Articles tagged with: politics
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अनुराग अन्वेषी ♦ इंटरनैशनल मेकअप आर्टिस्ट कर्स्टन टिंबल और डोमिनिक ने अपने कौशल से अमिताभ बच्चन को बिग बी के करेक्टर से बाहर कर दिया है। यह एक बड़ी वजह है कि औरो की भूमिका में दर्शकों को अपने अमिताभ का चेहरा नहीं दिखता। रही सही कसर खुद बिग बी ने पूरी कर दी अपनी वाइस मॉड्यूलेशन से। यह फिल्म सिर्फ औरो की कहानी नहीं है। यह विद्या के संघर्ष की कहानी है। अमोल आम्टे की महत्वाकांक्षा की भी कहानी है। मीडिया की नासमझी-नादानी की भी दास्तां है। तिसपर चारों कहानियां एक साथ चल रही हैं और ऊबने नहीं देतीं। स्क्रिप्ट की बुनावट इतनी सधी और कसी हुई कि इन कहानियों को आप एक-दूसरे से अलग नहीं कर सकते।
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रवीश कुमार ♦ हम अपने भीतर बहस कर चुप हो जाते हैं। गले को कस कर नाक से हवा छोड़ते हुए कांय कांय आवाज़ निकालते हैं। हम सब राजनीतिक से लेकर इलाक़ाई और अन्य तरह के स्वार्थों पर केंद्रित खेमों में बंटे हैं। आलोचना अपने खेमे को बचाकर सामने वाले की की जाती है। इसलिए पत्रकारों की आलोचना भी सवालों के घेरे में है। हम किसी न किसी के हाथ में खेल रहे हैं। उसे सही ठहराने के लिए दलीलों की भरमार है। मीडिया का म नहीं जानने वाले आलोचक अख़बारों के कॉलम से उगाहने लगे हैं। इन्हीं सब के बीच कोई बाल्की जैसा काबिल निर्देशक आराम से अपनी फिल्म के पर्दे में दो छवि बनाता है। अच्छे नेता की और दूसरी लतखोर मीडिया की।
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जगदीश्वर चतुर्वेदी ♦ अमेरिका ने अफगानिस्तान में लोकतंत्र का जो नाटक किया है वैसा नाटक वह और भी अनेक देशों में कर चुका है। इसमें पक्ष और विपक्ष कौन होगा, क्या मसले होंगे, कौन वोट देगा और कौन जीतेगा – इत्यादि फैसले मतदान के पहले ही सीआईए के द्वारा ले लिये जाते हैं और मतदान के परिणामों के बहाने उनकी घोषणा कर दी जाती है। अफगानिस्तान और इराक में अमेरिका और उसके सहयोगी राष्ट्रों की सेना का कब्जा बुनियादी तौर पर अवैध है, यह इन दोनों देशों की संप्रभुता का हनन है। अफगानिस्तान की गद्दी पर बैठने वाला कोई हो, वह अमेरिका की कठपुतली की तरह काम करने के लिए मजबूर है।
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अविनाश ♦ प्रभाष जोशी देवता नहीं हैं। वे एक चतुर सुजान हैं, जो जानता है कि कब क्या करने से लाभ की गठरी सरक कर उनके पास आएगी। वे अपनी जन-छवि बनाने के लिए आंदोलनों का इस्तेमाल करते हैं और कांग्रेस की कतार में खड़े होने के लिए भाजपा-आरएसएस पर कठोर कागद कारे लिखते हैं। 84 के जून में ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान जब सेना के जवानों ने स्वर्ण मंदिर पर कब्जा कर लिया था, तो इन्हीं प्रभाष जोशी ने जनसत्ता में बैनर हेडिंग लगाया था – सत श्री अकाल, जनरल दयाल। यह उस सांप्रदायिक और ज़हरीले संपादक का कारनामा था, जिस संपादक को आज सिद्ध और प्रसिद्ध बताया जा रहा है।
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अरविंद शेष ♦ इतने हतभागे हैं आप कि यह मुनादी करते हुए इस बात का अंदाज़ा लगा पाने में सक्षम नहीं हैं कि आपने विश्वनाथ प्रताप सिंह को जोकर क्यों कहा होगा। यह कहते हुए दरअसल मैं जानबूझ कर यह तथ्य अनदेखा कर रहा हूं कि आप अच्छी तरह जानते थे और जानते हैं कि आपने विश्वनाथ प्रताप सिंह को जोकर क्यों कहा होगा। आपकी पूरी मानसिक संरचना जिस नींव पर खड़ी है और जिस मिट्टी से तैयार हुई है, वहां समाज के वंचित तबकों के लिए कुछ भी किये जाने पर आपके भीतर से और निकल क्या सकता है? क्या इसी ज़हर के साथ आप “बहुत सारे ज़रूरी मुद्दे पर बात करने” का दम भर रहे हैं।
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जगदीश्वर चतुर्वेदी ♦ वह यह आलोक तोमर नहीं है जो मैंने अपने जेएनयू के छात्र जीवन में पढ़ते हुए देखा था, मवालियों की भाषा बोलने वाला आलोक तोमर कहां से आया? आखिर यह पत्रकार दादागिरी की भाषा क्यों बोल रहा है? मैंने ऐसी भाषा में कभी किसी पत्रकार को लिखते नहीं देखा। आलोक तोमर यह भारतेंदु, महावीरप्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद, राजेंद्र यादव, प्रभाष जोशी, राजेंद्र माथुर की परंपरा वाली भाषा नहीं है। आलोक तोमर, यह बताओ, आखिरकार आदमी का इतना तेजी से पतन कैसे होता है कि वह पत्रकारिता की समस्त परंपराओं, एथिक्स, नीतियां, मानकों, संपादकीय नीति आदि सबको भूल जाए और गली के दादाओं की भाषा का इस्तेमाल करने लगे?
