Tagged: Sheeba Aslam Fehmi

हमारी फिल्‍मों के दलित चरित्र इतने निरीह क्‍यों हैं? 29

हमारी फिल्‍मों के दलित चरित्र इतने निरीह क्‍यों हैं?

शीबा असलम फहमी ♦ हमारी फिल्मों में तो कल्पना भी नहीं की जाती एक ‘कम-जात’ के प्रतिभावान होने की! अगर इसके बर-अक्स आप को कोई ऐसी फिल्म याद आ रही हो, तो मेरी जानकारी में इजाफा कीजिएगा… हां खुदा न खासता अगर कोई प्रतिभा होगी तो तय-शुदा तौर पर अंत में वो कुलीन परिवार के बिछड़े हुए ही में होगी। ‘सुजाता’ याद है आपको? कितनी अच्छी फिल्म थी। बिलकुल पंडित नेहरु के जाति-सौहार्द को साकार करती! अछूत-दलित कन्या ‘सुजाता’ को किस आधार पर स्वीकार किया जाता है, और उसे शरण देनेवाला ब्राह्मण परिवार किस तरह अपने आत्म-द्वंद्व से मुक्ति पाता है? वहां भी उसकी औकात-जात का वर ढूंढ कर जब लाया जाता है, तो वह व्यभिचारी, शराबी और दुहाजू ही होता है, और कमसिन सुजाता का जोड़ बिठाते हुए, अविचलित माताजी के अनुसार ‘इन लोगों में यही होता है’।

साहित्य में लोकतंत्र के बहाने वर्चस्व की साजिश 20

साहित्य में लोकतंत्र के बहाने वर्चस्व की साजिश

अनीता भारती ♦ “गौरवशाली” हिंदू भारतीय संस्कृति और उसको महिमामंडित करने वालों ने एक को श्रेष्ठ साबित करने के लिए दूसरे को हमेशा पददलित किया है। अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ तीरंदाज घोषित करने के लिए एकलव्‍य का अगूंठा काटा जाना जरूरी है। ज्ञान सिर्फ एक वर्ग और जात की बपौती बनी रहे, इसलिए शंबूक का सिर काट दिया जाना चाहिए। सुदीप्ति जी यह मैं आपको, आपके ही वर्ग-जाति के इतिहासकारों द्वारा लिखे गये “इतिहास” से केवल एक-दो ही उदाहरण दे रही हूं। पुरातन काल से लेकर आधुनिक काल में भूमंडलीकरण तक इतिहासकारों से लेकर साहित्यकारों के ब्राह्मणवादी जातीय पूर्वाग्रह ज्यों के त्यों खड़े हैं, जिसका ताजा उदाहरण आपका तिलमिला कर शीबा को आक्रामक तरीके से डांट-डपट करते हुए एक तीर से कई निशाने एक साथ साधना है।

क्‍या एक को मिटा कर ही दूसरे को जगह मिलेगी? 23

क्‍या एक को मिटा कर ही दूसरे को जगह मिलेगी?

सुदीप्ति सिंह ♦ सवाल ये है कि जब दोनों ऐतिहासिक चरित्रों में विरोध नहीं, सहयोग था, तब हम ऐसी शर्त क्‍यों रखें कि एक को सामने आना चाहिए, दूसरे को अंधेरे में चले जाना चाहिए? साथ ही सवाल यह भी है कि साहित्‍य, राजनीति, विज्ञान, कला आदि के इतिहास में छूट गये लोगों को क्‍या दर्ज कर लिये गये लोगों की कीमत पर ही जगह मिलेगी? हम आज मार्टिन गेरे या मिनोकियो के बारे में सूचना फैलाएं लेकिन न्‍यूटन शेक्‍सपियर और रूसो को हटा दें, क्‍योंकि पहले ही इन्‍हें इतनी जगह मिल चुकी है? मेरे गांव के मनीराम मांझी को देश के इतिहास में जगह नहीं मिली और उन्‍हें तभी जगह मिलेगी, जब महात्‍मा गांधी को रिप्‍लेस कर दिया जाए? ये कैसा तर्क है?

नजर पर पर्दा या जिस्‍म पर पर्दा… देखिए स्‍पेशल रिपोर्ट! 4

नजर पर पर्दा या जिस्‍म पर पर्दा… देखिए स्‍पेशल रिपोर्ट!

