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किसानों के प्रति अपनी सदियों की चिढ़ से उबरिए पचौरी जी 12

किसानों के प्रति अपनी सदियों की चिढ़ से उबरिए पचौरी जी

सुनील अमर ♦ आपने तो अपने इस एक लेख से ही किसानों के प्रति अपनी सदियों की चिढ़, घृणा और कुत्सित सोच का खुलासा कर दिया। कितने छुपे रुस्तम हैं आप कि जिस किसान के पसीने से पैदा हुए अनाज को खाकर आपने स्वयं को वेदव्यास के आसन पर आसीन कर लिया, उसी किसान की खुशहाली के विरुद्ध ऐसी षडयंत्रपूर्ण सोच?

नये किसानों को आपातकाल से पहले वाला नोएडा चाहिए 0

नये किसानों को आपातकाल से पहले वाला नोएडा चाहिए

सुधीश पचौरी ♦ मीडिया में काम करने वालों का गांव नहीं होता। किसी का गांव हुआ भी तो वह उसे छिपा लेता है। गांव चमकदार मीडिया में गांव पिछड़ेपन की शर्म है। किसान जीवन पर बनी कुछ पुरानी फिल्मों में किसान दिखता दिखता है। दो बीघा जमीन, मदर इंडिया जैसी फिल्मों में दिखता है। यह गरीब शोषित है। मीडिया के लिए पुराने किसान का यही स्टीरियो टाइप है।

लेखक बेहतर राष्‍ट्रीय प्रवक्‍ता हो सकते हैं, पर वे सुस्‍त हैं 25

लेखक बेहतर राष्‍ट्रीय प्रवक्‍ता हो सकते हैं, पर वे सुस्‍त हैं

डेस्‍क ♦ साहित्य और मीडिया दो ऐसे पड़ोसी देश की तरह हैं जो हमेशा एक दूसरे से लड़ते रहते हैं। इनकी दुश्मनी पुरानी है। फिर भी साहित्य को मीडिया की जरूरत है। मीडिया को साहित्य की जरूरत है। मशहूर कथाकार और हंस के संपादक राजेंद्र यादव ने ये बातें मंगलवार को दिल्‍ली के इंडिया हैबिटैट सेंटर के गुलमोहर सभागार में कहीं। मौका था मोहल्‍ला लाइव, जनतंत्र और यात्रा बुक्‍स की साझेदारी में पहले बहसतलब का। मीडिया में साहित्‍य की खत्‍म होती जगह पर बोलते हुए उन्‍होंने कहा कि हमें एक खास तरह के साहित्य को ही साहित्य मानने की मानसिकता से उबरने की जरूरत है। जिस वक्त ऐसा होने लगेगा इस बहस को एक निष्कर्ष मिलता दिखाई देने लगेगा।

साहित्‍य और मीडिया पर आज बहसतलब, हैबिटैट आएं 13

साहित्‍य और मीडिया पर आज बहसतलब, हैबिटैट आएं

डेस्‍क ♦ क्‍या हिंदी साहित्‍य मीडिया के लिए सेलेबल कमॉडिटी (बिकाऊ माल) क्‍यों नहीं है? इस मसले पर हिंदी की वर्चुअल दुनिया के सबसे पॉपुलर मंच जनतंत्र/मोहल्‍ला लाइव और पेंगुइन प्रकाशन के हिंदी सहयोगी यात्रा बुक्‍स के साझा प्रयास से एक सेमिनार का आयोजन किया गया है। 18 मई की शाम सात बजे इंडिया हैबिटैट सेंटर, नयी दिल्‍ली के गुलमोहर सभागार में आयोजित इस सेमिनार में हिंदी साहित्‍य और मीडिया के पांच जरूरी नाम सेमिनार में अपनी बात रखेंगे। ये वक्‍ता होंगे : राजेंद्र यादव, सुधीश पचौरी, ओम थानवी, रवीश कुमार और शीबा असलम फहमी।

माओवाद मिथक नहीं है, हां… एक रूमान ज़रूर है! 5

माओवाद मिथक नहीं है, हां… एक रूमान ज़रूर है!

