Articles tagged with: naya gyanodaya
नज़रिया, विश्वविद्यालय, शब्द संगत »
डेस्क ♦ हमने जिस गम को भूला हुआ समझ लिया था, उसका दर्द अब भी किसी किसी की जबान से छलक जाता है। विभूति नारायण राय की बदजुबानी का किस्सा कुछ ऐसा ही है कि लोग उस मसले को भूल गये थे। लेकिन पिछले दिनों जनसत्ता में कृष्ण सोबती ने उस प्रसंग पर अपनी कलम चला कर फिर से उस जख्म को हरा कर दिया, जिसे अब मद्धिम नहीं पड़ना था। सांस्थानिक गठजोड़ों वाली हिंदी में लेखकीय अस्मिता यूं भी कोई मायने रखने वाली चीज नहीं है – लेकिन फिर लेखक विरोध करते हैं और संस्थान अपनी जगह बने रहते हैं। खैर, कृष्ण सोबती की इस प्रतिक्रिया की नकलचेंपी हम पहले ही कर चुके होते, अगर मोहल्ला लाइव के मॉडरेटर का यात्रा संबंधी खलल इसमें नहीं पड़ता। खैर, देर आयद दुरुस्त आयद।
शब्द संगत »
अमर उजाला ♦ लगभग सवा सौ लेखकों के बहिष्कार के बाद भारतीय ज्ञानपीठ अपने निदेशक रवींद्र कालिया को नया ज्ञानोदय के संपादक पद से हटाने का विचार कर रहा है। नया ज्ञानोदय में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय के विवादास्पद साक्षात्कार को सबसे बेबाक बताने वाले कालिया के खिलाफ पहले ही वर्धा न्यायालय की ओर से नोटिस जारी है। भारतीय ज्ञानपीठ के इतिहास में यह घटना पहली बार हुई है, जब निदेशक को स्त्री अवमानना के आरोप पर नोटिस जारी हुआ। तीस सितंबर को न्यास की अगली बैठक में पत्रिका के भविष्य पर निर्णय लिया जाएगा।
विश्वविद्यालय, शब्द संगत »
डेस्क ♦ वर्धा जिला न्यायालय के फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट, धनंजय निकम ने भारतीय ज्ञानपीठ की पत्रिका “नया ज्ञानोदय” में छपे विभूति नारायण राय के साक्षात्कार में लेखिकाओं को दी गयी गाली मामले में राय, रवींद्र कालिया और साक्षात्कारकर्ता राकेश मिश्र के खिलाफ क्रिमिनल नोटिस जारी की है। 23 अगस्त के अपने ऑर्डर में निकम ने कहा कि सभी कागजात देखने के बाद तथा शिकायतकर्ता की दलीलें सुनाने के बाद यह मामला प्रथमदृष्टया ऐसा लगता है कि इस प्रकरण से महिला लेखिकाओं का अपमान हुआ है। अतः तीनों आरोपियों को आईपीसी की धारा 499, 500, 501 तथा 509 के तहत नोटिस किया जा सकता है। कालिया, राय और मिश्र को 20 सितंबर तब अपना जवाब रखना है।
विश्वविद्यालय, शब्द संगत »
रघुवंश प्र सिंह ♦ महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय है, उसके वाइस चांसलर हैं वीएन राय। क्या लिखा है उन्होंने और महिला लेखकों के प्रति उनकी क्या टिप्पणी है? मैं लज्जित हूं उस शब्द का सदन में उच्चारण करने में कि उन्होंने क्या कहा। … ((व्यवधान)) … सारा देश लाज्जित है। देश भर के 150 लेखकों ने एक साथ कहा कि उसको हटाया जाए। अभी तक सरकार ने क्यों नहीं हटाया है? महिला लेखिका के प्रति किन शब्दों का उच्चारण किया है? एक वाइस चांसलर ने ऐसा किया और क्यों उस पर अभी तक कार्रवाई नहीं हुई है? हम यह पहला सवाल उठाते हैं। ये कहते हैं कि महिला का सशक्तीकरण कर रहे हैं और कहते हैं कि सभी ऊंचे पदों पर महिलाओं को बैठाएं। सरकार इसका जवाब दे कि क्यों नहीं उसे हटाया गया।
शब्द संगत »
सैन्नी अशेष ♦ हम दूर-दराज़ के साधारण पहाड़ी लोगों को क्यों तुम्हारे दरबार में हाजिर होना चाहिए? स्नोवा बार्नो की रचनाएं स्वीकार करने और छापने वाले हंस, पहल, वागर्थ, वसुधा, पाखी, समकालीन भारतीय साहित्य, इंडिया टुडे, आउटलुक, सरिता आदि किसी भी पत्रिका ने ज्ञानोदय जैसा बर्ताव नहीं किया। यहां तक कि भारतीय भाषा परिषद ने स्नोवा बार्नो के अस्वीकार करने पर भी उसके प्रथम पुरस्कार की राशि भेज दी। संवाद प्रकाशन ने डंके की चोट पर स्नोवा की दो किताबें इस साल जारी कीं। ठीक है, हिमाचल के लेखकों ने स्नोवा बार्नो की लड़ाई लड़ी और सरकार ने भी हमें निर्दोष पाकर हमें स्वतंत्रता दे दी। लेकिन अब हम लिखना छोड़ चुके हैं। हिंदी की इस दुनिया से बहुत बेहतर काम हैं हमारे पास करने को।
विश्वविद्यालय, शब्द संगत »
