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Articles tagged with: uday prakash

नज़रिया, फेसबुक से »

[17 May 2012 | No Comment | ]
ये जगह किसी साम्राज्यवादी भेड़िये का ‘थूथन’ भर नहीं है!

उदय प्रकाश ♦ गहरी संवेदनाएं, मानवीय सहकारिता और हरसंभव सहायता की अलक्ष्य कोशिशें इस ‘वर्चुअल-समाज’ में भी हैं। उस समाज से कहीं, (कई बार) अधिक और भावुक कर देने वाला, जिसे हम असली बाहर का ‘यथार्थ’ वाला समाज कहते हैं, लेकिन जो मीडिया, राजनीति और पूंजी की ताकतों का अनैतिक गंठजोड़ बनकर एक अर्ध-मानव भीड़ या लालची हिंसक झुंड में तब्दील हो रहा है। उसकी चेतना को लुप्त और धो-पोंछ कर ‘सफा’ कर देने वाली ताकतें बहुत सारी हैं। इसीलिए फेसबुक या ट्विटर या ब्‍लॉग्स किसी ‘साम्राज्यवादी भेड़िये का ‘थूथन’ या ‘थोबड़ा’ भर नहीं हैं। इस ‘आभासी’ (वर्चुअल) जगत में किसी संकट में घिरे अकेले निहत्थे मनुष्य की आवाजें भी सुनी जा सकती हैं। मुमताज बेगम का यह वाकया शायद यही कहता है।

नज़रिया, मीडिया मंडी, शब्‍द संगत »

[2 May 2012 | 8 Comments | ]
मित्र चाहे नरेंद्र मोदी ही क्‍यों न हो, उसको सात खून माफ है!

आनंद स्‍वरूप वर्मा ♦ मैं नहीं समझता कि मंगलेश ने कोई चूक की है। अगर किसी के दक्षिणपंथी अथवा वामपंथी/प्रगतिशील होने का मापदंड गोष्ठियों में जाने को ही बना लिया जाए न कि उसके जीवन और कृतित्व को तो यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण होगा। वैचारिक प्रतिबद्धता का निर्धारण इस तरह के सतही मापदंडों से नहीं होता कि कौन कहां जा रहा है अथवा किससे मिल रहा है। उदय प्रकाश का मामला इससे थोड़ा भिन्न था क्योंकि उन्होंने उस व्यक्ति के हाथों पुरस्कार लिया जो घोर कम्युनिस्ट विरोधी और प्रतिगामी विचारों का घोषित तौर पर पोषक है हालांकि इसे भी मुद्दा बनाने के पक्ष में मैं उस समय नहीं था। जिन दिनों हस्ताक्षर अभियान चल रहा था, मैंने यही कहा था कि एक बार उदय प्रकाश से पूछना चाहिए कि किन परिस्थितियों में ऐसा हुआ?

असहमति, शब्‍द संगत »

[6 Aug 2011 | 20 Comments | ]

विनीत कुमार ♦ एक आदिवासी का हिंदी कविता के लिए पुरस्कार का मिलना क्या सचमुच इतने ताज्जुब की बात है? अगर हां तो फिर हम उसके आदिवासी होने पर ताज्जुब कर रहे हैं या फिर उसके कविता लिखने पर? माफ कीजिएगा, वर्चुअल स्पेस जिसमें कि मोहल्लालाइव भी शामिल है और मेनस्ट्रीम मीडिया ने अनुज लुगुन के पुरस्कार मिलने की खबर को कुछ इस तरह से प्रोजेक्ट किया कि अनुज लुगुन की जो छवि उभर आयी, उसके अनुसार वो पहले आदिवासी है, उसके बाद कवि।

शब्‍द संगत, संघर्ष »

[4 Aug 2011 | 8 Comments | ]

एके पंकज ♦ लुगुन की कविता ‘अघोषित उलगुलान’ को हिंदी कविता का प्रतिष्ठित भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार मिलना एक सदी के हिंदी ही नहीं वरन समस्त भारतीय साहित्य में एक नयी परिघटना है। वह इसलिए भी कि पहली बार भाभूअपु एक आदिवासी को मिलने जा रहा है, जो इस देश के आंतरिक उपनिवेश का नागरिक है और ‘ऐतिहासिक अन्याय’ का घोषित शिकार भी।

शब्‍द संगत »

[4 Aug 2011 | 17 Comments | ]

उदय प्रकाश ♦ कॉर्पोरेट पूंजी और नयी तकनीकी के आक्रामक साम्राज्य द्वारा अपदस्थ की जा चुकी लोकतांत्रिक और विचारधारात्मक राजनीति के पतन और विघटन के बाद, अपनी धरती, घर, जंगल और अपनी पहचान तक के लिए जूझते और आत्मरक्षा या प्रतिरोध के न्यूनतम प्रयत्नों के लिए भी अभूतपूर्व दमन और संहार झेलते आदिवासियों के कठिन जीवन अनुभवों को व्यक्त करने वाली यह कविता समकालीन हिंदी कविता की अब तक परिपोषित, पुरस्कृत और परिपुष्ट परंपरा में एक विक्षेप या प्रस्थान की तरह है।

uncategorized »

[3 Aug 2011 | 27 Comments | ]

