में अभी भी वयोवृद्ध नहीं हुए और इस तमगे के न लगने पर भी ज्यादा बल्कि सबसे ज्यादा सम्मान हासिल कर पाये हैं।

नज़रिया, शब्‍द संगत »

[1 May 2011 | 5 Comments | ]

श्याम बिहारी श्यामल ♦ उनकी चिंतन-प्रणाली की एक खासियत यह कि किसी भी बात को कभी अंतिम तौर पर बंद नहीं करते। ऐसा नहीं कि जो कह दिया, उस पर आगे सोचना रोककर सदा के लिए अड़ गये। जीवन जब गतिमान हो और ज्ञान-मनीषा की धार लगातार प्रवहमान, तो विमर्श भला स्थिर या रुका हुआ कैसे हो सकता है। कोई स्थापना भला अंतिम सत्य कैसे हो सकती है। इसीलिए तो कितना भी लिख-बोल चुकने के बावजूद उनकी लेखनी और वाणी का काम लगातार शेष बना हुआ है। उन्हें कितना भी पढ़ा जा चुका हो, किसी ने कितने भी व्याख्यान सुन रखे हों, उन्हें फिर-फिर पढ़ने-सुनने की इच्छा कभी धीमी नहीं पड़ती। उन्हें पढ़ना-सुनना हमेशा बचा रहता है।

नज़रिया, मोहल्ला दिल्ली, व्याख्यान, शब्‍द संगत »

[3 Mar 2011 | 5 Comments | ]

नामवर सिंह ♦ आंचलिक कथाकार जो पैदा हुए फणीश्वरनाथ रेणु जैसे, तो इन लोगों ने स्थानीयता की छौंक देने के लिए कुछ छौंक बघार ज्यादा ही दे दी उन्होंने। हास्य रस पैदा करने के लिए, लोकतत्व ले आने के लिए भाषा को इतना मांज दिया कि लगा यही स्‍टैंडर्ड हिंदी है। यह उन्होंने जानबूझकर नहीं किया, वे यथार्थवाद दिखा रहे थे, उन्होंने समझा कि यथार्थवाद यही है कि लोग जैसे बोलते हैं वैसा ही दिखाया जाए। यह यथार्थवाद नहीं होगा नेचुरलिजम जिसे कहते हैं, यह प्रकृतवाद होगा… यथार्थवाद नहीं है।

नज़रिया, शब्‍द संगत, सिनेमा »

[17 Dec 2010 | 9 Comments | ]

शेष नारायण सिंह ♦ पता चला है कि उनके उपन्यास “काशी का अस्सी” पर एक फिल्म बन रही है। इसका निर्माण डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी कर रहे हैं। अपने नामी धारावाहिक “चाणक्य” की वजह से दुनिया भर में पहचाने जाने वाले डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने जब अमृता प्रीतम की कहानी के आधार पर फिल्म ‘पिंजर’ बनायी थी तो भारत के बंटवारे के दौरान पंजाब में दर्द का जो तांडव हुआ था, वह सिनेमा के परदे पर जिंदा हो उठा था। छत्तोआनी और रत्तोवाल नाम के गावों के हवाले से जो भी दुनिया ने देखा था, उससे लोग सिहर उठे थे। अवसाद को “पिंजर” का स्थायी भाव बना कर हाथ जला चुके चाणक्य से उम्मीद की जानी चाहिए कि इस बार वे मस्ती को ही कहानी का स्थायी भाव बनाएंगे।