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Articles tagged with: rajendra yadav

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[1 Aug 2010 | 11 Comments | ]
स्‍टार न्‍यूज पर हुई बहस, विभूति ने कहा सब फासिस्‍ट हैं!

अविनाश ♦ एंकर ने विभूति से सवाल किया कि कुछ लोग छिनाल शब्द का प्रयोग करने के लिए आपसे इस्‍तीफे की मांग कर रहे हैं। इस पर विभूति ने कहा कि एक पाठक, एक लेखक होने के नाते उन्‍हें अपने समकालीन लेखकों पर टिप्‍पणी करने का लोकतांत्रिक अधिकार है। और इसके लिए इस्‍तीफे की मांग एक फासिस्‍ट मांग है। इसकी चुटकी लेते हुए मैत्रेयी पुष्‍पा ने कहा कि हां, अपने समय की लेखिकाओं को गाली देने का, छिनाल कहने का अधिकार!!! हमारा सिर्फ इतना कहना है कि अगर अपने समकालीन लेखकों पर ऐसी टिप्‍पणी करने का पाठक और लेखक होने के नाते विभूति नारायण राय को लोकतांत्रिक अधिकार है, तो वे पाठक और लेखक बने रहें – वर्धा के वीसी कैसे बने रहेंगे। उन्‍हें तत्‍काल प्रभाव से बरखास्‍त करना चाहिए।

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[1 Aug 2010 | 35 Comments | ]
विभूति और आलोक मेहता ने हिंदी को शर्मसार किया

विनीत कुमार ♦ अभी तक हमने किसी भी पत्रकार को इस तरह सार्वजनिक रूप से बेआबरू होते नहीं देखा है। ऑडिएंस के वाजिब गुस्से से आप इस बात का अंदाजा लगा सकते हैं कि सत्ता के गलियारों में चमकनेवाले सफल पत्रकार और होते हैं और जो लोगों के दिलों पर राज करते हैं, वो और ही पत्रकार होते हैं। ऐवाने गालिब जैसे भरे सभागार में हमें एक शख्स भी ऐसा नहीं मिला, जिसने ये कहा कि अरे बैठ जाइए, मेहता साहब को बोलने दीजिए। ये अलग बात है कि उसी सभागार में आलोक मेहता के कूल्हे के नीचे काम करनेवाले नई दुनिया के पत्रकार भी मौजूद थे और मीडिया की नामचीन हस्तियां भी। एक भी स्वर, एक भी हाथ आलोक मेहता के पक्ष में न सही, बोलने देने के आग्रह के लिए नहीं उठे।

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[1 Aug 2010 | 7 Comments | ]
हिंदी के ‘शवों’ और ‘शावकों’ की पहचान

अभिषेक श्रीवास्तव ♦ स्‍वामी अग्निवेश ने हंस की गोष्‍ठी में एक संदर्भ का जिक्र किया था। जब हेमचंद्र पांडे की लाश को दिल्‍ली लाया गया, तो यह सवाल उठा कि आखिर उस लाश को रात भर रखेगा कौन। स्‍वामी अग्निवेश ने इस संदर्भ में बड़े मार्के की बात कही, जो जितनी सामान्‍य है, उतनी ही प्रासंगिक भी- तमाम लोगों ने शव को अपने यहां रखने से मना कर दिया। ‘ऐसे ही समय में लोगों की पहचान होती है।’ स्‍वामी जी ने भले ही शिष्‍टतावश उन लोगों के नाम नहीं गिनाये जिनकी ‘पहचान’ हेम पांडे के शव ने करा दी थी, लेकिन हंस की गोष्‍ठी में शनिवार को जो कुछ भी हुआ, उसने हिंदी साहित्‍य और पत्रकारिता में कुछ ‘शवों और शावकों की पहचान’ करा दी।

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[31 Jul 2010 | 46 Comments | ]
हंस की गोष्ठी में हंगामा, चोर जैसे भागे विभूति-आलोक

