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अकादमिक जवाब मत दो, अपना जवाब दो!

➧ अभिषेक गोस्वामी वर्ष 1995, मार्च का महीना। सुबह नौ बजे। मैं जयपुर में धूलेश्वर गार्डन के पिछवाड़े, एक घर के दरवाजे के बाहर खड़ा हूं। दरवाजे पर सूत की एक डोरी लटक रही...

सांस्कृतिक संहार के विरुद्ध ‘भाषा कर रही है दावा’ 2

सांस्कृतिक संहार के विरुद्ध ‘भाषा कर रही है दावा’

♦ सविता मुंडा नब्बे के दौर में रांची रंगमंच जब बहुत सक्रिय था और रांची के साथ-साथ बोकारो, जमशेदपुर, धनबाद, हजारीबाग, कोडरमा आदि जिलों में कई नाट्य समूह लगातार नाटकों का मंचन कर रहे...

हम अपनी सांस्‍कृतिक भूख जनता की शर्तों पर मिटाएं! 0

हम अपनी सांस्‍कृतिक भूख जनता की शर्तों पर मिटाएं!

हृषीकेश सुलभ ♦ सांस्कृतिक भूख की तृप्ति हम जनता की शर्तों पर नहीं, अपनी शर्तों पर कर रहे हैं। कहीं न कहीं हम प्रभुओं की रुचि से संचालित हो रहे हैं। हम वह रंगमंच नहीं कर रहे, जिसकी मांग हमारी जनता कर रही है। सामुदायिक सक्रियता है नाटक, जिसे हमने कुछ लोगों के जिम्मे छोड़ दिया है।

सुनिए, गुनिए… छोटा कद, बड़े हौसले के कुछ लोगों की कहानी 6

सुनिए, गुनिए… छोटा कद, बड़े हौसले के कुछ लोगों की कहानी

आशीष कुमार अंशु ♦ वैसे नाटे कद के लोगों की तलाश और उनको थिएटर के साथ जोड़ना बिल्कुल आसान नहीं था। नाटे कद के ये कलाकार अलग-अलग पृष्ठभूमि से हैं और अलग-अलग कामों से जुड़े हैं। इसलिए चुनौती सिर्फ थिएटर से जोड़ने तक ही सीमित नहीं थी, उससे कहीं बड़ी थी।

प्रतिभा और अपराध साथ साथ नहीं रह सकते! 2

प्रतिभा और अपराध साथ साथ नहीं रह सकते!

अजित राय ♦ यदि आप ऑस्ट्रिया की राजधानी वियेना जाएं, तो वहां की गलियों में महान संगीतकार मोजार्ट के किस्से बिखरे मिलते हैं। मैं 2009 की बरसात में बुडापेस्ट, हंगरी से ट्रेन से वहां गया था। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल के ग्रीष्म महोत्सव में रूसी लेखक अलेक्सांद्र पुश्किन की तीन कहानियों का तुर्कमेनिस्तानी रंगकर्मी वोव्ल्याकुली खोद्जकुली निर्देशित प्रस्तुति देखते हुए मोजार्ट बेहद याद आये। ईर्ष्‍या, व्यभिचार और अहंकार की शताब्दियों से चलती मानवीय दुखांत कथाओं को नयी रंगभाषा में देखना अलग अनुभव है।

“मैं कृष्‍णा कृष्‍ण की” और उत्तर-दक्षिण का एक रंग-संगम 0

“मैं कृष्‍णा कृष्‍ण की” और उत्तर-दक्षिण का एक रंग-संगम

नरेंद्र ♦ एकपात्रीय नाटक की प्रस्तुति अत्यंत चुनौती और जोखिम भरी होती है। पूरे समय मंच पर अकेले स्वयं को प्रस्तुत करना और नाटक में आए सभी चरित्रों को उसके स्वरूप, स्वर व प्रस्तुति से साकार करना और इससे भी बढकर दर्शकों को पूरे समय बांधे रखना बहुत कठिन होता है। विभा ने इस कठिनतम चुनौती को स्वीकार किया और द्रौपदी के मूल चरित्र के अतिरिक्त आए अन्य स्त्री पात्रों सहित पुरुष पात्रों, यथा द्रुपद, युधिष्ठिर, अर्जुन और कृष्ण के रूप को अपने अभिनय, भाव भंगिमा, मुद्राओं तथा स्वर के साथ साकार किया।

