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Articles tagged with: ravish kumar

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[7 Jan 2010 | 2 Comments | ]
जब सब तालियां बजाने लगें तो मामला गड़बड़ समझो

फीता राम ♦ फिल्म के बारे में लोगों के विचार उन लोगों की ‘स्थिति’ के बारे में ज्‍यादा बताते हैं। यह सब पर लागू होता है। जब मुझे ‘lays चिप्स’ बहुत स्वादिष्‍ट लगने लगते हैं तो यह सोचने पर मजबूर हो जाता हूं कि क्यों यह इतने स्वादिष्‍ट बनाये गये है। फिर यह सोचता हूं कि स्वाद आलू में है या पैकेट में या जहां से खरीदा है, वहां या फिर सैफ अली खान के प्रोमो में – आखिर कहां? लेकिन इन सब के बावजूद ‘स्वाद’ और ‘सत्य’ में फर्क तो है। ज़रूरी नहीं कि जो चीज़ मुझे स्वादिष्‍ट लगे वो मेरे हित में भी हो। सुना है कि बहुत से ख़तरनाक ज़हर बहुत मीठे होते हैं। जिस तरह की विषमताएं हमारे समाज में हैं यह कहना कि फिल्म ‘सबको’ पसंद आयी है क्योंकि इसने इतने दिनों में इतने करोड़ कमा लिये हैं, एक भद्दा और अश्लील व्यंग्य है।

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[7 Jan 2010 | 2 Comments | ]
सिस्टम के थ्री इडियॉटिक बागी

रवीश कुमार ♦ शिक्षा व्यवस्था से भागने के रास्ते को लेकर कई फिल्में बनी हैं। भागने के कई रास्ते भी हैं। थ्री इडियट्स फिल्म पूंजीवादी सिस्टम को रोमांटिक बनाने का प्रयास करती है। काबिलियत पर ज़ोर से ही कामयाबी का रास्ता निकलता है। काबिल होना पूंजीवादी सिस्टम की मांग है। रणछोड़ दास का विकल्प भी किसी अमेरिकी कंपनी की कामयाबी के लिए डॉलर पैदा करने की पूंजी बन जाता है। कामयाबी के बिना ज़िंदा रहने का रास्ता नहीं बताती है यह फिल्म। शायद ये किसी फिल्म की ज़िम्मेदारी नहीं होती। उसका काम होता है जीवन से कथाओं को उठाकर मनोरंजन के सहारे पेश कर देना। ताकि हम तनाव के लम्हों में हंसने की अदा सीख सकें।

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[22 Dec 2009 | 4 Comments | ]
कौन कहता है कि “पा” अमिताभ बच्‍चन की फिल्‍म है?

अनुराग अन्‍वेषी ♦ इंटरनैशनल मेकअप आर्टिस्ट कर्स्टन टिंबल और डोमिनिक ने अपने कौशल से अमिताभ बच्चन को बिग बी के करेक्टर से बाहर कर दिया है। यह एक बड़ी वजह है कि औरो की भूमिका में दर्शकों को अपने अमिताभ का चेहरा नहीं दिखता। रही सही कसर खुद बिग बी ने पूरी कर दी अपनी वाइस मॉड्यूलेशन से। यह फिल्म सिर्फ औरो की कहानी नहीं है। यह विद्या के संघर्ष की कहानी है। अमोल आम्टे की महत्वाकांक्षा की भी कहानी है। मीडिया की नासमझी-नादानी की भी दास्तां है। तिसपर चारों कहानियां एक साथ चल रही हैं और ऊबने नहीं देतीं। स्क्रिप्ट की बुनावट इतनी सधी और कसी हुई कि इन कहानियों को आप एक-दूसरे से अलग नहीं कर सकते।

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[16 Dec 2009 | 12 Comments | ]
क्‍यों छुपायी जा रही है “पा” की असली कहानी?

