Articles tagged with: prabhat khabar
ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया, मीडिया मंडी »
संदीपन देब ♦ क्या कभी हमारे देश का राजनीतिक माहौल ऐसी शर्मनाक स्थिति में रहा है, जैसा की अभी है? अख़बारों के पहले पन्ने पर जिस तरह की ख़बरें रोज़ आ रही हैं, उससे आपको उबकाई आती होगी। हमारे नेता मानवीय मूल्यों को खोने की आख़िरी राह पर चल रहे हैं। क्या हमारे नेताओं के पास कोई शर्म नहीं है! लगभग दो माह बाद हम गणतंत्र दिवस की 60वीं सालगिरह मनाएंगे। जब भी अगले गणतंत्र दिवस के बारे में सोचता हूं, मेरे ज़ेहन में क्यों केला शब्द आ रहा है?
ख़बर भी नज़र भी, मीडिया मंडी, मोहल्ला रांची »
तथागत ♦ तय कीजिए कि शिनाख्तों पर आधारित खोजपरक पत्रकारिता करनी है या बयानों पर आधारित पत्रकारिता। विनोद शरण ने अपनी जितनी भी रिपोर्टों के उदाहरण दिये हैं, वे हास्यास्पद हैं। बताइए तो, किसी में प्रत्याशी बन्ना को रिपोर्टर मां-बाप का आशीर्वाद लेते देखते हैं और लहालोट होकर उसकी रिपोर्ट लिखते हैं, तो कहीं लिखते हैं – मोहन को मिल रहा जीत का आशीर्वाद। ये रिपोर्टिंग का कौन सा ककहरा है भाई। और मज़ेदार ये कि विनोद शरण लिखते हैं कि 20 साल से प्रभात खबर में हूं। कमाल है – 20 सालों में न तो खुद रिपोर्ट लिखना आया, न ही किसी ने सिखाया। रिपोर्टिंग की उनकी भाषा साफ बताती है कि मामला निष्पक्ष रिपोर्टिंग का नहीं बल्कि भक्तिभाव का है और ये भक्तिभाव बिना लेन-देन कहां आता है इस कलियुग में!
मीडिया मंडी, समाचार »
डेस्क ♦ खबर एक है, इंट्रेस्ट अलग-अलग। उसकी व्याख्याएं अलग-अलग। दिलचस्प है कि आईआरएस (इंडियन रीडरशिप सर्वे) 2009 की दूसरी छमाही की रिपोर्ट को आज लगभग सभी अख़बारों ने छापा है – और छापते हुए लगभग सभी अख़बारों ने खुद को तीसमारखां बताया है।क्या ये अख़बार ऐसा दूसरी ख़बरों के साथ भी करते हैं? अगर करते हैं, तो पाठक क्या समझे? चलिए, हम इस पचड़े में नहीं पड़ते हैं और देखते हैं कि किसने क्या छापा!
ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया, मीडिया मंडी, मोहल्ला रांची »
हरिवंश ♦ झारखंड के लोग याद रखें कि जब सरकारें और राजनीतिक दल उनके भविष्य की हत्या कर रहे थे, तब झारखंड के वीवीआईपी के बच्चों के लिए क्या अवसर थे? गुज़रे आठ वर्षो तक लगातार विभिन्न कोटों से इनके बच्चे सीधे दाखिला पा रहे थे। मेडिकल में। भले ही ये बच्चे लिख-लोढ़ा पढ़ पत्थर की योग्यतावाले रहे हों, पर वे सीधे डॉक्टर बन रहे थे। उन्हें प्रतियोगिता परीक्षा में बैठने की मजबूरी नहीं थी, क्योंकि वे वीवीआईपी लोगों के बच्चे थे। दरअसल ये राजनीतिज्ञ इस नये दौर के नये राजा-महाराजा हैं। ये बार-बार आपको छलेंगे। जाति के नाम पर। धर्म के नाम पर। क्षेत्रवाद का नाम देकर। मोह कर। भ्रम में डाल कर। क्योंकि ये मानते हैं कि नासमझ मतदाताओं के बीच ठग ही राज करते हैं।
ख़बर भी नज़र भी, मीडिया मंडी, समाचार »
विनोद शरण ♦ दरअसल आप प्रभात खबर के घोर विरोधी हैं, जो और किसी के इशारे पर काम कर रहे हैं। प्रभात खबर ने अपनी निष्पक्षता के अनेक उदाहरण आपको दिये लेकिन क्या आपको यह नज़र नहीं आता कि इस चुनाव में अन्य बड़े अख़बार क्या कर रहे हैं? कई प्रत्याशियों की ख़बरें दूसरे बड़े अख़बारों में इसलिए नहीं छप रही हैं क्योंकि वे विज्ञापन नही दे रहे हैं, जबकि प्रभात खबर में हर प्रत्याशी की ख़बर छप रही है, चाहे वह विज्ञापन देता है या नहीं देता है। रोज का अख़बार देखते रहिए। क्या कारण है कि आपकी नज़र अन्य बड़े अख़बारों की करतूतों की ओर नहीं जाती। मैं नहीं कह सकता कि वह कौन-सी मजबूरी है, जिसके इशारे पर आप प्रभात खबर जैसे छोटे अख़बार को निशाना बना रहे हैं।
