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डेस्क ♦ प्रभात खबर की यह रिपोर्ट बताती है कि आंदोलनकारियों या व्यवस्था से नाराज़ लोगों का अब भी चौथे खंभे पर भरोसा है। यह भी कि तमाम झंझावातों के बावजूद प्रभात खबर झारखंड का सर्वाधिक विश्वसनीय अखबार है। माओवादी सरकार के सामने झुकने को तैयार नहीं हैं, लेकिन अखबार के सामने झुकने को तैयार हैं। यह भी कि तमाम बोल-वचनों के बावजूद सरकार अपनी ही साख का कत्ल कैसे कर देती है।
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हरिवंश ♦ 2009 के चुनाव परिणाम, 2005 के चुनाव परिणामों से भी अधिक खंडित, जटिल और विभाजित है। इसका संकेत है कि खंड-खंड बंटा झारखंडी समाज, लगातार बंट और विभाजित हो रहा है। समाज के स्तर पर। इस चुनाव के मुख्य गेनर हैं, शिबू सोरेन, बाबूलाल मरांडी, सुदेश महतो और कांग्रेस। बाबूलाल और कांग्रेस दोनों एक दूसरे के पूरक साबित हुए हैं। बाबूलाल जी और कांग्रेस गंठजोड़ ने भाजपा की लुटिया डुबो दी है। शिबू सोरेन को तमाड़ चुनाव में मिली पराजय के बाद लोग हाशिये पर डाल रहे थे। पर झामुमो की कामयाबी ने साबित कर दिया है कि शिबू सोरेन आज भी झारखंडी माटी के बड़े नेता हैं। नक्सली या अतिवामपंथी ताकतों ने भी तीन राजनीतिक समूहों के प्रति अपनी सहानुभूति दिखायी है।
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डेस्क ♦ 20 दिसंबर। प्रभात ख़बर के पटना संस्करण का बॉटम है – आइको है रोबोट वाइफ। उत्तेजक ख़बर है। एक दिन पहले हमने बताया था कि कैसे एक मामूली ख़बर को विशिष्ट बना कर और कैसे केंद्र के काम को राज्य के खाते में डाल कर तैयार की गयी एक ख़बर इस अख़बार में टॉप लीड बनायी गयी। झारखंड में अख़बार नहीं आंदोलन का नारा और बिहार में बिहार जागे देश आगे का स्लोगन इस्तेमाल करने वाले इस अख़बार की विडंबना दोनों ही जगह साफ जाहिर हो रही है। झारखंड में अपने संचालक संस्थान उषा मार्टिन के लिए लॉबिंग करने और बिहार में नीतीश सरकार का मुखपत्र बन जाने वाले प्रभात खबर का कंसर्न कायदे से बाज़ार भी है। किसी ने कहा कि प्रभात ख़बर का आज का बॉटम सॉफ्ट पॉर्न का मुजाहिरा है।
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डेस्क ♦ प्रभात खबर के पटना संस्करण में परसों की लीड स्टोरी है – पटना में बिज़नेस सबसे आसान। इसमें ज़्यादातर काम राज्य सरकार के दायरे से बाहर हैं। एकाध को छोड़ कर। हम सिर्फ एक सवाल रख रहे हैं। अपनी तरफ से कुछ कहे बिना। आप बताएं कि इनमें से कौन-कौन से काम में राज्य सरकारें पहले बिहार में बाधा डालती रही हैं और कौन से काम में राज्य सरकार चाहे भी, तो नागरिक के लिए मुश्किलें नहीं खड़ी कर सकती हैं? वैसे हैरानी इस बात की है कि क्या इस तरह की ख़बरों को अख़बार का टॉप लीड बनाया जा सकता है? ये रिपोर्ट सरकार की शुद्ध चमचागीरी है या इसे निम्नस्तरीय संपादकीय दृष्टि भी कही जा सकती है।
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हरिवंश ♦ भाषाई आंदोलन, बाल ठाकरे की मराठी अस्मिता, अब राज ठाकरे का मराठी मानुष, भिंडरावाले का आंदोलन, अयोध्या प्रकरण, सांप्रदायिक सवाल, जातिगत मुद्दे जैसे सवालों से इस देश में समय-समय पर जो आग लगी, उससे मुल्क ने क्या सीखा? क्या इन भावात्मक सवालों (आग) से कोई सबक मिला? कितना झुलसा है, यह देश, जिस देश कि चौहद्दी पर बार-बार चीन अपनी ताकत का एहसास कराये, आतंकवाद की चुनौती लगातार बनी हो, पचासों करोड़ नितांत गरीब, किसी तरह जी रहे हों, प्रधानमंत्री के शब्दों में, जहां आजादी के बाद की सबसे बड़ी चुनौती नक्सल समस्या मौजूद हो, वहां एक नया भानुमती का पिटारा खोलने के कदम को आप क्या कहेंगे?
