Articles tagged with: namwar singh
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बिनीत राय ♦ हिंदी के दो सर्वाधिक प्रतिष्ठत आलोचकों नामवर सिंह और मैनेजर पांडे ने बिहार के कुख्यात बाहुबली नेता के साथ एक मंच पर बैठने से इनकार कर दिया। इन दोनों के ‘नेशनल बुक ट्रस्ट’, नयी दिल्ली द्वारा आयोजित भोजपुरी पुस्तक ‘पूर्वी के थाह’ के लोकार्पण में जाने से इनकार करने पर आयोजकों को कार्यक्रम की रूपरेखा बदलनी पड़ी। पुस्तक के लेखक थे जौहर शफीहाबादी। यह पुस्तक भोजपुरी भाषा में लिखी गयी है। हिंदी साहित्य के इन दोनों नामचीन शख्सीयतों का कार्यक्रम कल छपरा में आयोजित किया गया था। आयोजकों का तर्क था कि प्रभुनाथ सिंह ने भोजपुरी के लिए आवाज उठाया है। एनबीटी के आयोजकों ने प्रभुनाथ सिंह का कार्यक्रम रद्द तो नहीं किया लेकिन उन्हें दूसरे सत्र में बुलाया जिसमें ये दोनों उपस्थित नहीं थे।
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डेस्क ♦ किसी पुष्यमित्र ने मोहल्ला लाइव की कुछ पोस्ट पर टिप्पणी की है कि नया ज्ञानोदय के अगले “सुपर बेवफा विशेषांक” में मैत्रेयी पुष्पा की रचना छप रही है। उन सज्जन ने मौजूद प्रसंग में अपना गुस्सा जाहिर कर रहे लोगों से थोड़ा इंतजार करने की बात की। इस किसी और ने प्रतिक्रिया दी कि शायद मैत्रेयी पुष्पा नया ज्ञानोदय से अपनी रचना वापस ले चुकी हैं। यह सच है – क्योंकि मैत्रेयी पुष्पा ने मोहल्ला लाइव को फोन करके बताया कि यह जो दुष्प्रचार चल रहा है, उसके पीछे कालिया एंड कंपनी का हाथ है। मैंने एक अगस्त को ही उन्हें ईमेल करके अपनी रचना वापस मांग ली है। मैत्रेयी जी ने यह भी कहा कि नया ज्ञानोदय अब इस लायक नहीं है कि वहां हम जैसे लेखक अपनी रचना छपने के लिए दें।
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डेस्क ♦ रवींद्र कालिया चुप हैं। विभूति नारायण राय भी अब संभल कर बोल रहे हैं। पहले घूम-घूम कर छिनाल का मतलब छिन्न-नाल समझा रहे थे। यानी जो जड़ों से कट गया हो। परंपरा से अलग हो गया हो। लेकिन अब वो भी नहीं कह रहे। ग़लती मानने के बाद यही समझा रहे हैं कि इंटरव्यू लेने वाले ने ही सारी गड़बड़ कर दी। वरना वो महिलाओं को छिनाल कहेंगे? इतने संवेदनहीन नहीं हैं? मतलब रवींद्र कालिया और हंटर साहब, दोनों थोड़ा संभल गये हैं। और संभल गये हैं तो अपने बचाव में कुछ नया खेल जरूर करेंगे। शायद इसलिए उन्होंने अपने चेलों को आगे कर दिया है। कुणाल सिंह और सुशील सिद्धार्थ ने अपने ब्लॉग पर कालिया-विभूति के पक्ष में फर्जी हस्ताक्षर अभियान शुरू किया है।
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डेस्क ♦ दिल्ली के कॉफी हाउस में लेखकों ने बैठक की, जिसमें सभी ने एक स्वर में एलान किया कि जब तक वीएन राय को महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति पद से हटाया नहीं जाएगा, वो विरोध जारी रखेंगे। विरोध की रणनीति के तहत अब विभूति के खिलाफ हस्ताक्षर अभियान में गैर हिंदी भाषी साहित्यकारों को भी शामिल किया जाएगा। इस हस्ताक्षर अभियान पर उमाशंकर सिंह, अल्पना मिश्र और कुमार मुकुल नजर रखेंगे। इसके अलावा 13 अगस्त को 11.30 बजे मानव संसाधन मंत्रालय के सामने प्रदर्शन किया जाएगा। सरकार पर दबाव बढ़ने के साथ अदालत का दरवाजा भी खटखटाने का फैसला लिया गया है। इसी के मद्देनजर एक पीआईएल दाखिल करने की तैयारी है।
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मैत्रेयी पुष्पा ♦ यह मोर्चा तो बहुत पहले खुल जाना चाहिए था। ऐसा होता तो आज यह नौबत न आती कि राय किसी स्त्री की आत्मकथा का शीर्षक अपनी बीमार मानसिकता के अनुसार तय करते पाये जाएं और उस पत्रिका का संपादक अपने गणों के साथ खुशी से किलकारियां मारे। कितना आनंद आता है किसी पुरुष को, जब औरत बेइज्जत होती है, इसकी नायाब मिसाल वीएन राय का दिया वह साक्षात्कार है। साक्षात्कार गलत नहीं माना जा रहा था, सामंतों की शुद्ध संस्कृति ऐसी ही होती है। दुख इस बात का है कि लोकतांत्रिक मूल्यों का पैरोकार साहित्य और गांधी के नाम पर चलने वाला शिक्षा संस्थान उस पुलिसिया व्यक्ति के शिकंजे में है, जो आका होने की आदतों में जीता है। क्या यह सब कभी मुक्त हो पाएगा?
