Articles tagged with: rangnath singh
मोहल्ला मुंबई, सिनेमा »
अब्राहम हिंदीवाला ♦ दिल्ली में ओसियान फेस्टिवल चल रहा है। फिल्म पढ़ने से ज़्यादा मज़ा देखने में देती है। मौका निकालें और कुछ फिल्में देख आएं। वैसे अपने यहां के फेस्टिवल आम दर्शकों को डराते हैं। उनका हाल लगभग शास्त्रीय संगीत की तरह होता जा रहा है। अगर आप बुद्धि, अर्थ बौर कर्म से संपन्न हो तो फेस्टिवल में आओ। मैंने कभी किसी मज़दूर को फेस्टिवल में नहीं देखा। क्यों भाई, कभी उन्हें भी तो निमंत्रित करें। और यह जो अंग्रेज़ी का कारोबार है। उसकी वजह से मिनिमम योग्यता के बाद ही आप फेस्टिवल की गतिविधियों को समझ सकते हैं। वरना मुंह बाये सुनते रहिए और औंघाते रहिए।
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राजेंद्र धोड़पकर ♦ कार्टून, दरअसल, सबवर्ज़न का एक माध्यम है। वह ह्यूमर के जरिये सीधे तौर पर समाज में जो कुछ घट रहा है उस पर विद्रोही दृष्टि डालता है। इर्रवरेंस युवावस्था का एक महत्वपूर्ण अंग है। उसे कार्टून रिफलेक्ट करता है। ह्यूमर के जरिये आप जनमानस की भावनाओं को ही अभिव्यक्त करते हैं। किसी को प्रधानमंत्री या अन्य प्रतिष्ठानों की आलोचना करनी हो, तो कार्टून उसका एक बेहद स्वस्थ और रचनात्मक माध्यम है। चूंकि सत्ता प्रतिष्ठान अपने को एक अति-गंभीर जामे में ढालते हैं। सत्ता के केंद्र की इमारत बेहद विशाल होती है। एक आम आदमी से दूरी कायम करने की कोशिश की जाती है। लेकिन है तो वह भी इंसान ही। ऐसे में ह्यूमर का सहारा लेकर कार्टून उन्हें आम आदमी के सामने लाकर खड़ा करता है।
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रंगनाथ सिंह ♦ संसदीय प्रणाली ऐसी प्रणाली है कि आप को हमेशा अपने राजनीतिक विपक्षी के साथ एक ही छत के नीचे बैठना पड़ता है। ऐसे में कौन किसके साथ किस मंच पर जाकर बैठता है, इसको अत्यधिक तूल देना कहीं न कहीं ब्राह्मणवादी शुचितावाद और अछूतवाद से प्रेरित दिखता है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया में आस्था जताने के बाद साझा मंच शेयर करने का सवाल उठाने वालों की राजनीतिक दृष्टि को समझना कठिन हो जाता है। एक ही मंच से कोई वामपंथी अपनी बात कहे और दक्षिणपंथी भी अपनी बात कहे, तो यह राजनीतिक रूप से सही है या ग़लत, इस पर एक खुली बहस होनी ही चाहिए।
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अभय ♦ विमल जैसी लेखिका का संस्मरण पुराण देख कर धक्का लगा। पुराण इसलिए कहा कि पुराण शैली में ही लेखिका ने अपनी राम कहानी कही है। इस सेमिनार में संस्मरण का भी सेशन भी रखा गया है, यह जानकर अच्छा लगा। लेखिका ने अपनी निजी खुन्नस को सिद्धांत का जामा पहनाना चाहा है। जो हर लिहाज से भर्त्सना योग्य है। कहते हैं कि हिंदी वाले निजी खुन्नस को जनम-जन्मांतर तक निभाते हैं। विमल थोराट ने इसे सही साबित कर दिया है। विमल थोराट को इतना तो समझना चाहिए कि संस्मरणों के आधार पर कुछ भी साबित किया जा सकता है। विमल थोराट से जुड़े संस्मरण सुनाने वाले भी ढेरों मिल जाएंगे।
नज़रिया, सिनेमा »
वरुण ♦ सिनेमा को लेकर मेरी सबसे सीधी समझ यही है कि सिनेमा जादू है। एक जादूगर सिर्फ हाथ से सिक्का निकाल कर भी हमें मुग्ध कर सकता है, अगर उसने जादू टूटने नहीं दिया तो, और वहीं दूसरा जादूगर हाथी ग़ायब कर के भी कभी-कभी वो सम्मोहन नहीं ला पाता कि हम उस पर भरोसा कर लें – बिना सोचे ही ताली बजाने लग जाएं। (रजत कपूर का सिनेमा हमेशा छोटा जादू दिखाता है, पर शानदार दिखाता है। यश चोपड़ा का सिनेमा हर बार हाथी ग़ायब करने की फिराक में रहता है, पर हर बार हम पहले ही जादू पकड़ लेते हैं – जादूगर के बगल में खड़ी लड़की इतनी नकली लगती है कि हमें पहले ही पता चल जाता है कि हमें उल्लू बनाया जा रहा है।
