Articles tagged with: uday prakash
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कलियुगी वेदव्यास ♦ कृपाचार्य: जिसका घर में सम्मान नहीं, उसका बाहर भी सम्मान नहीं हो सकता, वत्स। यह सब अमेरिकी पूंजीवादी षडयंत्र है और दक्षिणपंथी दुष्प्रचार। देखा नहीं, कैसे वह कुलद्रोही क्रूर, दक्षिणपंथी, माफिया साधु के हाथों पुरस्कार ले आया और तमाम भर्त्सना के बावजूद अपने इस कृत्य पर इतराता रहा। जो गुरुद्रोही होता है, उसका यही हश्र होता है पुत्र। उसे पागल कुत्ते की तरह घेरकर मारा जाता है। वह नरक का भागी होता है। याद रखो कि गुरु ही पिता है, गुरु ही माता है, गुरु ही भ्राता है, गुरु ही प्रेमी है और गुरु ही पति भी। ऐसा हमारे शास्त्रों में लिखा है। जॉक देरिदा, जॉक देरिदा, जॉक देरिदा। शिष्य: यह कौन सा मंत्र है गुरुदेव, जिसका आप लगातार सोते-जागते जाप करते रहते हैं?
शब्द संगत, स्मृति »
उदय प्रकाश ♦ छोटा-सा आंगन, आंगन के बीच में छोटा-सा चौरा और बींचोबीच तुलसी का बिरवा। और ठीक कुछ कदम आगे खपरैल की संकरी-सी वह धुआंई मलीन कोठरी, जिसमें उनका जन्म हुआ था। एक दरिद्र ब्राह्मण का जर्जर घर। दैन्य और अभिमान, वंचना और विद्या, अभाव और प्रतिभा के प्रकट विरोधाभासी द्वंद्वों को साकार करता हुआ। वह कोई अजब-सा अनुभव था। मैंने कुछ साल पहले केरल के गांव कलाडी का वह घर भी देखा था, जहां से लाठी में अपनी छोटी-सी गठरी लटका कर एक और प्रतिभा बाहर निकल पड़ी थी। बिल्कुल ऐसा ही घर, जैसा उस रोज ऊंचगांव सानी में सामने था।
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डेस्क ♦ उदय प्रकाश हमारे समय के एक विलक्षण कथाकार हैं। उनकी मशहूरियत का अंदाज़ा लगा पाना आसान नहीं। वे उन लेखकों की पांत के संभवत: अंतिम स्तंभ हैं, जो फ्रीलांसर की तरह जीवन जीने में भरोसा रखते हैं। बंधी बंधायी लीक उनका स्वभाव नहीं है और यात्रा के बग़ैर उन्हें चैन नहीं हैं। वे घूमते हैं। सरहद के भीतर। सरहद के पार। इन दिनों वे जर्मनी की यात्रा पर हैं। उनके एक जासूस प्रशंसक ने वहां से उनकी दो करतबी तस्वीर हमें भेजी है। दोनों तस्वीर मोहल्ला लाइव के पाठकों की नज़र।
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अब्राहम हिंदीवाला ♦ कुछ दिनों पहले अनुराग कश्यप वेनिस गये थे। वहां उन्होंने ढेर सारी फिल्में देखीं। तरह-तरह की और खुद से शर्मसार हुए। उन्होंने महसूस किया कि पिछले एक साल से उन्होंने शूटिंग नहीं की है। वे अपनी बड़ी फिल्मों की स्क्रिप्ट लिखने में लगे हैं। उन्होंने अपनी संगिनी को प्रेरित किया। संगिनी कल्कि ने उन्हें प्रोत्साहित किया और इस फिल्म की स्क्रिप्ट लिख ली गयी। स्क्रिप्ट पूरी होने के 20 दिनों के बाद शूटिंग करने का फ़ैसला ले लिया गया। आप देखें कि शूटिंग आरंभ भी हो चुकी है। इस फिल्म में कल्कि हैं। देव डी की चंदा कल्कि। वह अनुराग की संगिनी हैं। उन्होंने ही इसे लिखा है। अनुराग ने उसे आख़िरी रूप दिया।
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विष्णु खरे ♦ मैं पहले (अशोक वाजपेयी/अरुण कमल/1980) पुरस्कार से ही असहमत था। आज 1979 में प्रकाशित 35 वर्ष से कम आयु के कवियों की रचनाओं को याद कर पाना असंभव-सा है लेकिन “उर्वर प्रदेश” उस वर्ष की सामान्य अच्छी कविता ही लगी थी, विशिष्ट नहीं। आज भी वह शायद इस पुरस्कार के कारण ही उल्लेख्य है। उनके संग्रह “नए इलाक़े में” की कविताओं में मुझे एक मार्मिक, नए अरुण कमल दिखाई दिए थे लेकिन उसके पहले और बाद के संग्रहों में उनकी कविताएं “उर्वर प्रदेश” की सामान्य अच्छी ज़मीन की ही लगती हैं। यह मालूम करना मुश्किल है कि आज कवि के रूप में उनकी वास्तविक प्रतिष्ठा क्या है।
