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एक पेंटिंग और भारतीय भाषा के विलोप का एक रूपक 2

एक पेंटिंग और भारतीय भाषा के विलोप का एक रूपक

रामजी यादव ♦ यह युवा चित्रकार मनीष उपाध्याय की एक पेंटिंग है, जिसमें उन्‍होंने अंग्रेजी भाषा को साधते एक भारतीय बच्चे को दिखाया है। बीन की धुन पर वर्णमाला के सांप को बस मे करने की कोशिश करनेवाले इस विद्यार्थी का रंग नीला है। माना जाता है कि सांप का जहर मनुष्य के शरीर को नीला कर देता है। यह चित्र कई अर्थ देता है। अंग्रेजी की पढ़ाई की कठिनाई के साथ ही भारतीय भाषाओं के विलोप का भी एक परोक्ष रूपक इसमें छिपा है और गले की माला उस कर्मकांड का खुलासा करती है, जो आज अंग्रेजी स्कूलों का आम ढर्रा है। किसी चित्रकार ने अपने देश की भाषा के ऊपर मंडराते खतरे को इतने मार्मिक ढंग से अभिव्यक्त किया है, यह सुखद अनुभव है।

दृश्‍य-अदृश्‍य : सीरज सक्‍सेना के चित्रों की प्रदर्शनी

दृश्‍य-अदृश्‍य : सीरज सक्‍सेना के चित्रों की प्रदर्शनी

डेस्‍क ♦ सीरज सक्‍सेना हिंदी प्रदेश के उन कर्मठ रंगचितेरों में से हैं, जो अपने लिए भाषाओं के बीच से पेंटिंग के तत्‍व खोजते हैं। 30 दिसंबर 2010 से लेकर 20 जनवरी 2011 तक उनके चित्रों की प्रदर्शनी दिल्‍ली के हौजखास में लगा है। मोहल्‍ला लाइव के पाठकों से आग्रह है कि वे वक्‍त निकालकर प्रदर्शनी में जरूर जाएं।

गांधी जी की धोती 8

गांधी जी की धोती

डेस्‍क ♦ सन सैंतालीस में जिस गांधी को गोली मारी गयी थी, उसी गांधी का गला आजाद भारत में हर दिन घोंटा गया। संजय कुमार तिवारी की नयी पेंटिंग मेरी धोती तो छोड़ दो ये बातें अपने तरीके से कह रही है। पेंटिंग में गांधी अपनी धोती का आखिरी छोर पकड़े हुए हैं। बाकी धोती की सतह चार किस्‍म के भारत की कथा कह रही है। एक पर राजपथ है, जिन पर नेता टहल रहे हैं। दूसरे पर कॉरपोरेट्स और उनकी चमचमाती कार है। तीसरे पर मीडिया वाले लाइट, कैमरा, एक्‍शन के अंदाज में खड़े हैं। और चौथी सतह पर क्रिकेट है, बॉलीवुड की बहार है। और सबसे गौर करने वाली बात कि गांधी के पीछे एक पेड़ है, जिस पर फंदा कसा हुआ है और गांव का एक किसान उससे लटकने जा रहा है। क्‍या ये विदर्भ है?

मनुष्य का देखना : चित्रकार होता है और नहीं होता है 3

मनुष्य का देखना : चित्रकार होता है और नहीं होता है

अखिलेश ♦ हम दावा करते हैं कि एक पढ़ा-लिखा व्यक्ति ही कलाकार होगा! यह गंभीर समस्या है, समझना चाहिए। विचार करना चाहिए। इस समस्या के कारण हमने अपने देश की कलाओं को दोयम दर्जे का ठहरा रखा है। हमारी गुलाम मानसिकता आज भी उन्हें स्वीकारने को तैयार नहीं है। हम भी उसे वैसे ही देखते-समझते-मानते हैं, जैसा अंगरेजों ने हमारे बारे में लिखा। दरअसल, दो लोक कलाकारों या कला रूपों के फर्क को दो मनुष्यों या समुदायों के बीच के फर्क की तरह ही देखना चाहिए। दोनों मनुष्यों के देखने का अपना ढंग है। उसे एक कैसे मान सकते हैं? दो गोंड कलाकार एक जैसा चित्र क्यों बनाएंगे? यह सब कुछ एक जैसा ही बनने लगा, तब वह इतना उबाऊ होगा कि हम शायद चित्र देखना ही बंद कर दें।