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रंगनाथ सिंह ♦ किसने अपने जीवन का कैसा उपयोग किया, इसका फैसला इतिहास करता है। किसी विचारधारा के बोधिवृक्ष के नीचे धूनी रमाये बैठे बाबा लोग नहीं तय करते कि किसके जीवन का प्राप्य क्या रहा है। न ही बाबा लोग बताएंगे कि नौजवानों को क्या करना चाहिए। लेकिन हिंदी के बाबाओं का दिल है कि मानता ही नहीं। एक बाबा कहता है जैसे मैं जीवनभर कागज पर क्रांति लाता रहा उसी तरह तुम भी लाओ! दूसरा बाबा कहता है कि चैरासी लाख योनियों बाद मनुष्य जन्म मिला है, इसे व्यर्थ के कामों में मत बर्बाद करो, मेरे साथ मोक्ष प्राप्त करने के लिए हिमालय चले चलो। तीसरा बाबा कहता है कि रोटी-भात की चिंता छोड़ो, मेरे संग कपालभाती करो, डैम-फिट हो जाओ। लाल-पीले-नीले-केसरिया तरह-तरह के बाबाओं से हिंदुस्तान पट गया है।
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विनीत कुमार ♦ आप हिंदी से जुड़ी किसी भी रचना को उठा कर देख लीजिए, उसमें बाज़ार के ख़िलाफ़ खड़े होने की बात अनिवार्य तौर पर मिल जाएगी। इसलिए अगर ये कहा जाए कि रंगनाथजी साहित्य के सच्चे पाठक और रक्षक हैं, तो मुझे नहीं लगता कि उन्हें कोई आपत्ति होगी। साहित्य पढ़ने का मतलब ही है कि आप बाज़ार के विरोध में खड़े हों, उन तमाम हरक़तों और ताक़तों के विरोध में खड़े हों जो कि साहित्य को बाज़ार के बीच ला पटकने के लिए आमादा हैं। जिस साहित्य को लोकमंगल की भावना से लिखा-पढ़ा जाता रहा, अगर वो लालाओं की जेब को गर्म करने लग गया है, तो हमें उसका हर हाल में विरोध किया जाना चाहिए।
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रंगनाथ सिंह ♦ गीताश्री समेत आउटलुक की पूरी टीम को यह समझ नहीं है कि इस तरह से टॉप तीन चुनना एक बचकानी हरकत है। यह सर्वे जीवित लोगों के बीच किया जाए, तब तो इसका दंश सीधा साहित्यकारों को झेलना पड़ता है। आउटलुक वालों को यह तो पता होना ही चाहिए कि टॉप तीन का फंडा सिर्फ उन्हीं चीज़ों पर लागू होता है, जो बाज़ारू हैं। यानी जो बेचने के लिए ही तैयार की जाती हैं… गीताश्री ने सूचीकरण की प्रक्रिया में एक रचनाकार पर जाने-अनजाने बड़ा ही मारक और तीखा व्यंग्य कर दिया है। इसके मासूम शिकार बने हैं विनोद कुमार शुक्ल। हिंदी साहित्य में सर्वाधिक चर्चित और प्रशंसित लेखकों में एक विनोद का नाम कवियों की सूची में है, लेकिन कथाकारों के बीच से ग़ायब है।
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रंगनाथ सिंह ♦ किसी रचनाकार का मूल्यांकन इस बात से किया जाता है कि जिन विषयों पर उसने अपनी कलम चलायी है, उसमें कितनी ईमानदारी दिखायी है। जिस तरह से आप जब आदिवासी मुद्दों पर काम करते हैं, तो उसी वक्त तमाम दूसरे मुद्दे को नज़रअंदाज़ कर रहे होते हैं, जो दूसरों की नज़र में आप के मुद्दे जितने ही ज़रूरी हैं। उसी तरह जब कोई लेखक किसी खास मुद्दे पर अपनी राय केंद्रित करता है तो सहज स्वाभाविक कारणों से दूसरे कई विषय उसकी निगाह की जद से बाहर हो जाते हैं। आपके प्रतिमान पर कसा जाए, तो बड़े-बड़े दलित चिंतक भी उसी अपराध के दोषी पाये जाएंगे, जिस अपराध के लिए आप प्रेमचंद को कठघरे में खड़ा करना चाहते हैं।
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रंगनाथ सिंह ♦ मैंने अपने चार साल के दिल्ली प्रवास में सिर्फ दो साहित्यिक समारोह में शिरकत की है, जिनमें हंस का समारोह ही दूसरा समारोह था। मैं कहानी, कविता भी नहीं लिखता की हिंदी साहित्य के माफियाओं के आशीर्वाद की मुझे ज़रूरत पड़े। मैं जिस सेंटर में हूं, वहां हिंदी साहित्य का इकलौता पृष्ठपेषक मैं ही हूं। जिस दुनिया में मेरे सरोकार हैं, वहां नामवर सिंह या सुधीश पचौरी जैसे लोग कोई वजूद नहीं रखते। उस दुनिया में हम सबका एक ही नाम है, हिंदी वालाज़। इस अपमानजनक जुमले की चोट खाकर मुझमें नान-हिंदीवालाज़ (मैंने उन्हें यही नाम दिया है) का सामना करने की हिम्मत बढ़ती है, घटती नहीं।


