Tagged: TED

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साइबर बुलींग प्रताड़ना का नया कल्‍चर है

♦ मोनिका लेंविस्‍की आपके सामने एक ऐसी औरत खड़ी है, जो सार्वजनिक तौर पर दस साल से ख़ामोश रही। ज़ाहिर है, वो ख़ामोशी टूट रही है, और ये हाल में ही शुरू हुआ है।...

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मैंने मलाला को उड़ने दिया, पर नहीं काटे

♦ जियाउद्दीन युसुफजई पितृसत्तात्मक समाजों और आदिवासी समाजों में आमतौर पर पिता को बेटों से जाना जाता है। लेकिन मैं उन कुछ पिताओं में से हूं, जो अपनी बेटी से जाने जाते हैं और...

कामों का बोझा बढ़ाने से बेहतर है एक ही चीज साधें 0

कामों का बोझा बढ़ाने से बेहतर है एक ही चीज साधें

पओलो कार्डिनी ♦ आप कभी वेनिस गये हो? छोटी गलियों में खुद को खोना कितना खूबसूरत है उस द्वीप पर। लेकिन हमारी मल्टीटास्किंग दुनिया कुछ अलग है। हजारों सूचनाओं से भरी। ऐसे में कैसा रहेगा फिर से अपनी साहस की किशोर भावना को पाना? मैं जानता हूं कि मोनो-टास्किंग के बारे में बात करना अजीब है, जब हमारे पास इतने सारे विकल्प हैं। लेकिन मैं फिर आपको कहता हूं केवल एक काम पर ध्यान दो या अपनी डिजिटल भावनाओं को बंद ही कर दो। ताकि आजकल, सब अपनी मोनो चीज बना सकें। क्यूं नहीं? तो अपनी मोनोटास्क वाली जगह ढूंढ लो… इस मल्टीटास्किंग दुनिया में।

मल्‍टीनेशनल गिरोह से कुछ ऐसे निकला सैनेटरी नैपकिन! 4

मल्‍टीनेशनल गिरोह से कुछ ऐसे निकला सैनेटरी नैपकिन!

अरुणाचलम मुरुगनाथम ♦ अगर कोई पैसे के पीछे ही भागता रहे, तो जीवन में कोई सुंदरता नहीं बचेगी। जिंदगी बड़ी उबाऊ होगी। बहुत से लोग ढेर सारा पैसा बनाते हैं, करोड़ों, अरबों रुपये जमा करते हैं। इस सबके बाद वो आखिर में समाजसेवा करने आते हैं, क्यों? पहले पैसों का ढेर बनाकर फिर समाजसेवा करने आने का क्या मतलब है? क्यों न पहले दिन से ही समाज के बारे में सोचें? इसीलिए, मैं ये मशीन केवल ग्रामीण भारत में, ग्रामीण महिलाओं को दे रहा हूं। क्योंकि भारत में, आपको जानकर आश्चर्य होगा, केवल दो प्रतिशत महिलाएं सैनेटरी नैपकिन इस्तेमाल करती हैं। बाकी सभी, फटे-पुराने, पोछे-नुमा कपड़े, पत्ते, भूसा, लकड़ी का बुरादा – इसी सब से काम चलाती हैं – सैनेटरी नैपकिन नहीं। इस 21वीं सदी में भी ये हाल है।

मैं सफीना हुसैन हूं! मुझे सुनिए, क्‍योंकि मैं टीम बालिका हूं!! 3

मैं सफीना हुसैन हूं! मुझे सुनिए, क्‍योंकि मैं टीम बालिका हूं!!

सफीना हुसैन ♦ सरकारी स्‍कूल असफल साबित हो रहे हैं क्‍योंकि उनका कोई मालिक नहीं है! एक प्राइवेट स्‍कूल क्‍यों सफल होता है? क्‍योंकि अभिभावक पैसा देते हैं और वे परिणाम देखना चाहते हैं, क्‍योंकि वहां एक संचालक मंडल हाता है, निदेशक बोर्ड के ट्रस्‍टी होते हैं। स्‍वामित्‍व या शासन और जवाबदेही के कई स्‍तर होते हैं। वहीं दूसरी ओर पब्लिक स्‍कूलों में शिक्षकों को केंद्रीय स्‍तर पर बुलाया जाता है और गांवों में उनका स्‍थानांतरण कर दिया जाता है। माता-पिता अनपढ़ होते हैं और वे कोई भी राय जाहिर करने में असमर्थ होते हैं। तो आप स्‍वामित्‍व का हस्‍तांतरण माता-पिता और समुदाय तक कैसे करेंगे और जरूरी बदलाव कैसे लायेंगे? सबसे पहले हम माता-पिता को सशक्‍त करते हैं और अभिभावक मंडल को प्रशिक्षित करते हैं।

एक अकेला थक जाएगा, मिलकर बोझ उठाना! 2

एक अकेला थक जाएगा, मिलकर बोझ उठाना!