सुधीश पचौरी ♦ रूमानी क्रांतिकारिता की मार्क्‍सवादी आंदोलनों में लंबी परंपरा रही है। यह क्रांति से पहले रूस में भी रही जिसे देख कर लेनिन ने इसे एक ‘बचकाना मर्ज’ तक कहा। रूमानी क्रांतिकारिता की उप-लहर बनी रही और कम्युनिस्टों के बीच बहस का मुद्दा बनती रही। ‘उत्तर सोवियत काल’ में और ‘उत्तर चीनी समाजवाद’ के इस नव उदारवादी या ‘लेट केपीटलिज्म’ के दौर में यह रूमानियत एक पापुलर व्यवहार भी बनी है। नव उदारवाद के वातावरण में ‘ऑफिसियल’ मानी जाने वाली बड़ी पार्टियों तक में इस रूमानियत ने जगह बनायी है। लातिन अमेरिका में कुछ देशों में वामपंथियों के चुनाव जीतने को कम्युनिस्टों के बीच कुछ इस तरह देखा-दिखाया गया मानो साम्राज्यवाद की कब्र खुद गयी हो!

प्रोफेसर पचौरी का लैक्‍चर : जो भाषा अड़ गयी, वो सड़ गयी 2

प्रोफेसर पचौरी का लैक्‍चर : जो भाषा अड़ गयी, वो सड़ गयी

विनीत कुमार ♦ लाइफबॉय के विज्ञापन पर अगर करोड़ों रुपये खर्च किये जाते हैं तो उसके साथ रोज दस लाख साबुन की बट्टियां बेचने का टार्गेट होता है। अगर हिंदी की ये दो लाइन के विज्ञापन को देखकर कन्ज्यूमर उससे जुड़ नहीं पाता तो करोड़ों का नुकसान होगा। इसलिए हिंदी भाषा के जरिये सिर्फ संप्रेषण का काम नहीं हो रहा है बल्कि इसके पीछे एक भारी इन्वेस्टमेंट और बिजनेस का रिस्क जुड़ा हुआ है। हिंदी को लेकर जिस भाषा विस्तार और भौगोलिक क्षेत्र की बात करते हैं प्रोफेसर पचौरी ने उसे कन्ज्यूमर रिच यानी उपभोक्ता की पहुंच के तौर पर विश्लेषित किया।

पॉपुलर कल्‍चर पर सुधीश पचौरी का लेक्‍चर सुनने आइए 4

पॉपुलर कल्‍चर पर सुधीश पचौरी का लेक्‍चर सुनने आइए

डेस्‍क ♦ पॉपुलर संस्कृति के बीच पैदा होनेवाली तमाम बहसों पर अपनी बात रखने के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय ने पॉपुलर लेक्चर सीरीज़ के तहत मीडिया विशेषज्ञ और हिंदी विभाग (डीयू) के अध्यक्ष प्रो सुधीश पचौरी को आमंत्रित किया है। विश्वविद्यालय प्रत्येक 15 दिनों के अंतराल में अकादमिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और समसामयिक मसलों से जुड़े विषयों पर विशेष व्याख्यान का आयोजन करता है। प्रो सुधीश पचौरी को इसी योजना के तहत आमंत्रित किया गया है। प्रो पचौरी विभिन्न अखबारों और पत्रिकाओं में पॉपुलर संस्कृति और मास मीडिया पर न केवल लगातार लेख लिखते रहे हैं बल्कि पॉपुलर संस्कृति पर स्वतंत्र रूप से किताब भी लिखी है। उनका लेक्‍चर 17 सितंबर को रखा गया है।

पार्टनर! तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है? 5

पार्टनर! तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?

♦ अनंत विजय हिंदी के जादुई यथार्थवादी कहानीकार उदय प्रकाश इन दिनों फिर से विवादों में घिरे हैं। विवाद की जड़ में है – पांच जुलाई को गोरखपुर में गोरक्षपीठ के कर्ताधर्ता और बीजेपी सांसद...