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विष्णु खरे ♦ मैं इस या दूसरे पुरस्कारों के निर्णायकों के बारे में कुछ नहीं कह सकता, किंतु यदि कोई पुरस्कार के लिए सिर्फ़ मैं उत्तरदायी हूं तो मैं सोचता हूं कि मेरी जवाबदेही सिर्फ़ मेरे निर्णय का औचित्य बतलाने तक ही सीमित नहीं रह जाती। यह सही है कि कोई भी पुरस्कार इसकी कोई गारंटी नहीं दे सकता कि उसका प्राप्तकर्ता यदि गुणवत्ता में उस कृति से आगे नहीं जाएगा, तो कम-से-कम वह स्तर तो क़ायम रखेगा : कोई भी निर्णायक आजीवन इसके लिए जि़म्मेदार नहीं ठहराया जा सकता कि उसके फ़ैसले ने जो उम्मीद जगाई थी, उसे इनामयाफ़्ता निभा या आगे ले जा न सका। फिर भी निर्णायक एक नैतिक उत्तरदायित्व के बोझ से मुक्त नहीं हो सकता।
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अब्राहम हिंदीवाला ♦ मोहनदास फिल्म के ऊपर अगर उदय प्रकाश स्वयं कुछ लिखते या दिल्ली में उनसे इंटरव्यू कर कुछ प्रकाशित किया जाता तो किसी कृति को पन्नों से पर्दे पर लाने की प्रक्रिया समझ में आती। मजहर कामरान जानते हैं कि उदय प्रकाश उनकी फिल्म से खुश नहीं हैं, लेकिन हम उदय प्रकाश से जानना चाहते हैं कि उनकी नाखुशी की वजह क्या है? मजहर कामरान ने फिल्म की ज़रूरत और नाटकीयता के लिए नये चरित्र जोड़े हैं और कहानी को दिल्ली तक पहुंचा दिया है। चूंकि फिल्म के लेखक में उदय प्रकाश का भी नाम आता है, इसलिए यह प्रतीत होता है कि मजहर ने उनकी सहमति से ही मोहनदास की मूल संरचना में परिवर्तन किये होंगे।
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मिहिर पंड्या ♦ उदय प्रकाश की मशहूर कहानी मोहनदास पर बनी फिल्म पर आख़िरकार सिनेमाघरों में रिलीज़ हो गयी। मोहल्ले के पाठकों के लिए पेश है ओसियान के वक्त लिखी गयी इस फिल्म की समीक्षा। ओशियंस की वो स्क्रीनिंग दिल्ली में “मोहनदास” का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन थी। दिन था सत्रह जुलाई सन दो हज़ार आठ। मैंने इस प्रदर्शन के टिकट एक हफ़्ता पहले ही खरीद लिये थे और उस दिन हम दोस्तों के पूरे जमावड़े के साथ थियेटर में मौजूद थे। सिनेमा के तौर पर फ़िल्म कमज़ोर है, उसमें बहुत से झोल हैं लेकिन यह लेख सिर्फ़ फ़िल्म के बारे में नहीं है। यह हमारे समय के बारे में है।
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गीताश्री ♦ आउटलुक हिंदी ने आपके विवेक को हमेशा सर आंखों पर रखा है। अन्य विषय के साथ आप साहित्य के भी सुधी सहृदय पाठक हैं। यह हमारे कथा-कहानी, कविता और साहित्य संबंधी स्तंभों की लोकप्रियता से स्पष्ट है। इस बार हम आपकी नब्ज़ टटोलना चाहते हैं। आपको जज बनाना चाहते हैं ताकि जान सकें कि सच्चे अर्थों में जनमानस में किस कवि और कथाकार की लोकप्रियता कैसी और कितनी है। आपकी सुविधा के लिए हमने समकालीन कवियों और कथाकारों के चुनिंदा नामों की अलग-अलग सूची बना दी है ताकि आप नामों की भूलभुलैया में खो न जाएं। इस सूची के बाहर भी कोई नाम आपको सर्वश्रेष्ठ लगे, तो वह भी आप हमें भेज सकते हैं। यह सूची हमने आपकी सुविधा के लिए बनायी है।
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अनिल ♦ कहीं ऐसा तो नहीं कि उदय प्रकाश पर इस बहाने जो बहस हुई, वह एक लेखक की लोकप्रियता को उठाने-गिराने के एजेंडे से संचालित रही हो? जबकि रायपुर के साहित्यिक आयोजन से जो राजनीतिक सवाल उभरे हैं, वे मौजूदा समय में समग्र साहित्यिक-सांस्कृतिक परिदृश्य की दुखती रग को छूते हैं। हिंदी में रचनारत समाज सिर्फ़ उदय की प्रतिबद्धताओं और सरोकार पर बहस करके एक सुविधाजनक संतुष्टि की ओर उन्मुख दिख रहा है। एक मित्र बता रहे थे कि हिंदी की एक साहित्यिक पत्रिका उदय प्रकाश प्रकरण पर विशेषांक निकालने जा रही है। हिंदी रचना संसार को छत्तीसगढ़ जैसे आयोजनों और उसमें शामिल होने वाले लेखकों के बारे में बात करने से, समूचे हिंदी रचनाशील दुनिया के खोखलेपन के उजागर होने का डर तो नहीं है?



