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ओम थानवी ♦ कुछ अखबारों में आतंकवादियों की तरफ से मिलने वाली विज्ञप्तियां और आपत्तिजनक विज्ञापन प्रमुखता से छपने लगे। पंजाब सरकार ने अखबारों को एक धमकी भरी हिदायत जारी की। उसका असर पड़ा। इस पर आतंकवादियों ने नया दांव खेला। डॉ सोहन सिंह के नेतृत्व वाली पंथक कमेटी (जो पांच प्रमुख आतंकवादी गुटों का समूह थी) ने पूरे मीडिया के लिए एक ‘आचार संहिता’ जारी की। आतंकवादियों को खबरों में आतंकवादी, उग्रवादी आदि की जगह ‘मिलिटैंट, खालिस्तानी सेनानी या खालिस्तानी मुजाहिद्दीन’ लिखने का निर्देश था। इसी तरह, भिंडरावाले के नाम से पहले संत लिखना जरूरी था। पंथिक कमेटी के साथ पाकिस्तान स्थित लिखने की मनाही थी।
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आनंद स्वरूप वर्मा ♦ मैं नहीं समझता कि मंगलेश ने कोई चूक की है। अगर किसी के दक्षिणपंथी अथवा वामपंथी/प्रगतिशील होने का मापदंड गोष्ठियों में जाने को ही बना लिया जाए न कि उसके जीवन और कृतित्व को तो यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण होगा। वैचारिक प्रतिबद्धता का निर्धारण इस तरह के सतही मापदंडों से नहीं होता कि कौन कहां जा रहा है अथवा किससे मिल रहा है। उदय प्रकाश का मामला इससे थोड़ा भिन्न था क्योंकि उन्होंने उस व्यक्ति के हाथों पुरस्कार लिया जो घोर कम्युनिस्ट विरोधी और प्रतिगामी विचारों का घोषित तौर पर पोषक है हालांकि इसे भी मुद्दा बनाने के पक्ष में मैं उस समय नहीं था। जिन दिनों हस्ताक्षर अभियान चल रहा था, मैंने यही कहा था कि एक बार उदय प्रकाश से पूछना चाहिए कि किन परिस्थितियों में ऐसा हुआ?
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ओम थानवी ♦ खरे जी के साथ मेरे आत्मीय संबंध रहे हैं। यह जानते हुए भी कि लोग उन्हें भरोसे का आदमी नहीं मानते। मोहल्ला लाइव पर उनके “पत्र” पर बात करते किसी ने लिखा है कि वे बेईमान भी हैं। फिर भी, मैं उनका आदर करता हूं। उनका पत्र मिला, तब मुझे दूर तक अंदेशा नहीं था कि यह पत्र भी अभिषेक-व्यालोक वाले पत्राचार की तरह अपनी डींग हांकने के लिए इस्तेमाल करने वाले हैं। वे शुरू में ही बता देते कि वह “पत्र” छपवाने का इरादा है, तो मैं भी (शायद) संभल कर जवाब लिखता और खुद कहता कि मेरा कथन भी साथ में दे दें! मैंने उनके पत्र को हल्के लिया और हल्के अंदाज में ही जवाब दे दिया। दो लोगों के बीच ऐसा ही होता है; पर आप चौराहे पर जिरह करना चाहते हैं, तो उसका मयार बदल जाता है।
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शशि भूषण ♦ जब कथित बड़े से बड़े लेखकों में इतना संयम, अनुशासन और स्वावलंबन नहीं है कि वे जो आरोप दूसरों पर लगाते हैं, जो अपेक्षाएं औरों से करते हैं, उनमें स्वयं खरे उतर सकें, तो वे लड़ाई करते ही क्यों हैं? जब उनकी ललकार या ईमानदारी, पक्षधरता की मांग अगर अपने लिए भी उतनी ही नहीं है, तो गाल बजाना किसलिए? किसका उदाहरण देकर कहें, बड़ा अजीब लगता है कि आज मुद्दा बनाने वाला आगे चलकर खुद अभियुक्त नजर आता है। सबको देख लिया … जिसका सबसे ज्यादा विरोध करते हैं उसी में लिप्त पाये जाते हैं लेखक। यही सोचकर कल थोड़ी तसल्ली हुई थी कि चलो थानवी जी ने कम से कम कहा तो यह।
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विष्णु खरे ♦ इलाचंद्रजी मुझसे मेरे छुटपन से ही कभी पढ़े नहीं गये। रही बात कृष्णा सोबती की तो मैं उनके लेखन को नकली, हिस्टीरियाई और ओवर-रेटेड मानता हूं। “उसका बचपन” को छोड़कर, जो ‘फ्लैश इन दि पैन’ का दर्जा रखता है, मैं कृष्ण बलदेव वैद के शेष लेखन को अपाठ्य समझता हूं। हिंदी कविता के उनके अंग्रेजी अनुवाद तो टूरिस्ट होटलों में वेल्कम ड्रिंक (स्वागत-रसरंजन – कितना जलील और बाजारू शब्द है यह ‘रसरंजन’, ‘बॉलीवुड’ जैसा) की तर्ज पर थाने में प्राथमिक कंबल-परेड के बाद अदालत में भारतीय दंड संहिता की कई सश्रम सजाओं को आकृष्ट करते हैं। आपने मुझे कुछ बताने का रेटोरिकल सवाल किया है। उपरोक्त के बाद, यदि वह उदाहरण नहीं बन सके, तो बताने के लिए बचता क्या है?
