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नॉर्थ ईस्‍ट से आयी कहानी : रेडियो राघोपुर 3

नॉर्थ ईस्‍ट से आयी कहानी : रेडियो राघोपुर

डेस्‍क ♦ दिनकर कुमार हिंदी के उन कुछ नामों में से हैं, जो गैर हिंदी भाषी इलाके में रहते हुए लंबे अरसे से अभिव्‍यक्ति का अहम मोर्चा संभाले हुए हैं। वे नॉर्थ ईस्‍ट में रहते हैं। दैनिक सेंटीनल नाम के एक हिंदी अखबार के संपादक हैं। पिछले महीने मोहल्‍ला लाइव पर हिंदी सिनेमा में आम आदमी खोज करते हुए जब एक बहस चली, तो फिल्‍मकार अनुराग कश्‍यप ने सुझाव दिया कि इस वर्चुअल मंच पर कहानी पाठ किया जाए। उन पर बात हो। बात जमे, तो उस पर फिल्‍म बनाने के बारे में सोचा जाए। संसाधन के स्‍तर पर जो भी सरंजाम होगा, अनुराग उसको डील करेंगे। कुछ शुरुआती कहानियों में दिनकर जी की कहानी रेडियो राघोपुर हमारे पास आयी थी। तब उन्‍होंने कहानी की स्‍कैन कॉपी हमारे पास भेजी थी।

एक और कहानी आयी है, हाइवे पर संजीव का ढाबा 14

एक और कहानी आयी है, हाइवे पर संजीव का ढाबा

कैलाश चंद चौहान ♦ “बताता हूं। शहर में एक लड़का काम करता था। उसे किसी ने बताया कि यहां एक बना बनाया प्लाट बिकाऊ है। इसमें तीन कमरे बने हुए थे। मालिक अपने लड़के को अमेरिका पढ़ाई के लिए भेजना चाहता था। मौका अच्छा था, मैं क्यों चूकता! कुछ जमीन गांव में घर के साथ वाली बेची, तीन बीघा खेत की जमीन थी, वह भी बेच दी। कुछ पैसा मैंने शहर में काम करके इकट्ठा किया हुआ था। शहर में हमारे कुछ रिश्ते थे, उन्होंने भी मेरी सहायता की। प्‍लॉट बेचने वाले भी सज्जन थे। वह भी कुछ पैसा किस्‍तों में लेने को तैयार हो गये। कहते हैं न जहां चाह, वहां राह।”

जमशेदपुर से शेखर मल्लिक ने भेजी कहानी 5

जमशेदपुर से शेखर मल्लिक ने भेजी कहानी

शेखर मल्लिक ♦ ऐसे देश में जहां भगतसिंह और मार्क्स को पढ़ना अनपढ़ या अल्पपढ़ सत्ता की आंखों में अपराध है, खूंखार नक्सली साहित्य रखने और नक्सलियों को गुपचुप मदद करने जैसी संदिग्ध गतिविधियों में लिप्त होने के पर्याप्त सबूत पुलिस उसके ठिकाने से उगाह चुकी थी। वह पुस्तिका भी, जिसके जलते हर्फे थे, “… की रात लांगो गांव मौत की काली चादर ओढ़े थी… बड़ी बेरहमी से कत्ल किया गया था जनता की वीर संतान … का। कुछ अक्षरों में उन वीर शहीदों की जीवन गाथा समाप्त नहीं हो सकती। सिद्दो-कान्हू-बिरसा-तिलका की परंपरा से अनुप्राणित ये योद्धा शोषणमुक्त समाज तैयार करने के लक्ष्य में अपनी जिंदगी के अंत तक काम करते रहे…

लखनऊ से आयी एक कहानी : दंगा भेजियो मौला! 9

लखनऊ से आयी एक कहानी : दंगा भेजियो मौला!