एक पेंटिंग, जो भयावह सरकारी नीतियों से पर्दा उठाती है 1

एक पेंटिंग, जो भयावह सरकारी नीतियों से पर्दा उठाती है

डेस्‍क ♦ संजय कुमार तिवारी की एक और नयी पेंटिंग मोहल्‍ला लाइव के पास आयी है। यह मौजूं इस अर्थ में है कि शिक्षा के अधिकार कानून के लागू होने के बाद इसे बनाया गया है। ये मनमोहन के उदारीकरण की बहुत साफ-शफ्फाक तस्‍वीर हमारे सामने रखती है। तस्‍वीर के दायें हिस्‍से में क्‍लास रूम है, जहां सुसंस्‍कृत तरीके से मजदूरी करने का पाठ पढ़ाया जा रहा है और उसके ठीक नीचे हमारे प्रधानमंत्री कुछ युवकों को खींच कर सड़क उस ओर ले जा रहे हैं, जहां कल्‍चर्ड लेबर की जरूरत का टैग लगा है। प्रधानमंत्री के ठीक ऊपर भारतीय राजनीति के दो प्रतीक चेहरे भी हैं, जो इस नये चलन को थामने की हड़बड़ी में लग रहे हैं।

मेरी काशी बचाओ 5

मेरी काशी बचाओ

डेस्‍क ♦ इससे पहले हमने संजय की दो पेंटिंग से आपका तआरुफ करवाया था। चित्र से लेकर विचार तक के उनके कारनामों को आप मोहल्‍ले में देखते रहे हैं। उनकी नयी चित्रकारी काशी पर है। उन्‍वान है – मेरी काशी बचाओ। जाहिर है – विनम्र और सादगी और पवित्रता से भरी काशी की संस्‍कृति जिस कदर अपने चमकदार वर्तमान से घायल है – इस चित्र में वो दुख साफ देखा जा सकता है। एक और बात इसमें गौर करने वाली है कि आज तक किसी ने भी शिव को अपनी अपनी अभिव्‍यक्तियों में क्षत-विक्षत नहीं दिखाया है (जहां तक मॉडरेटर की जानकारी है…), संजय ने पहली बार शिव को तीर से घायल दिखाया है और उनके जिस्‍म से लहू की बूंदें टपक रही हैं। इस बार अधिक व्‍याख्‍या नहीं। आप देखें, डूबें और अपने अपने अर्थ निकालें।

भारतीय गणतंत्र की दारुण कथा कहती एक पेंटिंग 6

भारतीय गणतंत्र की दारुण कथा कहती एक पेंटिंग

डेस्‍क ♦ सीनियर चार्टर एकाउंटेंट संजय कुमार तिवारी की एक और चित्रकला से आपका परिचय कराते हैं। इस चित्रकला में भारतीय गणतंत्र के कुछ और नजारे दिखाये गये हैं। एक पार्क है, जिसमें दो तरह का जीवन दिखाया गया है। एक तरफ कुछ कामगार हैं और दूसरी तरफ चंद प्रेमी युगल हैं। कामगारों के बच्‍चे चीखते हुए से लग रहे हैं और उनकी मां दिल पर पत्‍थर रख कर उनकी चीख़ नज़रअंदाज़ करती हुई काम में मशगूल हैं। पार्क के खाने में इन कामगारों के लिए ईएसआई अस्‍पताल लिखा हुआ है… यह पूरी पेंटिंग कई प्रतीकों के जरिये हमारे गणतंत्र की दारुण कथा कह रहा है।