डेस्‍क ♦ एनडीटीवी इंडिया हर शुक्रवार को प्राइम टाइम में रात साढ़े नौ बजे रवीश की रिपोर्ट नाम से, मुद्दों से जुड़ा विशेष कार्यक्रम प्रसारित करता है। इसी कड़ी में, मुस्लिम महिलाओं के बुर्के को लेकर जारी किये गये देवबंद के एक मौलाना के फतवे पर उठे व्यापक वाद-विवाद को समेटते हुए परदे में नजर प्रसारित हुआ। रवीश एक परिपक्व और मंझे हुए रिपोर्टर हैं। पिछले 15 वर्षों के रिपोर्टिंग के अनुभवों ने उन्हें मुद्दे की संवेदनशीलता और व्यापकता दोनों को सहेजने में माहिर बना दिया है। इसी महारत के साथ उन्होंने इस संवेदनशील और अंतरराष्‍ट्रीय बन चुके मुद्दे को भी उसके तमाम पहलुओं के साथ उभारा। इस मसले पर जब दुनिया भर में बच्चे से ले कर बूढ़ा तक एक तयशुदा नजरिया बना चुका है, रवीश ने पक्ष-विपक्ष के स्वर उभारे।

लेखक बेहतर राष्‍ट्रीय प्रवक्‍ता हो सकते हैं, पर वे सुस्‍त हैं 25

लेखक बेहतर राष्‍ट्रीय प्रवक्‍ता हो सकते हैं, पर वे सुस्‍त हैं

डेस्‍क ♦ साहित्य और मीडिया दो ऐसे पड़ोसी देश की तरह हैं जो हमेशा एक दूसरे से लड़ते रहते हैं। इनकी दुश्मनी पुरानी है। फिर भी साहित्य को मीडिया की जरूरत है। मीडिया को साहित्य की जरूरत है। मशहूर कथाकार और हंस के संपादक राजेंद्र यादव ने ये बातें मंगलवार को दिल्‍ली के इंडिया हैबिटैट सेंटर के गुलमोहर सभागार में कहीं। मौका था मोहल्‍ला लाइव, जनतंत्र और यात्रा बुक्‍स की साझेदारी में पहले बहसतलब का। मीडिया में साहित्‍य की खत्‍म होती जगह पर बोलते हुए उन्‍होंने कहा कि हमें एक खास तरह के साहित्य को ही साहित्य मानने की मानसिकता से उबरने की जरूरत है। जिस वक्त ऐसा होने लगेगा इस बहस को एक निष्कर्ष मिलता दिखाई देने लगेगा।

साहित्‍य और मीडिया पर आज बहसतलब, हैबिटैट आएं 13

साहित्‍य और मीडिया पर आज बहसतलब, हैबिटैट आएं

डेस्‍क ♦ क्‍या हिंदी साहित्‍य मीडिया के लिए सेलेबल कमॉडिटी (बिकाऊ माल) क्‍यों नहीं है? इस मसले पर हिंदी की वर्चुअल दुनिया के सबसे पॉपुलर मंच जनतंत्र/मोहल्‍ला लाइव और पेंगुइन प्रकाशन के हिंदी सहयोगी यात्रा बुक्‍स के साझा प्रयास से एक सेमिनार का आयोजन किया गया है। 18 मई की शाम सात बजे इंडिया हैबिटैट सेंटर, नयी दिल्‍ली के गुलमोहर सभागार में आयोजित इस सेमिनार में हिंदी साहित्‍य और मीडिया के पांच जरूरी नाम सेमिनार में अपनी बात रखेंगे। ये वक्‍ता होंगे : राजेंद्र यादव, सुधीश पचौरी, ओम थानवी, रवीश कुमार और शीबा असलम फहमी।

