Articles tagged with: prabhash joshi
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अंबरीश कुमार ♦ आज प्रभाष परंपरा के वाहक वे बहादुर पत्रकार भी हैं, जो धंधे में मालिक का काम होने के बाद मिठाई का डिब्बा लेकर माफिया डीपी यादव की चौखट पर शीश नवाते हैं और वे पत्रकार भी हैं, जो एक्सप्रेस प्रबंधन से साजिश कर प्रभाष जोशी को संपादक पद से हटवाते हैं। वे भी हैं, जो 1995 के दौर में प्रभाष जोशी को पानी पी पी कर कोसते थे और हमारे खिलाफ एक संघी संपादक के निर्देश पर चुनाव भी लड़े और हारे भी। जिन ताकतों को हमने कई बार हराया वे सभी अब प्रभाष परंपरा वाले हो गये है। न्यास में बाकी धंधेबाज लोगों की सूची देखकर उत्तर प्रदेश के किसी पुराने पत्रकार से बात कर ले, ट्रांसफर-पोस्टिंग से करोड़ों का वारा-न्यारा करने वालों का भी पता चल जाएगा।
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विवेक वाजपेयी ♦ किसी को कभी भी याद किया जा सकता है। लेकिन हम बात खास उस जगह की कर रहे हैं, जहां पर प्रभाष जी को याद करने के लिए ही लोग एकत्रित हुए थे। जगह थी दिल्ली में बापू की समाधि राजघाट के ठीक सामने स्थित गांधी स्मृति के सत्याग्रह मंडप का। जहां पर प्रभाष परंपरा न्यास की ओर से स्वर्गीय प्रभाष जी के जन्मदिन के मौके पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। इस कार्यक्रम में लोगों का हुजूम उमड़ा हुआ था। हर वर्ग के लोग मौजूद थे। वयोवृद्ध गांधीवादी लोगों से लेकर आज की युवा पीढ़ी तक। मीडिया के सब नामी-नये चेहरे। साथ ही प्रबुद्ध साहित्यकार और प्रसिद्ध आलोचक भी, जिनमें अशोक वाजपेयी और नामवर सिंह को मैं भली-भांति जान सका।
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समरेंद्र ♦ दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में प्रभाष जोशी पर लिखी गयी पुस्तक का लोकार्पण हुआ। इसे आप महज संयोग कहेंगे या क्या कहेंगे कि उस लोकार्पण में जितने लोगों ने प्रभाष जोशी के बारे में अपनी राय रखी, उनमें से एक को छोड़ कर कोई भी गैर ब्राह्मण नहीं था। जो अकेला शख्स गैरब्राह्मण था, वो भी एक ऐसी जाति से ताल्लुक रखता था जो खुद को ब्राह्मण होने का दावा करती रही है। यहां तक कि हद से अनहद गये का प्रकाशक भी ब्राह्मण ही है। इसे भी आप महज संयोग कहेंगे या फिर क्या कहेंगे कि मंच पर आकर प्रभाष जोशी को महान बताने वालों में एक भी महिला नहीं थी।
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मोहल्ला लाइव संवाददाता ♦ अशोक वाजपेयी ने प्रभाषजी को याद करते हुए कहा कि प्रभाषजी उन गिने चुने पत्रकारों में थे, जिनकी आवाज साहित्यिक जगत तक में साफ सुनी जाती थी। उन्होंने राम मनोहर लोहिया और राजेंद्र माथुर के साथ प्रभाषजी की तुलना करते हुए कहा कि ये वे लोग थे, जिन्होंने हिंदी की नयी शैली विकिसत की और हिंदी वालों को उनका उचित सम्मान दिलाने में पूरी कोशिश की। उन्होंने ये भी कहा कि प्रभाषजी जैसा पत्रकार पैदा नहीं हुआ, जो हिंदीभाषी पूरे समाज का प्रवक्ता बन गया हो। वाजपेयी ने कहा कि प्रभाष जी संभवत: गांधीवादी निर्भयता के आखिरी प्रवक्ता थे।
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अजीत कुमार ♦ शायद पत्रकारिता के लंबे अनुभव के दौरान आपको व्यक्तिगत तौर पर उनको परखने का मौका मिला हो। संभव है, आपको व्यक्तिगत जीवन में उनको लेकर कटु अनुभव रहे हों। यह आपके लेखन से पूरी तरह उभरता है। तब भी आप कहते हैं मैं उनके थॉट्स को लेकर व्यक्तिगत हो रहा हूं। जबकि अपने पिछले कई लेखों में प्रभाष जी को लेकर आपने जिस तरह की भाषा का प्रयोग किया है, वह पूरी तरह से साबित करता है कि आप उनके समूचे व्यक्तित्व और कृत्तित्व को सवाल के दायरे में ला रहे हैं। इसे मैं अपने उदाहरण से भी थोड़ा स्पष्ट करने की कोशिश करता हूं। जब तक मैं आपसे मिला नहीं था, आपकी छवि सिर्फ आपके लेखन के माध्यम से मेरे यहां उभरती थी। लेकिन बहुत कुछ जानने के बाद आपके लेखन के सहारे बनी छवि एक हद तक खंडित हो गयी।
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अजीत कुमार ♦ क्या प्रभाष जी के जाति और सत्ती प्रथा के संबंध में दिये गये विचार और उनका व्यक्तिगत ज़िंदगी में कर्मकांडी ब्राह्मण होना ही क्या हिंदी पत्रकारिता को उनकी अप्रतिम देन को मिटाने के लिए पर्याप्त है? आखिर अगर ऐसा है तो जाति के संबंध में गांधी के विचार को लेकर आप करेंगे? बाबरी मस्जिद विध्वंस पर निर्मल वर्मा के विचार को लेकर क्या उनके साहित्य में योगदान को नदारद मान लेना चाहिए? ऐसे और भी कई उदाहरण हो सकते हैं। क्या आप नहीं मानते कि हर विधा के कुछ अपने प्रतिमान होते हैं और जो भी उन प्रतिमानों पर खरा उतरता है, उस विधा के लिए वह अतिमहत्वपूर्ण हो जाता है!