डेस्‍क ♦ हंस की सालाना गोष्ठी हंगामेदार रही। पूर्व आईपीएस अधिकारी और महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय और नई दुनिया के संपादक आलोक मेहता चोर की तरह भागे। भाषण प्रक्रिया खत्म होने के बाद जब सवाल-जवाब का सिलसिला जैसे ही शुरू हुआ, विभूति नारायण राय मंच से उठ कर जाने लगे। जिसके बाद श्रोताओं ने उनसे रुकने की अपील की। मंच का संचालन कर रहे आनंद प्रधान ने भी उनसे रुकने की अपील की। लेकिन विभूति नहीं रुके। उनको तेजी से दरवाजे की तरफ़ बढ़ता देख श्रोताओं ने कहा कि हमने आपको इतनी देर तक सुना है, आपको हमारे सवालों का जवाब देना चाहिए। मगर विभूति के कदम रुके नहीं, बल्कि उनकी रफ़्तार और तेज हो गयी…

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[31 Jul 2010 | 9 Comments | ]
मैं राज्‍य की हिंसा का समर्थन करूंगा : विभूति ना राय

डेस्‍क ♦ विभूति नारायण राय ने कहा कि जो लोग कहते हैं कि देश में इन दिनों अघोषित आपातकाल है, वे अतिरंजना में जी रहे हैं। अगर ऐसा होता, तो संसद से चार-पांच किलोमीटर की दूरी पर हम इस तरह भारतीय राज्‍य को कोस नहीं रहे होते। विभूति नारायण राय ने कहा कि राज्‍य की अपनी निर्मिति ही अलोकतांत्रिक है। राज्‍य असहमति का अधिकार नहीं देता। उन्‍होंने कहा कि कोई राज्‍य इतना लोकतांत्रिक हो ही नहीं सकता कि वो अपने अस्तित्‍व के खिलाफ हथियारबंद संघर्ष को इजाजत दे दे। विभूति नारायण राय ने कहा कि मैं हिंसा का समर्थक नहीं हूं – लेकिन अगर मुझे चुनना होगा तो मैं राज्‍य की हिंसा का समर्थन करूंगा। क्‍योंकि हम इससे तो मुक्‍त हो सकते हैं, माओवाद की हिंसा से कभी मुक्‍त नहीं हो सकते।

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[28 Jul 2010 | 23 Comments | ]
यह विचारों का लोकतंत्र नहीं, बौद्धिक तानाशाही है!

राजेंद्र यादव ♦ बुद्धिजीवियों का यह कौन सा आचरण है कि वे दूसरे पक्ष की बात सुनेंगे ही नहीं। यह विचारों का लोकतंत्र नहीं, बौद्धिक तानाशाही है। “मैं तुम्‍हारे विचारों को एक सिरे से खारिज करता हूं, मगर मरते दम तक तुम्‍हारे ऐसा कहने के अधिकार का समर्थन करूंगा।” यह कहा-बताया जाता है लोकतंत्र के पुरोधा वॉल्‍टेयर का। दूसरे को बोलने ही न दो, यह कैसा फासीवाद है? क्‍या हमारे तर्क इतने कमजोर हैं कि “दुश्‍मन” के सामने ठहर ही नहीं पाएंगे? इस वैचारिक तानाशाही का एक कुत्सित रूप कुतर्कों का पिंजड़ा खड़ा करना भी है। आप किसी भी विषय पर बात कीजिए, वे तर्क देंगे कि जब किसान हजारों की संख्‍या में आत्‍महत्‍याएं कर रहे हों, तब आप एसी कमरों में बैठकर एक फालतू मुद्दे पर मगजपच्‍ची कर रहे हैं – यह भयानक देशद्रोह है।

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[22 Jul 2010 | 2 Comments | ]
परिवर्तनकामी टोली ने सार्वजनिक किया राजेंद्र जी का पक्ष