रवीश कुमार ♦ हम अपने भीतर बहस कर चुप हो जाते हैं। गले को कस कर नाक से हवा छोड़ते हुए कांय कांय आवाज़ निकालते हैं। हम सब राजनीतिक से लेकर इलाक़ाई और अन्य तरह के स्वार्थों पर केंद्रित खेमों में बंटे हैं। आलोचना अपने खेमे को बचाकर सामने वाले की की जाती है। इसलिए पत्रकारों की आलोचना भी सवालों के घेरे में है। हम किसी न किसी के हाथ में खेल रहे हैं। उसे सही ठहराने के लिए दलीलों की भरमार है। मीडिया का म नहीं जानने वाले आलोचक अख़बारों के कॉलम से उगाहने लगे हैं। इन्हीं सब के बीच कोई बाल्की जैसा काबिल निर्देशक आराम से अपनी फिल्म के पर्दे में दो छवि बनाता है। अच्छे नेता की और दूसरी लतखोर मीडिया की।

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[23 Nov 2009 | 4 Comments | ]
हिंदी-अंग्रेजी के अख़बारों का किसान अलग क्यों होता है?

रवीश कुमार ♦ हिंदी और अंग्रेजी के अखबारों ने किसानों के आंदोलन को अलग अलग चश्में से देखा। क्या अमर उजाला लिख सकता था कि किसानों ने दिल्ली बर्बाद कर दी। ट्रैफिक जाम लगा दिया। क्यों इस अखबार ने लघु-हेडर लगाए कि गन्ना मूल्य नीति के विरोध में किसानों का ज़ोरदार प्रदर्शन। क्या अगर अमर उजाला हिंदुस्तान टाइम्स की तरह लिखता तो उसके पाठक स्वीकार करते। भले ही पश्चिम उत्तर प्रदेश के शहरों से निकलता हो लेकिन आज भी इन शहरों के लोग गांवों से जुड़े हैं। थोड़े किसान हैं या किसी किसान को जानते होंगे। हिंदुस्तान टाइम्स का पाठक बिल्कुल अलग। तो क्या पाठकों की संवेदनशीलता और वर्ग चरित्र के अनुसार एक ही घटना को दो चश्मे से देखेंगे?

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[8 Nov 2009 | 4 Comments | ]
हाथ का लिखा, दिल के बोल

रवीश कुमार ♦ हम सब एनडीटीवी इंडिया के न्यूजरूम में बात कर रहे थे कि अगली सुबह प्रभाष जी सचिन के सत्रह हजार पूरे होने पर क्या लिखेंगे। कुछ आंसू होंगे, कुछ हंसी होगी और कुछ पागलपन। नये-नये शब्द निकलेंगे और इस बार लिखेंगे तो उनकी कलम दो हजार शब्दों की सीमा को तोड़ चार हजार शब्दों तक जाएगी। शुक्रवार का ‘जनसत्ता’ देख लीजिए। उसमें प्रभाष जी का नाम तक नहीं है। जिस अखबार को बनाया वह भी उनकी मौत की खबर आने से पहले छप गया। तेंदुलकर की एक तस्वीर के साथ छह नवंबर का ‘जनसत्ता’ घर आ गया। उसने भी प्रभाष जी का इंतजार नहीं किया। इस बार प्रभाष जोशी ने अपने अखबार की डेडलाइन की कम और अपनी डेडलाइन की परवाह ज्यादा की!

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[26 Oct 2009 | 5 Comments | ]
इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में लगी इंग्लिश देवी की मूर्ति

रवीश कुमार ♦ 24 अक्तूबर 2009 को नयी दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में इंग्लिश देवी अवतरित हो गयीं। चंद्रभान प्रसाद की चार साल पुरानी परिकल्पना एक मूर्ति के रूप में साकार हुई है। चंद्रभान चाहते हैं कि दलित का हर बच्चा अंग्रेजी में पारंगत हो। अंग्रेजी जानेगा, तो वो विश्व की तमाम मुख्यधाराओं से संवाद कर सकेगा। हिंदी भाषी चंद्रभान इस मूर्ति के ज़रिये हिंदी-इंग्लिश का फरियौता नहीं करना चाहते। उनका मक़सद है कि कम से कम समय में दलित साक्षरता को हासिल किया जाए और अंग्रेजी माध्यम में उनकी निपुणता उनके लिए दुनिया के दरवाज़े खोल देगी। इस मौके पर कुछ ऐसे दलित भी बुलाये गये थे, जो उद्योगपति बन चुके हैं। जिनका कारोबार पचास से पांच सौ करोड़ रुपये का है। सिर्फ एक भाषा की कमी से वो दुनिया के सामने हीरो नहीं हैं।

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[24 Oct 2009 | One Comment | ]
देख भाई देख, ताल ठोंक के देख!

