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Articles tagged with: uday prakash

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[16 Nov 2009 | 10 Comments | ]
जर्मनी में उदय प्रकाश : दो करतबी तस्‍वीरें…

डेस्‍क ♦ उदय प्रकाश हमारे समय के एक विलक्षण कथाकार हैं। उनकी मशहूरियत का अंदाज़ा लगा पाना आसान नहीं। वे उन लेखकों की पांत के संभवत: अंतिम स्‍तंभ हैं, जो फ्रीलांसर की तरह जीवन जीने में भरोसा रखते हैं। बंधी बंधायी लीक उनका स्‍वभाव नहीं है और यात्रा के बग़ैर उन्‍हें चैन नहीं हैं। वे घूमते हैं। सरहद के भीतर। सरहद के पार। इन दिनों वे जर्मनी की यात्रा पर हैं। उनके एक जासूस प्रशंसक ने वहां से उनकी दो करतबी तस्‍वीर हमें भेजी है। दोनों तस्‍वीर मोहल्‍ला लाइव के पाठकों की नज़र।

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[21 Oct 2009 | 3 Comments | ]
“पीली जूती वाली लड़की” अनुराग कश्‍यप की अगली फिल्‍म

अब्राहम हिंदीवाला ♦ कुछ दिनों पहले अनुराग कश्‍यप वेनिस गये थे। वहां उन्‍होंने ढेर सारी फिल्‍में देखीं। तरह-तरह की और खुद से शर्मसार हुए। उन्‍होंने महसूस किया कि पिछले एक साल से उन्‍होंने शूटिंग नहीं की है। वे अपनी बड़ी फिल्‍मों की स्क्रिप्‍ट लिखने में लगे हैं। उन्‍होंने अपनी संगिनी को प्रेरित किया। संगिनी कल्कि ने उन्‍हें प्रोत्‍साहित किया और इस फिल्‍म की स्क्रिप्‍ट लिख ली गयी। स्क्रिप्‍ट पूरी होने के 20 दिनों के बाद शूटिंग करने का फ़ैसला ले लिया गया। आप देखें कि शूटिंग आरंभ भी हो चुकी है। इस फिल्‍म में कल्कि हैं। देव डी की चंदा कल्कि। वह अनुराग की संगिनी हैं। उन्‍होंने ही इसे लिखा है। अनुराग ने उसे आख़‍िरी रूप दिया।

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[14 Sep 2009 | 3 Comments | ]
इन्‍हें कैसे मिल गया भारत भूषण अग्रवाल पुरस्‍कार

विष्‍णु खरे ♦ मैं पहले (अशोक वाजपेयी/अरुण कमल/1980) पुरस्‍कार से ही असहमत था। आज 1979 में प्रकाशित 35 वर्ष से कम आयु के कवियों की रचनाओं को याद कर पाना असंभव-सा है लेकिन “उर्वर प्रदेश” उस वर्ष की सामान्‍य अच्‍छी कविता ही लगी थी, विशिष्‍ट नहीं। आज भी वह शायद इस पुरस्‍कार के कारण ही उल्‍लेख्‍य है। उनके संग्रह “नए इलाक़े में” की कविताओं में मुझे एक मार्मिक, नए अरुण कमल दिखाई दिए थे लेकिन उसके पहले और बाद के संग्रहों में उनकी कविताएं “उर्वर प्रदेश” की सामान्‍य अच्‍छी ज़मीन की ही लगती हैं। यह मालूम करना मुश्किल है कि आज कवि के रूप में उनकी वास्‍तविक प्रतिष्‍ठा क्‍या है।

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[14 Sep 2009 | 4 Comments | ]
एक पुरस्‍कार के तीन दशक : एक विवादास्‍पद जायज़ा

विष्‍णु खरे ♦ मैं इस या दूसरे पुरस्‍कारों के निर्णायकों के बारे में कुछ नहीं कह सकता, किंतु यदि कोई पुरस्‍कार के लिए सिर्फ़ मैं उत्तरदायी हूं तो मैं सोचता हूं कि मेरी जवाबदेही सिर्फ़ मेरे निर्णय का औचित्‍य बतलाने तक ही सीमित नहीं रह जाती। यह सही है कि कोई भी पुरस्‍कार इसकी कोई गारंटी नहीं दे सकता कि उसका प्राप्‍तकर्ता यदि गुणवत्ता में उस कृति से आगे नहीं जाएगा, तो कम-से-कम वह स्‍तर तो क़ायम रखेगा : कोई भी निर्णायक आजीवन इसके लिए जि़म्‍मेदार नहीं ठहराया जा सकता कि उसके फ़ैसले ने जो उम्‍मीद जगाई थी, उसे इनामयाफ़्ता निभा या आगे ले जा न सका। फिर भी निर्णायक एक नैतिक उत्तरदायित्‍व के बोझ से मुक्‍त नहीं हो सकता।

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[5 Sep 2009 | 5 Comments | ]
कथाकार उदय प्रकाश बताएं कि मोहनदास कैसी फिल्‍म है?

