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Articles tagged with: naxal

नज़रिया, संघर्ष »

[5 May 2012 | No Comment | ]
ढीठ सरकार का घमंड नक्‍सलियों ने तोड़ ही दिया!

याज्ञवल्‍क्‍य वशिष्‍ठ ♦ ताडमेटला जैसे कई गांव के गांव उजाड़ दिये गये। घरों को जला कर राख कर दिया गया। यह अलहदा सवाल है कि जिन पुलिस अधिकारियों ने अनूठी सोच दिखाते हुए जिन लोगों से यह जांबाजी करवायी, उसके बाद तो इस इलाके में नक्‍सलियों की मौजूदगी नहीं होनी थी। पर क्‍या उसके बावजूद नक्‍सलियों की मौजूदगी यह मानने को मजबूर नहीं करती है कि पुलिस ने यह इलाका और उन ग्रामीणों को नक्‍सलियों के पास ढकेल दिया? ग्रामीणों को यह समझने के लिए मजबूर किया कि नक्‍सली ही उनके ज्‍यादा हमदर्द हैं? सरकार के नाम जारी चिट्ठी जो बजरिया मीडिया पहुंची, उसमें माओवादियों ने युवा कलेक्‍टर एलेक्‍स के लिए जिस शब्‍द का प्रयोग किया वो था, ‘युवा दलित की चिंता नहीं है सरकार को’ …

नज़रिया »

[4 Jun 2011 | 2 Comments | ]

विश्वजीत सेन ♦ एक बहुत ही ऊर्जावान और संभावनाओं से परिपूर्ण आंदोलन कैसे भटकाव की अंधी गली में पहुंच जाता है, नक्सलवाद इसका उदाहरण है। भटकाव की अंधी गली में वे इतनी दूर तक चले गये हैं कि अब ममता की ओर टकटकी लगाकर देखने के सिवा उनके पास कोई विकल्प नहीं है। अगर ममता अपने वादे से मुकर जाती हैं, तब भी वे कर ही क्या सकते हैं? पुनः गुहार लगाएंगे, पुनः पुनः गुहार लगाएंगे। और कोई विकल्प तो है नहीं उनके पास। अगर वे अपनी पुरानी रणनीति की ओर लौटने का प्रयास करेंगे, तब ममता उन्‍हें इस बुरी तरह कुचलवा देंगी, जिसकी कल्पना भी वे नहीं कर सकते।

नज़रिया, बात मुलाक़ात »

[1 Jan 2011 | 9 Comments | ]

अरुंधती राय ♦ आप एक ऐसी अवस्था का निर्माण कर रहे हैं जिसमें राष्ट्रविरोधी की परिभाषा यह हो जाती है कि जो अधिक से अधिक लोगों की भलाई के लिए काम कर रहा है, यह अपने आप में विरोधाभासी और भ्रष्ट है। विनायक सेन जैसा आदमी जो सबसे गरीब लोगों के बीच काम करता है अपराधी हो जाता है, लेकिन न्यायपालिका, मीडिया तथा अन्यों की मदद से जनता के एक लाख 75 हजार करोड़ रुपये का घोटाला करने वालों का कुछ नहीं होता। वे अपने फार्म हाउसों में, अपने बीएमडब्ल्यू के साथ जी रहे हैं। इसलिए राष्ट्रविरोधी की परिभाषा ही अपने आप में भ्रष्ट हो चुकी है… जो कोई भी न्याय की बात कर रहा है, उसको माओवादी घोषित कर दिया जाता है। यह कौन तय करता है कि राष्ट्र के लिए क्या अच्छा है।

नज़रिया, मीडिया मंडी »

[4 Sep 2010 | 15 Comments | ]