सचमुच क्‍या इतनी ही खोखली है हमारी डेमोक्रेसी 10

सचमुच क्‍या इतनी ही खोखली है हमारी डेमोक्रेसी

डेस्‍क ♦ ये एक पेंटिंग बड़ी दिलचस्‍प है, जो हम मोहल्‍ला लाइव के पाठकों के लि‍ए विशेष तौर पर छाप रहे हैं। होता यह है कि हम इंडियन डेमोक्रेसी के कई विद्रूपों को दिखाने के लिए लेख छापते रहते हैं। फिर भी बातें श्रोता समाज के दिलों में नहीं उतर पाती। किसी विद्वान ने कभी यह बता दिया था कि एक तस्‍वीर हजार शब्‍दों के बराबर होती है। हम इसी सूत्र का सिरा पकड़ कर एक पेंटिंग आपसे शेयर कर रहे हैं। पें‍टर हैं संजय कुमार तिवारी। ये कोई पेशेवर चित्रकार नहीं हैं। पेशे से चार्टर एकाउंटेंट हैं, लेकिन शब्‍द, समाज और संवेदना में ऐसे डूबे रहते हैं कि कभी जंगल-पहाड़ की ओर निकल पड़ते हैं, तो कभी कूची ले‍कर महीनों कैनवास के सामने बैठे रहते हैं।

कबड्डी कबड्डी… एक और हिंदू देवी नंगी हैं! 40

कबड्डी कबड्डी… एक और हिंदू देवी नंगी हैं!

डेस्‍क ♦ कमर के ऊपर स्त्रियों के वस्‍त्र की परंपरा मुश्किल से एक हजार साल पहले शुरू हुई होगी। यानी दस पीढ़ी पहले। भारत में इस्‍लाम के साथ वस्‍त्र का सलीका आया – इसको मानने से हिंदूवादियों को कोई परहेज नहीं होना चाहिए। आज भी बस्‍तर के आदिवासी गांवों में महिलाएं कमर के ऊपर नग्‍न होती हैं। मैंने खुद 1999 में सरगुजा के एक आदिवासी गांव में स्त्रियों को ऐसे पहनावे में देखा है। बहरहाल, यहां इस तस्‍वीर को देने का मक़सद सिर्फ हुसैन पर हाय हाय करने वाले शिवसेनावादियों को आईना दिखाने का है।

शिवसेनावादियो, इधर देखो, देवी दुर्गा नंगी खड़ी हैं… 33

शिवसेनावादियो, इधर देखो, देवी दुर्गा नंगी खड़ी हैं…

डेस्‍क ♦ हुसैन पर हल्‍ला मचाने वाले शिवसेनावाद‍ियों का रचना और उसकी प्रक्रिया से कोई लेना देना नहीं होता। वे बस मंगलाचरण के शोर में अपनी गालियां निकालते हैं और सो जाते हैं। अभी एक मित्र ने हमें सुबोध गुप्‍ता के बारे में बताया, जो कलाकार हैं और जिन्‍होंने दुर्गा की नग्‍न मूर्ति बनायी है। सुबोध गुप्‍ता ने पटना आर्ट कॉलेज से कला की पढ़ाई की। 1990 के बाद से वे लगातार दिल्‍ली में हैं। सुबोध गुप्‍ता की ये मूर्ति बहुत स्‍वाभाविक है और इसमें दुर्गा की शक्ति को उनके अप्रतिम सौंदर्य के साथ जोड़ कर देखा गया है। गनीमत है कि शिवसेनावादियों की नजर उन पर नहीं पड़ी है। पड़ती भी तो वे सुबोध को हिंदू होने का लाभ देते। ऐसा नहीं लगता कि हिंदुओं की दादागीरी का प्रदर्शन करने वाले इस देश में अभिव्‍यक्ति की सारी आजादी केवल इसी कौम के लिए है?