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Articles tagged with: naxalism

संघर्ष, समाचार »

[27 May 2011 | No Comment | ]

नागरिक मोर्चा ♦ कहा जा रहा है कि कुछ ”बाहरी तत्व” मज़दूरों को भड़का रहे हैं। ऐसा कहने वाले मंडलीय कमिश्नर, पुलिस के अफ़सर और भाजपा सांसद योगी आदित्‍यनाथ सीधे-सीधे संविधान का उल्लंघन कर रहे हैं। क्या वे नहीं जानते कि देश का क़ानून किसी भी व्यक्ति को कहीं भी जाकर अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाने की इजाज़त देता है? ट्रेड यूनियन एक्ट, 1926 भी मजदूरों को बाहर से अपने प्रतिनिधि चुनने का अधिकार देता है। वार्ताओं में मज़दूरों की ओर से उनके प्रतिनिधि के रूप में गैर-मज़दूर समर्थक पहले भी भागीदारी करते रहे हैं। मगर अपने अहंकार और मालिकपरस्ती की रौ में आकर इन्होंने गोरे शासकों को भी पीछे छोड़ दिया है।

स्‍मृति »

[17 Nov 2010 | 8 Comments | ]

विनीता पांडे ♦ आंध्रप्रदेश पुलिस मेरे पति हेम चंद्र पांडे के बारे में दुष्प्रचार कर फर्जी मुठभेड़ में की गयी उनकी हत्या पर पर्दा डालने का काम कर रही है। इस मामले में न्यायिक जांच किये जाने के बजाय लगातार मुझे परेशान करने की कोशिश की जा रही है। पुलिस ने शास्‍त्रीनगर स्थित हमारे किराये के घर में बिना मुझे बताये छापा मारा है और वहां से कई तरह की आपत्तिजनक चीजों की बरामदगी दिखायी है। आंध्रप्रदेश पुलिस का ये दावा बिल्कुल झूठा है कि मैंने उन्हें अपने घर का पता नहीं बताया। पुलिस के पास मेरे घर का पता भी था और मेरा फोन नंबर भी लेकिन उन्होंने छापा मारने से पहले मुझे सूचित करना जरूरी नहीं समझा।

नज़रिया, मोहल्ला दिल्ली »

[15 Jul 2010 | 21 Comments | ]

अविनाश ♦ कहीं जाकर या नहीं जाकर, किसी को सुन कर या नहीं सुन कर हम अपनी प्रतिबद्धताएं, अपने आचरण की शुद्धता साबित कर सकते हैं – लेकिन इस सबूत से कुछ फर्क नहीं पड़ता। मैं अभी भी इस बात पर कायम हूं कि अरुंधती मान जाएं और विश्‍वरंजन छत्तीसगढ़ से चल कर हंस की गोष्‍ठी में आ जाएं तो पूरे आंदोलनी हिलोर का एक नया संदेश प्रसारित किया जा सकता है। विश्‍वरंजन को घेर कर, उनको सामने खड़ा करके हत्‍यारा बता कर, उनके सामने उनका पुतला जला कर, उन्‍हें जूतों की माला पहना कर। और ऐसा करते हुए अगर उस वक्‍त तमाम बुद्धिजीवियों की गिरफ्तारी हो जाती है – तो इस भारतीय स्‍टेट को एक्‍सपोज करने का कितना आसान अवसर आपके पास है, ये आप ही तय कीजिए।

नज़रिया, मोहल्‍ला रायपुर, समाचार »

[13 Jul 2010 | One Comment | ]

डेस्‍क ♦ यह पहला मौका नहीं है जब छत्तीसगढ़ पुलिस ने मानवाधिकार की आवाज उठाने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं पर निशाना साधा है। इससे पहले भी पुलिस के आला अधिकारी अरुंधती रॉय और हिमांशु कुमार पर नक्सलियों से साठगांठ के आरोप लगाते रहे हैं। लेकिन अब उन्होंने मेधा पाटकर को भी इसमें लपेट लिया है। मतलब साफ है… जो भी नक्सलवाद के खिलाफ चल रहे अभियान में पुलिस और प्रशासन के साथ नहीं है, बारी-बारी उन सभी के खिलाफ कार्रवाई की भूमिका तैयार की जा रही है।

नज़रिया, मीडिया मंडी, मोहल्ला दिल्ली, मोहल्‍ला रायपुर, समाचार »

[13 Jul 2010 | 2 Comments | ]

डेस्‍क ♦ छत्तीसगढ़ पुलिस की तरफ से घोषित किये गये माओवादी मास्टरमाइंड लिंगाराम कोडोपी ने खुद को बेगुनाह बताया है। नम आंखों के साथ दिल्ली के प्रेस क्लब में एक प्रेस कानफ्रेंस में लिंगाराम ने कहा कि वो बेगुनाह हैं और उनका कांग्रेस नेता अवधेश सिंह गौतम के घर पर हुए हमले से कोई लेना-देना नहीं है। लिंगाराम नोएडा के इंटरनेशनल मीडिया इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया से पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे हैं और उनके मुताबिक मई के बाद से वो एनसीआर छोड़ कर कहीं नहीं गये। एक दिन पहले छत्तीसगढ़ में दंतेवाड़ा के एसएसपी एसआरपी कल्लुरी ने दावा किया था कि छह जुलाई को कांग्रेस नेता के घर पर हुए हमले का मास्टरमाइंड लिंगाराम कोडोपी है।

नज़रिया, मोहल्‍ला रायपुर »

[1 Jul 2010 | 3 Comments | ]

