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Articles tagged with: rajya sabha

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[22 Dec 2009 | 2 Comments | ]
माननीय महोदय, इंटरनेट पर पोर्नोग्राफी बंद करवाएं…

राम प्रकाश ♦ महोदय, इंटरनेट पर बढ़ रही नग्नता (पोर्नोग्राफी) एक अत्‍यंत गंभीर मसला है। यह अश्‍लीलता भारतीय जीवन मूल्यों एवं संस्कृति के नितांत विरुद्ध है। स्थिति यह है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी को भी उपहास का विषय बनाने से परहेज नहीं किया गया था। सभ्य समाज इंटरनेट के माध्यम से घर-घर तक पहुंच रही अश्‍लील सामग्री से व्यथित एवं चिंतित है। इस पोर्नोग्राफी का न केवल बच्चों पर कुप्रभाव पड़ रहा है, अपितु समस्त समाज में बुराई फैल रही है। भारत के कई तटवर्ती राज्यों एवं महानगरों में सेक्‍स पर्यटन के अभिप्राय से विदेशी निरंतर आ रहे हैं। इतना पानी सिर से गुजर गया है कि अब इंटरपोल अपने 188 सदस्य देशों के सहयोग से ऐसी वेबसाइट ब्लॉक करने तथा उन्हें तैयार करने वालों का पता लगाने की योजना बनाने की सोच रही बतायी जाती है।

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[16 Dec 2009 | No Comment | ]
महोदय, क्‍या जोशी कमेटी की रिपोर्ट लागू होगी?

अंबिका सोनी ♦ 1997 में प्रसार भारती स्थापित की गयी। वह बिल्कुल एक autonomous organisation के रूप में स्थापित की गयी और क्‍या रूल्स बनाने हैं, क्‍या रिक्रूटमेंट रूल्स बनाने हैं, किस तरह से लोगों को भर्ती करना है, यह अब प्रसार भारती के अधिकारों के तहत आता है। वर्ष 2006 में एक ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स बनाया गया था। कुछ मुद्दे उनके सामने रखे गये थे, जिनमें यह मुद्दा भी था कि जो लोग 1997 में प्रसार भारती को सरकार की तरफ से भेजे गये थे, उनका क्‍या स्टेटस होना चाहिए? तो जीओएम ने यह तय किया था कि 5 अक्‍टूबर, 2007 तक जो लोग उनके ज़रिए प्रसार भारती में रिक्रूट किये गये या सरकार की तरफ से भेजे गये थे, उसके बाद किसको भर्ती करना है, कैसे vacancies भरनी हैं, यह प्रसार भारती को खुद तय करना है।

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[12 Dec 2009 | No Comment | ]
चलो संसद में चलते हैं… वहां भी सेल लगती है!

राज मोहिंदर ♦ 1958 में लोकसभा की 125 बैठकें हुईं और राज्यसभा की 91 हुईं, लेकिन वहीं 2008 में राज्यसभा व लोकसभा की केवल 46 बैठकें हुईं। हम अपने देश की दूसरे मुल्कों के साथ तुलना नहीं करते, क्‍योंकि हमारी समस्याएं दूसरे मुल्कों से ज़्यादा हैं। वे मुल्क प्रोग्रैस कर चुके हैं, लेकिन हमें अभी प्रोग्रैस करनी है। मेरा प्रश्न यह है कि 46 दिन तो गांवों में पंचायत ही बैठ जाती है, तो कहां पंचायत और कहां पार्लियामैंट! मेरा यह प्रोपोज़ल है कि साल में पार्लियामैंट की 150 बैठकें होनी चाहिए।

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[12 Dec 2009 | No Comment | ]
“रजिस्‍ट्री के बाद सरकार कब्‍ज़ा भी दिलाये”

