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आलोक तोमर ♦ यह विभूति नारायण राय की बहादुरी की एक कहानी है, जिसमें मुजरिम के तौर पर मैं भी शरीक हूं। इसलिए मुझे हैरत नहीं होती कि अगर विभूति नारायण राय ने अनिल राय अंकित को बचाने का जेहादी रास्ता अपना ही लिया है, तो वे आखिरी दम तक कोशिश करेंगे। मगर विभूति भाई मित्र हैं इसलिए उन्हें बता देना अपना फर्ज है कि जेहादियों का आखिर में होता क्या है? अंकित पुराना चोर है और चोरी के लिए नया ठिकाना तलाश कर लेगा, मगर विभूति भाई आप नाहक शहीद हो जाएंगे।
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डेस्क ♦ हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के संचार विभाग के विभागाध्यक्ष अनिल कुमार राय के हमनाम एक और चोरगुरु के कारनामों पर सीएनईबी चैनल ने खबर चलायी थी। चोरगुरु सीएनईबी चैनल की एक्सक्लूसिव सीरीज़ है, जो देश भर में फैले फर्जी प्राध्यापकों के खेल को बिगाड़ रही है। बौखलाये चोर गुरुओं ने कमर सीधी कर ली है। अभी अभी kishor4media@gmail.com के जरिये हमें सूचना दी गयी है कि वरिष्ठ मीडियाकर्मी राहुल देव एवं उनके साथी जगदीश मोहन के खिलाफ भारतीय दंड संहिता 500/501 के तहत वाराणसी कोर्ट ने सम्मन जारी किया है। वाराणसी की इस घटना के बाद जाहिर है तमाम चोरगुरु उत्साहित होंगे, लेकिन हम राहुल देव को भरोसा दिलाना चाहते हैं कि हम सब उनके अभियान के साथ हैं।
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आलोक तोमर ♦ मैं जनसत्ता के आदिवासियों में से हूं, यानी उस टीम में से जिसने पहला अंक निकाला था, इसलिए कुछ बातें साझा करना चाहता हूं। जनसत्ता जिस समय सामने आया, तो प्रभाष जी का सपना था कि बोलचाल और मुहावरे की भाषा में नये तेवर वाला एक अखबार निकाला जाए। बाहर वाले नहीं जानते कि उस समय एक्सप्रेस समूह के मालिक रामनाथ गोयनका प्रभाष जी को इंडियन एक्सप्रेस का प्रधान संपादक बनाना चाहते थे और प्रभाष जी ने विनम्रता लेकिन दृढ़ता से कहा था कि उन्हें हिंदी में यह प्रयोग करने दिया जाए। गोयनका मान गये थे। पहले दिन जो अखबार निकला था, उसमें प्रूफ की प्रचंड अशुद्वियां थीं लेकिन लेआउट नया था, भाषा में तेवर था और खबरों में सरोकार था। इसीलिए पाठकों ने हाथों-हाथ लिया।
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हेमेंद्र मिश्र ♦ अभी अभी बीते आम चुनाव में खबरों को जब बाजार की सुनहली पालकी में झुला कर उपभोक्ता के सामने रखा गया, तो खूब हाय-तौबा मची। चारों ओर से यह आवाज उठने लगी कि पत्रकारीय मूल्य में गिरावट आ गयी है और ख़बरों को अर्थ के आधार पर तय किया जाने लगा है। आप कुछ भी छापें हमें फर्क नहीं पड़ता… और खबरों से खेलना ही आपकी पत्रकारिता है… जैसे जुमले प्रयोग होने लगे। लेकिन ऐसा नहीं है कि ख़बरों को मसाले की छौंक मारकर परोसने का धंधा हाल ही में शुरू हुआ है। बल्कि इस तथाकथित मज़बूत स्तंभ पर आर्थिक या यूं कहे मिलावट की पुताई आज़ादी के बाद से ही शुरु हो गयी थी।
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ख़बरों में मिलावट को रोकने के लिए कानून बना पाना संभव होगा या नहीं, कहा नहीं जा सकता। अमूमन सभी मीडिया संस्थान किसी न किसी राजनीतिक पार्टी से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं। हर जगह ख़बरों के साथ घालमेल किया जाता है और सबसे बड़ी बात अगर कभी मीडिया को क्रॉसचेक करने के लिए कानून बनाने की बात की जाती है, तो हम सब यानी पूरा मीडिया ही लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर अंकुश लगाने के आधार पर ऐसे किसी कानून का विरोध करने लगेंगे। निकट भविष्य में यह जरूर संभव हो सकता है कि मीडिया के लिए कोई गाइडलाइन बनायी जाए और उन गाइडलाइंस का पालन न करने वालों पर जुर्माना लगाया जाए। पर, ऐसी कोई गाइडलाइन तैयार कर पाना भी आसान काम नहीं होगा।
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घूम फिरकर आपकी शिक़ायत उस मीडिया से है, जो बाज़ार के हाथों गिरवी हो गया है। मगर एक बात मुझे समझ में नहीं आयी कि जिस मीडिया को आप बाजार की रखैल साबित करने पर तुले हैं, उसकी परिभाषा के दायरे में केवल इलेक्ट्रानिक मीडिया क्यों है। आपके पूरे लेख में जिस तरह के सवाल खड़े किये गये हैं, उनकी जद में केवल इलेक्ट्रानिक मीडिया ही क्यों है? क्या आप ये मानकर चल रहे हैं कि अख़बारों में ख़बरों के साथ खिलवाड़ नहीं होता? या ख़बरों का सेलेक्शन करते हुए इस बात का ध्यान नहीं रखा जाता कि कौन सी ख़बर पाठकों की लारग्रंथियों में हलचल मचाएगी? कहीं आप ये तो नहीं कहना चाहते कि ख़बर को सनसनीखेज़ करने, न्यूडिटी का छौंका लगाने से लेकर उसे मसालेदार बनाकर परोसने तक का काम केवल न्यूज चैनल करते हैं?