अब्राहम हिंदीवाला ♦ मोहनदास फिल्म के ऊपर अगर उदय प्रकाश स्वयं कुछ लिखते या दिल्ली में उनसे इंटरव्यू कर कुछ प्रकाशित किया जाता तो किसी कृति को पन्नों से पर्दे पर लाने की प्रक्रिया समझ में आती। मजहर कामरान जानते हैं कि उदय प्रकाश उनकी फिल्म से खुश नहीं हैं, लेकिन हम उदय प्रकाश से जानना चाहते हैं कि उनकी नाखुशी की वजह क्या है? मजहर कामरान ने फिल्म की ज़रूरत और नाटकीयता के लिए नये चरित्र जोड़े हैं और कहानी को दिल्ली तक पहुंचा दिया है। चूंकि फिल्म के लेखक में उदय प्रकाश का भी नाम आता है, इसलिए यह प्रतीत होता है कि मजहर ने उनकी सहमति से ही मोहनदास की मूल संरचना में परिवर्तन किये होंगे।

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[5 Sep 2009 | 4 Comments | ]
सच और सिनेमा की अंधेरी रोशनियों के बीच मोहनदास

मिहिर पंड्या ♦ उदय प्रकाश की मशहूर कहानी मोहनदास पर बनी फिल्‍म पर आख़‍िरकार सिनेमाघरों में रिलीज़ हो गयी। मोहल्‍ले के पाठकों के लिए पेश है ओसियान के वक्‍त लिखी गयी इस फिल्‍म की समीक्षा। ओशियंस की वो स्क्रीनिंग दिल्ली में “मोहनदास” का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन थी। दिन था सत्रह जुलाई सन दो हज़ार आठ। मैंने इस प्रदर्शन के टिकट एक हफ़्ता पहले ही खरीद लिये थे और उस दिन हम दोस्तों के पूरे जमावड़े के साथ थियेटर में मौजूद थे। सिनेमा के तौर पर फ़िल्म कमज़ोर है, उसमें बहुत से झोल हैं लेकिन यह लेख सिर्फ़ फ़िल्म के बारे में नहीं है। यह हमारे समय के बारे में है।

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[13 Aug 2009 | 35 Comments | ]
हिंदी के टॉप तीन कथाकारों और कवियों के लिए पाठक सर्वे

गीताश्री ♦ आउटलुक हिंदी ने आपके विवेक को हमेशा सर आंखों पर रखा है। अन्य विषय के साथ आप साहित्य के भी सुधी सहृदय पाठक हैं। यह हमारे कथा-कहानी, कविता और साहित्य संबंधी स्तंभों की लोकप्रियता से स्पष्ट है। इस बार हम आपकी नब्‍ज़ टटोलना चाहते हैं। आपको जज बनाना चाहते हैं ताकि जान सकें कि सच्चे अर्थों में जनमानस में किस कवि और कथाकार की लोकप्रियता कैसी और कितनी है। आपकी सुविधा के लिए हमने समकालीन कवियों और कथाकारों के चुनिंदा नामों की अलग-अलग सूची बना दी है ताकि आप नामों की भूलभुलैया में खो न जाएं। इस सूची के बाहर भी कोई नाम आपको सर्वश्रेष्ठ लगे, तो वह भी आप हमें भेज सकते हैं। यह सूची हमने आपकी सुविधा के लिए बनायी है।

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[29 Jul 2009 | 4 Comments | ]
उदय प्रकाश और योगी प्रकरण बनाम छत्तीसगढ़ सरकार

अनिल ♦ कहीं ऐसा तो नहीं कि उदय प्रकाश पर इस बहाने जो बहस हुई, वह एक लेखक की लोकप्रियता को उठाने-गिराने के एजेंडे से संचालित रही हो? जबकि रायपुर के साहित्यिक आयोजन से जो राजनीतिक सवाल उभरे हैं, वे मौजूदा समय में समग्र साहित्यिक-सांस्कृतिक परिदृश्य की दुखती रग को छूते हैं। हिंदी में रचनारत समाज सिर्फ़ उदय की प्रतिबद्धताओं और सरोकार पर बहस करके एक सुविधाजनक संतुष्टि की ओर उन्मुख दिख रहा है। एक मित्र बता रहे थे कि हिंदी की एक साहित्यिक पत्रिका उदय प्रकाश प्रकरण पर विशेषांक निकालने जा रही है। हिंदी रचना संसार को छत्तीसगढ़ जैसे आयोजनों और उसमें शामिल होने वाले लेखकों के बारे में बात करने से, समूचे हिंदी रचनाशील दुनिया के खोखलेपन के उजागर होने का डर तो नहीं है?

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[27 Jul 2009 | 2 Comments | ]
हिंदी लेखक कहां खड़ा है?

रविभूषण ♦ विचारधारा से लेखक बंधे हुए हों या नहीं, लेकिन मानव जीवन, समय और समाज से वह सदैव बंधा हुआ है। कवियों, लेखकों, आलोचकों, संस्‍कृतिकर्मियों और बुद्धिजीवियों से यह सदैव अपेक्षा की जाती है और हिंदी में इसके अनेक नायाब उदाहरण हैं कि वे उन लोगों के साथ न हों, मंचस्‍थ भी नहीं, एवं सांप्रदायिक शक्तियों का अपने लेखन-वाचन में विरोध करना और समय-समय पर उनके साथ, कुछ समय के लिए ही सही, खड़े होना किसी भी दृष्टि से मुनासिब नहीं।

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[25 Jul 2009 | 7 Comments | ]
हम अपने ख़याल को सनम समझे थे

उदय कह रहे हैं कि वे गोरखपुर के कार्यक्रम योगी की उपस्थिति का राजनीतिक पाठ नहीं कर पाये। लेकिन उदय का ये रूप उनके विचारों में आये ज़बरदस्त परिवर्तन का नतीजा है। इस बात को वे स्वीकार भी कर चुके हैं। दिक्क़त ये है कि उनके चाहने वाले उस उदय को खोज रहे हैं, जो प्रगतिशील मूल्यों का पक्षधर होने का दावा करता था। वे नहीं देख पा रहे कि आजकल उदय ‘औलिया’ की रहमत में दुनिया का मुस्तकबिल देख रहे हैं, और मानते हैं कि लेखक को विचारों की बाड़बंदी से ऊपर होना चाहिए।