डेस्‍क ♦ बिहार के लखीसराय में माओवादियों ने अपने साथियों को छुड़ाने के एवज में तीन पुलिसकर्मियों को बंधक बना लिया। इनमें से एक की हत्‍या कर देने के बाद माओवादियों के अमानवीय किस्‍सों से पटी मीडिया की खबरों ने पूरे देश को हिला दिया। माओवादियों के इस कृत्‍य की चारों ओर निंदा हुई और हो रही है। ऐसे में लेखिका अरुंधती राय ने भी अपना बयान जारी किया है। अरुंधती के मुताबिक मीडिया की ओर से निंदा-बुलेटिन में बांट-बखरा नहीं होना चाहिए। मीडिया को फर्जी पुलिस मुठभेड़ में मारे जा रहे माओवादियों के बारे में भी ऐसी ही संवेदनशीलता से बातें करनी चाहिए।

असहमति, नज़रिया, मोहल्ला दिल्ली, शब्‍द संगत »

[28 Jul 2010 | 23 Comments | ]

राजेंद्र यादव ♦ बुद्धिजीवियों का यह कौन सा आचरण है कि वे दूसरे पक्ष की बात सुनेंगे ही नहीं। यह विचारों का लोकतंत्र नहीं, बौद्धिक तानाशाही है। “मैं तुम्‍हारे विचारों को एक सिरे से खारिज करता हूं, मगर मरते दम तक तुम्‍हारे ऐसा कहने के अधिकार का समर्थन करूंगा।” यह कहा-बताया जाता है लोकतंत्र के पुरोधा वॉल्‍टेयर का। दूसरे को बोलने ही न दो, यह कैसा फासीवाद है? क्‍या हमारे तर्क इतने कमजोर हैं कि “दुश्‍मन” के सामने ठहर ही नहीं पाएंगे? इस वैचारिक तानाशाही का एक कुत्सित रूप कुतर्कों का पिंजड़ा खड़ा करना भी है। आप किसी भी विषय पर बात कीजिए, वे तर्क देंगे कि जब किसान हजारों की संख्‍या में आत्‍महत्‍याएं कर रहे हों, तब आप एसी कमरों में बैठकर एक फालतू मुद्दे पर मगजपच्‍ची कर रहे हैं – यह भयानक देशद्रोह है।

नज़रिया, मोहल्ला दिल्ली, शब्‍द संगत »

[22 Jul 2010 | 2 Comments | ]

परिवर्तनकामी टोली ♦ अरुंधती ने ‘हंस’ के जलसे में न जाने का फैसला सार्वजनिक करने से पहले राजेंद्र यादव से किसी तरह की पुष्टि नहीं की। अगर उन्होंने ये फैसला करने से पहले राजेंद्र यादव से एक बार बात कर ली होती या यह पता लगा लिया होता कि क्या विश्वरंजन को भी बुलाया गया है, तो उनका भ्रम तभी दूर हो जाता। इस संवादहीनता ने दो जनपक्षधर व्यक्तित्वों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा की। अरुंधती और राजेंद्र यादव की जनपक्षधरता असंदिग्ध रही है। भ्रम की ये स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण है। अरुंधति राय का जो कद है और जो विश्वसनीयता है, उसमें उन्हें सुनी-सुनाई बातों के आधार पर इस तरह का कोई फैसला सार्वजनिक करने से बचना चाहिए। राजेंद्र यादव का कहना है कि वे अब भी चाहते हैं कि अरुंधती इस कार्यक्रम में शामिल हों।

नज़रिया, मोहल्ला दिल्ली »

[15 Jul 2010 | 21 Comments | ]

