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अकादमिक जवाब मत दो, अपना जवाब दो!

➧ अभिषेक गोस्वामी वर्ष 1995, मार्च का महीना। सुबह नौ बजे। मैं जयपुर में धूलेश्वर गार्डन के पिछवाड़े, एक घर के दरवाजे के बाहर खड़ा हूं। दरवाजे पर सूत की एक डोरी लटक रही...

सुनिए, गुनिए… छोटा कद, बड़े हौसले के कुछ लोगों की कहानी 6

सुनिए, गुनिए… छोटा कद, बड़े हौसले के कुछ लोगों की कहानी

आशीष कुमार अंशु ♦ वैसे नाटे कद के लोगों की तलाश और उनको थिएटर के साथ जोड़ना बिल्कुल आसान नहीं था। नाटे कद के ये कलाकार अलग-अलग पृष्ठभूमि से हैं और अलग-अलग कामों से जुड़े हैं। इसलिए चुनौती सिर्फ थिएटर से जोड़ने तक ही सीमित नहीं थी, उससे कहीं बड़ी थी।

लोग हंस रहे हैं, जबकि उन्हें शर्म आनी चाहिए! 2

लोग हंस रहे हैं, जबकि उन्हें शर्म आनी चाहिए!

अजित राय ♦ यह रंगमंडल की सबसे कम खर्चीली प्रस्तुतियों में से एक है क्योंकि निर्देशक ने बाहर से महंगे पेशेवरों को आयातित करने के बजाय रंगमंडल में उपलब्ध प्रतिभाओं-संसाधनों का खूबसूरती से इस्तेमाल किया है। संगीत, प्रकाश, मंच सज्जा आदि के लिए कम से कम में काम चलाया गया है, जिसके कारण अंत तक आलेख और अभिनेता ही प्रस्तुति के केंद्र में बने रहते हैं। ‘जात ही पूछो साधु की’ नाटक का शीर्षक कबीर के एक दोहे से लिया गया है जिसमें वे कहते हैं – ‘जात न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान’। विजय तेंदुलकर ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था में जातिवाद को व्यंग्यात्मक आख्यान की तरह लिया है।

बच्‍चों के रंगीन तालाब में एनएसडी ने फेंका बदरंग पत्‍थर! 17

बच्‍चों के रंगीन तालाब में एनएसडी ने फेंका बदरंग पत्‍थर!

डेस्‍क ♦ क्‍या आप कल्‍पना कर सकते हैं कि बच्‍चों के मासूम और उत्‍सुक तालाब में हम बेस्‍वाद, रंगहीन, कल्‍पनाहीन और गैररचनात्‍मक पत्‍थर फेंक सकते हैं? सवाल ही नहीं है। लेकिन राष्‍ट्रीय नाट्य विद्यालय जो कि रंग और रूप और ध्‍वनि के एक बड़े सृजन से जुड़ा है, उसने ऐसा किया है। एनएसडी ने सरकार रंगटोली के समर कैंप का जो स्‍वादहीन-रंगहीन विज्ञापन छपवाया है, उसमें विद्यालय की मंशा साफ समझ में आती है। हालांकि हम कयास लगाने की कोशिश नहीं कर रहे हैं कि वह मंशा क्‍या हो सकती है।

हिंदी भाषी राज्‍यों में राष्‍ट्रीय नाट्य विद्यालय की मांग 10

हिंदी भाषी राज्‍यों में राष्‍ट्रीय नाट्य विद्यालय की मांग

प्रसन्‍ना ♦ सभी हिंदी भाषी राज्‍यों में राष्‍ट्रीय नाट्य विद्यालय शुरू किये जाने चाहिए। हिंदी भाषा में समकालीन नाट्य लेखन, अव्‍यावसायिक और व्‍यावसायिक रंगमंच का अपना गौरवमय इतिहास रहा है। यह हिंदी भाषा है, जिसने समकालीन भारतीय रंगमंच का पहला नाटककार भारतेंदु हरिश्‍चंद्र के रूप में पैदा किया। यही नहीं, उत्तर प्रदेश, मध्‍य प्रदेश, राजस्‍थान और बिहार जैसे राज्‍यों के अव्‍यावसायिक रंगमंच ने ही समकालीन भारतीय रंगमंच के आरंभिक उभार को संभव बनाया। हबीब तनवीर, इब्राहीम अल्‍काजी, ब व कारंत, गिरीश कर्नाड, विजय तेंदुलकर और बादल सरकार जैसे रंगकर्मियों ने हिंदी रंगमंच को समृद्ध किया।