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ओम थानवी ♦ मंगलेश डबराल सिनेमा गोष्ठी के मामले में शायद इसलिए निशाना बने, क्योंकि पहले वे खुद ऐसी शिरकतों का विरोध करते आये हैं। उदय प्रकाश तो साम्यवादी लेखक ही थे, जिनके खिलाफ लामबंदी की गयी। वरना गोपीचंद नारंग जब साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष बने, तो मंगलेश डबराल ने अकादेमी के तमाम कार्यक्रमों में हिस्सा लेने से इनकार कर दिया था। ऐसे तेवर के चलते उन्होंने राकेश सिन्हा के बुलावे को स्वीकार किया तो विवाद के बीज वहां जाते वक्त शायद वे खुद बो गये थे। वे कह सकते हैं कि राकेश सिन्हा बुद्धिजीवी हैं, आदित्यनाथ पर तो संगीन आरोप लगते रहे हैं। तब, अगर नामवर या विभूति तरुण विजय की एक किताब का लोकार्पण करते हैं, तो इसमें आपत्ति क्यों हो?
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ओम थानवी ♦ एक मार्क्सवादी मित्र-संपादक ने जब मेरी इस बात पर विश्वास नहीं किया कि अज्ञेय ने मजदूरों-किसानों के हक में भी कविताएं लिखी हैं और आहत-वंचित तबके के हक में भी, तो मैंने अगले रोज उन्हें अज्ञेय की पचास “जनोन्मुखी” कविताएं भिजवा दी थीं; करीब तीस उन्होंने बाद में अपनी पत्रिका में प्रकाशित भी कीं, पर इस कलगी के साथ कि “हालांकि ये अज्ञेय कि प्रतिनिधि कविताएं नहीं हैं”!! … मजे की बात यह है कि अज्ञेय ने “प्रतिनिधि कविताएं” नाम से कोई संचयन कभी पेश ही नहीं किया। “प्रिय कविताएं” जरूर मिल जाएंगीं। पर वे उनको प्रिय रही कविताएं हैं, आपको कोई दूसरी प्रिय हो सकती हैं, क्यों नहीं कोई प्रिय न हों! यह आपकी स्वाधीनता है, और अज्ञेय के लिए सबसे बड़ा मूल्य यही था।
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ओम थानवी ♦ वामपंथी कवि नंद भारद्वाज ने अज्ञेय को उनके सामाजिक सरोकारों के संदर्भ फिर से समझने की जरूरत बतायी है। यह बात पिछले दिनों कोलकाता में डॉ शंभुनाथ ने भी कही थी। नामवर सिंह, केदार नाथ सिंह, मैनेजर पांडे, उदय प्रकाश, राजेश जोशी, अरुण कमल आदि ने भी अज्ञेय जन्मशती वर्ष में अज्ञेय को सहृदयता से न सिर्फ देखा है, अज्ञेय के साहित्य की वह मीमांसा की है जिसकी अपेक्षा उनके श्रीमुख से कम से कम कट्टर (साहित्य को भाषण, पत्रकारिता, नारों आदि की तरह तात्कालिक चीज समझने वाले) वामपंथी नहीं करते थे। बहरहाल, अपने (स्वाभाविक) पूर्वग्रहों के बावजूद नंद जी का स्वर कई जगह सकारात्मक हुआ है, जिसका फेसबुक आदि पर स्वागत किया जा रहा है।
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कृष्णा सोबती ♦ हमने गहरे संतोष और सराहना से एक बार फिर ‘मुअनजोदड़ो’ का आवरण देखा और अलमारी में वापस रखने को हाथ बढ़ाया ही था कि उसकी जिल्द में कुछ सरसराया। किसी ने तगड़ी हांक दी थी: घणी खम्मा थानवी महाराज! बिना चूनर-घाघरे वाली उस नचनिया की इतनी बड़ाई और इस भरपूर ठसियोड़ी चालवाले वजूद की ओर उस्तादों ने आंख तक न उठायी!
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अविनाश ♦ एक शराबी की सूक्तियां नाम के उनके गुटखे को नौजवानों ने पसंद किया था और और सामान्य और गैर-गंभीर गोष्ठियों में उनकी सूक्तियां सुना-सुना कर हम हंसते भी रहे हैं। इसी प्रयोग से उत्साहित होकर उन्होंने हिंदी की कुछ शख्सीयतों को निशाना बनाने और कुछ को महिमामंडित करने के लिए एसएमएस कविताएं लिखनी शुरू की। रोज शाम आठ बजे के आसपास उनका एसएमएस काव्य हिंदी के लगभग हजार लोगों के पास पहुंचता है।