हावर्ड रेनगोल्ड ♦ आधुनिक अर्थशास्त्र का मौलिक सिद्धांत आपको बताएगा कि आता हुआ एक रुपया सिर्फ इसलिए अस्वीकार करना गलत है क्योंकि किसी दूसरे अनजान आदमी को तो 99 रुपये मिल रहे हैं। लेकिन हजारों अमरीकी, यूरोपीय और जापानी विद्यार्थियों के साथ प्रयोगों में एक बड़ी संख्या में वो सारे विभाजन निरस्त हो गये, जो 50-50 के आसपास नहीं थे।

समय आ गया है कि हम सबको पत्रकार बनना होगा! 6

समय आ गया है कि हम सबको पत्रकार बनना होगा!

शुभ्रांशु चौधरी ♦ मैं हमारे राष्ट्रीय कवि रवींद्रनाथ टैगोर की एक कविता के साथ अपनी बात खत्म करता हूं। उन्होंने बहुत साल पहले लिखा था, बांग्ला में : आमरा सोबाई राजा, आमादेर एई राजार राजोत्ते। अर्थात लोकतंत्र के इस नये राज में हम सभी राजा हैं। समय आ गया है कि हम सब को पत्रकार बनना होगा, जिससे कि वही लोकतंत्र मजबूत हो, और हमारा कल बेहतर हो।

जब तक खुद को निर्दोष साबित नहीं करते, आप अपराधी हैं! 0

जब तक खुद को निर्दोष साबित नहीं करते, आप अपराधी हैं!

क्ले शर्की ♦ पीपा और सोपा इस मीडिया मोनोपोली और नागरिक अधिकार के बीच युद्ध की दूसरी कड़ी है। मगर जहां डीएमसीए अंदर घुस कर काम करता था … कि हम आपके कंप्‍यूटर में घुसे हैं, आपके टीवी का हिस्सा हैं, आपके गेम मशीन में मौजूद हैं, और उसे वो करने से रोक रहे हैं, जिसके वादे पर हमने उन्हें खरीदा था … पीपा और सोपा तो परमाणु विस्फोट जैसे हैं और ये कह रहे हैं कि हम दुनिया में हर जगह पहुंच कर कंटेंट को सेंसर करना चाहते हैं।

अगर वाकई कुछ करना है, तो डिग्रियों को फेंक दीजिए! 20

अगर वाकई कुछ करना है, तो डिग्रियों को फेंक दीजिए!

बंकर रॉय ♦ मैं अपनी बात ये कहके खत्‍म करना चाहूंगा कि कि समाधार आपके अंदर ही होता है। समस्‍या का हल अपने अंदर ढूंढिए। और उन लोगों की बात सुनिए, जो आपसे पहले समाधान कर चुके हैं। सारी दुनिया में ऐसे लोग मौजूद हैं। चिंता ही मत करिए। विश्‍व बैंक की बात सुनने से बेहतर है, आप जमीनी लोगों की बातें सुनें। उनके पास दुनिया भर के हल हैं।

मीटिंगों में आड़ी-तिरछी रेखाएं खींचने वालो, लगे रहो! 2

मीटिंगों में आड़ी-तिरछी रेखाएं खींचने वालो, लगे रहो!

सुन्‍नी ब्राउन ♦ जो लोग शब्दों में निहित जानकारी देखते समय कागज पर आड़ी-तिरछी रेखाएं खींचते हैं, वो उसका ज्यादा बड़ा हिस्सा याद रख पाते हैं, अपने डूडल-हीन साथियों की तुलना में। ऐसा माना जाता है कि डूडल करने वाले का ध्यान भंग हो चुका है, मगर असलियत ये है कि डूडल बनाने से आपका ध्यान बंटने से बचा रहेगा।