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रवि प्रकाश ♦ क्या यह सच नहीं कि आउटलुक के सीनियर पत्रकार सुनील तिवारी जी को सिर्फ और सिर्फ कोड़ा के ख़िलाफ़ एक्सक्लूसिव ख़बरें लिखवाने के लिए थोड़े समय के लिए रखा गया। मधु कोड़ा के दोस्त विनोद सिन्हा के ख़िलाफ़ पहली ख़बर छपी – कौन है विनोद सिन्हा। इसके बाद चार ख़बरें और छपीं। फिर पता चला कि विनोद सिन्हा ने चाइबासा इलाके में बहुत कम ज़मीन पर खनन का पट्टा लिया है, लेकिन उससे बीस गुणा ज़्यादा ज़मीन पर खनन करवाता है। इसकी ख़बर निकालने के लिए सुनील तिवारी के साथ कुछ और रिपोर्टर चाइबासा भेजे गये। वहां विनोद के गुंडों ने उन्हें घेरा भी। किसी तरह बच-बचाकर वे लोग वापस रांची लौटे। तब हमारे पास फोटो थी। ख़बर भी। ख़बर लिखी गयी। लेकिन ख़बर नहीं छपी।
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एक पत्रकार ♦ रविप्रकाश जी सिटी का काम देखते थे, वे सिटी एडिटर नहीं थे। ऐसा कोई पद प्रभात खबर में नहीं है। मधु कोड़ा की ख़बर रोकने की बात भी पचती नहीं है क्योंकि मधु कोड़ा के ख़िलाफ़ तो लगातार प्रभात खबर में समाचार छपते रहे हैं। सुनील तिवारी के बारे में ज़िक्र था कि उन्हें हटा दिया गया था। सुनील तिवारी ने दो साल तक काम किया था। मैं न तो रवि प्रकाश का विरोधी हूं न ही किसी का समर्थक। लेकिन जब मैंने उनकी कलम से कुछ पढ़ा, तो अटपटा लगा, इसलिए लिख रहा हूं। ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि जो मैं लिख रहा हूं, वह खुली किताब की तरह है। प्रभात खबर में काम करनेवाला हर कर्मचारी इसे जानता है। इसलिए जब रविप्रकाशजी ने एक रिपोर्ट के बारे में लिखा तो सबको ताज्जुब हुआ।
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हरिवंश ♦ घटते वोट क्या बताते हैं? हमारी मान्यता रही है, कोउ नृप होउ हमहि का हानी। कोई भी राजा हो, उससे क्या फ़र्क पड़नेवाला? डॉ लोहिया ने भी निराशा के कर्तव्य में भारतीय मन की उदासी-तटस्थता का उल्लेख किया है। उनकी व्याख्या मानती है कि हज़ारों वर्ष की गुलामी ने हमें सत्वहीन कर दिया है। बाबरनामा में बाबर के सटीक अनुभव हैं। कैसे लाखोंलाख लोग सेना के मामूली टुकड़ी को मूकदर्शक बन कर स्वागत करते हैं। पराधीनता मान लेते हैं। इस तरह मतदाताओं के घटते रुझान की अनेक व्याख्या होती रही है। होती रहेगी। पर लोकतंत्र को हमारी मौजूदा राजनीति, अविश्वसनीय बना चुकी है। यह सच है।
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संदीपन देब ♦ क्या कभी हमारे देश का राजनीतिक माहौल ऐसी शर्मनाक स्थिति में रहा है, जैसा की अभी है? अख़बारों के पहले पन्ने पर जिस तरह की ख़बरें रोज़ आ रही हैं, उससे आपको उबकाई आती होगी। हमारे नेता मानवीय मूल्यों को खोने की आख़िरी राह पर चल रहे हैं। क्या हमारे नेताओं के पास कोई शर्म नहीं है! लगभग दो माह बाद हम गणतंत्र दिवस की 60वीं सालगिरह मनाएंगे। जब भी अगले गणतंत्र दिवस के बारे में सोचता हूं, मेरे ज़ेहन में क्यों केला शब्द आ रहा है?
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तथागत ♦ तय कीजिए कि शिनाख्तों पर आधारित खोजपरक पत्रकारिता करनी है या बयानों पर आधारित पत्रकारिता। विनोद शरण ने अपनी जितनी भी रिपोर्टों के उदाहरण दिये हैं, वे हास्यास्पद हैं। बताइए तो, किसी में प्रत्याशी बन्ना को रिपोर्टर मां-बाप का आशीर्वाद लेते देखते हैं और लहालोट होकर उसकी रिपोर्ट लिखते हैं, तो कहीं लिखते हैं – मोहन को मिल रहा जीत का आशीर्वाद। ये रिपोर्टिंग का कौन सा ककहरा है भाई। और मज़ेदार ये कि विनोद शरण लिखते हैं कि 20 साल से प्रभात खबर में हूं। कमाल है – 20 सालों में न तो खुद रिपोर्ट लिखना आया, न ही किसी ने सिखाया। रिपोर्टिंग की उनकी भाषा साफ बताती है कि मामला निष्पक्ष रिपोर्टिंग का नहीं बल्कि भक्तिभाव का है और ये भक्तिभाव बिना लेन-देन कहां आता है इस कलियुग में!


