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पर्यावरण की नजर से गुजरात एक दु:स्‍वप्‍न है मोदी-भक्‍तो! 4

पर्यावरण की नजर से गुजरात एक दु:स्‍वप्‍न है मोदी-भक्‍तो!

रामचंद्र गुहा ♦ नरेंद्र मोदी के पर्यावरण संबंधी दावे दो ताजा घटनाओं से और ज्यादा समझ में आते हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री के उद्योगपति मित्रों में गौतम अडाणी खास हैं। अडाणी समूह पिछले डेढ़ दशक में खूब फला-फूला है। पर्यावरण मंत्रालय की एक विशेषज्ञ समिति ने पाया है कि मुंद्रा में अडाणी के बंदरगाह में कानूनी प्रावधानों और पर्यावरण के मापदंडों का उल्लंघन हुआ है। दलदली जंगलों के विनाश और समुद्री पर्यावरण के प्रदूषण की वजह से स्थानीय मछुआरे दरिद्रता की हालत में पहुंच गये हैं। विशेषज्ञ समिति ने अडाणी समूह पर 200 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाने की सिफारिश की है। जिस समिति ने यह जांच की थी, उसमें जानकार और निष्पक्ष विशेषज्ञ थे।

कॉरपोरेट कंपनियों के पे रोल पर खड़ा है भारतीय मीडिया! 2

कॉरपोरेट कंपनियों के पे रोल पर खड़ा है भारतीय मीडिया!

रामचंद्र गुहा ♦ पत्र-पत्रिकाएं कंपनियों के दिए हुए प्रचार के पर्चे इस तरह छापते हैं, जैसे वे निष्पक्ष खबरें हों। कई अखबारों ने तो बड़ी कंपनियों के साथ सुविधाजनक खबरों के बदले कंपनी के शेयर हासिल करने के समझौते किये हैं। पेड न्यूज तो एक सीधा, बल्कि खुला मीडिया भ्रष्टाचार है। निजी कंपनियां खबरों को बहुत महीन तरीके से भी तोड़ती-मरोड़ती हैं। 80 के दशक में चिपको और नर्मदा बचाओ आंदोलन काफी लोकप्रिय हुए थे, तब पर्यावरण के मुद्दों पर मीडिया कवरेज की बाढ़ आ गयी थी। अनिल अग्रवाल, कल्पना शर्मा, उषा राय, डेरिल डिमोंटे जैसे प्रतिभाशाली पत्रकारों ने पर्यावरण और उसके सामाजिक-आर्थिक पहलुओं पर बहुत लिखा। उदारीकरण के बाद कई अखबारों ने शायद विज्ञापनदाताओं के दबाव में पर्यावरण रिपोर्टिंग कम कर दी।