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विनीत कुमार ♦ आलोक तोमर ने लिखा, “ये ब्लॉगिए और नेट पर बैठा अनपढ़ों का लालची गिरोह प्रभाष जी को कैसे समझेगा?” आगे उन्होंने लिखा, “ये वे लोग हैं, जो लगभग बेरोज़गार हैं और ब्लॉग और नेट पर अपनी कुंठा की सार्वजनिक अभिव्यक्ति करते रहते हैं। नाम लेने का फायदा नहीं हैं क्योंकि अपने नेट के समाज में निरक्षरों और अर्ध-साक्षरों की संख्या बहुत है।” आलोक तोमर की भाषा कितनी विरोधाभासी है, इसका नमूना आप देखिए कि जो प्रभाष जोशी के मानव विरोधी बयानों का प्रतिरोध कर रहा है, वो पढ़ा-लिखा होकर भी जिसे कि हिंदी टाइपिंग आती है, साइटें खोलना जानता है वो अनपढ़ है।
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भोला तोमर ♦ प्रभाष जोशी अपने लंबे पत्रकारीय जीवन में कई गैर-ब्राह्मणों को पदोन्नति देते हुए दिख सकते हैं – उन्होने दिये भी होंगे – लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि ब्राह्मण इस जंबूद्वीप का सबसे महान प्राणी है। कई सारे समुदायों की तरह ब्राह्मणों के योगदान को दिखाने के लिए दूसरे तरीके हो सकते हैं लेकिन उनकी महानता को सिलिकन वैली या फिर भद्रलोक के खेल क्रिकेट से जोड़ना जातीय अहंकार ही दिखाता है। प्रभाषजी ने ये बयान देकर ब्राह्मणों की नयी पीढ़ी को एक तरह से डिफेंसिव करने का भी काम किया है, जो जातीय अहंकार से ऊपर उठना चाहती है और चाहती है कि लोग उसे मनुवादी न कहें।
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निखिल आनंद गिरि ♦ टीआरपी के खेल पर मोहल्ला में अच्छी कमेंट्री चालू है, लेकिन इससे कुछ होने वाला है नहीं। होगा वही, जो पूंजीपति चाहेंगे। टीवी में मार्केटिंग का कंसेप्ट ज़्यादा पुराना नहीं है। अख़बार इतने सालों से हैं, मगर वहां भी टीवी की रैटरेस के बाद से ही रीडरशिप को लेकर तूफान मचना शुरू हुआ है। इस मार्केटिंग ने ही सारा खेल शुरू किया है। दरअसल, सारा खेल एक-दूसरे को बेवकूफ बनाने का है। प्रोडक्ट बेचती कंपनियों और ख़बर बेचते चैनलों में मौसेरे भाई जैसा रिश्ता है। एक आम आदमी को बेवकूफ बनाता है तो दूसरा उस्ताद के ही कान काटता है।
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सुशांत झा ♦ टीआरपी मुल्क की जाति व्यवस्था की तरह है, जिसकी आलोचना तो सभी करते हैं लेकिन उसे ख़ारिज़ कोई नहीं करना चाहता। आप चाहे तो इसकी तुलना दहेज प्रथा से भी कर सकते हैं। टीवीवालों से पूछिए तो जवाब मिलेगा कि ये जनता की मांग है। मानो जनता ने महेंद्र सिंह टिकैत की अगुआई में प्रेस क्लब पर लाखों की संख्या में पिछले रविवार को ही धरना दिय़ा था। ये बात अलग है कि इकलौती जनता अपनी वाइल्ड फैंटेसी में इंडिया टीवी ही क्या, नेकेड न्यूज़ और संभव हो तो हर रोज थ्री एक्स मूवी देख सकती है – लेकिन इकलौती जनता नाम की कोई चीज नहीं होती।


