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एक कविता, अनेक भारत [ViA Tagore]

अरुण माहेश्‍वरी ➡ पिछले दिनों कृष्ण कल्पित की कविता की एक पंक्ति ने चौंका दिया था, मैं चाहे कबूतर की सूखी हुई बीट हूं, पर मैं कवि नहीं हूं…, आज मुकेश कुमार की पूरी...

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हां, हम सब हरामजादे हैं! #MukeshKumar

पिछले महीने, दिल्ली में, केंद्रीय मंत्री निरंजन ज्योति ने ‘रामजादे’ बनाम ‘हरामजादे’ वाला चर्चित घोर सांप्रदायिक वक्तव्य अपने एक भाषण में दिया था, उससे कितनों की ‘भावनाएं आहत हुईं’ इसका हिसाब कौन रखेगा? लेकिन...

सांस्कृतिक संहार के विरुद्ध ‘भाषा कर रही है दावा’ 2

सांस्कृतिक संहार के विरुद्ध ‘भाषा कर रही है दावा’

♦ सविता मुंडा नब्बे के दौर में रांची रंगमंच जब बहुत सक्रिय था और रांची के साथ-साथ बोकारो, जमशेदपुर, धनबाद, हजारीबाग, कोडरमा आदि जिलों में कई नाट्य समूह लगातार नाटकों का मंचन कर रहे...

विनायक सेन के लिए धरना, प्रदर्शन और चंद कविताएं 6

विनायक सेन के लिए धरना, प्रदर्शन और चंद कविताएं

डेस्‍क ♦ परसों से आज तक बिनायक सेन के लिए लिखी गयी तीन कविताएं मोहल्‍ला लाइव के पास आयी हैं। बिनायक गांधी के अंतिम आदमी के लिए लड़ रहे थे और उन्‍हें इसके लिए आजाद भारत में उम्रकैद मिली। 125 साल पूरे होने पर जो कांग्रेस इतिहास को नये सिरे से खंगाल रही है, हिरावल जनता ही एहसास दिला सकती है कि सन 47 और 2010 में कोई फर्क नहीं है। मुक्ति की लड़ाई अब भी जारी है। हम इस लड़ाई में सरकार और अदालत के खिलाफ हैं

सब तय है तो फिर बता ही देते हैं उस दारोगा का नाम 5

सब तय है तो फिर बता ही देते हैं उस दारोगा का नाम

व्‍योमेश शुक्‍ल ♦ मेले में मूंगफली बेचने लगता है लेटरप्रेस में सही वाक्य संभव करने वाला आविष्कारक वैज्ञानिक कंप्‍यूटर नहीं सीख पाता | अश्लील भोजपुरी में गर्क होने को है भाषा की शख्सियत | यहीं टूटने थे खड़ी बोली के गुंबद
यहीं बक सकता था गाली दारोगा – मां की, बहन की, दुनिया के सभी भाइयों और बेटों और प्रेमियों को
यहीं बनना था आस्था को सबसे बड़ा तर्क
यहीं तय होने थे हिंदू-मुसलमान, आदमी-औरत, ज्यादा आदमी और कम औरत, काव्यात्मक-अकाव्यात्मक के फर्क

देखो जी देखो, गुलामी डायन खाये जात है! 7

देखो जी देखो, गुलामी डायन खाये जात है!

अनिल सदगोपाल ♦ फूंके 700 करोड़ रुपये दलितों के, टपकी सरकारी तिजोरी, टपके स्टेडियम… लुढ़के ओवरब्रिज, मजदूर मरे जात हैं… हल्ला बोला खेलों का, हुए कारपोरेट पूंजीपति मालामाल हैं,
जाने काहे को हमरे खिलाड़ी पसीना बहात हैं… गुलामी डायन खाये जात है।
मस्ती बारह दिन की, बारह दिन का तमाशा, एक लाख करोड़ रुपये का टिकिट कटाया।
कच्छ से आया, कोहिमा से आया, पैसा आया लक्षद्वीप और लद्दाख से,
अस्सी फीसदी करें गुजर-बसर 20 रुपल्ली में, फिर भी सब कुछ दिल्ली में लुटाये जात हैं,
गुलामी डायन खाये जात है…