ख़बर भी नज़र भी, मीडिया मंडी, मोहल्ला रांची »
रवि प्रकाश ♦ विनोद सिन्हा प्रकरण में एक बड़ी स्टोरी करायी गयी, लेकिन छापी नहीं गयी। लिखने वाले थे सुनील तिवारी। सुनील पहले आउटलुक के रिपोर्टर हुआ करते थे। बाद में प्रभात खबर ने उन्हें अप्वाइंट किया। केवल विनोद सिन्हा वाली खबर निकलवा कर उन्हें चलता कर दिया गया। तब मैं सिटी एडिटर था। यानी कि पहले दो किस्तों में स्टोरी छाप कर तत्कालीन मधु कोड़ा सरकार पर दबाव बनाया गया और तीसरी किस्त के लिए बार्गेनिंग करने की कोशिश की गयी। साफ है कि न सिर्फ मधु कोड़ा एंड कंपनी झारखंड के चमकते हुए हमाम में नहा रहे थे बल्कि पहले से नहाते आये उषा मार्टिन ग्रुप अपने लिए बड़ा हमाम मधु कोड़ा से चाह रहा था।
ख़बर भी नज़र भी, मीडिया मंडी, मोहल्ला रांची, समाचार »
तथागत ♦ आउटलुक के ताज़े अंक में झारखंड पर कवर स्टोरी है। ज़ाहिर है, झारखंड इन दिनों मधु कोड़ा की वजह से चर्चा में है। स्टेट के ख़ज़ाने को खाली करने और बड़े पैमाने पर कॉरपोरेट्स की दलाली करने जैसे आरोपों के चलते मधु कोड़ा पर सीबीआई की घेराबंदी मज़बूत हो रही है। मधु कोड़ा का लगातार बयान आ रहा है कि ये सब साज़िश है और उन्हें फंसाया जा रहा है। किसी भी ऐसे मामले में फंसने पर ऐसे बयान रस्मी होते हैं, लेकिन आउटलुक ने बताया है कि मधु कोड़ा का पूरा मामला एक्सपोज़ कैसे हुआ। खोजी और आंदोलनकारी पत्रकारिता के लिए मशहूर प्रभात खबर ने मधु कोड़ा के ख़िलाफ़ सीरीज़ में स्टोरी की।
ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया, मीडिया मंडी, मोहल्ला रांची »
तथागत ♦ कुछ दिनों पहले प्रभात खबर ने एक आचार संहिता का एलान किया था। इस अखबार ने अपने बारे में बार-बार कहा कि वह पक्षधर पत्रकारिता में विश्वास नहीं रखता, बल्कि निष्पक्षता उसकी शैली है। आचार संहिता में भी कुल यही बात कही। कहा कि पार्टियों से विज्ञापन लेंगे, लेकिन टेबल के ऊपर से। टेबल के नीचे से नहीं। लिहाज़ा अगर विज्ञापन वाली ख़बर भी छपी, तो उसके नीचे लिखेंगे कि ये ख़बर विज्ञापन का हिस्सा है। लेकिन प्रभात खबर की आचार संहिता एलान के 15 दिनों के भीतर दम तोड़ देगी, इसका क़तई अंदाज़ नहीं था।
ख़बर भी नज़र भी, मीडिया मंडी, स्मृति »
डेस्क ♦ देर रात प्रभाष जी का इंतक़ाल हुआ। दिल्ली के अख़बार तो नहीं, लेकिन कई क्षेत्रीय अख़बारों ने अपने शहरी संस्करणों में इस मनहूस ख़बर को छापी। लेकिन दूसरे दिन लगभग अख़बारों ने सम्मानपूर्वक प्रभाष जी को याद किया। उन पर पूरा का पूरा पन्ना निकाला। प्रभात खबर से लेकर नई दुनिया तक में उनके साहस से भरे पत्रकारीय जीवन को भावपूर्ण तरीके से याद किया। लगभग अख़बारों के प्रधान-समूह संपादकों ने उन पहले पन्ने पर एडिटोरियल लिखा। लेकिन खबरों के धंधे में जागरण की खबर लेने वाले प्रभाष जोशी से इस अखबार ने उनकी मौत की खबर अंडरप्ले करके बदला लिया। ये एक अख़बार की छोटी मानसिकता का परिचय देता है।
ख़बर भी नज़र भी, मीडिया मंडी, मोहल्ला रांची, स्मृति »
हरिवंश ♦ प्रभाषजी व्यक्ति नहीं, प्रतीक बन गये थे। श्रेष्ठ मूल्यों के। जीने के मकसद के। पत्रकारिता के उच्च प्रतिमानों के। तीन दिनों पहले पटना से उनका फ़ोन आया था। वह प्रभात खबर के पथ प्रदर्शक थे। निजी जीवन में भी अभिभावक। अत्यंत संवेदनशील। गांधी और विनोबा के जीवन मूल्यों का उन पर गहरा असर था। साधन और साध्य उनके जीवन के मापदंड थे। उनकी रुचि बहुआयामी थी। लेखन, खेल, संगीत, इतिहास, पाककला सबमें निपुणता। 1983 में उनके नेतृत्व में निकला जनसत्ता हिंदी अखबारों में मानक है। श्रेष्ठ टीम। और ऐसा अखबार, जो लीक से हट कर था। कहें, एक नयी राह बनायी।