पटना ने सफदर को याद किया, आलोकधन्‍वा भी बोले 10

पटना ने सफदर को याद किया, आलोकधन्‍वा भी बोले

आलोकधन्‍वा ♦ अब एक ऐसी पीढ़ी सामने आ रही है, जिसे भारत के स्वतंत्रता आंदोलन एवं अपने क्रांतिकारी इतिहास से कुछ लेना देना नहीं है। उन्हें अच्छी नौकरी चाहिए, इसके लिए वे अपना देश छोड़ देंगे। आपका देश है कहां? आपकी भाषा कौन सी है? आप हिंदी, बांग्ला, तमिल बोलना नहीं चाहते। भारतीय भाषाओं का इतना निरादर कभी न हुआ था। एक ऐसा मनुष्‍य बनाया जा रहा है, जो मनुष्‍य को सबसे कम पहचानता है। भाई, बहनों, मां, बाप को नहीं पहचानता है। एक ऐसा मनुष्‍य हमारे सामने है, जिसके पास सिर्फ पेट और भोग की इंद्रियां हैं, स्वाधीन मस्तिष्‍क जिसके पास नहीं है। कला के लिए प्रेम नहीं है। ऐसे लोगों को कंप्यूटर जितना भी आता हो, मनुष्‍य को ये काफी कम समझते हैं।

गाड़ी, घोड़े, थिएटर… चलते हुए ही अच्‍छे लगते हैं! 11

गाड़ी, घोड़े, थिएटर… चलते हुए ही अच्‍छे लगते हैं!

रामकुमार सिंह ♦ एक दौर था, जब बॉक्‍स ऑफिस पर कतार होती थी और फिल्‍म की रिलीज के बाद यह होता था कि पैसा रखें कहां, लेकिन अब हालत खराब है। वे याद करते हैं कि पिछले दो साल में उनके थिएटर में वांटेड ऐसी फिल्‍म थी, जिसके हाउसफुल शो रहे। ईद का मौका था और उन्‍हें अपने दर्शकों को वापस भेजना पड़ा क्‍योंकि सीट नहीं थी। फिलहाल थिएटर में करीब नौ सौ सीटें हैं, जिनमें सबसे नीचे ड्रेस सर्किल तो उन्‍होंने बंद ही कर रखा है। बालकनी और बॉक्‍स ही बेच रहे हैं। इतने ही दर्शक आते हैं आजकल। प्रकाशजी कहते हैं, छोटे शहरों के लोगों के लिए उस तरह की मनोरंजक फिल्‍में बनना बंद हो गयीं। आइ हेट लव स्‍टोरीज को चूरू जैसे शहर में पहले दिन शाम को शो बंद रखना पड़ा क्‍योंकि कोई देखने वाला ही नहीं था।

आइए, छोटे कस्‍बे के सिनेमाघरों को बचाते हैं… 3

आइए, छोटे कस्‍बे के सिनेमाघरों को बचाते हैं…

अरविंद अरोरा ♦ अब छोटे शहरों और कस्‍बों के सिनेमाघर मालिकों के सामने एक ही रास्‍ता बचता है, जिसे वे हारकर अपनाते ही हैं। और वह रास्‍ता है, अपने थिएटर में सस्‍ती फिल्‍में करना जिनमें से 99 प्रतिशत लो बजट सी ग्रेड हिंदी सिनेमा होता है, और एक प्रतिशत दक्षिण का अंग प्रदर्शन से भरा हिंदी में डब किया हुआ सिनेमा, जिन्‍हें देखने सिनेमाघर जाने की सोचना तो दूर, उनके आसपास से निकलने में भी लोग हिचकते हैं कि कहीं कोई यह न सोचे कि ‘ऐसी वाली’ फिल्म देख कर आ रहे हैं। हालांकि यह प्रवृत्ति आखिरकार सिनेमा का ही नुकसान कर रही है, लेकिन हैरत की और उससे भी ज्‍यादा दु:ख की बात यह है कि ऐसी फिल्‍में प्रदर्शित करके भी सिनेमाघर बहुत अधिक लाभ कमाने की स्थिति में नहीं हैं।

आठ महीने हो गये, पोस्‍टमार्टम रिपोर्ट नहीं आयी… 5

आठ महीने हो गये, पोस्‍टमार्टम रिपोर्ट नहीं आयी…

विकास वैभव ♦ शशि की मृत्यु के बाद जो कुछ हुआ, उसमें एनएसडी की भूमिका हमेशा ही संदिग्ध रही है। एनएसडी ने हमेशा यही कोशिश की कि किसी भी तरह से इस प्रकरण को जल्द से जल्द समाप्त किया जाए। एक तरह से उसकी भूमिका पल्ला झाड़ने वाली ही रही है क्यूंकि इस प्रकरण में अगर जांच बढ़ती, तो एनएसडी और अस्पताल प्रशासन की सांठ-गांठ के कच्चे-चिठ्ठे सामने आने का डर था। इसके अलावा भी एनएसडी में जिस तरह की धांधलियां निरंतर चलती रहती हैं, उसका भी बाहर आने का खतरा था। यही कारण रहा कि एनएसडी प्रशासन और उसके निदेशक ने पूरे प्रकरण पर पानी डालने की कोशिश की और इसे सामान्य मौत बताया और पोस्टमार्टम करवाने की भी जरूरत नहीं समझी।