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अजेय कुमार ♦ आज विभूति-कालिया का विरोध करने वालों में निश्चित तौर पर वे लोग भी शामिल हैं, जिनको उनसे अपने कोई पुराने हिसाब-किताब चुकता करने हैं। साहित्यकारों में और विशेषकर हिंदी के साहित्यकारों में आपसी गुटबाजी और द्वेष के कारण धड़ेबंदी की पुरानी परंपरा है। यहां अक्सर सौदेबाजी होती है और उसके आधार पर लोगबाग अपनी पोजीशन बदलते रहते हैं और कभी-कभी पता नहीं चलता कि कौन किसके खेमे में है। यह इस बहस का निंदनीय पहलू है। बेशक अधिकांश लेखिकाओं व लेखकों ने केवल सैद्धांतिक प्रश्नों को ही तरजीह दी है। परंतु एक भ्रष्ट व्यवस्था में आखिरकार सत्तासीनों का अपना एक खौफ होता है। इसी खौफ ने इस विवाद में कई जेनुइन लेखकों को चुप रहने पर विवश कर दिया है।
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अमर उजाला ♦ लगभग सवा सौ लेखकों के बहिष्कार के बाद भारतीय ज्ञानपीठ अपने निदेशक रवींद्र कालिया को नया ज्ञानोदय के संपादक पद से हटाने का विचार कर रहा है। नया ज्ञानोदय में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय के विवादास्पद साक्षात्कार को सबसे बेबाक बताने वाले कालिया के खिलाफ पहले ही वर्धा न्यायालय की ओर से नोटिस जारी है। भारतीय ज्ञानपीठ के इतिहास में यह घटना पहली बार हुई है, जब निदेशक को स्त्री अवमानना के आरोप पर नोटिस जारी हुआ। तीस सितंबर को न्यास की अगली बैठक में पत्रिका के भविष्य पर निर्णय लिया जाएगा।
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जानकी पुल ♦ कुलपति-ज्ञानोदय विवाद में अपने विरोध को और सख्त रूप देते हुए हिंदी के वरिष्ठतम लेखकों में एक कृष्ण बलदेव वैद ने भी भारतीय ज्ञानपीठ से अपनी किताबें वापिस ले ली हैं। वैद इस समय अमेरिका में हैं और वहां से ज्ञानपीठ के न्यासी आलोक जैन को लिखे एक पत्र में उन्होंने संस्था से पूर्ण असहयोग करने और वहां से प्रकाशित अपनी दोनों पुस्तकें वापिस लेने की सूचना दी है। उन्होंने लिखा है कि जब तक भारतीय ज्ञानपीठ लेखकों के प्रतिरोध का संतोषप्रद जवाब नहीं देती, मेरा उससे पूर्ण असहयोग रहेगा। इस असहयोग में यह भी शामिल है कि मैं ज्ञानोदय के लिए कुछ नहीं लिखूंगा और ज्ञानपीठ से प्रकाशित अपनी दो पुस्तकें – संशय के साये और डुबोया मुझको होने ने – मैं वापिस ले रहा हूं।
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डेस्क ♦ वर्धा जिला न्यायालय के फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट, धनंजय निकम ने भारतीय ज्ञानपीठ की पत्रिका “नया ज्ञानोदय” में छपे विभूति नारायण राय के साक्षात्कार में लेखिकाओं को दी गयी गाली मामले में राय, रवींद्र कालिया और साक्षात्कारकर्ता राकेश मिश्र के खिलाफ क्रिमिनल नोटिस जारी की है। 23 अगस्त के अपने ऑर्डर में निकम ने कहा कि सभी कागजात देखने के बाद तथा शिकायतकर्ता की दलीलें सुनाने के बाद यह मामला प्रथमदृष्टया ऐसा लगता है कि इस प्रकरण से महिला लेखिकाओं का अपमान हुआ है। अतः तीनों आरोपियों को आईपीसी की धारा 499, 500, 501 तथा 509 के तहत नोटिस किया जा सकता है। कालिया, राय और मिश्र को 20 सितंबर तब अपना जवाब रखना है।
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गीतांजलिश्री ♦ जिस तरह के ऊल-जलूल शीर्षक के सहारे नया ज्ञानोदय को लोकप्रियता दिलाये जाने का प्रयास किया जाता रहा है, और जिस छद्म भाषा में ये निंदनीय साक्षात्कार दिया गया है, दोनों उसी गहरे पैठी पुरुष-मानसिकता के प्रतिमान हैं, जो सदियों से चली आ रही है। न जाने दंभ में या कि बेवकूफी में, ये बातें कही गयीं, मगर इससे फर्क नहीं पड़ता। बल्कि इरादा क्या था/है, उससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता। चूंकि जब तक आपकी मानसिकता नहीं बदलेगी और औरत के प्रति नजर वही पुरानी चलेगी, तब तक आप उसके पक्ष में हों, या विपक्ष में, आपकी भाषा यही रहेगी। क्योंकि आपके पास कोई और भाषा है ही नहीं। मजाक, गंभीर विवाद, गाली, तारीफ, सबके लिए शब्द-संपदा एक होगी। भद्दे शब्द, बेहूदा शैली, फूहड़ अंदाज।