समाज के वैचारिक अकाल पर पटना में होगी बात 5

समाज के वैचारिक अकाल पर पटना में होगी बात

डेस्‍क ♦ इंसान और उसके दुख को समझने की कोशिश में पटना के एक युवक ने एक फिल्‍म बनायी है। यह फिल्‍म नागार्जुन की कविताओं पर आधारित है। नाम है, मेघ बजे। फिल्म में बाबा की पांच कविताओं को शामिल किया गया है – अकाल और उसके बाद, मेघ बजे, बादल को घिरते देखा है और गुलाबी चूड़‍ियां। विवेक कहते हैं कि इस फिल्म का उद्देश्य है युवापीढ़ी को बाबा के विचारों और कविताओं से अवगत कराना ताकि इस वैचारिक संकट के युग में भी उनके अंदर मेघ बजता रहे, जिंदगी सजती रहे। फिल्म की लांचिंग 15 सितंबर को बिहार विधान परिषद के सभागर में होनी है। इस मौके पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन भी किया गया है। इस गोष्ठी का विषय है, कैसे दूर हो समाज का वैचारिक अकाल।

झूठ-प्रपंच से बना है हमारा साहित्यिक समाज! 14

झूठ-प्रपंच से बना है हमारा साहित्यिक समाज!

डेस्‍क ♦ यह युवा कवि, रंगकर्मी मृत्‍युंजय की कविता है। हिंदी कविता में मृत्‍युंजय का नाम अपेक्षाकृत कम पहचाना नाम है – उसी तरह जैसे सच्‍ची मेधा बड़बोली न होने के चलते पार्श्‍व में रह जाती है। जो कविता आप पढ़ने जा रहे हैं, यह उन्‍होंने कुछ साल पहले लिखी थी। इसमें एक किरदार है और उस किरदार के बहाने मृत्‍युंजय हिंदी के साहित्यिक तिलिस्‍म को समझाने की कोशिश कर रहे हैं। यह पता नहीं है कि इसे उन्‍होंने कहीं छपने के लिए दी थी या नहीं – दी थी तो कहीं छपी या नहीं – लेकिन मोहल्‍ला लाइव की फाइल में यह कविता रखी थी। हम अमूमन कविताएं नहीं छापते, लेकिन कभी छापते भी हैं – तो प्रसंग समझ कर, अपने तईं असर समझ कर। यह कविता आज सार्वजनिक कर रहे हैं, क्‍योंकि इसके अर्थ अब ज्‍यादा खुलेंगे।

वे ढूंढ रहे थे हमारी स्त्रियों को जो छुपी थीं पत्तों के बीच 6

वे ढूंढ रहे थे हमारी स्त्रियों को जो छुपी थीं पत्तों के बीच

डेस्‍क ♦ दो दशक पुरानी लिखावट की दो महीने के भीतर की तीसरी गोष्‍ठी में कवि रंजीत वर्मा ने अपनी कविताएं पढ़ीं। इस बार ज्‍यादा श्रोता थे और माहौल को थोड़ा औपचारिक बाना दिया गया था। लिखावट का बैनर भी चिपकाया गया था। अध्‍यक्षता रंजीत वर्मा के मित्र और वरिष्‍ठ हिंदी क‍थाकार हृषिकेश सुलभ कर रहे थे। जगह वही थी, मयूर विहार। फेज वन। लिखावट के सदस्‍य राजीव वर्मा जी के घर की छत। हमेशा की तरह कवि मिथिलेश श्रीवास्‍तव ने लिखावट के कविता-आयोजनों की तफसील रखी और यह जानकारी दी कि अब हम इस सीरीज को घर घर कविता के नाम से आगे बढ़ाएंगे। यानी एक घर नहीं, उन तमाम कविता प्रेमियों के घर, जो अपनी छत और अपना बैठका एक शाम कविता के नाम कर सकते हैं।

चाहता हूं, इतिहास के गोरे पन्‍ने थोड़े सांवले हो जाएं 14

चाहता हूं, इतिहास के गोरे पन्‍ने थोड़े सांवले हो जाएं

अविनाश ♦ अभी कल राष्‍ट्रीय नाट्य विद्यालय की ओर गया, तो रंग प्रसंग के कमरे में कवि नीलाभ किसी से फोन पर बातें कर रहे थे और रणेंद्र की एक कविता की तारीफ दर तारीफ किये जा रहे थे। कह रहे थे, रेयाज के ब्‍लॉग पर है यह कविता। तब मुझे लगा कि मामला गंभीर है और मैंने उन्‍हीं से लेकर रणेंद्र जी की ये कविता पढ़ी। रणेंद्र जी अपने मित्र हैं और मुझे वाकई शर्मिंदगी हुई कि मैंने इतने कैजुअल ढंग से इस पूरे मामले को क्‍यों लिया। इस कविता में कवि कहता है कि वह उन तमाम चीजों पर कविता लिखने की कोशिश कर रहा है, जिनको इतिहास और जीवन के धवल-सवर्ण पन्‍नों जगह नहीं मिलती।