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ओबीसी साहित्‍य : जिनकी सत्ता, उनका साहित्‍य 3

ओबीसी साहित्‍य : जिनकी सत्ता, उनका साहित्‍य

हरे राम सिंह ♦ वीरेंद्र कहते हैं‍ कि “ओबीसी साहित्य की परिकल्पना विवादास्पद और जोखिम भरा है।” हिंदी के बौद्धिकों में साहस की इतनी कमी क्यों है? हिंदी का पिछली एक सदी का इतिहास बताता है कि जोखिम नहीं उठाने के कारण ही हिंदी का विमर्श क्षेत्र सिकुड़ता गया है। समय ने “ओबीसी साहित्य” को जन्म दिया है। उसे रोकने का साफ मतलब यह हुआ कि हम हिंदी साहित्य के विकास को किसी न किसी रूप में रोक रहे हैं क्योंकि हमारे भीतर सवर्ण मानसिकता का “अहंकार” बैठा है। ओबीसी साहित्य को वर्ग के आधार पर और विषय वस्तु के आधार पर देखना अलग बात है। वीरेंद्र यादव यह पहले से ही कैसे अनुमान लगा बैठे कि ओबीसी साहित्य की पहचान जाति विशेष की पहचान तक सीमित होगी ?

सधी और तराशी हुई हैं तेजेंद्र शर्मा की कहानियां : राजेंद्र यादव

सधी और तराशी हुई हैं तेजेंद्र शर्मा की कहानियां : राजेंद्र यादव

प्रेस विज्ञप्ति ♦ कथाकार तेजेंद्र शर्मा ने जब अपने लिखे साहित्य को प्रवासी साहित्य कहे और माने जाने पर असहमति जतायी तो श्री यादव ने अपने वक्तव्य में कहा कि किसी भी लेखक को प्रवासी इसलिए नहीं कहा जाता कि उसे अपमानित करना है या अलग बिरादरी का दिखाना है, बल्कि इसलिए है क्योंकि हिंदी कहानी पच्चासों टुकड़ों में बंटी हुई है।

ऐवान-ए-गालिब में उस शाम पितामह भी पनिया गये थे… 4

ऐवान-ए-गालिब में उस शाम पितामह भी पनिया गये थे…

डेस्क ♦ अरसे बाद वेदव्‍यास का एक मेल आया, तो पता चला कि ये वे वेदव्‍यास नहीं हैं, जो पहले मोहल्‍ला में महाभारत लिखा करते थे और बाद में पारिश्रमिक की लालसा में लखनऊ से प्रकाशित होने वाले किसी मायावी अखबार जनसंदेश टाइम्‍स में लिखने लगे। मॉडरेटर ने उन वेदव्‍यास से तस्‍दीक भी करनी चाही कि आईडी बदल ली क्‍या – और जब संदर्भ सुना तो उनके पैरों तले से जमीन खिसक गयी।

हंस के 25 साल पर दिखा कि क्‍यों हिंदी दोयम दर्जे की है! 34

हंस के 25 साल पर दिखा कि क्‍यों हिंदी दोयम दर्जे की है!

शुभम श्री ♦ इस कार्यक्रम का अच्छा न होना सिर्फ अक्षर प्रकाशन, राजेंद्र यादव या अजय नावरिया की असफलता नहीं है, यह हिंदी साहित्य की भी असफलता है। यही वह जगह है, जहां से हिंदी को दोयम दर्जे का मानने की जड़ें मजबूत होती हैं।

जवान हंस का पनछोट जन्मदिन, नावरिया से नामवर तक 3

जवान हंस का पनछोट जन्मदिन, नावरिया से नामवर तक

ब्रजेश कुमार झा ♦ हंस ने अपने 25 साल पूरे करने पर गंभीर गोष्ठी की कल्पना की थी। भूमिका तो राजेंद्र यादव ने ऐसी ही बांधी थी। हंस पत्रिका ने “साहित्यिक पत्रकारिता और हंस” विषय पर बोलने के लिए प्रो नामवर सिंह से कहा था। वे आये। बोले भी। पर उक्त विषय पर कोई बात नहीं की। कुछ चुटकियां लीं।