परिवर्तनकामी टोली ♦ अरुंधती ने ‘हंस’ के जलसे में न जाने का फैसला सार्वजनिक करने से पहले राजेंद्र यादव से किसी तरह की पुष्टि नहीं की। अगर उन्होंने ये फैसला करने से पहले राजेंद्र यादव से एक बार बात कर ली होती या यह पता लगा लिया होता कि क्या विश्वरंजन को भी बुलाया गया है, तो उनका भ्रम तभी दूर हो जाता। इस संवादहीनता ने दो जनपक्षधर व्यक्तित्वों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा की। अरुंधती और राजेंद्र यादव की जनपक्षधरता असंदिग्ध रही है। भ्रम की ये स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण है। अरुंधति राय का जो कद है और जो विश्वसनीयता है, उसमें उन्हें सुनी-सुनाई बातों के आधार पर इस तरह का कोई फैसला सार्वजनिक करने से बचना चाहिए। राजेंद्र यादव का कहना है कि वे अब भी चाहते हैं कि अरुंधती इस कार्यक्रम में शामिल हों।

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[15 Jul 2010 | 5 Comments | ]
अरुंधती के इस फैसले से फर्क किसको पड़ेगा नीलाभ जी!

समरेंद्र ♦ राजेंद्र यादव पर आरोप लगाने वाले नीलाभ जैसे लोगों की यही सीमा है। वो इससे ऊपर सोच ही नहीं सकते कि किस कार्यक्रम में किसने किसके साथ मंच साझा किया? और कौन कहां बुलाने पर भी नहीं पहुंचा? यही वजह है कि वो हमेशा इस बात को लेकर सतर्क रहते हैं कि उनकी छवि खराब नहीं हो। उनकी सारी की सारी कवायद सामाजिक छवि को सहेजने में लगी रहती है। शायद उनकी सियासत और दुकानदारी इसी से चलती है! नीलाभ जैसों की कुत्सित और संकीर्ण मानसिकता के कारण ही आज वामपंथ का इतना बुरा हाल है। आज वामपंथी दलों में जितनी गुटबाजी है और जितने धड़े हैं, उतने किसी भी विचारधारा में नहीं है।

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[15 Jul 2010 | 21 Comments | ]
हंस की गोष्‍ठी नहीं भी होगी तो क्‍या फर्क पड़ जाएगा

अविनाश ♦ कहीं जाकर या नहीं जाकर, किसी को सुन कर या नहीं सुन कर हम अपनी प्रतिबद्धताएं, अपने आचरण की शुद्धता साबित कर सकते हैं – लेकिन इस सबूत से कुछ फर्क नहीं पड़ता। मैं अभी भी इस बात पर कायम हूं कि अरुंधती मान जाएं और विश्‍वरंजन छत्तीसगढ़ से चल कर हंस की गोष्‍ठी में आ जाएं तो पूरे आंदोलनी हिलोर का एक नया संदेश प्रसारित किया जा सकता है। विश्‍वरंजन को घेर कर, उनको सामने खड़ा करके हत्‍यारा बता कर, उनके सामने उनका पुतला जला कर, उन्‍हें जूतों की माला पहना कर। और ऐसा करते हुए अगर उस वक्‍त तमाम बुद्धिजीवियों की गिरफ्तारी हो जाती है – तो इस भारतीय स्‍टेट को एक्‍सपोज करने का कितना आसान अवसर आपके पास है, ये आप ही तय कीजिए।

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[26 May 2010 | 18 Comments | ]
राजेंद्र यादव ने भी अजित राय को हंस से निकाला

डेस्‍क ♦ विवादास्‍पद सांस्‍कृतिक पत्रकार अजित राय हंस की गली से भी निकाल बाहर किये गये हैं। अब तक वे हंस के सांस्‍कृतिक प्रतिनिधि थे और उनका नाम इसी रूप में हंस में छपा करता था। लेकिन मौजूदा विवाद से नाराज संपादक राजेंद्र यादव ने उन्‍हें उनकी इस भूमिका से वंचित कर दिया है। यानी जनसत्ता के बाद हंस का झटका भी अजित राय के लिए बड़ा है – हालांकि राजेंद्र यादव के मुताबिक इसकी सूचना अजित राय को देने पर उनकी प्रतिक्रिया थी कि इससे उन्‍हें कोई फर्क नहीं पड़ता, वे हंस से ऊपर उठ चुके हैं। हंस का ताजा अंक बाजार में आ गया है और अजित राय का नाम उसमें नहीं है।