Articles tagged with: ravish kumar
मीडिया मंडी »
समरेंद्र सिंह ♦ इस बहस में ऐसे कितने रिपोर्टर हैं, जिनकी ख़बरें तमाम सबूत और दस्तावेज होते हुए भी रोकी गयी हो? या फिर कितने ऐसे लोग हैं, जिन्होंने ख़बर रोकने या फिर रुकवाने का काम किया हो? इस देश में रिपोर्टरों की कमी नहीं है अजीत जी। सवाल यह है कि स्कूप चलाने का हौसला कितनों में है? अब ख़बर नहीं चलेगी तो सेक्स बिकेगा, सिनेमा बिकेगा, स्पोर्ट्स बिकेगा और सनसनी बिकेगी। उसके अलावा जो स्पेस बचता है, उसमें लंतरानी चलेगी। इसलिए सवाल यह पूछिए कि आज कितने संपादकों की हैसियत दलाल से ऊपर की है और कितने संपादक ख़बर समझते हैं? रिपोर्टर तो बस पुर्जा है। ईमानदार रिपोर्टर इसलिए चाहिए कि ऊपर बैठे लोगों की दलाली चलती रहे।
मोहल्ला दिल्ली, शब्द संगत »
शिवानी खरे ♦ जहां शब्दों से भाव मूर्त होते हैं वहीं लकीरें चित्र को मूर्त बनाती हैं और उन चित्रों में रंग भरे जा सकते हैं। यह बात केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल ने विश्वजीत की कविता पुस्तक कुछ शब्द कुछ लकीरें के लोकार्पण समारोह में कही। विश्वजीत का सीधा जुड़ाव राजनीति से है और राजपथ पर चलते चलते अक्सर वे कविता की पगडंडी पर चलने लगते हैं। कपिल सिब्बल ने कहा कि आजकल तो सारे नेता कवि बनते जा रहे हैं। फिर सिब्बल ने विश्वजीत के साथ अपनी दोस्ती की यादें ताजा कीं और कहा कि उनकी कविताओं को पढ़कर और उनकी रेखाओं को समझकर उन्हें और उनकी राजनीतिक यात्रा और अनुभव से और गहराई से जुड़ने का मौका मिलेगा।
नज़रिया, मीडिया मंडी »
नवीन कु रणवीर ♦ रवीश कुमार जवाब दें? एनडीटीवी इंडिया में शुक्रवार 25 जून 2010 को रात 9:30 बजे रवीश की रिपोर्ट में जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल को लेकर डिस्क्लेमर भी दिखाया था, परंतु उसके बावजूद भी देश के हर राज्य का वो वर्ग इतना सक्षम नहीं है कि सवर्ण समाज के द्वारा दी गयी इस घृणा पर गर्व कर सके। पंजाब में दलितों की आर्थिक स्थित अच्छी है। कैसे है, ये भी आप जानते हैं। उन्होंने समाज के उस वर्ग का ही बहिष्कार किया, जिसने उनसे घृणा की। पंजाब में डेरा संप्रदाय हमेशा से एक ताकत और पहचान का प्रतीक रहा है। आपकी रिपोर्ट का असर ये पड़ेगा कि जिन राज्यों का हमने जिक्र किया, वहां के सवर्ण अब खुले तौर पर लोगों को इन जाति-सूचक शब्दों के उच्चारण से बुलाएंगे, गाने गाकर चिढ़ाएंगे।
नज़रिया, मीडिया मंडी »
विनीत कुमार ♦ रवीश ने अपनी रिपोर्ट में जिन माध्यमों के जरिये दलितों की नयी पहचान बनने की बात की है, उन माध्यमों के विश्लेषण से दलित विमर्श के भीतर एक नये किस्म की बहस और विश्लेषण की पूरी-पूरी गुंजाइश बनती है। जिन माध्यमों को कूड़ा और अपसंस्कृति फैलानेवाला करार दिया जाता रहा है, वही किसी जाति के स्वाभिमान की तलाश में कितने मददगार साबित हो सकते हैं, इस पर गंभीरता से काम किया जाना अभी बाकी है। इलीटिसिज्म के प्रभाव में मशीन औऱ मनोरंजन के बीच पैदा होनेवाली संस्कृति पर पॉपुलर संस्कृति का लेबल चस्पां कर उसे भ्रष्ट करार देने की जो कोशिशें विमर्श और अकादमिक दुनिया में चल रही हैं, उसके पीछ कोई साजिश तो जरूर लगती है।
नज़रिया, मीडिया मंडी, मोहल्ला दिल्ली, मोहल्ला मुंबई, सिनेमा »
डेस्क ♦ सब जानते हैं कि रावण अभिषेक बच्चन और ऐश्वर्या राय की फिल्म है। लेकिन हमारे लिए दरअसल ये फिल्म देशज पृष्ठभूमि से आये उन कलाकारों की है, जिन्होंने स्टार उपस्थितियों के बीच अपनी शानदार छाप छोड़ी है। मुंबई में इसका प्रीमियर देख कर आये फिल्म क्रिटिक अजय ब्रह्मात्मज कल शाम दिल्ली के प्रेस क्लब में बोल रहे थे, अभिषेक बच्चन और ऐश्वर्या जैसी प्रतिभाओं के बावजूद ये फिल्म उन कलाकारों के नाम जानने की उत्सुकता आपमें भरती है – जिनका असर लेकर आप सिनेमा हॉल से बाहर आते हैं। पंकज त्रिपाठी उनमें से एक हैं। पंकज त्रिपाठी ने रावण में गुलाबो की भूमिका की है। मोहल्ला लाइव में गुलाबो (पंकज त्रिपाठी) की कुछ तस्वीरें हम जारी कर रहे हैं।
ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया, व्याख्यान, शब्द संगत »
रवीश कुमार ♦ दो ही बातें हो सकती हैं। मीडिया इतनी बड़ी हो गयी है कि साहित्यकारों की हैसियत तय करना चाहती है या फिर साहित्यकार इतने कमतर हो गये हैं कि मीडिया से उद्धार चाहते हैं। माध्यम की ठसक देखिए। पर ऐसा क्या है जहां आकर हमारे साहित्यकार मीडिया को रचनात्मकता से भर देंगे। हू हा.. हुंकार की बोली युग में मैं किसी केदारनाथ सिंह जी को स्टुडियो में भयभीत बैठे देखने की कल्पना नहीं कर सकता। मुझे नहीं लगता कि जो आज की मीडिया है उसमें साहित्यकारों की कोई जगह और ज़रूरत है। मैं जहां है जैसा है के आधार पर बोल रहा हूं। एक कारण यह है कि अब पत्रकार रघुवीर सहाय या अज्ञेय होने की ख्वाहिश लेकर नहीं आता है।
नज़रिया, फ फ फोटो फोटो, मीडिया मंडी, रिपोर्ताज »
डेस्क ♦ एनडीटीवी इंडिया हर शुक्रवार को प्राइम टाइम में रात साढ़े नौ बजे रवीश की रिपोर्ट नाम से, मुद्दों से जुड़ा विशेष कार्यक्रम प्रसारित करता है। इसी कड़ी में, मुस्लिम महिलाओं के बुर्के को लेकर जारी किये गये देवबंद के एक मौलाना के फतवे पर उठे व्यापक वाद-विवाद को समेटते हुए परदे में नजर प्रसारित हुआ। रवीश एक परिपक्व और मंझे हुए रिपोर्टर हैं। पिछले 15 वर्षों के रिपोर्टिंग के अनुभवों ने उन्हें मुद्दे की संवेदनशीलता और व्यापकता दोनों को सहेजने में माहिर बना दिया है। इसी महारत के साथ उन्होंने इस संवेदनशील और अंतरराष्ट्रीय बन चुके मुद्दे को भी उसके तमाम पहलुओं के साथ उभारा। इस मसले पर जब दुनिया भर में बच्चे से ले कर बूढ़ा तक एक तयशुदा नजरिया बना चुका है, रवीश ने पक्ष-विपक्ष के स्वर उभारे।
नज़रिया »
रवीश कुमार ♦ नैन्सी ने जाति के हिसाब से जोधपुर और आसपास के जिलों में घरों की गिनती करायी थी। इस तरह की व्यवस्था दूसरे इलाकों में थी, जिसे तब खानाशुमारी के नाम से जाना जाता था। नैन्सी के समय में खास जाति के घरों को गिना गया था। यह भी हो सकता है कि कई जातियों के पास घर ही न हों। कई राजस्थानी रजवाड़ों के पास गांवों में जाति के हिसाब से घरों की गिनती होती थी। इस तरह की गिनती राजस्व वसूली की सुविधा के लिए शुरू हुई थी। मारवाड़ में अलग-अलग जाति के लोगों पर अलग अलग कर थे। इसीलिए नैन्सी की गिनती में आबादी की कुल संख्या का पता नहीं चलता है क्योंकि लोगों की गिनती नहीं हुई थी।
मीडिया मंडी, मोहल्ला दिल्ली »
डेस्क ♦ साहित्य और मीडिया दो ऐसे पड़ोसी देश की तरह हैं जो हमेशा एक दूसरे से लड़ते रहते हैं। इनकी दुश्मनी पुरानी है। फिर भी साहित्य को मीडिया की जरूरत है। मीडिया को साहित्य की जरूरत है। मशहूर कथाकार और हंस के संपादक राजेंद्र यादव ने ये बातें मंगलवार को दिल्ली के इंडिया हैबिटैट सेंटर के गुलमोहर सभागार में कहीं। मौका था मोहल्ला लाइव, जनतंत्र और यात्रा बुक्स की साझेदारी में पहले बहसतलब का। मीडिया में साहित्य की खत्म होती जगह पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि हमें एक खास तरह के साहित्य को ही साहित्य मानने की मानसिकता से उबरने की जरूरत है। जिस वक्त ऐसा होने लगेगा इस बहस को एक निष्कर्ष मिलता दिखाई देने लगेगा।
मीडिया मंडी, मोहल्ला दिल्ली »
डेस्क ♦ क्या हिंदी साहित्य मीडिया के लिए सेलेबल कमॉडिटी (बिकाऊ माल) क्यों नहीं है? इस मसले पर हिंदी की वर्चुअल दुनिया के सबसे पॉपुलर मंच जनतंत्र/मोहल्ला लाइव और पेंगुइन प्रकाशन के हिंदी सहयोगी यात्रा बुक्स के साझा प्रयास से एक सेमिनार का आयोजन किया गया है। 18 मई की शाम सात बजे इंडिया हैबिटैट सेंटर, नयी दिल्ली के गुलमोहर सभागार में आयोजित इस सेमिनार में हिंदी साहित्य और मीडिया के पांच जरूरी नाम सेमिनार में अपनी बात रखेंगे। ये वक्ता होंगे : राजेंद्र यादव, सुधीश पचौरी, ओम थानवी, रवीश कुमार और शीबा असलम फहमी।



