Articles tagged with: Nirupama Pathak
नज़रिया, स्मृति »
रीतेश ♦ सुसाइड नोट मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है लेकिन अंत में चार लाइन हिंदी में भी लिखा गया है, जिसमें निरुपमा ने अपना अंतिम संस्कार गया में करने की गुजारिश की है। सुसाइड नोट पर अंग्रेजी में लिखी गयी बातें और हिंदी में लिखी गयी गुजारिश उसकी लिखावट से मेल खाती है, ये प्रियभांशु और उसके दोस्तों ने पुलिस को बताया है। लेकिन सुसाइड नोट में अंग्रेजी के कुछ शब्दों को तोड़ दिया गया है जो एक शब्द हैं और निरुपमा ऐसी गलतियां नहीं करती थी। ये संदेह पैदा करता है कि उससे जबरन यह नोट लिखवाया गया होगा।
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रीतेश ♦ घर वालों की तरफ से प्रियभांशु से रिश्ते को लेकर इनकार, राहू की खराबी और विनाश की धमकी के साथ पिता की चिट्ठी के मद्देनजर निरुपमा की मनोदशा को भी समझने की जरूरत है कि उसे 14 अप्रैल को जब घर जाने का निर्देश भाई से फोन पर मिलता है तो वह सबसे पहले जाने का टिकट कटाने की बजाय उसी दिन अपनी वापसी का टिकट कटाती है। यानी उसने जाने का फैसला तब तक नहीं किया लेकिन यह तय कर लिया था कि अगर जाएगी तो 28 अप्रैल को तो लौट ही आएगी। इस मनोदशा को समझने की जरूरत है कि मां की बीमारी की खबर सुनकर भी एक बेटी घर जाने और न जाने की उलझन में क्यों थी? कौन सा खौफ इसके पीछे काम कर रहा था?
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रीतेश ♦ पूछताछ में एक अहम बात ये थी कि कोडरमा से जो अधिकारी शिव प्रसाद पूछताछ के लिए दिल्ली आये थे, उन्होंने पूछताछ के लिए बुलाये गये निरुपमा के एक मित्र को पूछताछ के बाद दो घंटा तक ब्रह्म ज्ञान दिया। शिव प्रसाद ने उससे कहा, “एक अच्छे पेशेवर और एक अच्छा दोस्त तो बाद में बनोगे, पहले एक अच्छा इंसान बनो। एक अच्छा इंसान होने के नाते तुम्हारा फर्ज बनता था कि तुम उन्हें रोकते, उन्हें समझाते कि घर वालों की मर्जी से शादी करो, अगर घर वाले नहीं कहते हैं तो शादी मत करो। आजकल बच्चों का संस्कार खराब हो गया है। वो धर्म, जाति और संस्कार समझते ही नहीं। आप जैसे लोगों के कारण संस्कृति खराब हो रही है, ये आपकी पीढ़ी की समस्या है।”
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रीतेश ♦ हमारी जानकारी यह है कि निरुपमा के शव को उनकी मां के अलावा किसी और ने पंखे से लटका हुआ नहीं देखा। जिसने भी देखा, सबने पलंग पर ही देखा। एक अपुष्ट खबर है, पुलिस को शायद सच पता हो, जब निरुपमा की मां से फंदे के बारे में पूछा गया तो उन्होंने किसी दूसरे कमरे से लाकर एक दुपट्टा दिया। अगर ऐसा है तो सवाल ये उठता है कि पंखे से शरीर नीचे गिर गया था लेकिन फंदा कैसे गिरा और गिरा तो दूसरे कमरे में कैसे चला गया। हो सकता है कि हमारी ये जानकारी गलत हो क्योंकि हम कोडरमा के बारे में सिर्फ सुनी-सुनाई या पुलिस रिकॉर्ड में आयी बातों को ही जान पाते हैं। हमें उम्मीद है कि इसका जवाब पुलिस की जांच से सामने आ जाना चाहिए।
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रीतेश ♦ स्मॉदरिंग के जरिये हत्या वह क्रूर प्रक्रिया है, जब किसी की नाक और मुंह को एक ही बार दबाकर उसकी सांस रोक दी जाए। दम घुटने से मौत के मामलों में पोस्टमार्टम के लिए डॉक्टर समुदाय ने आम तौर पर तीन टर्म तय किये हैं। जब आदमी की मौत फांसी पर झूलने से हो, तो उसे डॉक्टर एसफिक्सिया एज ए रिजल्ट ऑफ हैंगिंग लिखते हैं। जब किसी की गला दबाकर हत्या की जाती है, तो उसमें एसफिक्सिया एज ए रिजल्ट ऑफ स्ट्रैंगुलेशन लिखा जाता है और जब किसी की हत्या नाक और मुंह दबाकर की जाए, तो उसे एसफिक्सिया एज ए रिजल्ट ऑफ स्मॉदरिंग लिखते हैं। डॉक्टरों का कहना है कि मेडिकल इतिहास में स्ट्रैंगुलेशन और स्मॉदरिंग का कोई भी मामला खुदकुशी का नहीं मिला है।
