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विनीत कुमार ♦ ख़बरों के चरित्र को लेकर जब भी टेलीविज़न की आलोचना की जाती है तो प्रिंट मीडिया का सिर अपने आप ही उचक जाता है। बरी कर दिये जाने के दर्प से उसकी अकड़ छिपाये नहीं छिपती। लेकिन इस क्रम में आइस यानी सूचना (मीनिंगलेस), मनोरंजन और उपभोक्तावाद के जरिये पैदा की जानेवाली ठंडी संस्कृति को मज़बूत करने में जुटा है, इस पर भी बात करना ज़रूरी है। आधे-आधे पन्ने में नंबर वन हरियाणा का राग अलापनेवाले अख़बारों से ये सवाल होने चाहिए कि तुरही बजाने की कला में लगातार निष्णात होनेवाले महानुभावो, क्या आपके पास एक कॉलम भी नहीं बचा रह जाता कि सरोकारों से जुड़ी ख़बरें उनमें छापी जा सके।
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मज़्कूर आलम ♦ उनका यह कनफेशन – आप जो चीज़ चलाते हैं, क्या वह आप अपनी मर्जी से चलाते हैं? क्या उसके पीछे कोई व्यवस्था होती है? – बहुत ख़तरनाक है, जो यह बताती है कि बाज़ार कैसे आदमी को कठपुतली में बदल रहा है। उसे मजबूर कर रहा है कि तुम वही करो जो बाज़ार कर रहा है। जबकि पत्रकारिता का मेन इथिक्स ही यह है कि वह उन चीज़ों का विरोध करे, जिसे वह सही नहीं मानता है और उन चीज़ों के पक्ष में मज़बूती से खड़ा हो, जो उसकी नज़र में सही है। लेकिन एक संपादक ही इतना लाचार और मजबूर होकर बयान देगा तो आम आदमी कहां जाएगा, किसके पास जाएगा अपना विरोध लेकर।
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प्रभात रंजन ♦ सच्चाई को स्वीकारना कभी आसान नहीं रहा। होरी की तरह अजीत अंजुम ने भी एक बड़ी सच्चाई स्वीकार की है। और ये अर्जित की गयी सच्चाई है। अपने समय और उसकी संचालक शक्तियों की पड़ताल करने के बाद की कड़वी सच्चाई। आये दिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की छीछालेदर करने वाले कुछ मठाधीश और पत्रकारिता का दंभ भरने वाले मित्र टाइप लोग शायद इस बात को समझ नहीं रहे। उनकी एकमात्र समस्या अपने बौद्धिक मुखौटे को बचाये रखने की है। और ऐसे में जब कोई अजीत अंजुम जैसा आदमी अपने व्यक्तित्व को दांव पर लगा कर सच स्वीकार करता है तो सनसनी-सी फैल जाती है।
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सुशांत सलूजा ♦ बड़ी अजीब सी बात है कि बार-बार अजीत अंजुमजी चैनल को बचाने के लिए उसमें काम करनेवाले 600 लोगों के रोज़गार की दुहाई दे रहे हैं – मानो हिंन्दुस्तान से बेरोज़गारी दूर करने का ठेका उन्होंने ही ले लिया हो। उन्हें इस बात की चिंता कतई नहीं है कि 600 लोगों की कीमत पर वे करोड़ों हिंदुस्तानियों को मानसिक रुप से बीमार बनाने का जघन्य पाप कर रहे हैं। मज़े की बात ये कि फिर चैनल से बाहर निकल कर आईआईएमसी जैसे संस्थानों में जाकर खुद की आलोचना कर मोरल हाईग्राउंड भी हाईजैक कर लेते हैं। वाह जनाब, चित भी मेरी, पट भी मेरी। पत्रकार कितनी जल्दी सियासी ज़ुबान सीख लेते हैं!
