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मदरसों की अपनी कम्युनल पॉलीटिक्स है

बिहार में मुस्लिम राजनीति पर सेमिनार ♦ अरुण नारायण बिहार में मुस्लिम राजनीति को लेकर हमने अपने फेसबुक पर एक चर्चा छेड़ी कि गैर मुस्लिम उनकी राजनीति को लेकर क्या सोचते हैं? इस पर...

रिपोर्टिंग में जनहित का खयाल रखें : ए संदीप 0

रिपोर्टिंग में जनहित का खयाल रखें : ए संदीप

डेस्‍क ♦ चौदह भाषाओं में प्रकाशित होने वाली समाचार पत्रिका द संडे इंडियन और माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय ने 18 सितंबर को भोपाल में “मध्य प्रदेश के विकास में मीडिया की भूमिका” पर एक राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया! इस सेमिनार में मध्‍यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, शिक्षामंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा, द संडे इंडियन के समूह संपादक ए संदीप, वरिष्‍ठ पत्रकार राहुल देव, उदय सिन्हा, दीपक चौरसिया के अलावा मध्य प्रदेश के कई वरिष्ठ पत्रकार उपस्थित थे। इस मौके पर ए संदीप ने कहा कि खोजी पत्रकारिता हो या फिर आलोचनात्मक पत्रकारिता, उसमें किसी व्यक्ति एवं संस्था पर आक्षेप लगाने के बजाय जनहित का ख्याल रखना चाहिए।

लेखक बेहतर राष्‍ट्रीय प्रवक्‍ता हो सकते हैं, पर वे सुस्‍त हैं 25

लेखक बेहतर राष्‍ट्रीय प्रवक्‍ता हो सकते हैं, पर वे सुस्‍त हैं

डेस्‍क ♦ साहित्य और मीडिया दो ऐसे पड़ोसी देश की तरह हैं जो हमेशा एक दूसरे से लड़ते रहते हैं। इनकी दुश्मनी पुरानी है। फिर भी साहित्य को मीडिया की जरूरत है। मीडिया को साहित्य की जरूरत है। मशहूर कथाकार और हंस के संपादक राजेंद्र यादव ने ये बातें मंगलवार को दिल्‍ली के इंडिया हैबिटैट सेंटर के गुलमोहर सभागार में कहीं। मौका था मोहल्‍ला लाइव, जनतंत्र और यात्रा बुक्‍स की साझेदारी में पहले बहसतलब का। मीडिया में साहित्‍य की खत्‍म होती जगह पर बोलते हुए उन्‍होंने कहा कि हमें एक खास तरह के साहित्य को ही साहित्य मानने की मानसिकता से उबरने की जरूरत है। जिस वक्त ऐसा होने लगेगा इस बहस को एक निष्कर्ष मिलता दिखाई देने लगेगा।

साहित्‍य और मीडिया पर आज बहसतलब, हैबिटैट आएं 13

साहित्‍य और मीडिया पर आज बहसतलब, हैबिटैट आएं

डेस्‍क ♦ क्‍या हिंदी साहित्‍य मीडिया के लिए सेलेबल कमॉडिटी (बिकाऊ माल) क्‍यों नहीं है? इस मसले पर हिंदी की वर्चुअल दुनिया के सबसे पॉपुलर मंच जनतंत्र/मोहल्‍ला लाइव और पेंगुइन प्रकाशन के हिंदी सहयोगी यात्रा बुक्‍स के साझा प्रयास से एक सेमिनार का आयोजन किया गया है। 18 मई की शाम सात बजे इंडिया हैबिटैट सेंटर, नयी दिल्‍ली के गुलमोहर सभागार में आयोजित इस सेमिनार में हिंदी साहित्‍य और मीडिया के पांच जरूरी नाम सेमिनार में अपनी बात रखेंगे। ये वक्‍ता होंगे : राजेंद्र यादव, सुधीश पचौरी, ओम थानवी, रवीश कुमार और शीबा असलम फहमी।

बुद्धिजीवी एक ब्राह्मणवादी अवधारणा है : धीरुभाई शेठ 2

बुद्धिजीवी एक ब्राह्मणवादी अवधारणा है : धीरुभाई शेठ

जितेंद्र कुमार यादव ♦ बुद्धिजीवी और श्रमजीवी के रूप में लोगों का विभाजन जातिवादी फ्रेम के तहत हुआ। इस तरह बुद्धिजीवी एक ब्राह्मणवादी अवधारणा ठहरती है। यह बात सीएसडीएस के पूर्व निदेशक और वरिष्‍ठ राजनीतिक समाजशास्‍त्री धीरूभाई शेठ ने डॉ राममनोहर लोहिया के जन्‍मशताब्‍दी वर्ष के अवसर पर जेएनयू में ‘सामाजिक चुनौतियां और बुद्धिजीवियों का दायित्‍व’ विषय पर आयोजित एक विचार गोष्‍ठी में कही। उन्‍होंने कहा कि इस देश में दो सत्ताएं हैं – व्‍याख्‍या सत्ता और राजसत्ता। व्‍याख्‍या सत्ता राजसत्ता को नियंत्रित करती रही है। बुद्धिजीवी वर्ग की ताकत को ऐतिहासिक रूप में समझने की जरूरत है।

“सीमांत लोगों की बात करना ही वैकल्पिक पत्रकारिता है” 1

“सीमांत लोगों की बात करना ही वैकल्पिक पत्रकारिता है”