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डेस्क ♦ विभूति नारायण राय के एक शब्द पर भले ही घमासान मचा है, उक्त इंटरव्यू में बहुत सी ऐसी बातें हैं, जिससे राय की मध्ययुगीन कुत्ता मानसिकता का पता चलता है। मसलन वर्धा विश्वविद्यालय की छात्राओं का जिक्र करते हुए वे कहते हैं : ‘अभी हाल में मेरे विश्वविद्यालय की कुछ लड़कियों ने मांग की कि उन्हें लड़कों के छात्रावासों में रुकने की इजाजत दी जाए। मेरी राय स्पष्ट थी कि अभी समाज में लड़कों को ऐसा प्रशिक्षण नहीं मिल रहा है कि वे लड़कियों को बराबरी का साथी समझें… पितृसत्तात्मक समाज में स्वाभाविक ही है कि स्त्री पुरुष के लिए एक ट्रॉफी की तरह है… जितनी अधिक स्त्रियां उतनी अधिक ट्रॉफियां।’ मोहल्ला लाइव पर इस मामले में पहले भी रपटें छापी गयी हैं।
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अशोक वाजपेयी ♦ यह दुखद और किसी हद तक शर्मनाक है कि नामवर सिंह जैसे ‘भद्र’ और वरिष्ठ आलोचक ने अभी तक इस मसले पर न तो कुछ कहा है, न ही कुलाधिपति पद से इस्तीफा दिया है। उन्होंने कुलाधिपति की हैसियत में कुलपति से कोई जवाब तलब तक नहीं किया है, जबकि केंद्रीय मंत्री ने इस मामले में हस्तक्षेप किया है। अगर नामवर जी ने किया है, तो उसे सार्वजनिक करना चाहिए। भारतीय ज्ञानपीठ अपने निदेशक-संपादक के साथ क्या करे, यह उसके अधिकार का मामला है। पर उसके द्वारा प्रकाशित उन सभी लेखकों को, जिन्हें लेखकों के अपमान और इस बढ़ते छिछोरेपन की चिंता है, ज्ञानपीठ से अपनी पुस्तकें वापस ले लेनी चाहिए। सभी लेखकों को हिंदी विवि से संबंध तोड़ लेना चाहिए।
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पंकज बिष्ट ♦ एक और सवाल देखें, जिसके जवाब में वह कहते हैं, ‘अभी हाल में मेरे विश्वविद्यालय की कुछ लड़कियों ने मांग की कि उन्हें लड़कों के छात्रावासों में रुकने की इजाजत दी जाए। मेरी राय स्पष्ट थी कि अभी समाज में लड़कों को ऐसा प्रशिक्षण नहीं मिल रहा है कि वे लड़कियों को बराबरी का साथी समझें… पितृसत्तात्मक समाज में स्वाभाविक ही है कि स्त्री पुरुष के लिए एक ट्रॉफी की तरह है… जितनी अधिक स्त्रियां उतनी अधिक ट्रॉफियां।’ ऐसी भाषा एक कुलपति की कैसे हो सकती है जो अपनी तरह के इकलौते विश्वविद्यालय का कुलपति हो? निश्चित तौर पर राय का इस पद के लिए चुना जाना ही गलत है। इस पद के लिए एक ऐसे व्यक्ति की नियुक्ति होनी चाहिए थी जो स्त्री-पुरुष की समानता के बुनियादी अधिकार में यकीन रखता।
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ऋचा जोशी ♦ ये जानना जरूरी है कि विभूति ने इस शब्द का प्रयोग क्यों और किन संदर्भों में किया। इस साक्षात्कार में जब एक चर्चित लेखिका और उसके साहित्य को केंद्र में रखकर प्रश्नकर्ता ने सवाल किया तो उनके श्रीमुख से औचक जो टिप्पणी निकली, उसमें विभूति अपने को तथाकथित तौर पर ‘सभ्य’ रखने में नाकाम रहे। एक लेखिका जिसे कई पुरस्कार मिल चुके हैं और साहित्य के कई अलंबरदार उसे पलक-पांवड़ों पर बिठाकर सदी की महानतम साहित्यकार की स्वयंभू घोषणा करते रहते हैं, का इंटरव्यू में राय ने अपमान कर दिया। हालांकि विभूति ने उस लेखिका का नाम नहीं लिया लेकिन नाम लिये बगैर भी उसे पूरा साहित्य जगत जानता-पहचानता है और ये भी जानता है कि साहित्य में उसकी कैसी गिरोहबंदी है।
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कृष्णा सोबती ♦ आपको किस तरह के शब्दों का इस्तेमाल करना चाहिए, यह कोई समाजशास्त्री या कोई मनोवैज्ञानिक आपको नहीं बताएगा। आज के समय में यदि अभिव्यक्ति के लिए ऐसे शब्द आप चुनते हैं, तो यह बहुत कुछ कहता है। दरअसल, हमारी सारी भाषाओं के अंदर इस वक्त जो हालात हैं, वे अच्छे नहीं हैं। आप अपनी समझ को नहीं बढ़ाना चाहते हैं। सबसे बड़ी समझने वाली बात है कि संपादक को यह देखना चाहिए कि उसकी पत्रिका में क्या-क्या छप रहा है और प्रकाशक का भी यह फर्ज बनता है कि उसकी संस्था से यदि कोई पत्रिका निकल रही है, तो उसमें किस तरह के शब्दों का चुनाव किया जा रहा है। आज के समय में आप यदि ‘बेवफा’ जैसे शब्द चुनते हैं, तो आप काफी पीछे चल रहे हैं।