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मीडिया में सेंटिंग-गेटिंग का खेल बहुत पुराना है – लेकिन अभी यह अपने शबाब पर है। जिसे पसंद नहीं करते हो, मंदी के बहाने उसे निकालो। अपने लोगो को भर लो। क्या ये सच नहीं? ऐसे ही किसी सेमिनार में एक सीनियर ने कहा था, हमारे मीडिया के हैडलाइंस विदेशों से तय होते हैं। हम उनके हाथों की कठपुतलियां बन कर रह गये हैं। नव-साम्राज्यवाद का एक पूंजीवादी चेहरा ये भी है। जहां तक दलाली का सवाल है, चर्चा थी कि एक नये-नवेले चैनल के मालिक ने अपने पत्रकारों (पढ़ें – नौकरों) से कहा कि रोज़ाना 5 हज़ार लेकर आओ, तो नौकरी बचेगी। क्या यह सच नहीं है?
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ख़बर में मिलावट करने वालों के ख़िलाफ़ कानून बनाने का जो शिगूफा “आउटलुक” के सम्पादक नीलाभ ने छोड़ा है, वह बेमतलब की बहस के अलावा कुछ नहीं है। इस देश में किसी भी चीज़ में मिलावट के लिए कानून हैं। क्या मिलावट रुकी? ख़बर में मिलावट करने वाले ही तो अन्य चीजों में मिलावट के ख़िलाफ़ दिन रात चीख़ते रहते हैं। लेकिन उनकी सुनता कौन है? सुनें भी क्यों जब वह ख़ुद मिलावटखोर हैं। कपिल सिब्बल ने शायद ग़लत नहीं कहा था कि मीडिया के छापने या नहीं छापने से कोई फर्क नहीं पड़ता। वाकई अब ख़बरों के छपने से आसमान नहीं टूट पड़ता।
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मौजूदा पत्रकारिता पर शोक मनाने के इसी दौर में वैसी पौध भी पल-बढ़ और पसर रही है जिसे चांदी की थाली में खाने का शौक नहीं है। उसे इस दुनिया का सबसे महंगा राजमहल जैसा घर, चार मोटरगाड़ियां, कम से कम एक हवाई जहाज और पांच लाख रुपए महीने की आमदनी की जरूरत नहीं है, जिसके लिए स्विट्जरलैंड के बैंकों की शरण लेनी पड़ती है। इस पौध को पता है कि इतना सब कुछ हासिल करने के लिए सबसे पहले अपनी रीढ़ को बाजार के शहंशाहों के पास गिरवी रखना पड़ता है।
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प्रख्यात अमेरिकी पत्रकार जेम्स कैरी ने कहा था कि हमलोगों ने ऐसी पत्रकारिता विकसित कर ली है, जिसमें हम हर चीज को जनता के नाम पर सही ठहराते हैं। पर इस पत्रकारिता में जनता की कोई भूमिका नहीं होती सिवाय दर्शक, श्रोता या पाठक बनने के। जेम्स कैरी की बातों को विस्तार दिया जाए तो यह स्पष्ट है कि मीडिया जो कुछ भी परोसती है, उसे तय करने में जनता की कोई भूमिका नहीं होती है। हर मीडिया संस्थान में मोटी पगार पाने वाले बड़े ओहदों पर बैठे लोग ही यह तय कर लेते हैं कि क्या दिखाना है या प्रकाशित करना है और क्या नहीं दिखाना है या नहीं प्रकाशित करना है। या यों कहें कि कितनी मिलावट करनी है। वे स्वार्थ साधने के वास्ते लिये गये निर्णयों को जनता की इच्छा कह कर सही ठहरा दिया जाता है।