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रीतेश ♦ हमने कहा था कि झूठ बोलने का झंझट ये है कि आपको उसे हमेशा याद रखना होता है कि किससे, कब और क्या कहा गया था। इस रिपोर्ट में आपको बार-बार इस बात का अहसास होगा कि झूठ बोलकर अपनी बेटी की हत्या का आरोप झेल रहे परिवार ने अपने चारों ओर किस तरह से कानूनी शिकंजे को और कस लिया है। ठोस तौर पर एक तरफ हत्या के पक्ष में तकनीकी कारणों से विवाद में आए पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अलावा कई परिस्थितिजन्य साक्ष्य हैं तो दूसरी तरफ खुदकुशी के पक्ष में एक सुसाइड नोट है जिसके साथ छेड़छाड़ की गयी है। पुलिस इसके आगे-पीछे की कड़ी तलाश रही है।
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दिलीप मंडल ♦ निरुपमा की हत्या का विरोध करने वालों से पूछा जा रहा है कि अगर निरुपमा की जगह आपकी बेटी होती, तो क्या आप तालियां बजाते। ऐसे प्रश्नों का उत्तर तात्कालिकता से परे ढूंढना होगा। अगर आने वाले दिनों में और कई निरुपमाओं की जान बचानी है तो उस वर्ण व्यवस्था की जड़ों को काटने की जरूरत है, जिसकी अंतर्वस्तु में ही हिंसा है। निरुपमा की हत्या करने वाले आखिर उस वर्ण व्यवस्था की ही तो रक्षा कर रहे थे, जो हिंदू धर्म का मूलाधार है। अंतर्जातीय शादियों का निषेध वर्ण-संकर संतानों को रोकने के लिए ही तो है… वर्ण व्यवस्था सिर्फ दलितों और पिछड़ों का हक नहीं मारती, निरुपमा को भी मारती है।
नज़रिया, स्मृति »
रीतेश ♦ अपने एक गुरुजी कहा करते थे कि सच बोलने का सबसे बड़ा फायदा ये है कि आपको याद रखने की जरूरत नहीं पड़ती कि आपने क्या कहा था और कब कहा था। झूठ बोलने में सबसे बड़ा झंझट है कि आपको हमेशा ये याद रखना होता है कि आपने कब, किससे, क्या कहा था। निरुपमा पाठक हत्याकांड में पाठक परिवार हालांकि सम्मिलित रूप से झूठ बोल रहा है बावजूद इसके निरुपमा के पापा कुछ कहते हैं तो उनकी माता कुछ और। ये उन दोनों के बयान, मुकदमों की कॉपी से भी साबित हो जाता है। वो झूठ इसलिए नहीं बोल रहे हैं कि झूठ बोलना उनकी फितरत है। उनकी दिक्कत ये है कि सच से बचने के लिए वो जो कह रहे हैं, उसे याद नहीं रख पा रहे हैं कि उन्होंने सोमवार को क्या कहा, मंगलवार को क्या कहा या बुधवार को क्या कहा था।
मीडिया मंडी, मोहल्ला दिल्ली »
डेस्क ♦ प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार हरीश खरे ने ‘निरुपमा को न्याय’ अभियान को आश्वासन दिया है कि वे पत्रकार निरुपमा पाठक की हत्या के मामले को संबंधित अधिकारियों के सामने उठाएंगे और इसे सीबीआई को सौंपने की प्रक्रिया तेज करने की कोशिश करेंगे। निरुपमा की मौत पर दुःख और चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि निरुपमा और उसका दोस्त भले ही अलग-अलग जातियों के रहे हों लेकिन वास्तव में, उनकी जाति और समुदाय एक ही – पत्रकार – थी जो कि आज के आधुनिक और वैश्विक होती दुनिया में ज्यादा महत्वपूर्ण है।
मीडिया मंडी, मोहल्ला रांची, समाचार »
डेस्क ♦ पाठक परिवार चाहे जितना भी खुद को बेदाग़ साबित करने की कोशिश करे लेकिन निरुपमा की मौत से जुड़े परिस्थितिजन्य साक्ष्य चीख चीख कर कह रहे हैं कि उसकी ह्त्या की गयी थी। झारखंड की सरकारी फोरेंसिक प्रयोगशाला की प्राथमिक जांच रिपोर्ट के मुताबिक नीरू की ह्त्या की गयी थी। अंग्रेजी दैनिक “टाइम्स ऑफ इंडिया” ने राज्य पुलिस के सूत्रों के हवाले से बताया है कि पाठक परिवार के दावे के मुताबिक़ जिस पंखे से निरुपमा पाठक की लाश लटकती हुई पायी गयी थी, वह अपने “पर्फेक्ट शेप” यानी वास्तविक आकार में ही है। रिपोर्ट के मुताबिक अगर नीरू ने सचमुच ख़ुदकुशी की होती तो पंखे के ब्लेड और दूसरे पुर्जों को कुछ नुकसान जरूर हुआ होता। यह रिपोर्ट राज्य के पुलिस महानिदेशक को सौंप दी गयी है।


