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Articles tagged with: rajendra yadav

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[2 Feb 2010 | 30 Comments | ]
न्‍याय के साथ खड़े हुए राजेंद्र यादव, अपने दस्‍तख़त दिये

डेस्‍क ♦ संजीव ने मिलते ही कहा कि आपलोग बहुत गलत काम कर रहे हैं। अभी अभी हुए एक कथा आयोजन में वे कुलपति विभूति नारायण राय के मेजबान बने थे। संजीव जनसंस्‍कृति से जुड़े कथाकार हैं और पाठकों के बीच उनका सम्‍मान असंदिग्‍ध रहा है। लेकिन अपने समय के नायकों की पतित गाथा का ऐसा दृश्‍य हमें देखने को मिल रहा है – जब दलित छात्रों के आंदोलन पर हेय नज़र रखने और चोर गुरु के साथ षड्यंत्र करके एक योग्‍य गुरु को वर्धा से निकालने की मुहिम में हमारे कथाकार-रचनाकार एक बदबूदार वीसी के साथ खड़े हैं। वहीं राजेंद्र यादव ने वहां हुए अन्‍याय के खिलाफ अपने हस्‍ताक्षर हमें दिये।

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[21 Sep 2009 | 6 Comments | ]
प्रभा खेतान को गुज़रे एक साल हो गया, किसी ने याद किया?

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी ♦ प्रभाजी की पारि‍वारि‍क पृष्‍ठभूमि, स्‍त्रीवाद और लेखन के बीच तीन-तेरह का रि‍श्‍ता था। इस रि‍श्‍ते को उन्‍होंने बड़े ही सदभाव के साथ नि‍भाया। इस संबंध की खूबी यह थी कि‍ उनके वर्गीय नजरिये के साथ वि‍चारधारात्‍मक प्रति‍बद्धता कभी आड़े नहीं आयी। प्रभाजी मारवाड़ी परि‍वार के धनि‍यों के साथ सादगी और ठाट के साथ मि‍लती थीं। उनके पास पैसा काफी था लेकि‍न अमीरों में वे पैसे के कारण नहीं लेखन के कारण खासतौर पर स्‍त्रीवादी उपन्‍यास लेखि‍का के रूप में सम्‍मान के साथ स्‍वीकृत थीं। मारवाड़ी अमीर उनके लेखन की संपदा, चमक और वैभव के सामने फीके नजर आते थे। उनके इस फीकेपन को वे आनंद भाव से लेती थीं। प्रभाजी की सबसे बड़ी शक्‍ति‍ उनकी दौलत नहीं, लेखन था।

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[14 Sep 2009 | One Comment | ]
साइबर स्‍पेस में घायल प्रभाष जोशी, राजेंद्र यादव

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी ♦ नेट लेखन में नि‍ज-संदर्भ, विडंबना, प्रामाणि‍कता और पुनरावृत्ति पर सबसे ज्‍यादा लि‍खा जाता है। यह उत्तर आधुनि‍क खेल यहां पर भी चला। जो आलोचनात्‍मक टि‍प्‍पणि‍यां आयीं वे यथार्थ का अति‍क्रमण करने वाली थीं।‍ यथार्थ में इन दोनों लेखकों ने जो कहा उसकी इनके लेखन के सांस्‍कृति‍क संदर्भ में मीमांसा की गयी। प्रभाष जोशी-राजेंद्र यादव के भक्‍त चाहते थे, अतीत को अतीत रहने दो। उसे अब सामने लाने से क्‍या लाभ जबकि‍ अन्‍य कह रहे थे जब बहस उनके लेखन के सांस्‍कृति‍क संदर्भ पर हो रही है तो हमें उनके अतीत और व्‍यवहार को भी वि‍वादि‍त गद्य के साथ जोड़ कर देखना चाहि‍ए। वे इन दोनों लेखकों के बहाने वर्तमान में प्रेस और समाज की दशा पर भी बातें कर रहे थे।