अविनाश ♦ कहीं जाकर या नहीं जाकर, किसी को सुन कर या नहीं सुन कर हम अपनी प्रतिबद्धताएं, अपने आचरण की शुद्धता साबित कर सकते हैं – लेकिन इस सबूत से कुछ फर्क नहीं पड़ता। मैं अभी भी इस बात पर कायम हूं कि अरुंधती मान जाएं और विश्‍वरंजन छत्तीसगढ़ से चल कर हंस की गोष्‍ठी में आ जाएं तो पूरे आंदोलनी हिलोर का एक नया संदेश प्रसारित किया जा सकता है। विश्‍वरंजन को घेर कर, उनको सामने खड़ा करके हत्‍यारा बता कर, उनके सामने उनका पुतला जला कर, उन्‍हें जूतों की माला पहना कर। और ऐसा करते हुए अगर उस वक्‍त तमाम बुद्धिजीवियों की गिरफ्तारी हो जाती है – तो इस भारतीय स्‍टेट को एक्‍सपोज करने का कितना आसान अवसर आपके पास है, ये आप ही तय कीजिए।

नज़रिया, मोहल्‍ला रायपुर, समाचार »

[13 Jul 2010 | One Comment | ]

डेस्‍क ♦ यह पहला मौका नहीं है जब छत्तीसगढ़ पुलिस ने मानवाधिकार की आवाज उठाने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं पर निशाना साधा है। इससे पहले भी पुलिस के आला अधिकारी अरुंधती रॉय और हिमांशु कुमार पर नक्सलियों से साठगांठ के आरोप लगाते रहे हैं। लेकिन अब उन्होंने मेधा पाटकर को भी इसमें लपेट लिया है। मतलब साफ है… जो भी नक्सलवाद के खिलाफ चल रहे अभियान में पुलिस और प्रशासन के साथ नहीं है, बारी-बारी उन सभी के खिलाफ कार्रवाई की भूमिका तैयार की जा रही है।

नज़रिया, मीडिया मंडी, मोहल्ला दिल्ली, मोहल्‍ला रायपुर, समाचार »

[13 Jul 2010 | 2 Comments | ]

डेस्‍क ♦ छत्तीसगढ़ पुलिस की तरफ से घोषित किये गये माओवादी मास्टरमाइंड लिंगाराम कोडोपी ने खुद को बेगुनाह बताया है। नम आंखों के साथ दिल्ली के प्रेस क्लब में एक प्रेस कानफ्रेंस में लिंगाराम ने कहा कि वो बेगुनाह हैं और उनका कांग्रेस नेता अवधेश सिंह गौतम के घर पर हुए हमले से कोई लेना-देना नहीं है। लिंगाराम नोएडा के इंटरनेशनल मीडिया इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया से पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे हैं और उनके मुताबिक मई के बाद से वो एनसीआर छोड़ कर कहीं नहीं गये। एक दिन पहले छत्तीसगढ़ में दंतेवाड़ा के एसएसपी एसआरपी कल्लुरी ने दावा किया था कि छह जुलाई को कांग्रेस नेता के घर पर हुए हमले का मास्टरमाइंड लिंगाराम कोडोपी है।

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[4 Jul 2010 | No Comment | ]

विनीता पांडे ♦ आपके समाचार पत्र में आज दिनांक 4 जुलाई 2010 को पहले पन्ने पर मेरे पति हेम चंद्र पांडे के बारे में आयी खबर में कई तथ्य पूरी तरह से गलत हैं। उसमें मेरे पति का नाम भी गलत लिखा गया है। आपकी खबर में हमारी शादी को लेकर भी सवाल उठाये गये हैं और भी कई तथ्यों के साथ तोड़ मरोड़ की गयी है। हमारी शादी 17 फरवरी 2002 को हमारे घर पिथौरागढ़ में हुई थी। इस बात की पुष्टि मेरे परिवार, रिश्तेदारों और दोस्तों से भी की जा सकती है। आपके अखबार ने शनिवार को प्रेस कल्ब में हुई प्रेस कांफ्रेंस में दिये गये मेरे वक्‍तव्‍य को गलत तरीके से छापा है। आपके अखबार ने मेरे हवाले से कहा है कि मैं आजाद की मौत की खबर सुनकर दुखी हुई थी। जबकि मैंने ऐसा कभी नहीं कहा।