डेस्‍क ♦ जैसा कि लेखक ने हमें बताया है कि यह दलित कथा नहीं है और फिल्म बनाने के वास्ते भी नहीं है। झिंझोड़ने का मुगालता भी नहीं है। पैसे और तकनीक से सहज सुलभ उन्मादों और कुंठाओं के आनंद से इतराते इस समय में इतने हाई परफार्मेंस वाले “शाक एब्जार्वर” आ चुके हैं कि कोई भी झटका पर्याप्त कंपन पैदा नहीं कर पाता। दलितों के अलावा और भी लोग हैं, जो खामोशी से अपने-अपने नरक जी रहे हैं। यह कहानी कथाक्रम पत्रिका के जुलाई-सितंबर 2003 अंक में छपी और अब मोहल्‍ला लाइव में छपने के लिए आयी है।

मैं हार मानता हूं, आप जीते, आपकी बात आखिरी… 13

मैं हार मानता हूं, आप जीते, आपकी बात आखिरी…

अनुराग कश्‍यप ♦ हमारे यहां वो नहीं हो सकता, जो यूरोप और अन्‍य देशों में हुआ है। हमारे देश में डेमोक्रेसी के मायने अलग हैं। हमारे यहां पिक्‍चरों में मोची, चमार, बार्बर, तेली जैसे शब्‍द काट दिये जाते हैं, क्‍योंकि उनके जो पॉलिटिकल रिप्रजेंटेटिव हैं, वो आई और बी मिनिस्‍ट्री पे चढ़ बैठते हैं, जो सेंसर बोर्ड पे चढ़ बैठता है। गुलाल में से सिर्फ दो शब्‍द सेंसर किये गये, जब पृथ्‍वी बना कहता है, सारे गोल चश्‍मे वाले ऐसे ही होते हैं, गांधी अंबेदकर। उनके चश्‍मे गोल थे, अंडरस्‍टैंडिंग भी गोल थी। गांधी और अंबेडकर काट दिया गया। वाक्‍य का मतलब क्‍या रहा? आपका आइडियलिज्‍म जो है, यहां के यथार्थ में रह कर इस्‍तेमाल करिए।

दिनेश श्रीनेत की कहानी: विज्ञापन वाली लड़की 4

दिनेश श्रीनेत की कहानी: विज्ञापन वाली लड़की

डेस्‍क ♦ विज्ञापन वाली लड़की। कानपुर से दिनेश श्रीनेत्र ने ये कहानी भेजी है। हालांकि ये दलित की कहानी नहीं है, फिर भी इसे आप सबसे साझा कर रहे हैं – क्‍योंकि ये इसी उद्देश्‍य से भेजी गयी है। यह कहानी सबसे पहले वागर्थ के अप्रैल 2006 के अंक में प्रकाशित हुई और सराही गयी थी। इसके बाद कहानी का उर्दू में अनुवाद हुआ और यह उर्दू आजकल में प्रकाशित हुई। उर्दू के पाठकों ने इसे इतना पसंद किया कि यह बाद में पाकिस्तान से आसिफ फारुकी के संपादन में निकलने वाली पत्रिका दुनियाजाद में प्रकाशित हुई। जैसा कि लेखक ने हमें जानकारी दी है, यह अब तक उनकी पहली और इकलौती प्रकाशित कहानी है। कहानी अभी और भी है, पढ़ते रहिए मोहल्‍ला लाइव। किसी भी कहानी पर फिल्‍म बनाने के लिए लेखक की अनुमति आवश्‍यक है।

इंदौर से आयी पहली कहानी : लुगड़ी का सपना 13

इंदौर से आयी पहली कहानी : लुगड़ी का सपना

डेस्‍क ♦ लुगड़ी का सपना। इस शीर्षक से इंदौर में रहने वाले सत्‍यनारायण पटेल ने पहली कहानी भेजी है। भारत की वृहत्तर नागरिकता से अलग अजीब और अभिजात नायकों की कहानी कहने वाले हिंदी सिनेमा में आम आदमी की कहानी खोजने की यह एक कोशिश है। अनुराग ने कहा है कि मोहल्‍ले पर ऐसी कहानियों को सार्वजनिक किया जाए। उस पर बात होगी। बहस होगी। कहानी अगर झिंझोरने वाली होगी और सब उस कहानी के मर्म से घायल होंगे, तो अनुराग उस पर फिल्‍म बनाएंगे – उसके लिए पैसे जुटाएंगे। मोहल्‍ला लाइव के पास एक और स्‍टोरी-आइडिया की स्‍कैंड कॉपी आयी है। इसके बाद हम उसे सार्वजनिक करेंगे। किसी भी कहानी पर फिल्‍म बनाने के लिए लेखक की अनुमति आवश्‍यक है।