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[4 Sep 2009 | 37 Comments | ]
साहि‍त्‍य लीला बंद करो राजेंद्र यादव

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी ♦ वे साहि‍त्‍य लीला करते रहते हैं। वे साहि‍त्‍य के लीला कृष्‍ण हैं। उनके पास साहि‍त्‍य गोपों की टोली है। हिंदी साहि‍त्‍य के सभी मैदान उनके स्‍वामि‍त्‍व में हैं। उनके पास साहि‍त्‍यसेनानि‍यों की लंबी चौड़ी फौज है। वे सरस हैं। उदार हैं। लेकि‍न दुर्भाग्‍य से इति‍हास मूर्ख हैं। कल ही उन्‍होंने अपने (अ)ज्ञान का फि‍र से पि‍टारा खोला है और उसमें से जो तथ्‍य और वि‍चार व्‍यक्‍त कि‍ये हैं, वे हिंदी के लि‍ए चिंता की चीज हैं। देशकाल डाट कॉम में उन्‍होंने जो कहा है, वह हिंदी की साहि‍त्‍यि‍क पत्रकारि‍ता के संपादक की शोचनीय दशा का जीता-जागता प्रमाण है।

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[31 Aug 2009 | 9 Comments | ]
ये 21वीं सदी में भी जातीय श्रेष्‍ठता की बात करते हैं :-)

दिलीप मंडल ♦ ये बेखबर लोग अगर अपनी बात खुद तक ही रखें तो हमें धेले भर की परवाह नहीं। लेकिन वो बोल रहे हैं और बेहद बेतुका और बेहूदा बोल रहे हैं। ये दोनों लोग ऐसी बातें बोल रहे हैं, जो उनके चेलों के अलावा हर किस को अखर रही है। मैं एक भी ऐसे आदमी को नहीं जानता, जो जातिवाद के समर्थन में उनके विचारों का कम से कम सार्वजनिक तौर पर समर्थन करें। इन दोनों महान लोगों के चेलों के पास भी बचाव में देने को कोई तर्क नहीं हैं। आखिर इनके चेलों में से भी कई ने जाति से बाहर शादी की है। उन्हें मालूम है कि उनकी अगली पीढ़ी क्या करने वाली है। हर जाति के लोगों को ये लेखन आउटडेटेड और सड़ा हुआ लग रहा है।

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[23 Aug 2009 | One Comment | ]
मेरे खयाल से बस इतना ही काफी है कि मेरा घर एक पूरी दुनिया है

डेस्‍क ♦ शनिवार, 22 अगस्‍त 2009 को अक्षर प्रकाशन, दरियागंज में रामलखन यादव की शोकसभा में उन्‍हें जानने, न जानने वाले बहुतेरे रचनाकार आये। राजेंद्र यादव, हरिनारायण, अर्चना वर्मा, महेश दर्पण, श्रीधरम आदि ने रामलखन से जुड़ी यादों को साझा किया। रामलखन के मित्र अविनाश मिश्र खामोश रहे। कुछ कह नहीं पाये। शोकसभा में वीरेंद्र कुमार बरनवाल, भालचंद्र जोशी, बलविंदर सिंह, दिलीप मंडल, समरेंद्र, अजय नावरिया, रमेश ऋतंभर, अच्‍युतानंद मिश्र मौजूद थे। शोकसभा ख़त्‍म होते-होते पंकज विष्‍ट और योगेंद्र आहूजा भी पहुंचे। कवि नीलाभ ने उनकी कुछ कविताओं का पाठ किया।

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[13 Aug 2009 | 35 Comments | ]
हिंदी के टॉप तीन कथाकारों और कवियों के लिए पाठक सर्वे