आप हिंदी रंगमंच के बारे में क्‍या सोचते हैं, कृपया बताएं 3

आप हिंदी रंगमंच के बारे में क्‍या सोचते हैं, कृपया बताएं

रंग प्रसंग ♦ हिंदी अपने विकास-क्रम में एक केंद्रीय स्थान ग्रहण कर चुकी है, इसलिए हिंदी रंगकर्म पर कोई भी विचार दूसरी देशी-विदेशी भाषाओं पर विचार किये बिना अधूरा ही रहेगा। हिंदी के नाटक भले ही दूसरी भाषाओं में अनूदित हो कर मंचित न हुए हों, लेकिन दूसरी भाषाओं के अनगिनत नाटक हिंदी में तर्जुमा करके खेले गये हैं। और इसके साथ-साथ उन भाषाओं में जो नाट्य-चिंतन हुआ है, उसका असर हिंदी रंगमंच पर पड़ा है। हिंदी रंगकर्म की इन्हीं विशेषताओं को देखते हुए यह जायजा लेने की जरूरत शिद्दत से महसूस होती है कि हिंदी नाटक और रंगमंच के डेढ़ सौ साल के मौजूदा दौर में आज इक्कीसवीं सदी के पहले दशक के आखिरी साल में हम कहां खड़े हैं।

यह भारत रंग महोत्‍सव नहीं, एनएसडी रंग महोत्‍सव है! 11

यह भारत रंग महोत्‍सव नहीं, एनएसडी रंग महोत्‍सव है!

मृत्‍युंजय प्रभाकर ♦ 12वें भारंगम का एक और आंकड़ा चौंकानेवाला है। भारत से मंचित होनेवाले 63 नाटकों में आधे से अधिक के निर्देशक राष्‍ट्रीय नाट्य विद्यालय से प्रशिक्षित छात्र हैं या उससे जुड़े लोग। भारंगम में नाटकों के चयन पर पहले भी सवाल उठते रहे हैं कि इसमें राष्‍ट्रीय नाट्य विद्यालय से जु़ड़े लोगों को तरजीह दी जाती है। 2008 का रंग महोत्सव तो पूरी तरह राष्‍ट्रीय नाट्य विद्यालय के लोगों को ही समर्पित था, जिसका विरोध ब़ड़े पैमाने पर हुआ था। भारत रंग महोत्सव के आयोजन का पैसा केंद्र सरकार से आता है, अतः इसका दुरुपयोग खटकता है। इस बार तो राष्‍ट्रीय नाट्य विद्यालय ने डिप्लोमा प्रोडक्शंस को भी भारंगम का हिस्सा बना दिया है, जिसमें अंधा युग को छोड़ दें तो एक भी स्तरीय नाटक नहीं हैं।

देश के थिएटर को एनएसडी के चंगुल से मुक्‍त कराया जाए 3

देश के थिएटर को एनएसडी के चंगुल से मुक्‍त कराया जाए

मृत्‍युंजय प्रभाकर ♦ इन्‍होंने एनएसडी को एक क्‍लोज़ बॉडी बना लिया है। अलग-अलग लॉबी हैं, पर हैं एनएसडीयन। मिल-बांट कर खाते हैं। सबकी अपनी लॉबी। जो आता है, अपने लोगों को उपकृत करता है। भले ही उसमें योग्‍यता हो या न हो। हां, एनएसडीयन्‍स हो, बस। यही कारण है कि नाटक में कैरियर बनाना चाहने वालों को एनएसडी के लिए मरना पड़ता है। या तो नहीं होने पर निराश होकर मरे या अंदर जाकर। सबसे बड़ी ज़रूरत इस बात की है कि देश के थिएटर को एनएसडी के चंगुल से मुक्‍त कराया जाए। तभी हम कुछ कर पाएंगे और शशि जैसे लोगों को बचा पाएंगे।

दर्द के सैलाब-सी शवयात्रा, एनएसडी के ख़‍िलाफ़ नारे लगे 10

दर्द के सैलाब-सी शवयात्रा, एनएसडी के ख़‍िलाफ़ नारे लगे

अविनाश ♦ पटना में शशि के शव के साथ एनएसडी के उनके कुछ सहपाठी गये थे। साथ में मशहूर रंग निर्देशक रॉबिन दास भी थे। लोगों के आक्रोश का निशाना इन्‍हें होना पड़ा। शवयात्रा के दौरान “एनएसडी के दलालो, वापस जाओ” नारे लगे। यह शशि के चाहने वालों की बेचैनी से भरी चीख़ थी, जो मांग कर रही थी कि एनएसडी ने उनके शशि का खयाल नहीं रखा था। उन्‍होंने एक जीवित रंगकर्मी एनएसडी को सौंपा था, एनएसडी ने उसकी मृत देह उन्‍हें लौटाया। पटना के रंगकर्मियों-संस्‍कृतिकर्मियों को न्‍याय चाहिए और उन दूसरे रंग-छात्रों के भविष्‍य को लेकर आश्‍वस्ति चाहिए, जो एनएसडी में पढ़ रहे हैं। उन्‍होंने पटना गये एनएसडी प्रबंधन के प्रतिनिधि को पांचसूत्री मांगपत्र सौंपा।