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खुद को गाली दो और पाक-साफ हो जाओ 7

खुद को गाली दो और पाक-साफ हो जाओ

पंकज नारायण ♦ पत्रकारों द्वारा आयोजित और संपन्न इस कार्यक्रम में बदलाव की दिशा में विकल्पों से जुड़ी रचनात्मकता और उसकी धार की शक्ति को लेकर कुछ बातें हो सकती थी और पूंजीवाद की जगह इसे स्थापित करने के रास्ते ढूंढे जा सकते थे। लेकिन ऐसे कई सवाल वहां नहीं उठे, जबकि वो सवाल सीधे पत्रकारों या विकल्पों से जुड़े थे। हमने उन मुद्दों पर बात की, जिसका हम कुछ नहीं कर सकते। सिर्फ उसको घटित होते हुए अपने सामने देख सकते हैं और कभी-कभार अपने भीतर के आदमी को डोज देने के लिए खुद को गलिया सकते हैं। सवालों का जिंदा रहना जरूरी है, लेकिन कुछ इस तरह जहां कुछ बूढ़े सवाल मरें और नये सवाल पैदा हों। वह बहस अधूरी है, जो समस्या को महिमामंडित करके हमें उसकी शरण में ले जाती है।

काग़ज़ पर काफ़्का… फेसबुक पर पंकज नारायण… 17

काग़ज़ पर काफ़्का… फेसबुक पर पंकज नारायण…

पंकज नारायण ♦ मेरे बचपन की प्यारी दोस्त गरीबी। अभी भी समय-समय पर साथ रहने आ जाती है। मैं उसे भी पूरा प्यार देता हूं। जब मेरे पास से जाने लगती है तब उसे डांटता हूं – देखो, मेरे पास आ कर रहने लगती हो तो कोई बात नहीं। मेरे दोस्तों के घर मत जाना वरना टांगें तोड़ दूंगा। फिर वह मेरी अमीरी पर मुस्कुराती है… वैसे मेरी यह दोस्त सबके पास जाती है, लेकिन टिकती उसी के पास है, जो इससे नफरत करता है…