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विनीत कुमार ♦ अजीत अंजुम ने जिस तरह से एक न्यूकमर से लेकर लखटकिया पत्रकार के समृद्ध होने (जाहिर है साधनों के स्तर पर) की जो बात बारीकी से बतायी है, मीडिया आलोचकों को एक ठोस आधार मिल जाएगा कि देखो जब एक चैनल का मुखिया ही ऐसी बातें स्वीकार रहा है, तो फिर अब तक जो हम कहते आये, वो कहां से ग़लत था। अजीत अंजुम ने इस लेख के जरिये उन मीडिया आलोचकों के हाथ में भी ऐसी जानकारी थमा दी है, जो अपने आलोचनाकर्म के दौरान चैनल की संस्कृति के बारे में ए बी सी भी नहीं जानता है और दमभर आलोचना करता रहा है। अब जब वो मीडिया को गरिआएगा, तो उसे सबूत के तौर पर इसे पेश करने में सहूलियत होगी, उसकी बातों की ऑथेंटिसिटी बढ़ेगी।
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विवेक सत्यमित्रम ♦ मुझे लगता है आलोचना का भी अपना एक बाज़ार है। हो सकता है इस बाज़ार में टीआरपी, विज्ञापन या फिर ब्रांडिंग जैसी मजबूरियां न हों। लेकिन हाजमा दुरुस्त रखना क्या कम बड़ी वजह है, जिसके लिए आलोचक बिरादरी के लोग तल्लीन होकर लगे रहते हैं। समस्या ये है कि कोई भी शख्स अगर अपनी बात रखने की कोशिश करता है, तो इस खास बिरादरी के लोग ये मान बैठते हैं मानो वो अपने किये हुए पापों की कनफेशन कर रहा है। और फिर… छीछालेदर का जो शानदार कार्यक्रम शुरु होता है, उसकी मिसाल यहां भी आपको दिख जाएगी। पता नहीं क्यों, ये लोग समाज की थॉट डाइवर्सिटी को स्वीकार नहीं करना चाहते। इन्हें लगता है, जैसे वो सोच रहे हैं… पूरी दुनिया को उनके जैसी सोच डेवलप कर लेनी चाहिए।
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अजीत अंजुम ♦ मैं एक पत्रकार हूं तो एक मैंने ‘पोल खोल’ भी बनाया और ‘सनसनी’ भी। मैंने राजनीति और अपराध पर भी कार्यक्रम बनाये। मुझे ‘सनसनी’ पर एतराज नहीं है। आप इतेफाक नहीं रखते होंगे, जिसमें एक दाढ़ी वाला एंकर हो। लेकिन उसमें दस ऐसी चीज़ है जो मुझे लगता है कि हमने नया किया। जिसमें स्टिंग ऑपरेशन हो और खास किस्म की आक्रामकता हो, समाज में जो लोग गलत काम कर रहें हैं, चाहे वह साधु हो या फ्रॉड बाबा हो या भ्रष्ट नौकरशाह- हमने एक कैंपेन चलाया था कि ‘बच नहीं सकेंगे वो, घूस लेते है जो।’ दो सौ से ज्यादा ऑफिसर, मैं सिपाही हवलदार की बात नहीं कर रहा हूं, क्योंकि इसमें भी आलोचक लिख देंगे कि हवलदार और सिपाही को पकड़वाये।
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निखिल आनंद गिरि ♦ टीआरपी के खेल पर मोहल्ला में अच्छी कमेंट्री चालू है, लेकिन इससे कुछ होने वाला है नहीं। होगा वही, जो पूंजीपति चाहेंगे। टीवी में मार्केटिंग का कंसेप्ट ज़्यादा पुराना नहीं है। अख़बार इतने सालों से हैं, मगर वहां भी टीवी की रैटरेस के बाद से ही रीडरशिप को लेकर तूफान मचना शुरू हुआ है। इस मार्केटिंग ने ही सारा खेल शुरू किया है। दरअसल, सारा खेल एक-दूसरे को बेवकूफ बनाने का है। प्रोडक्ट बेचती कंपनियों और ख़बर बेचते चैनलों में मौसेरे भाई जैसा रिश्ता है। एक आम आदमी को बेवकूफ बनाता है तो दूसरा उस्ताद के ही कान काटता है।
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सुशांत झा ♦ टीआरपी मुल्क की जाति व्यवस्था की तरह है, जिसकी आलोचना तो सभी करते हैं लेकिन उसे ख़ारिज़ कोई नहीं करना चाहता। आप चाहे तो इसकी तुलना दहेज प्रथा से भी कर सकते हैं। टीवीवालों से पूछिए तो जवाब मिलेगा कि ये जनता की मांग है। मानो जनता ने महेंद्र सिंह टिकैत की अगुआई में प्रेस क्लब पर लाखों की संख्या में पिछले रविवार को ही धरना दिय़ा था। ये बात अलग है कि इकलौती जनता अपनी वाइल्ड फैंटेसी में इंडिया टीवी ही क्या, नेकेड न्यूज़ और संभव हो तो हर रोज थ्री एक्स मूवी देख सकती है – लेकिन इकलौती जनता नाम की कोई चीज नहीं होती।
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आशीष कुमार अंशु ♦ विभिन्न संगठनों के धरना-प्रदर्शन के दौरान अच्छे विजुअल्स के लिए इलैक्ट्रानिक मीडिया के पत्रकारों द्वारा प्रदर्शनकारियों को उकसाते हुए देखा जाना अब आम है। टीआरपी के ही संदर्भ में मुज़फ्फरपुर के जनसंपर्क अधिकारी गुप्ताजी की बात भला कैसे भूल सकता हूं, जिन्होंने उस खबर की खाल निकाली, जिसमें बिहार के एक स्थानीय चैनल ने रातों रात हर पत्ते पर ‘राम’ लिखे होने की ख़बर दिखायी थी। गांव में मेला लग गया। गुप्ता जी ने जब पेड़ की सबसे ऊपरी शाख से पत्ते मंगाए तो राम नाम ग़ायब। यह कैसा चमत्कार था, जिसमें राम का नाम नीचे वाले पत्तों पर लिखा था लेकिन ऊपर वाले पत्तों पर नहीं। गुप्ताजी ने पता किया तो जानकारी मिली, यह सब उस पत्रकार और कुछ गांव वालों की मिलीभगत से हुआ था।