दिवाकर मुक्तिबोध ♦ …जब ऐसी स्थितियां हों तो ग्रामीण नक्सलियों के खिलाफ होने के बावजूद पुलिस के सूचनादूत कैसे बन सकते हैं? इसीलिए पुलिस का सूचना तंत्र कमजोर है और नक्सलियों का मजबूत। पुलिस जब तब इसे ठीक नहीं कर पाएगी, नक्सलियों के खिलाफ जंग जीतना मुश्किल है। जाहिर है, लड़ाई बहुत लंबी है। यदि इसे जीतना है तो पुलिस या अर्द्धसैनिक बलों के जवानों को आम आदमी बनकर गांवों में आदिवासियों के बीच रहना होगा। जंगलों को ठीक से जानना होगा तथा ग्रामीणों का विश्वास जीतना होगा। तभी वे भेड़ों के बीच भेड़िये की पहचान कर पाएंगे और फिर उन्हें मारने में आसानी होगी। वरना नक्सलियों के हमले इसी तरह जारी रहेंगे और जानें जाती रहेंगी।

नज़रिया »

[16 Jun 2010 | 8 Comments | ]

आनंद स्‍वरूप वर्मा ♦ ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की पत्रकार अनोहिता मजुमदार ने एक दिसंबर 2001 को नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के अध्यक्ष प्रचंड (पुष्प कमल दहाल) से बातचीत की, जिसका विवरण इस अखबार के दो दिसंबर के अंक में प्रमुखता से प्रकाशित हुआ। बातचीत के दौरान इस प्रतिनिधि ने सवाल किया कि माओवादी योद्धाओं और आतंकवादियों में क्या फर्क है? इस सवाल का जवाब देते हुए कामरेड प्रचंड ने कहा कि ‘दोनों की किसी भी तरह से तुलना ही नहीं की जा सकती। आतंकवादी लोग निरीह और निहत्थी जनता के खिलाफ विवेकशून्य और आत्मघाती हमले करते हैं।

असहमति, नज़रिया »

[14 Jun 2010 | 9 Comments | ]

विश्‍वदीपक ♦ साजिद रशीद की विवेकहीनता का आलम ये है कि वो ‘आंतकवाद’ और ‘माओवाद’ को एक ही तराजू पर तौल रहे हैं। उन्‍हें आतंकवाद और माओवाद में फर्क भी समझ में नहीं आ रहा? क्या रशीद की बातों में, अमेरिका और कांग्रेस की दलीलों में कोई फर्क नजर आ रहा है? रशीद कहते कि माओवादी ‘सत्ता में परिवर्तन’ के ख्वाहिशमंद है। अब जबकि भारतीय राज्य अपनी वैधानिकता की सबसे खरतनाक जद्दोजहद कर रहा है राशिद जैसे लोगों को डर क्यों लग रहा है? क्या महज इसीलिए कि वर्तमान सत्ता संरचना में उनकी जो हिस्सेदारी है, सुविधाएं हैं, सहूलियतें है वो छिन जाएंगी?

असहमति, नज़रिया »

[13 Jun 2010 | 23 Comments | ]

साजिद रशीद ♦ नक्सलवादियों के पक्ष में इस समय सबसे निडर और बुलंद आवाज अरुंधती राय की है। अगरचे वे अपने उपन्यास ‘द गॉड ऑफ स्माल थिंग्स’ में कॉमरेड नंबूदरीपाद जैसे मार्क्सवादी नेता की आलोचना करके कम्युनिस्टों में ‘शापित’ हो चुकी हैं। अरुंधती ने साप्ताहिक ‘आउटलुक’ में प्रकाशित अपने लंबे लेख में नक्सलवादियों की हिंसा को दुरुस्त ठहराने के लिए जो रोशनाई खर्च की थी, उसमें अब ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस के उन डेढ़ सौ यात्रियों का लहू भी शामिल हो गया है, जिन्होंने अपनी आखिरी सांसें लेते हुए यह जरूर सोचा होगा कि उनके किस दुश्मन ने उन्हें यह दर्दनाक मृत्यु दी है? याद रहे, पिछले पांच वर्षों में नक्सलवादियों के हमलों में मरने वाले नागरिकों की संख्या लगभग पंद्रह सौ है।

नज़रिया, मोहल्ला रांची »

[2 Jun 2010 | 8 Comments | ]

अश्‍िवनी कुमार पंकज ♦ नहीं कह सकता कि देश में नक्सल-वादी कहां हैं, कहां नहीं हैं? पर दावे से कह सकता हूं कि दिल्ली, पटना, लखनऊ… और रांची में तो नक्सलवाद नहीं है। तो यहां विकास किसने रोका है? आजादी के छह दशक बाद भी देश के सभी बड़े शहरों में नागरिक सुविधाएं आज तक भी क्यों नहीं सुलभ हो सकी हैं? रांची आज भी अंधेरे में डूबी हुई है, क्यों? ‘मधु कोड़ा’ क्या नक्सलवाद की देन हैं? बोफोर्स दलाली के पीछे भी क्या नक्सलवादी ही थे? देश के किसी भी राज्य के किसी भी हिस्से में पुलिस जब चाहे जिस किसी को थाने में या फिर सरेआम मार देती है, यह भी नक्सलवादियों के इशारे पर होता है? दिल्ली हो या दंतेवाड़ा… घरों में घुसकर जो हत्याएं कर रहे हैं, लूट रहे हैं, सड़कों पर सरेआम रेप कर रहे हैं, क्या यह सब भी नक्सलवादियों का ही काम है?