राम नारायण साहू ♦ भारत में दो करोड़ से अधिक मुक़दमे ज़मीन या मकान संबंधी विवाद के बारे में विभिन्न न्यायालयों में लंबित हैं। यदि यह मानें कि एक-एक मुकदमे में कम से कम दो परिवार अर्थात दस व्यक्ति प्रभावित होते हैं, तो 100 करोड़ से अधिक आबादी वाले देश में 20 करोड़ से अधिक लोग संपत्ति विवाद की समस्या में जकड़े हैं। ज़मीनी विवादों के कारण आपसी झगड़े, मारपीट तथा हत्या जैसे गंभीर अपराध जन्म लेते हैं। साथ ही, रातोंरात धनवान एवं शक्तिशाली बनने के लिए भू-माफियागिरी का बढ़ता चलन सरकार एवं जनता दोनों के लिए गंभीर समस्या के रूप में उभरा है। इस समस्या से निपटने के लिए यदि सरकार गंभीर रूप से सोचे, तो जनता की बहुत सी समस्याएं स्वत: समाप्त हो सकती हैं।

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[11 Dec 2009 | 3 Comments | ]
“बचाने वाले, गिराने वाले, सब एक निकले”

अली अनवर ♦ जिसने इतना बड़ा अपराध किया है, उनको सज़ा मिलनी चाहिए, फांसी की सज़ा भी कम होगी, सज़ा मिलनी चाहिए। यहां किसी के पर्सनल लॉ से देश नहीं चलेगा, किसी की आस्था से देश नहीं चलेगा। देश चलता है संविधान से, कानून के राज से, रूल ऑफ लॉ से। इस मुल्क में जम्हूरियत है, प्रजातंत्र है। छह दिसंबर का जो हमला है, वह एक पुरानी मस्जिद कहाये जाने का मामला नहीं है, वह हमारी जो जम्हूरियत है, हमारा जो संविधान है, हमारे मुल्क की जो आत्मा है, उस पर यह हमला है। इसलिए हम कहते हैं कि कोई भी सज़ा हो, उसके लिए कम है। हम चाहते हैं, हमारी पार्टी की नीति है कि इस मसले का हल आज भी किसी की आस्था से, किसी के विश्वास से नहीं होने वाला है।

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[9 Dec 2009 | One Comment | ]
सांसद ने पत्रकारों की बात की, संसद ने अनसुना किया

डेस्‍क ♦ कुछ चीज़ें अनरिपोर्टेड रह जाती हैं। उन्‍हें अख़बारों में छापा नहीं जाता, टीवी में दिखाया नहीं जाता। दरअसल पूरे देश के मसले पर संवेदनशील दिखने वाले मीडिया के भीतर की अमानवीय दुनिया के बारे में कोई नहीं जान पाता। आपस की बातचीत में मधुर भंडारकर एक बार कह रहे थे कि वे न्‍यूज़ रूम पर एक फिल्‍म बनाना चाहते हैं। उनकी कई फिल्‍में आ गयीं, लेकिन न्‍यूज़ रूम अनकवर्ड रह गया। कभी कभी कुछ सांसद पत्रकारों के मुद्दे पर सिर हिलाते हैं, लेकिन मीडिया को तो छोड़ दीजिए, संसद और संसद का लीडर उसे इगनोर करना चाहता है। परसों की राज्‍यसभा की कार्यवाही पलटते हुए ऐसा ही एक नज़ारा पढ़ने को मिला।

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[9 Dec 2009 | 2 Comments | ]
यूएनआई के पत्रकारों को चार महीने से वेतन नहीं मिला