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दिलीप मंडल ♦ दिखाने और छिपाने की नैतिकता पर चल रही चर्चा के बीच इस बात पर भी बहस हो सकती है कि किसी व्यक्ति के कृत्य की और उसके गुण और अवगुण की क्या सामाजिक व्याख्या होनी चाहिए। निजी कृत्यों और कुकृत्यों की सामाजिक और खासकर जातीय व्याख्या कितनी ख़तरनाक हो सकती है, उसका अंदाज़ा संभवत: आप लगा सकते हैं। किसी जाति समूह के हीरो (जैसे सचिन) के गुणों को उस जाति समूह का गुण बताएंगे या ये कहेंगे कि कोई शख्स किसी जाति समूह का होने की वजह से किसी खास गुण से लैस है तो उस जाति समूह में अगर कोई विलेन हुआ तो उसकी व्याख्या में कैसी मुश्किलें आएंगी, इसका भी अंदाज़ा लगाया जा सकता है। जाति विशेष को खास गुणों से लैस बताने की स्थापना पर जब पिछली बार बात हुई थी तो शायद संदर्भ उतने साफ नहीं थे, लेकिन आज हैं।
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आलोक श्रीवास्तव ♦ प्रभाष जी हिंदी के शक्तिशाली और प्रमुख संपादक रहे। शक्तिशाली इस अर्थ में कि उन्हें एक्सप्रेस समूह के मालिक का पूर्ण विश्वास प्राप्त था। उनके निधन पर मुझे शोक है। ठीक उसी तरह जिस तरह पिछले दो दशकों में दिवंगत हुए हिंदी के अन्य संपादकों रघुवीर सहाय, धर्मवीर भारती, मनोहर श्याम जोशी, गणेश मंत्री आदि के निधन पर हुआ था। पर एक फर्क देख रहा हूं, उपरोक्त संपादकों में से कौन कद में और योगदान में प्रभाष जोशी से कमतर था? पर किसी का वैसा स्तुतिगान नहीं हुआ, जैसा प्रभाष जी का हो रहा है।
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अरविंद तिवारी ♦ जब प्रभाष जी का शव राज्य सरकार के विशेष विमान से शुक्रवार शाम इंदौर विमानतल पर लाया गया, तब वहां गिने हुए चार पत्रकार, एक फोटोग्राफर व एक लोकल चैनल के कैमरामैन के अलावा पत्रकार बिरादरी से कोई मौजूद नहीं था। जो दूसरे शख्स वहां मौजूद थे उनमें सांसद सज्जनसिंह वर्मा व उद्योगपति किशोर वाधवानी के अलावा कांग्रेस के आधा दर्जन नेता, चार-छह रिश्तेदार, चचेरे भाई महेंद्र जोशी व सुख-दुख के साथी सुरेंद्र संघवी शामिल हैं। जिन प्रभाष जोशी को दिल्ली से अंतिम विदाई देने के लिए उनके वसुंधरा स्थित निवास से गांधी प्रतिष्ठान व दिल्ली विमानतल तक पत्रकार बिरादरी के सैकड़ों साथ रहे हों वहीं उनके प्रिय इंदौर में ऐसा क्यों हुआ, यह समझ से परे है।
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गिरीश पंकज ♦ इसमें दो राय नहीं कि प्रभाष जी के जाने के बाद रचनात्मक पत्रकारिता का एक पुरोधा चला गया। यह एक युगांत भी है। ऐसे युगांत जो दुबारा नहीं आने वाला। बस उनका लेखन ही हमारे सामने रहेगा। आने वाली पीढ़ी अगर पत्रकारिता के चरित्र को उज्ज्वल बनाए रखना चाहती है, सचमुच पत्रकारिता करना चाहती है, तो वह प्रभाष जोशी के रास्ते पर चले। पत्रकार केवल सामाजिक विषयों पर ही न लिखे, वह खेल, विज्ञान आदि अन्य विषयों पर भी पढ़े और लिखे। प्रभाषजी यही करते थे। जितना अच्छा वे किसी राजनीतिक-सामाजिक विषय पर लिखते थे, उससे बेहतर भाषा में वे क्रिकेट पर भी लिखते थे। हिंदी के सुधी पाठक उनके इस शीर्षक को आज तक याद करते हैं, कि “जब तक सूरज-चांद रहेगा, अजहर तेरा नाम रहेगा”।




