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गैंग्‍स ऑफ वासेपुर में भारतीय लोक का असली रंग है 1

गैंग्‍स ऑफ वासेपुर में भारतीय लोक का असली रंग है

रविशंकर कुमार ♦ इस फिल्‍म का रंग देसी है, जो लोक रंग के मिलने से बना है। यही लोक रंग हिंदुस्तान की पहचान है… और इस फिल्म की भी! इसका अपराध भी देसी, संगीत भी देसी। बातचीत और अभिनय का अंदाज भी देसी है। यही इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है। कांटी और बारूद से बम बनाना, ट्रक के स्टियरिंग से पिस्टल बनाना… और चलाने के समय उसके नाल का फट जाना… विशुद्ध रूप से देसी। अभिनेताओं की मुद्राएं भी देसी। मनोज वाजपेयी जब कपड़े धोती बंगालन लड़की से कुछ पूछते हैं, तो वो जैसे बिना बोले सर झुकाकर अपना चेहरा छुपाती है, लाजवाब है। हर देश के लोगों का उठने-बैठने चलने-बोलने का अपना अंदाज होता है। वही मुद्राएं वहां की अभिनय कला में भी दिखती हैं। वो इस फिल्म में है।

सुंदर और बेहतर की तलाश में भटकता एक फिल्मकार 1

सुंदर और बेहतर की तलाश में भटकता एक फिल्मकार

रविशंकर कुमार ♦ माजिद अपनी फिल्मों में, जो सुंदर है उसकी तलाश करते हैं और उसे दुनिया के सामने लाते हैं। वे एक ऐसा संसार रचते हैं जिनके पात्र किसी लूट किसी साजिश का हिस्सा नहीं हैं। वे न तो किसी को डराने में लगे हैं, न ही झूठे रोमांच पैदा करने में, न ही किसी युद्ध को बढ़ावा देने में। और न ही किसी को जीतने में यकीन करते हैं। उनके पात्र इतने प्यारे हैं कि भुलाये नहीं भूलते। चिल्ड्रेंस आफ हैवेन का नायक जो कि एक बच्चा है, उसे रेस में जूते जीतने हैं, क्योंकि उसके पास जूते नहीं हैं।

भोजपुरी सिनेमा में सार्थक हस्‍तक्षेप करेगा “सईयां ड्राइवर…” 5

भोजपुरी सिनेमा में सार्थक हस्‍तक्षेप करेगा “सईयां ड्राइवर…”

रविशंकर कुमार ♦ दर्शकों का भोजपुरी फिल्मों के करीब आने का सबसे बड़ा कारण हिंदी फिल्मों से हिंदुस्तान का गायब होना था। हिंदी फिल्में हमारे देश के रीयल इमोशन से दूर चली गयी थी। वह एक ऐसी दुनिया का निर्माण कर रही थी, जहां हिंदुस्तान का आम आदमी अपने आप को फिट नहीं कर पा रहा था। ठगा सा महसूस कर रहा था। इसलिए उसने अपना रुख भोजपुरी सिनेमा की ओर किया। मगर भोजपुरी फिल्मों ने उन दर्शकों के साथ क्या किया? उम्मीद से देख रहे उन दर्शकों के सामने हिंदी फिल्मों का घटिया संस्करण प्रस्तुत किया गया।