Tagged: ravish kumar

मैं गाजियाबाद में रहता हूं, आपको कोई दिक्‍कत है? 12

मैं गाजियाबाद में रहता हूं, आपको कोई दिक्‍कत है?

♦ रवीश कुमार महानगरों में आपके रहने का पता एक नयी जाति है। दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े शहरों में जाति की पहचान की अपनी एक सीमा होती है। इसलिए कुछ मोहल्ले नये ब्राह्मण...

मोदी को पता है किस पर गुर्राना है, किसे लाड़ दिखाना है 1

मोदी को पता है किस पर गुर्राना है, किसे लाड़ दिखाना है

एनडीटीवी के कार्यकारी संपादक रवीश कुमार इन दिनों गुजरात चुनाव कवर कर रहे हैं। टीवी के लिए जो वो दिखा-बोल रहे हैं, उसके अलावा कुछ झलकियां सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर भी छींट रहे हैं।...

विस्‍तार है अपार… प्रजा दोनों पार… करे हाहाकार… 10

विस्‍तार है अपार… प्रजा दोनों पार… करे हाहाकार…

रवीश कुमार ♦ नयना से पता चला था पॉल राबसन के बारे में। ऐसा लगा कि मिसिसिपी गंगा की मौसी है। दोनों बहने हैं। दोनों की व्यथा एक है। भूपेन हजारिका की आवाज में सुना तो धड़कनें तेज हो गयीं। गंगा तुम बहती हो क्यों। किसके लिए ये नदी बहती आ रही है। मनुष्य का नदियों से प्रयोजन पूरा हो चुका है। वो नदी मार्ग से सड़क मार्ग की ओर प्रस्थान कर चुका है। नदियों की धाराओं और मार्गों के नाम को लेकर कोई लड़ाई नहीं है। हर मनुष्य का ख्वाब है कि कोई सड़क उसके नाम हो जाए। तब भी गंगा क्यों बही जा रही है। हम जैसे रिश्तेदारों को तड़पाने के लिए। कुछ तीज त्योहारों के लिए। गंगा उपक्रम नहीं रही है। वो कर्मकांड बन चुकी है। पॉल रॉबसन के बारे में जानकर बड़ा गर्व हुआ था।

पेड न्‍यूज फिल्‍म पत्रकारिता में भी पूरी तरह घुस गया है 0

पेड न्‍यूज फिल्‍म पत्रकारिता में भी पूरी तरह घुस गया है

गौरव सोलंकी ♦ रवीश, यह इस लोकप्रिय एक्शन मसाला सिनेमा की ही माया है कि आप गर्व से कह रहे हैं कि गंभीरता विश्वविद्यालयों में ही रहे, तो ठीक है। हम जैसे कुछ लोग हैं, जिनके लिए सिनेमा उतना ही पवित्र माध्यम है, जितना मुझे लगता है कि आपके लिए मीडिया होगा। हम उसे चिकनी चमेली के बदन के लिए कुर्बान होते नहीं देखना चाहते। और यह कहते हुए समीक्षा लिखना कि यह समीक्षा नहीं है, ऐसा है, जैसा कोई भी न्यूज चैनल वाला दिन भर बॉलीवुड पर स्पेशल रिपोर्ट बनाने के बाद कहे कि नहीं, मैं समाचार नहीं दिखा रहा था। और इस तरह उसकी सारी जिम्मेदारी खत्म हो जाए।

अग्निपथ बहुत बुरी है, आप भी बहुत बहुत बुरे हैं रवीश! 4

अग्निपथ बहुत बुरी है, आप भी बहुत बहुत बुरे हैं रवीश!

शशि भूषण ♦ मुझे यह तारीफ पढ़कर लग रहा है कि शायद रवीश जी के जीवन में इतनी शांति है कि वे ऐसी ही किसी हिंसा के सहारे बेचैनी की तलाश में थे। फिल्म में क्या अच्छा-अच्छा होता है, यह लिखकर कमाने वाले बेहतर बताएंगे… मैं तो और कुछ दर्शकों के हवाले से भी केवल इतना कहना चाहता हूं कि यह फिल्म एक बार भी देखने लायक नहीं है। मुझे सचमुच आश्‍चर्य हो रहा है रवीश जी को पढ़कर। पर मैं आत्मालोचन के लिए ही सही, यह फिल्म दुबारा देखने की स्थिति में नहीं हूं।