डेस्क ♦ समकालीन युवा कविता का सर्वाधिक प्रतिष्ठित सम्मान, भारत भूषण अग्रवाल कविता पुरस्कार अनुज लुगुन को उनकी कविता ‘अघोषित उलगुलान’ के लिए दिया जाएगा। इस वर्ष के निर्णायक उदय प्रकाश ने इसका चयन किया है। यह कविता ‘प्रगतिशील वसुधा’ के अप्रैल-जून 2010 के अंक में प्रकाशित हुई थी।

पुस्‍तक मेला, मोहल्ला दिल्ली »

[6 Mar 2011 | 30 Comments | ]

कुंवर नारायण ♦ इस पुस्‍तक में यात्रा वृत्तांत की शैली को कई स्‍तरों पर संभाला गया है। भौगोलिक स्‍तर पर, ऐतिहासिक स्‍तर पर, सूचनाओं-जानकारियों के स्‍तर पर। साथ ही यह पुस्‍तक साहित्‍य और इतिहास के बीच एक संवाद भी है। हिंदी की यह पहली किताब है, जिसमें ट्रैवेलॉग को एक ही नैरेटिव में साधा गया है। ये इधर की किताबों में बिल्‍कुल फर्क तरह की किताब है। इस किताब का शिल्‍प डिटैक्टिव लगता है – ओरहान पामुक ने इसी तरह से डिटेक्टिव टेक्‍नीक को अपने उपन्‍यासों में गंभीर मानवीय संवेदना स्‍टैब्लिश करने के लिए इस्‍तेमाल किया है।

शब्‍द संगत »

[25 Dec 2010 | 13 Comments | ]

डॉ शशिकांत ♦ पाठकों को यह जानकार आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि अपनी निजी जिंदगी में घटित एक बेहद दर्दनाक और अनितिक हादसे को आधार बनाकर उदय प्रकाश ने एक ऐसा महा-आख्यान (मोहनदास) रच दिया जिसको पढ़ते हुए न जाने कितने पाठक फूट-फूट कर रोये हैं। कभी विचारधारा की गिरोहबंदी करके तो कभी सत्ता के गलियारे में तीन तिकड़म करके विश्वविद्यालयों, अकादमियों और विभिन्न सरकारी संस्थाओं में पहले खुद घुसने और फिर अपने चेलों-चमचों, चापलूसों, भाई-भतीजों, बेटी-दामादों को फिट कराने की जुगत में लगे हिंदी के बहुतेरे भ्रष्ट, अनैतिक और मीडियॉकर लेखकों-अध्यापकों की छाती पर आज उदय प्रकाश को साहित्य अकादेमी पुरस्कार दिये जाने की खबर के बाद सांप लोट रहा है।

नज़रिया, मोहल्ला दिल्ली, शब्‍द संगत »

[22 Nov 2010 | 5 Comments | ]

उदय प्रकाश ♦ एक बहुत मामूली-सा तथ्य यह है कि इस दौर में हर स्वतंत्र, साधनहीन और अकेला कवि हिंदी साहित्य-संस्थान ही नहीं, ऊंची और महान ‘विचारधाराओं’ के भाषाई राष्‍ट्र-राज्य से भी बेदखल कर दिया गया है। मुंबई के भ्रष्ट ‘आदर्श हाउसिंग सोसाइटी’ की तरह ही हिंदी का यह सारा कारोबार मठाधीशों का ‘आदर्श कोआपरेटिव हाउसिंग सोसायटी’ प्राइवेट लिमिटेड’ ही है। यह विडंबना ही है कि इस पर लोकतांत्रिक नैतिकता का कोई विचारधारात्मक बुल्डोजर फिलवक्त नही चलेगा। हमेशा की तरह, उसका रुख उधर नहीं, इधर की ओर होगा। समकालीन हिंदी कविता के ‘स्लम्स’ यानी अनधिकृत बस्तियों की ओर।

मोहल्ला दिल्ली, शब्‍द संगत »

[28 Jul 2010 | 3 Comments | ]

कलियुगी वेदव्यास ♦ कृपाचार्य: जिसका घर में सम्मान नहीं, उसका बाहर भी सम्मान नहीं हो सकता, वत्स। यह सब अमेरिकी पूंजीवादी षडयंत्र है और दक्षिणपंथी दुष्प्रचार। देखा नहीं, कैसे वह कुलद्रोही क्रूर, दक्षिणपंथी, माफिया साधु के हाथों पुरस्कार ले आया और तमाम भर्त्‍सना के बावजूद अपने इस कृत्य पर इतराता रहा। जो गुरुद्रोही होता है, उसका यही हश्र होता है पुत्र। उसे पागल कुत्ते की तरह घेरकर मारा जाता है। वह नरक का भागी होता है। याद रखो कि गुरु ही पिता है, गुरु ही माता है, गुरु ही भ्राता है, गुरु ही प्रेमी है और गुरु ही पति भी। ऐसा हमारे शास्त्रों में लिखा है। जॉक देरिदा, जॉक देरिदा, जॉक देरिदा। शिष्य: यह कौन सा मंत्र है गुरुदेव, जिसका आप लगातार सोते-जागते जाप करते रहते हैं?