गीताश्री ♦ आउटलुक हिंदी ने आपके विवेक को हमेशा सर आंखों पर रखा है। अन्य विषय के साथ आप साहित्य के भी सुधी सहृदय पाठक हैं। यह हमारे कथा-कहानी, कविता और साहित्य संबंधी स्तंभों की लोकप्रियता से स्पष्ट है। इस बार हम आपकी नब्‍ज़ टटोलना चाहते हैं। आपको जज बनाना चाहते हैं ताकि जान सकें कि सच्चे अर्थों में जनमानस में किस कवि और कथाकार की लोकप्रियता कैसी और कितनी है। आपकी सुविधा के लिए हमने समकालीन कवियों और कथाकारों के चुनिंदा नामों की अलग-अलग सूची बना दी है ताकि आप नामों की भूलभुलैया में खो न जाएं। इस सूची के बाहर भी कोई नाम आपको सर्वश्रेष्ठ लगे, तो वह भी आप हमें भेज सकते हैं। यह सूची हमने आपकी सुविधा के लिए बनायी है।

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[5 Aug 2009 | 5 Comments | ]
वे बेख़बर ही सही, इतने बेख़बर भी नहीं

रंगनाथ सिंह ♦ मैंने अपने चार साल के दिल्ली प्रवास में सिर्फ दो साहित्यिक समारोह में शिरकत की है, जिनमें हंस का समारोह ही दूसरा समारोह था। मैं कहानी, कविता भी नहीं लिखता की हिंदी साहित्य के माफियाओं के आशीर्वाद की मुझे ज़रूरत पड़े। मैं जिस सेंटर में हूं, वहां हिंदी साहित्य का इकलौता पृष्ठपेषक मैं ही हूं। जिस दुनिया में मेरे सरोकार हैं, वहां नामवर सिंह या सुधीश पचौरी जैसे लोग कोई वजूद नहीं रखते। उस दुनिया में हम सबका एक ही नाम है, हिंदी वालाज़। इस अपमानजनक जुमले की चोट खाकर मुझमें नान-हिंदीवालाज़ (मैंने उन्हें यही नाम दिया है) का सामना करने की हिम्मत बढ़ती है, घटती नहीं।

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[4 Aug 2009 | 6 Comments | ]
मेरी पीठ को एमसीडी की दीवार मत बनाइए प्‍लीज़!

विनीत कुमार ♦ नामवर सिंह जैसा आलोचक युवा का मतलब राहुल का मुहावरा इस्तेमाल किये बिना समझ नहीं पाते और युवा रचनाकार का मतलब सिर्फ अजय नावरिया से लगा लेते हैं। मैं अपनी उसी मानसिकता पर तो बात कर रहा था, जहां हिंदी समाज एक बड़े संदर्भ को कैसे संकुचित करता जाता है। अरुंधति राय ने भाषा के सवाल पर जो बात कही, उसकी चर्चा न करते हुए हम आलोचक नामवर सिंह की चुटकुलेबाज़ी में फंस कर रह जाते हैं क्योंकि उसमें हमारी व्यक्तिगत स्तर पर की जानेवाली चुगली का सार्वजनिक रूप दिखायी दे रहा था, हमें मज़ा आ रहा था। क्या हम साहित्य पढ़ते हुए चुगलखोर होते चले जाते हैं।

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[3 Aug 2009 | 8 Comments | ]
एंचोर पाका… साहित्यिक चमचे और चमचों के आका

रंगनाथ सिंह ♦ विनीत, आपने अपने लेख में व्यक्तिवाद नामक शब्द का खुल कर प्रयोग किया है। व्यक्तिवाद क्या है – फिलहाल इस पर बहस नहीं करूंगा लेकिन जिस एक व्यक्ति का नामवर सिंह ने मंच से कई बार नाम लिया, मेरी समझ से नामवर सिंह ने उसकी समूचे हिंदी जगत में फूलत-फलते तैल-संप्रदाय के युवा प्रतिनिधि के रूप में मंच पर विराजमान होने के कारण आलोचना की। अगर गांधी अहिंसा के प्रतीक, भगत सिंह प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में स्वीकार किये जा सकते हैं तो किसी को तैल-संप्रदाय के प्रतीक के रूप में स्वीकार करने में मुझे कोई आपत्ति नहीं है। प्रतीकों के सहारे बात रखना आसान हो जाता है।