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वे ऐसी जगह थे, जहां बैठकर धूप में छांव का अनुभव होता था 2

वे ऐसी जगह थे, जहां बैठकर धूप में छांव का अनुभव होता था

कान में उजबक की तरह नजर आते हमारे सितारे

[20 May 2013 | Read Comments | ]

Sonam Kapur 365x114

डेस्‍क ♦ कांस फिल्‍म फेस्टिवल में हमारे सितारे जैसी हरकतें कर रहे हैं, उससे पता चलता है कि वे सच और सिनेमा का मिक्‍सचर हो चले हैं। टिप्‍पणीकार उन्‍हें एक बच्‍चे के जन्‍मदिन पार्टी में शामिल उत्‍साही मेहमान की संज्ञा दे रही हैं।

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ओम थानवी ♦ मेरे लिए बिक्रम जी ऐसी जगह थे, जहां बैठकर आप धूप में भी छांव अनुभव करते हैं। जहां अपने-आपको खाली करते हैं, भरते हैं। किसी गिरजे की तरह।
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साहित्‍य में तंग नजर का दौर चुक गया है

ओम थानवी ♦ कलाकार सैयद हैदर रज़ा को राष्ट्रपति ने आज पद्मविभूषण से नवाजा। दूसरी तरफ फेसबुक पर आज ही किसी अन्य बहस में रज़ा फाउंडेशन का विरोध पढ़ने में आया। किसलिए, यह साफ समझ नहीं पड़ रहा। एक कलाकार अपने चित्रों की कमाई से कला ही नहीं, साहित्य के क्षेत्र में भी कुछ करे तो उसमें आपत्ति कैसी? महज इसलिए कि उसका काम अशोक वाजपेयी देख रहे हैं? वाजपेयीजी की दृष्टि कई परदानशीं मतवादी लेखकों से बहुत उदार है; आज ही ‘कभी-कभार’ (जनसत्ता) में ऋतुराज की कविताओं पर उनकी मुक्तकंठ प्रशंसा पढ़ी जा सकती है। हिंदी साहित्य में कट्टरपंथियों का तो हाल यह है कि मैनेजर पाण्डेय अज्ञेय जन्मशती पर शिरकत करें (नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह, विश्वनाथ त्रिपाठी, राजेंद्र यादव से लेकर पंकज बिष्ट तक किस ने नहीं की; कुछ नहीं तो अज्ञेय पर व्याख्यान देकर या संस्मरण लिखकर ही?) या प्रणय कृष्ण अज्ञेय पर किताब लिखें तो अज्ञेयवादी कहकर पुकारे (दुत्कारे?) जाते हैं।

प्रणब की औपनिवेशिक मानसिकता 2

प्रणब की औपनिवेशिक मानसिकता

♦ ओम थानवी प्रणब मुखर्जी को ढाका में बांगलादेश का सर्वोच्च अलंकरण ‘मुक्तियुद्ध सम्मान’ दिया गया। अलंकरण स्वीकार करते वक्त प्रणब बाबू बांगला में बोलते तो कितना अच्छा लगता। भारत में उसका तर्जुमा प्रसारित...

इसने नारे की हवाई छोड़ी, उसने भाषण की चर्खी 1

इसने नारे की हवाई छोड़ी, उसने भाषण की चर्खी

♦ उदय प्रकाश आज के हिन्दी अखबार ‘अमर उजाला’ की हेडलाइन है : “मोदी ने मोहा युवा मन” … इसके बाद सब-हेडलाइन है : नौजवान बदलेंगे तकदीर। ऐसा उन्होंने ‘श्री राम कॉलेज आफ़ कॉमर्स’...

किसी एक फिल्म का नाम दो #SatyajitRay #Two 0

किसी एक फिल्म का नाम दो #SatyajitRay #Two

♦ ओम थानवी ‘पथेर पांचाली’ (1955) से लेकर ‘आगंतुक’ (1991) तक सत्यजित राय ने पूरे छत्तीस वर्ष काम किया और छत्तीस फिल्में बनाईं। यानी हर साल एक फिल्म। मगर औसतन। किसी वर्ष कोई फिल्म...

कामना पर बंदिश कैसी? 0

कामना पर बंदिश कैसी?

♦ ओम थानवी सोनिया गांधी ने कहलाया है कि कोई उन्हें नए साल की शुभकामना न दे। पर किसी की कामना पर बंदिश कैसी? गम की घड़ी में कोई ऐश में मुब्तिला न हो,...

शोक के बाजार का बड़ा खिलाड़ी 1

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♦ ओम थानवी आज जितने अखबार मैं घर पर देख पाया, उनमें अकेला टाइम्स ऑफ इंडिया है जिसमें पहला पन्ना अखबार का है ही नहीं। वह पूरा पन्ना विज्ञापन के लिए बेच दिया गया...

दवा उद्योग हमारे स्वास्थ्य का दोस्त नहीं दुश्मन है 0

दवा उद्योग हमारे स्वास्थ्य का दोस्त नहीं दुश्मन है

♦ ओम थानवी बेटे डॉ मिहिर ने एक विडियो भेजा है, 15 साल दवा उद्योग में काम कर चुकी ग्वेन ओल्सन का। ओल्सन बेबाकी से बताती हैं कि कैसे दवा उद्योग हमारे स्वास्थ्य का...

महादेवीजी का जीवन सुकरात के जहर पीने की कहानी है 0

महादेवीजी का जीवन सुकरात के जहर पीने की कहानी है

♦ ओम थानवी फ़िराक़ गोरखपुरी हिंदी को लेकर नुक्ताचीनी करते थे। हिंदी लेखकों के बारे में भी। लेकिन हिंदी ही देश की राष्ट्रभाषा हो सकती है, यह भी कहते थे। तुलसीदास को दुनिया का...

‘यह वैमनस्य के पुतले की जीत है’ 1

‘यह वैमनस्य के पुतले की जीत है’

गुजरात विधान सभा चुनावों में नरेंद्र मोदी की लगातार तीसरी जीत ने एक बार फिर भारतीय संसदीय लोकतंत्र की उन सीमाओं से परिचित कराया है जिसमें लोकतंत्र का मखौल उड़ाने वाला शख्स लोकतंत्र के...