गीतांजलिश्री ♦ जिस तरह के ऊल-जलूल शीर्षक के सहारे नया ज्ञानोदय को लोकप्रियता दिलाये जाने का प्रयास किया जाता रहा है, और जिस छद्म भाषा में ये निंदनीय साक्षात्कार दिया गया है, दोनों उसी गहरे पैठी पुरुष-मानसिकता के प्रतिमान हैं, जो सदियों से चली आ रही है। न जाने दंभ में या कि बेवकूफी में, ये बातें कही गयीं, मगर इससे फर्क नहीं पड़ता। बल्कि इरादा क्या था/है, उससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता। चूंकि जब तक आपकी मानसिकता नहीं बदलेगी और औरत के प्रति नजर वही पुरानी चलेगी, तब तक आप उसके पक्ष में हों, या विपक्ष में, आपकी भाषा यही रहेगी। क्योंकि आपके पास कोई और भाषा है ही नहीं। मजाक, गंभीर विवाद, गाली, तारीफ, सबके लिए शब्द-संपदा एक होगी। भद्दे शब्द, बेहूदा शैली, फूहड़ अंदाज।
विश्वविद्यालय, शब्द संगत »
डेस्क ♦ नया ज्ञानोदय के संपादक रवींद्र कालिया ने माफी मांगी है। इसी सिलसिले में उन्होंने एक चिट्ठी जनसत्ता को भेजी है। माफी इसलिए नहीं कि उनसे भूल हुई। वो छिनाल कांड से हिंदी साहित्य जगत को कितनी शर्मिंदगी होगी, इसका अंदाजा नहीं लगा सके। बल्कि माफी इसलिए कि विभूति नारायण राय का इंटरव्यू उन्होंने पढ़ा नहीं था और वो हू-ब-हू छप गया। मतलब साफ है, रवींद्र कालिया झूठ बोल रहे हैं। उनमें तो इतना नैतिक साहस भी नहीं कि गलती कबूल करें और संपादक होने का फर्ज अदा करें। वो अपना गुनाह दूसरों पर थोप रहे हैं। ठीक वैसे ही, जैसे विभूति नारायण राय ने गुनाह कबूल करने से पहले कहा था कि उन्होंने छिनाल शब्द का प्रयोग ही नहीं किया था। मतलब कालिया विभूति नारायण राय की तरह ही कायर भी हैं।
विश्वविद्यालय, शब्द संगत »
विष्णु खरे ♦ जहां तक मेरा आकलन है, हिंदी साहित्य में राय-कालिया की प्रतिष्ठा यदि कभी थी भी तो आज फूटी कौड़ी की नहीं रह गयी है। लेकिन अधिकांश ऐसे प्राणी, उनके सरपरस्त और समर्थक गंडक-चर्म में वाराहावतार होते हैं। उन्हें न व्यापै जगत-गति। फिर जिस समाज में हत्यारे, बलात्कारी, डकैत, स्मग्लर, करोड़ों का गबन करने वाले संसद तक पहुंच रहे हों वहां हिंदी, जो खुद गरीब की जोरू की तरह सबकी भौजाई या साली है, भले ही उसका एक गांधी विश्वविद्यालय हो, उसकी लेखिकाओं को छिनाल कह देना तो एक होली की ठिठोली से ज्यादा कुछ नहीं। हिंदी साहित्य को अब ज्ञानोदय-ज्ञानपीठ से कुलटा, रखैल, समलिंगी, हिजड़ा, ‘निंफोमैनिएक’ सुपर-विशेषांकों और ग्रंथों की विकल प्रतीक्षा रहेगी।
विश्वविद्यालय, शब्द संगत »
वर्धा स्ट्रिंगर ♦ दैनिक भास्कर को एक अनौपचारिक भेंटवार्ता के दौरान वरिष्ठ पत्रकार व प्रसार भारती की अध्यक्ष मृणाल पांडे ने महिला लेखिकाओं को छिनाल कहने के विभूति नारायण के विवादास्पद बयान पर लताड़ते हुए कहा कि जिस अंदाज में यह बात विभूति नारायण ने कही है, इससे उनके महिलाओं के बारे में असली नजरिये का पता चलता है। इसके पीछे लोकप्रियता हासिल करने की चाहत काम कर सकती है। विभूति नारायण के अपमानजनक बयान से हिटलर की याद आ गयी। जर्मन तानाशाह हिटलर ने कहा था कि औरतों को अपने अस्तित्व के बारे में नहीं सोचना चाहिए, यह मुझे चिड़चिड़ा देता है। मृणाल पांडे ने कहा कि दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि जिस व्यक्ति ने यह बयान दिया है, वह एक बेहद जिम्मेदारी वाले पद पर है।
विश्वविद्यालय, शब्द संगत »
विष्णु खरे ♦ ‘जिन्हें देवता बर्बाद करना चाहते हैं पहले उन्हें विकल मस्तिष्क कर देते हैं’ वाली यूनानी कहावत के मुताबिक हमारे कुलपति का दिमाग लेखक होने के उनके वहम और वामपंथियों के अपनी वर्दी की कई जेबों में होने की खुशफहमी ने तो खराब कर ही दिया होगा, हिंदी कुलपति होने की सत्ता के कारण राष्ट्रव्यापी अधिकांश हिंदी प्राध्यापक-लेखक-प्रकाशक गुलामी जो उन्हें अनायास प्राप्त हो गयी उसने उन्हें विभूति-विभ्रम का आखेट बना डाला। हम अधिकांश हिंदी विभागों की गलाजतों को जानते ही हैं। स्वयं गांधी विवि में सैकड़ों पद और छात्रवृत्तियां हैं, एमलिट, एमफिल, पीएचडी के निबंध-प्रबंध हैं, अपने अपने रुझान के उपयुक्त छात्र-छात्राएं हैं, लेखक-लेखिकाओं को बुलाने के लिए बहाने, बहकावे-बहलावे हैं।