उस टेलर की तलाश अब भी है जिसने कांचा के कपड़े सिले थे 12

उस टेलर की तलाश अब भी है जिसने कांचा के कपड़े सिले थे

रवीश कुमार ♦ मांडवा। बच्चन की जुबान पर जब मांडवा उच्चरित होता था, तो लगता था कि भारत छोड़ो, मांडवा में ही बसो। अपने गांव के बाद मांडवा का ही नाम लेने में मजा आता था। लगता था काश मांडवा में पैदा हुए होते। करण मल्होत्रा ने मांडवा को तो रखा मगर उसे पहचान की पटरी से उतार दिया। वो सिर्फ मुंबई के नक्शे के बाहर का गांव है, जहां पुलिस मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के डर से नहीं पहुच पाती। खुद भी नहीं जाती और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को भी जाने के लिए नहीं कहती कि जाकर देखो मांडवा में क्या हो रहा है।

स्टीफेंस का लपाड़ा और हिंदू की लौंडिया क्यों नहीं? 7

स्टीफेंस का लपाड़ा और हिंदू की लौंडिया क्यों नहीं?

रवीश कुमार ♦ सोचता हूं, कैमरे की इतनी अच्छी समझ रखनेवाला इम्तियाज डिस्को डांसर से आगे क्यों नहीं जा पाया? निश्चित रूप से उसने अच्छी फिल्म बनायी है। मगर उसे अपनी कहानी को स्टीफेंस और हिंदू के बीच की ग्रंथियों से आजाद कर देना होगा। वो फालतू की और पचीस लोगों की हीन और गर्व गंथ्रियां हैं। हिंदू कालेज का कैंटीनवाला दरअसल इम्तियाज से कह रहा है कि कहानी यहां नहीं हैं… पूरे मन से देखा इस फिल्म को और मन भर देखा। रावन अगर पिट पिटा के नहीं गयी होती तो रॉक स्टार को चुनौतियों का सामना करना पड़ता। रावन से घायल दर्शकों के लिए रॉक स्टार मरहम की तरह है।

नायक जब खिलौना बन जाता है, रोमांच पैदा नहीं करता! 10

नायक जब खिलौना बन जाता है, रोमांच पैदा नहीं करता!

रवीश कुमार ♦ रावन तो नहीं चली लेकिन जल्दी ही रावन का नायक जीवन डेढ़ से तीन रुपये का खिलौना बनकर गाय घाट और सोनपुर के मेले में बिकने लगेगा। ऐ बच्चा देखो, खेलो इससे, डेढ़ सौ करोड़ की फिल्म में से ये खुदरा बच गया है। हीरो है, हीरो है। किंग खान से खेलो, किंग खान से बोलो, किंग खान संग डोलो, किंग खान संग झूमो, अरे खेलो बाबू खेलो, जीवन से खेलो। एक संवैधानिक चेतावनी भी लिखी होगी, अपने जीवन से न खेलें। इस जीवन से खेलें।

“आरक्षण” पर प्रतिबंध राष्‍ट्र-वादी सत्ता को मजबूत करेगा! 26

“आरक्षण” पर प्रतिबंध राष्‍ट्र-वादी सत्ता को मजबूत करेगा!

वीरेंद्र यादव ♦ आरक्षण फिल्म पर प्रतिबंध का सिलसिला भारतीय जनतंत्र के लिए अच्छी खबर नहीं है। यह अभिव्यक्ति की आजादी के बरक्स राष्‍ट्रवादी सत्ता को मजबूती प्रदान करेगा। प्रकाश झा की फिल्म के बरक्स आरक्षण के समर्थन में फिल्म बनायी जा सकती है। लेकिन सत्तातंत्र के हाथों से प्रतिबंध का हथियार आसानी से नहीं छीना जा सकता। जरा सोचिए।

हर तरह के सिनेमा को जीने का हक है, उसे जीने दें … 3

हर तरह के सिनेमा को जीने का हक है, उसे जीने दें …

विनीत कुमार ♦ गांड, चोद (अनुराग कश्यप) के बाद अब बहनचोद और बंदूक की तरह खड़ा लौड़ा सेमिनारों में बड़े इत्मीनान से इस्तेमाल किया जाने लगा है। दर्शक किस दैवी शक्ति से इसे पचा ले रहे हैं, नहीं मालूम। लेकिन मैंने जो बात कही थी कि गालियों का अगर बहुत इस्तेमाल होने लगे तो ये किसी भी विधा के लिए रिवेन्यू जेनरेट करने का जरिया नहीं रह जाएगा।