समाज बदलता है, तो फिल्में भी बदलती हैं अनुराग 12

समाज बदलता है, तो फिल्में भी बदलती हैं अनुराग

दिलीप मंडल ♦ प्रधानमंत्री पिछले छह साल से कह रहे हैं कि वामपंथी उग्रवाद आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती है, लेकिन देश के सामने जो सबसे बड़ा सवाल है, उस पर हमारी फिल्में पक्ष या विपक्ष में क्या बोलती हैं। बोलती भी हैं या चुप रहती हैं? 9/11 की थीम के आसपास भारत में न्यूयॉर्क और माई नेम इज खान जैसी फिल्में बनती हैं, लेकिन भारतीय सवालों पर चुप्पी क्यों है? गुजरात दंगों पर फिल्म बनाने के लिए केंद्र में कांग्रेस की सरकार के आने का इंतजार क्यों होता है? औद्योगीकरण, मूलनिवासियों के विस्थापन और विकास के सवालों पर जेम्स कैमरोन अवतार जैसी फिल्म बनाते हैं और पैसे भी कमाते हैं। भारत में फिल्मों के लिए यह वर्जित विषय क्यों है? यह आप भी मानेंगे कि भारतीय समाज और सिनेमा की बहस में तो अभी सवाल भी ढंग से फ्रेम नहीं हुए हैं।

अपनी इसी अदा से अनुराग मुझे प्‍यारे हैं: हंसल मेहता 2

अपनी इसी अदा से अनुराग मुझे प्‍यारे हैं: हंसल मेहता

डेस्‍क ♦ अनुराग कश्‍यप की बातों का बवंडर फेसबुक की दुनिया में भी पहुंचा। फिल्‍मकार हंसल मेहता ने अपने वॉल पर इस टैग के साथ अनुराग कि टिप्‍पणी छापी कि This is why I love Anurag Kashyap! यानी अपनी इसी अदा से अनुराग मुझे प्‍यारे हैं। वहां भी अनुराग के गुस्‍से और अनुराग के लहजे में ज्‍यादा लोग उलझे, कम ही थे जिनकी पकड़ में असल अर्थ आ रहे थे। लोगों की प्रतिक्रियाओं को अलग रखते हैं, तो हम देख रहे हैं कि एक ही समय के दो युवा फिल्‍मकार लहजे को लेकर कॉन्‍शस होने से ज्‍यादा इस बात को लेकर कॉन्‍शस हैं कि उनके निहितार्थ क्‍या होते हैं। शमशेर कहते थे, बात बोलेगी हम नहीं। हम कैसे भी हों, अश्‍लील-फूहड़-संस्‍कारी-रूपवान, हमारे विचारों की तासीर ही हमारी तकदीर तय करेगी।

समाज न बदल पाने की कुंठा सिनेमा पर न उतारिए 26

समाज न बदल पाने की कुंठा सिनेमा पर न उतारिए

अनुराग कश्‍यप ♦ सिनेमा से समाज बदलना है, आंदोलन करना है, तो उतरिए और मदन मोहन मालवीय की तरह भीख मांगिए, पैसा जो‍ड़‍िए और बनाइए। फिल्‍म की तुलना साहित्‍य और पेंटिंग से न ही करें तो अच्‍छा है। और यदि नहीं कर सकते तो कृपया सिनेमा को अपने आंदोलनों से मुक्‍त करें। विमर्श करिए, बहस करिए, हाथ में बंदूक उठाइए और बदलिए समाज को। मेरी कोशिश बस इतनी है कि सिनेमा अगर एक इंच भी बदल सकूं तो बस उतनी जिम्‍मेदारी चाहिए, जो मैंने उठायी है। जो जिम्‍मेदारी आपने उठायी है, उसे आप निभाइए। अपनी जिम्‍मेदारी न निभा पाने का, समाज को न बदल पाने का फ्रस्‍ट्रेशन सिनेमा पर न उतारिए – अपना ही समय व्‍यर्थ करेंगे आप।