शब्‍बीर हुसैन ♦ आवारा पूंजी की मीडिया पर पकड़ मजबूत हुई है और इस पकड़ ने खबर को मनोरंजन में बदल दिया है। राहुल महाजन, मलिका शेरावत या राखी सावंत जैसे चरित्रों का मीडिया सुर्खियों में होने के कारण भी यही हैं। मनोरंजन की प्रवृत्ति स्थिर नहीं है। अतः ये चरित्र भी तेजी से बदलते और आते जाते हैं। जनार्दनराय नागर राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय के जनपद विभाग और मीडिया अध्ययन केंद्र के साझे में हुए ‘नयी चुनौतियां और वैकल्पिक मीडिया’ विषय पर सुप्रसिद्ध पत्रकार अनुराग चतुर्वेदी ने अपने व्याख्यान में कहा कि मनुष्यता की पहचान और हिंसा रहित समाज के लिए वैकल्पिक मीडिया की जरूरत हमेशा बनी रहेगी। उन्होंने कहा कि सीमांत लोगों के बारे में पत्रकारिता ही वैकल्पिक पत्रकारिता है।

लोकतंत्र और मीडिया के लिए आईसीटी जरूरी : राव 0

लोकतंत्र और मीडिया के लिए आईसीटी जरूरी : राव

भोपाल डेस्‍क ♦ लोकतंत्र की गुणवत्ता के लिए सूचना और संचार तकनीकी न केवल बेहतर सहयोग कर रही है, बल्कि आम नागरिक, सक्रिय मीडिया और न्यू मीडिया को प्रोत्साहित कर रही है। इसका उपयोग नकारात्मक कम है। आईसीटी के कारण मतदान में इजाफा हुआ है। यह बात देश के ख्यात चुनाव और मीडिया विशेषज्ञ डॉ एन भास्कर राव ने कही। श्री राव एमपीपोस्ट द्वारा स्थानीय स्वराज भवन में 11 अप्रैल को आयोजित सूचना प्रौद्योगिकी, चुनाव और राजनीति विषय पर अपना व्याख्यान दे रहे थे। एमपीपोस्ट द्वारा जारी किये गये डिजिटल दस्तावेज की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि वास्तव में जो काम देश के प्रतिष्ठित आईटी नगर बैंगलूर से होना था वह भोपाल में संपन्न हुआ।

बिहार को छवियों का बंधुआ नहीं बनना चाहिए 1

बिहार को छवियों का बंधुआ नहीं बनना चाहिए

डेस्‍क ♦ नवभारत टाइम्स, पटना के पूर्व संपादक अरुण रंजन ने कहा कि मीडिया में बिहार की दो छवियां हैं – एक प्रगट है तो दूसरी अप्रगट। इन दोनों के बीच अंदर ही अंदर टकराहट चलती रहती है। जेपी आंदोलन के समय और आपातकाल के बाद बिहार में एक नयी पत्रकारिता का उदय हुआ, जिसने भूमि संघर्ष, बूथ कैप्चरिंग, अवैध हथियार के बारे में खुल कर लिखा। सामाजिक मान्यता प्राप्त अपराधियों के खिलाफ भी लिखा गया। इससे बिहार की खून खराबे वाली तस्वीर तो बनी, बदनामी भी हुई लेकिन उससे बड़ी एक और छवि बनी वह थी प्रतिरोध करने के जुझारूपन की। इसी जुझारूपन से राज्य और देश में बड़े बदलाव का रास्ता तैयार हुआ। नेगेटिव इमेज के डर से बड़े मकसद को छोड़ा नहीं जा सकता है।

बिहार की ‘मीडियावी’ छवि पर सेमिनार 28 को 4

बिहार की ‘मीडियावी’ छवि पर सेमिनार 28 को

डेस्‍क ♦ बिहार और बिहारियों के बीच ये सवाल अकसर उठता रहा है कि क्या मीडिया बिहार की वास्तविक तस्वीर दिखाता है या फिर कहीं वह पहले से बनी बनाई स्टीरियोटाइप इमेज को ध्यान में रखकर चीज़ों को पेश तो नहीं करता रहता? बिहार के लोग तो ये भी शिकायत करते मिल जाएंगे कि मीडिया ने बिहार की एक नकारात्मक छवि गढ़ी है जिससे ग़ैर बिहारियों की नज़र में वे दीन-हीन बन जाते हैं। उनका कहना है कि बिहार के बारे में मीडिया अपराध, जातिवाद, बाढ़, सूखा, भ्रष्टाचार, राजनीतिक अराजकता, हिंसा और पलायन आदि की ख़बरें ही प्रमुखता से प्रकाशित करता है जबकि राज्य में सब कुछ बुरा ही हो रहा हो ऐसा नहीं है।

“मीडिया महिलाओं के मसले मर्द के चश्‍मे से देखता है” 3

“मीडिया महिलाओं के मसले मर्द के चश्‍मे से देखता है”

शीबा असलम फहमी ♦ आधुनिकता क्या केवल वस्त्रों में दिखनी चाहिए, या फिर वह हमारे भीतर विचारों के स्तर पर उतरने का पर्याय होना चाहिए। उन्होंने कहा कि महिला दिवस का सौवां साल हमारे लिए महत्त्वपूर्ण होना चाहिए, लेकिन अगर दलित समाज की महिलाएं पच्चीस दिसंबर को अपना महिला दिवस अलग से मनाती हैं, तो क्या हमें उन तक नहीं पहुंचना चाहिए। बहुत आधुनिक हो चुके हमारे मीडिया में खासतौर पर अल्पसंख्यकों के मुद्दे को एक फैशन की तरह लिया जाता है।