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Articles tagged with: TRP

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[27 Aug 2010 | 35 Comments | ]
नकवी के डर पर सवार “आजतक” के अजय कुमार

नागार्जुन ♦ नकवी को ऐसा क्यों लगा कि अजय कुमार अलादीन के चिराग की तरह चमत्कारी साबित हो सकते हैं और उन्हें आज तक के आउटपुट की कमान सौंप दी? दरअसल, इसकी असली वजह अजय कुमार की काबिलियत नहीं बल्कि नकवी का डर है। एसपी सिंह की मृत्यु के बाद आज तक की कमान राहुल देव को सौंपी गयी। लेकिन वो कुछ समय बाद चले गये। फिर सत्ता नकवी के हाथ में आयी। उसी समय आज तक आधे घंटे के प्रोग्राम से न्यूज चैनल की तरफ बढ़ने लगा। नकवी को उम्मीद थी कि कमान उन्हीं के हाथ में रहेगी। लेकिन यह जिम्मेदारी उदय शंकर को सौंपी गयी। नकवी ने नौकरी से इस्तीफा दे दिया। फिर फरवरी 2004 में उनकी वापसी हुई।

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[26 Aug 2010 | 18 Comments | ]
टीआरपी से झांक रही है “आजतक” की पतन कथा

नागार्जुन ♦ आप सोच रहे होंगे कि आखिर इंडिया टीवी ने ऐसा कौन सा चमत्कार किया है, स्कूप किया है कि वो नंबर वन बन गया। इंडिया टीवी में किसी स्कूप का सवाल ही नहीं। और न ही यह कहानी इंडिया टीवी और स्टार न्यूज के उत्थान की कहानी है। बल्कि यह दास्तान आजतक के पतन की दास्तान है। एक चैनल जिसे देश के दर्शकों ने सबसे अधिक प्यार दिया, वो चैनल आज अपने दर्शकों को उनके प्यार के बदले में कुछ भी नया नहीं दे रहा। वो चैनल इंडिया टीवी का थोड़ा “बेहतर” संस्करण (नंगई कम दिखाने के मामले में) मात्र बन कर रह गया है। बीते दो साल में वहां कोई बड़ी स्टोरी नहीं हुई है। आखिर ऐसा क्यों हुआ? आखिर आजतक का आधार क्यों खिसक रहा है?

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[3 Nov 2009 | 9 Comments | ]
2 नवंबर 2009 : टेलीविज़न के इतिहास में एक अश्‍लील दिन

विनीत कुमार ♦ ख़बरों के चरित्र को लेकर जब भी टेलीविज़न की आलोचना की जाती है तो प्रिंट मीडिया का सिर अपने आप ही उचक जाता है। बरी कर दिये जाने के दर्प से उसकी अकड़ छिपाये नहीं छिपती। लेकिन इस क्रम में आइस यानी सूचना (मीनिंगलेस), मनोरंजन और उपभोक्तावाद के जरिये पैदा की जानेवाली ठंडी संस्कृति को मज़बूत करने में जुटा है, इस पर भी बात करना ज़रूरी है। आधे-आधे पन्ने में नंबर वन हरियाणा का राग अलापनेवाले अख़बारों से ये सवाल होने चाहिए कि तुरही बजाने की कला में लगातार निष्णात होनेवाले महानुभावो, क्या आपके पास एक कॉलम भी नहीं बचा रह जाता कि सरोकारों से जुड़ी ख़बरें उनमें छापी जा सके।

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[11 Aug 2009 | 8 Comments | ]
नैतिकता भी हो गयी है प्रायोजित

मज़्कूर आलम ♦ उनका यह कनफेशन – आप जो चीज़ चलाते हैं, क्या वह आप अपनी मर्जी से चलाते हैं? क्या उसके पीछे कोई व्यवस्था होती है? – बहुत ख़तरनाक है, जो यह बताती है कि बाज़ार कैसे आदमी को कठपुतली में बदल रहा है। उसे मजबूर कर रहा है कि तुम वही करो जो बाज़ार कर रहा है। जबकि पत्रकारिता का मेन इथिक्स ही यह है कि वह उन चीज़ों का विरोध करे, जिसे वह सही नहीं मानता है और उन चीज़ों के पक्ष में मज़बूती से खड़ा हो, जो उसकी नज़र में सही है। लेकिन एक संपादक ही इतना लाचार और मजबूर होकर बयान देगा तो आम आदमी कहां जाएगा, किसके पास जाएगा अपना विरोध लेकर।

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[8 Aug 2009 | 5 Comments | ]
ठीक होरी की तरह सच का सामना किया अजीत अंजुम ने

प्रभात रंजन ♦ सच्चाई को स्वीकारना कभी आसान नहीं रहा। होरी की तरह अजीत अंजुम ने भी एक बड़ी सच्चाई स्वीकार की है। और ये अर्जित की गयी सच्चाई है। अपने समय और उसकी संचालक शक्तियों की पड़ताल करने के बाद की कड़वी सच्चाई। आये दिन इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया की छीछालेदर करने वाले कुछ मठाधीश और पत्रकारिता का दंभ भरने वाले मित्र टाइप लोग शायद इस बात को समझ नहीं रहे। उनकी एकमात्र समस्या अपने बौद्धिक मुखौटे को बचाये रखने की है। और ऐसे में जब कोई अजीत अंजुम जैसा आदमी अपने व्यक्तित्व को दांव पर लगा कर सच स्वीकार करता है तो सनसनी-सी फैल जाती है।

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[7 Aug 2009 | No Comment | ]
सनसनी के निर्माता लालू की तरह आउटडेटेड हो जाएंगे