अली अनवर ♦ यूएनआई के 800 कर्मचारियों को 4 महीने से वेतन नहीं मिला है। महंगाई के जमाने में अगर एक महीना और आठ-दस दिन पगार में देर हो जाए, तो क्‍या हालत होती है, समझा जा सकता है। 1961 में पंडित जवाहर लाल नेहरू जी ने इस एजेंसी की स्थापना की थी। यह एजेंसी बहुत कम पैसे में या नाममात्र का शुल्क ले कर देश भर के तमाम अख़बारों व गवर्नमैंट के संस्थानों को निष्पक्ष न्यूज़ उपलब्ध कराती है। केंद्र सरकार ने DAVP की विज्ञापन दरों में इज़ाफा करके अख़बारों को मंदी से उबारने के लिए करोड़ों रुपयों की मदद की है, लेकिन UNI जो सहकारिता के सिद्धांत पर चलने वाली एक संस्था है, उसे सरकार मदद के रूप में एक कौड़ी भी नहीं दे रही है।

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[8 Dec 2009 | No Comment | ]
संतोष भारतीय पर कार्रवाई की मांग को लेकर हंगामा

डेस्‍क ♦ 8 दिसंबर की दोपहर राज्यसभा सदस्यों ने हंगामा खड़ा कर दिया। शून्यकाल के शुरू होते ही जद (यू) सांसद अली अनवर, राजद के राजनीति प्रसाद, एलजेपी के साबिर अली और भाकपा के अजीज़ पाशा के साथ कई सांसद चौथी दुनिया अखबार की प्रति लहराते हुए सदन के वेल में पहुंच गये। वे चौथी दुनिया के संपादक संतोष भारतीय के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का नोटिस जारी करने की मांग कर रहे थे। सदन में तब हंगामा मच गया, जब सांसद अली अनवर ने यह कहा कि संतोष भारतीय ने अपनी एक रिपोर्ट में राज्यसभा के सांसदों को नपुंसक बताया है। इस पर राज्यसभा के उपसभापति के रहमान खान ने यह मामला अभी सभापति जी के पास विचाराधीन होने की बात कही।

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[8 Dec 2009 | No Comment | ]
चौथी दुनिया और संतोष भारतीय को नोटिस

डेस्‍क ♦ चौथी दुनिया सप्ताहिक अखबार और इसके संपादक संतोष भारतीय के ख़िलाफ़ राज्यसभा में विशेषाधिकार हनन का नोटिस दिया गया है। नोटिस देने वाले सांसदों में अली अनवर (जदयू), अजीज पाशा (सीपीआई), राजनीति प्रसाद (आरजेडी) और साबिर अली (लोकजनशक्ति पार्टी) है। इन सांसदों ने उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति हामिद अली अंसारी से इस मामले में कार्रवाई की मांग की है। जिसके बाद उपराष्ट्रपति ने उन्हें भरोसा दिलाया कि चौथी दुनिया और इसके संपादक पर सख़्त कार्रवाई की जाएगी। चौथी दुनिया ने “रंगनाथ कमीशन की रिपोर्ट पेश न होना राज्यसभा का अपमान” शीर्षक से कवर स्टोरी छापी है। सांसदों को लगता है कि इस लेख से राज्यसभा का अपमान हुआ है।

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[14 Aug 2009 | 3 Comments | ]
शिक्षा का मौलिक अधिकार खैरात में बांटने की राजनीति

अजित सिंह ♦ राज्यसभा में 29 सदस्यों ने इस विधेयक के विरोध में अपना भाषण दिया लेकिन विडंबना यह है कि जनता के हितों के बारे में गंभीरता से विचार करने वाले इस सदन के एक भी सदस्य ने इस विधेयक के ख़िलाफ वोट देने का साहस नहीं जुटाया। इस विधेयक का नाम तो शिक्षा अधिकार विधेयक है, जिसके बारे में इसके पक्षधर कह रहे हैं कि यह 6-14 साल के बच्चों को शिक्षा का मौलिक अधिकार देता है, लेकिन वे बड़ी सफाई से इस बात को गोल कर देते हैं कि इस विधेयक के लागू होने के पहले तक सुप्रीम कोर्ट के उन्नीकृष्णन फैसले के आधार पर पहले से ही 0-14 वर्ष की आयु के बच्चों को शिक्षा का मौलिक अधिकार मिला हुआ है।