विभा रानी ♦ छम्मक्छल्लो ने पहले भी लिखा था कि गाली देना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और उसमें मां बहन का इस्तेमाल हमारा आपद धर्म. इससे आप हमें बेदखल नहीं कर सकते. दूसरे हमारे भीति भाव को तो तुलसीदास जी भी अपने समय में अनुभव कर गए थे, इसीलिए लिख भी गये कि ‘बिन भय होंहि न प्रीति’ तो, जबतक आप किसी बात का भय नहीं दिखाएंगे, लोग आपकी बात नहीं मानेंगे. गांधी जी के सत्य, अहिंसा और प्रेम के मार्ग पर चलते हुए किसी से अनुरोध वाली भाषा में कहेंगे कि भाई साहब, यहां पर अपनी शंका का समाधान मत करें तो वह पलट कर आपसे ही कह बैठेगा कि “क्यों? यह ज़मीन क्या तेरे बाप की है?” फिर आप क्या कर लेंगे?

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[20 Oct 2009 | 4 Comments | ]
यू-ट्यूब में बिहार है तो वही, लेकिन लगता मज़ेदार है

रवीश कुमार ♦ एक वीडियो है एमआईजी कंकड़बाग नाम से। एक मंज़िली इमारत। लाल बार्डर और सफेद दीवारें। कैमरा गेट से चलता है और बरामदे तक पहुंचता है, जहां ग्रील लगे हैं। गेट के सामने सुधा डेयरी की नकल पर एक बोर्ड दिखता है। दूधा लिखा हुआ है। घर में घुसते ही कैमरा किसी बुज़ुर्ग की तस्वीर से पैन होता हुआ कई तरह के मेडल और शील्ड पर जा टिकता है। उसके बाद कंप्यूटर आता है। सजा कर रखा गया बिस्तर और झूला भी। इन वीडियो में आप पटना के नये मानस को देख सकते हैं। जिस शहर के लोग कभी अपने घर को बाहर से इस डर से नहीं रंगते थे कि कोई समझ न ले कि लूट का माल है और डाका न पड़ जाए, उस शहर के लोग वीडियो बना कर अपने कमरों तक की तस्वीरें सार्वजनिक कर रहे हैं।

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[19 Oct 2009 | 12 Comments | ]
अश्‍लीलता की हद में हिदायत के दो चित्र, देखिए तो सही!

डेस्‍क ♦ जब भी फुर्सत मिलती है, रवीश इन दिनों मोबाइल प‍त्रकारिता करते हैं। ये दो तस्‍वीरें उन्‍होंने हमें भेजीं, जिनमें सड़क या सार्वजनिक किनारे को टॉयलेट की तरह इस्‍तेमाल करने की मनाही के लिए दो संदेश लिखे हैं। दोनों संदेश अब्‍यूज़्ड लैंग्‍वेंज़ में हैं और हम इस बात पर घनघोर मंथन कर रहे थे कि इसे पब्लिक स्‍फीयर में लाना चाहिए या नहीं। कुछ मित्रों की राय भी मिली कि थोड़ा ब्‍लर (धुंधला) करके संदेशों को छाप देना चाहिए। मोबाइल फोटोकारिता की अपनी महत्‍वाकांक्षी सीरीज़ एज ऑफ इंस्‍ट्रक्‍शन को अंजाम देने में जुटे रवीश कुमार जब आईएसबीटी (पुरानी दिल्‍ली) से शाहदरा की तरफ़ आ रहे थे, तो यमुना क्रॉस करते ही बायीं तरफ़ टेलीफोन के उलझे तारों वाले बक्‍से के ऊपर ये संदेश उन्‍हें मिला।