सुशांत सलूजा ♦ बड़ी अजीब सी बात है कि बार-बार अजीत अंजुमजी चैनल को बचाने के लिए उसमें काम करनेवाले 600 लोगों के रोज़गार की दुहाई दे रहे हैं – मानो हिंन्दुस्तान से बेरोज़गारी दूर करने का ठेका उन्‍होंने ही ले लिया हो। उन्‍हें इस बात की चिंता कतई नहीं है कि 600 लोगों की कीमत पर वे करोड़ों हिंदुस्तानियों को मानसिक रुप से बीमार बनाने का जघन्य पाप कर रहे हैं। मज़े की बात ये कि फिर चैनल से बाहर निकल कर आईआईएमसी जैसे संस्थानों में जाकर खुद की आलोचना कर मोरल हाईग्राउंड भी हाईजैक कर लेते हैं। वाह जनाब, चित भी मेरी, पट भी मेरी। पत्रकार कितनी जल्दी सियासी ज़ुबान सीख लेते हैं!

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[6 Aug 2009 | One Comment | ]
मीडिया को गरियाने की चाबी दे दी अजीत अंजुम ने

विनीत कुमार ♦ अजीत अंजुम ने जिस तरह से एक न्यूकमर से लेकर लखटकिया पत्रकार के समृद्ध होने (जाहिर है साधनों के स्तर पर) की जो बात बारीकी से बतायी है, मीडिया आलोचकों को एक ठोस आधार मिल जाएगा कि देखो जब एक चैनल का मुखिया ही ऐसी बातें स्वीकार रहा है, तो फिर अब तक जो हम कहते आये, वो कहां से ग़लत था। अजीत अंजुम ने इस लेख के जरिये उन मीडिया आलोचकों के हाथ में भी ऐसी जानकारी थमा दी है, जो अपने आलोचनाकर्म के दौरान चैनल की संस्कृति के बारे में ए बी सी भी नहीं जानता है और दमभर आलोचना करता रहा है। अब जब वो मीडिया को गरिआएगा, तो उसे सबूत के तौर पर इसे पेश करने में सहूलियत होगी, उसकी बातों की ऑथेंटिसिटी बढ़ेगी।

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[6 Aug 2009 | 6 Comments | ]
टीवी की आलोचना का भी बाज़ार बन गया है

विवेक सत्‍यमित्रम ♦ मुझे लगता है आलोचना का भी अपना एक बाज़ार है। हो सकता है इस बाज़ार में टीआरपी, विज्ञापन या फिर ब्रांडिंग जैसी मजबूरियां न हों। लेकिन हाजमा दुरुस्त रखना क्या कम बड़ी वजह है, जिसके लिए आलोचक बिरादरी के लोग तल्लीन होकर लगे रहते हैं। समस्या ये है कि कोई भी शख्स अगर अपनी बात रखने की कोशिश करता है, तो इस खास बिरादरी के लोग ये मान बैठते हैं मानो वो अपने किये हुए पापों की कनफेशन कर रहा है। और फिर… छीछालेदर का जो शानदार कार्यक्रम शुरु होता है, उसकी मिसाल यहां भी आपको दिख जाएगी। पता नहीं क्यों, ये लोग समाज की थॉट डाइवर्सिटी को स्वीकार नहीं करना चाहते। इन्हें लगता है, जैसे वो सोच रहे हैं… पूरी दुनिया को उनके जैसी सोच डेवलप कर लेनी चाहिए।

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[5 Aug 2009 | 8 Comments | ]
माफ कीजिए, इस हमाम में हम सब नंगे हैं!

अजीत अंजुम ♦ मैं एक पत्रकार हूं तो एक मैंने ‘पोल खोल’ भी बनाया और ‘सनसनी’ भी। मैंने राजनीति और अपराध पर भी कार्यक्रम बनाये। मुझे ‘सनसनी’ पर एतराज नहीं है। आप इतेफाक नहीं रखते होंगे, जिसमें एक दाढ़ी वाला एंकर हो। लेकिन उसमें दस ऐसी चीज़ है जो मुझे लगता है कि हमने नया किया। जिसमें स्टिंग ऑपरेशन हो और खास किस्म की आक्रामकता हो, समाज में जो लोग गलत काम कर रहें हैं, चाहे वह साधु हो या फ्रॉड बाबा हो या भ्रष्ट नौकरशाह- हमने एक कैंपेन चलाया था कि ‘बच नहीं सकेंगे वो, घूस लेते है जो।’ दो सौ से ज्यादा ऑफिसर, मैं सिपाही हवलदार की बात नहीं कर रहा हूं, क्योंकि इसमें भी आलोचक लिख देंगे कि हवलदार और सिपाही को पकड़वाये।

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[3 Aug 2009 | 3 Comments | ]
टीआरपी प्रभु, तुम चंदन हम पानी!

निखिल आनंद गिरि ♦ टीआरपी के खेल पर मोहल्ला में अच्छी कमेंट्री चालू है, लेकिन इससे कुछ होने वाला है नहीं। होगा वही, जो पूंजीपति चाहेंगे। टीवी में मार्केटिंग का कंसेप्ट ज़्यादा पुराना नहीं है। अख़बार इतने सालों से हैं, मगर वहां भी टीवी की रैटरेस के बाद से ही रीडरशिप को लेकर तूफान मचना शुरू हुआ है। इस मार्केटिंग ने ही सारा खेल शुरू किया है। दरअसल, सारा खेल एक-दूसरे को बेवकूफ बनाने का है। प्रोडक्ट बेचती कंपनियों और ख़बर बेचते चैनलों में मौसेरे भाई जैसा रिश्ता है। एक आम आदमी को बेवकूफ बनाता है तो दूसरा उस्ताद के ही कान काटता है।