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डेस्क ♦ नया ज्ञानोदय के संपादक रवींद्र कालिया ने माफी मांगी है। इसी सिलसिले में उन्होंने एक चिट्ठी जनसत्ता को भेजी है। माफी इसलिए नहीं कि उनसे भूल हुई। वो छिनाल कांड से हिंदी साहित्य जगत को कितनी शर्मिंदगी होगी, इसका अंदाजा नहीं लगा सके। बल्कि माफी इसलिए कि विभूति नारायण राय का इंटरव्यू उन्होंने पढ़ा नहीं था और वो हू-ब-हू छप गया। मतलब साफ है, रवींद्र कालिया झूठ बोल रहे हैं। उनमें तो इतना नैतिक साहस भी नहीं कि गलती कबूल करें और संपादक होने का फर्ज अदा करें। वो अपना गुनाह दूसरों पर थोप रहे हैं। ठीक वैसे ही, जैसे विभूति नारायण राय ने गुनाह कबूल करने से पहले कहा था कि उन्होंने छिनाल शब्द का प्रयोग ही नहीं किया था। मतलब कालिया विभूति नारायण राय की तरह ही कायर भी हैं।
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विष्णु खरे ♦ जहां तक मेरा आकलन है, हिंदी साहित्य में राय-कालिया की प्रतिष्ठा यदि कभी थी भी तो आज फूटी कौड़ी की नहीं रह गयी है। लेकिन अधिकांश ऐसे प्राणी, उनके सरपरस्त और समर्थक गंडक-चर्म में वाराहावतार होते हैं। उन्हें न व्यापै जगत-गति। फिर जिस समाज में हत्यारे, बलात्कारी, डकैत, स्मग्लर, करोड़ों का गबन करने वाले संसद तक पहुंच रहे हों वहां हिंदी, जो खुद गरीब की जोरू की तरह सबकी भौजाई या साली है, भले ही उसका एक गांधी विश्वविद्यालय हो, उसकी लेखिकाओं को छिनाल कह देना तो एक होली की ठिठोली से ज्यादा कुछ नहीं। हिंदी साहित्य को अब ज्ञानोदय-ज्ञानपीठ से कुलटा, रखैल, समलिंगी, हिजड़ा, ‘निंफोमैनिएक’ सुपर-विशेषांकों और ग्रंथों की विकल प्रतीक्षा रहेगी।
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वर्धा स्ट्रिंगर ♦ दैनिक भास्कर को एक अनौपचारिक भेंटवार्ता के दौरान वरिष्ठ पत्रकार व प्रसार भारती की अध्यक्ष मृणाल पांडे ने महिला लेखिकाओं को छिनाल कहने के विभूति नारायण के विवादास्पद बयान पर लताड़ते हुए कहा कि जिस अंदाज में यह बात विभूति नारायण ने कही है, इससे उनके महिलाओं के बारे में असली नजरिये का पता चलता है। इसके पीछे लोकप्रियता हासिल करने की चाहत काम कर सकती है। विभूति नारायण के अपमानजनक बयान से हिटलर की याद आ गयी। जर्मन तानाशाह हिटलर ने कहा था कि औरतों को अपने अस्तित्व के बारे में नहीं सोचना चाहिए, यह मुझे चिड़चिड़ा देता है। मृणाल पांडे ने कहा कि दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि जिस व्यक्ति ने यह बयान दिया है, वह एक बेहद जिम्मेदारी वाले पद पर है।
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विष्णु खरे ♦ ‘जिन्हें देवता बर्बाद करना चाहते हैं पहले उन्हें विकल मस्तिष्क कर देते हैं’ वाली यूनानी कहावत के मुताबिक हमारे कुलपति का दिमाग लेखक होने के उनके वहम और वामपंथियों के अपनी वर्दी की कई जेबों में होने की खुशफहमी ने तो खराब कर ही दिया होगा, हिंदी कुलपति होने की सत्ता के कारण राष्ट्रव्यापी अधिकांश हिंदी प्राध्यापक-लेखक-प्रकाशक गुलामी जो उन्हें अनायास प्राप्त हो गयी उसने उन्हें विभूति-विभ्रम का आखेट बना डाला। हम अधिकांश हिंदी विभागों की गलाजतों को जानते ही हैं। स्वयं गांधी विवि में सैकड़ों पद और छात्रवृत्तियां हैं, एमलिट, एमफिल, पीएचडी के निबंध-प्रबंध हैं, अपने अपने रुझान के उपयुक्त छात्र-छात्राएं हैं, लेखक-लेखिकाओं को बुलाने के लिए बहाने, बहकावे-बहलावे हैं।
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एक छात्र ♦ हिंदी विश्वविद्यालय में बने नये भवनों से पानी टपक रहा है, पैसा सब गया इलाहाबाद। स्त्री अध्ययन विभाग में फर्जी नौकरी, डिग्री, सबका जुगाड़ है। अम्मा ने भी तो फर्जी अनुभव की धौंस से नौकरी पायी है। छात्र नेता गा रहा है – बिल्लो रानी कहे तो अपनी जान दे दूं। बिल्लो नाबालिग है। छात्र नेता ने माफ़ी मांग ली है…