उस शाम ऐवाने-गालिब में सब थे, हम भी थे… 3

उस शाम ऐवाने-गालिब में सब थे, हम भी थे…

रंगनाथ सिंह ♦ नावरिया के मंच पर आने के साथ ही हंस के कार्यक्रम की गत बिगड़नी शुरू हो गयी। अपने भौंडे मंच-संचालन से नावरिया ने श्रोताओं को इतना अधिक पका दिया कि लोग उनके खिलाफ हूटिंग करने लगे। और अंत में जब नामवर जी के बोलने की घोषणा करने के नाम पर नावरिया सस्ती-चापलूस बयानबाजी करने लगे, तो लोगों ने सामूहिक रूप से हूटिंग कर दी।

हंस की गोष्‍ठी में नहीं जमा रंग, नामवर भी साधारण बोले 50

हंस की गोष्‍ठी में नहीं जमा रंग, नामवर भी साधारण बोले

विनीत कुमार ♦ हंस जैसी पत्रिका के 25 साल के इतिहास को इतने लिजलिजे और पनछोट तरीके से याद किया जाएगा, ये देख-सुनकर भारी निराशा हुई। हम हंस की रजत जयंती कार्यक्रम से लौटकर सदमे में हैं।

हंस के पचीस साल पूरे, आज दिल्‍ली में जुटेगा हिंदी समाज 4

हंस के पचीस साल पूरे, आज दिल्‍ली में जुटेगा हिंदी समाज

डेस्क ♦ राजेंद्र यादव के संपादन में हंस अपने प्रकाशन के पचीस वर्ष पूरे कर चुकी है। हिंदी समाज ही नहीं, पूरे देश और देश की तमाम भाषाओं के लिए यह एक गौरवपूर्ण घटना है। हंस की रजत जयंती के अवसर पर 31 जुलाई, यानी कल शाम पांच बजे ऐवाने गालिब सभागार में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया है।

एक दलित लेखक के सच को गल्‍प मानने का नामवरी हठ 14

एक दलित लेखक के सच को गल्‍प मानने का नामवरी हठ

दिलीप मंडल ♦ एक तरफ तो लेखक यह कह रहे हैं कि मैंने अपना और समाज का यथार्थ इसमें रखा है, लेकिन आलोचक और महान लोग इसमें कुछ और ही ढूंढ निकालते हैं। रामशरण जोशी, राजेंद्र यादव और खासकर नामवर सिंह इस बात पर अड़े रहे कि नहीं, यह आत्मकथा नहीं है। यह तो “कथाकृति” है। एक “उपन्यास” है, “सर्जनात्मक कृति” है, “वर्णनात्मक कृति” है। सब कुछ है लेकिन वास्तविक जीवन कथा नहीं है। साथ में यह सलाह भी दी कि दलितों की रचनाएं ऐसी ही होनी चाहिए, जिसमें स्थितियों के प्रति गुस्सा न हो। तुलसी राम को जोशी जी, यादव जी और सिंह जी इस बात के लिए मुबारकबाद देते हैं कि उनकी रचना में किसी के प्रति क्रोध नहीं है, स्थितियों के प्रति गुस्सा नहीं हैं।

गोया तालिबानी होना कोई आलू का अचार होना है… 17

गोया तालिबानी होना कोई आलू का अचार होना है…

अरविंद शेष ♦ अगर राजेंद्र यादव मानते हैं कि स्त्री और दलित इस समाज के वंचित और शोषित तबके रहे हैं तो शोषण के वे सूत्र क्या रहे हैं और विचार से लेकर भाषा और व्यवहार तक में शोषण और वंचना का यह सामाजिक मनोविज्ञान किस-किस भेस में छिपा अपना काम करता रहता है? क्या महिलाओं का मामला सचमुच उतना परम पावन नहीं है कि कोई जब चाहे उनके ‘सम्मान’ में उन्हें ‘निंफोमेनियाक कुतिया’ या ‘छिनाल’ कह दे? क्या इसके बाद अब वे यह कहना चाहेंगे कि अगर कोई ‘चोर-चमार’ या ‘भंगी कहीं के’ जैसा (आपराधिक) जुमला उछालता है तो इसके बदले उसकी आरती उतारी जानी चाहिए और इसके लिए कोई हाय-तौबा मचाने की जरूरत नहीं?