सारा मीडिया बिहारियों से भरा-पड़ा है, लेकिन… 3

सारा मीडिया बिहारियों से भरा-पड़ा है, लेकिन…

शीबा असलम फ़हमी ♦ बिहारियों को अपने नेताओं से ये सवाल करना चाहिए की इतना संसाधनपूर्ण प्रदेश कैसे ‘ग़रीब की जोरू गांव की …’ बनाया गया। तसलीमा और मकबूल फ़िदा पर बिना थके फैशन के तहत, सतर दर सतर लिखनेवालों में भी यही बिहारी जन आगे होते हैं। सारा मीडिया बिहारियों से भरा पड़ा है। लेकिन सब अपनी अपनी निरंकुशता और भ्रष्टाचार को पालने में सारी मेधा झोंक रहे हैं (अपवादों का एहतराम है मुझे और सबको)। भला हो ठाकरे परिवार का, जिसने हम पर जूता उठाया, तो अपनी अपनी ज़ात के गर्व से उबर कर सब यूपी / बिहारवाले अपनी औक़ात समझे।

कमेंट बॉक्‍स में राग पुरस्‍कार: दिल्‍ली की जय 4

कमेंट बॉक्‍स में राग पुरस्‍कार: दिल्‍ली की जय

शीबा असलम फ़हमी ♦ दीन-हीन-मिस्कीन लेखकों ने रीढ़वाला होने का एहसास कराया। जो सरकार साहित्य के ‘स’ से भी ना-बलद है, वो साहित्यकारों को तौल रही है। ये सभी क़ाबिले एहतराम हैं! कमाल ये कि कुछ बुद्धिजीवियों को ‘दिल्ली’ और ‘वर्तमान दिल्ली सरकार’ में फ़र्क़ नहीं मालूम। दिल्ली पर हर भारतवासी का उतना ही हक़ है जितना किसी ‘दिल्लीवाले’ का। जो ‘बाहरवाले’ दिल्ली आ कर ‘कुछ’ बन जाते हैं वे अपनी मेधा और मेहनत से बनते हैं। दिल्ली सरकार या दिल्लीवाले उन्हें रेआयत में कुछ नहीं दे देते। इसलिए दिल्ली के ना होने क बावजूद दिल्ली में सफलता से स्थापित होने वालों को याचक भाव से मुक्ति पा लेनी चाहिए।

अपनी बेटियों से डरे हुए लोग! 8

अपनी बेटियों से डरे हुए लोग!

शीबा असलम फहमी ♦ वे जानते ही नहीं कि मुस्लिम महिलाएं इस्लाम में रह कर जेंडर-जिहाद कर रही हैं और कठमुल्लों की सत्ता को रौंद रही हैं। पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान जहां शिक्षा, लोकतांत्रिक मूल्य आदि अपनी शैशवावस्था में हैं, वहां मुशर्रफ के खिलाफ, लोकतंत्र के हक में जो प्रदर्शन हो रहे हैं, उनमें औरतों की भागीदारी विस्मित करती है। भारत में सारी आजादी के बावजूद मिडिल-क्लास में जुझारू महिलाओं का कैसा टोटा है? यही नहीं, इराक-इरान, इंडोनेशिया, तुर्की, बालकन राज्य सभी जगह मुस्लिम औरतें मुखर हैं। अप्रवासी मुस्लिम समाजों में इज्तेहाद और जेंडर-जिहाद एक विचारधारा के तौर पर उभर कर सामने आ रहे हैं। पढ़ी-लिखी, कमाऊ औरतें अपने-अपने मर्दों की बखूबी नकेल कस रही हैं।

शीबा असलम फाहमी को गुस्सा क्यों आता है? 7

शीबा असलम फाहमी को गुस्सा क्यों आता है?

सुनील दीपक ♦ उन्होंने पूछा कि क्या मैंने उनका “हंस” के नवंबर अंक वाला लेख पढ़ा या नहीं और कैसा लगा? मैंने कहा कि अभी नहीं पढ़ा, क्योंकि पत्रिका इटली आने में कुछ देर लगाती है और मेरे घर से यात्रा के लिए चलने तक नवंबर अंक नहीं पहुंचा था। इसलिए उनसे वायदा किया कि जब पढ़ूंगा तो उसके बारे में अपनी राय अवश्य दूंगा। भारत से घर वापस लौटे दस दिन हो गये, तो उनका एक अन्य संदेश मिला कि लेख पढ़ा या नहीं? तो रात को सोने से पहले, सोचा कि लेख को पढ़ने की कोशिश की जाये। पढ़ा तो नींद छू मंतर हो गयी, बहुत देर तक सोचता रहा, शीबा जी के गुस्से के बारे में।