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Articles tagged with: vibha rani

स्‍मृति »

[4 Jun 2011 | No Comment | ]

सदानंद मेनन ♦ उनका सबसे बड़ा स्वप्न था – उनके यूनिक ‘थर्ड थिएटर का – अंतिम उत्तर’ … लोगों के जीवन के बारे में शहरी थिएटर ग्रुप उनके जीवन की गाथा न रचें। कामगार, फैक्ट्री मजूर, किसान, भूमिहीन मजदूर, अपना नाटक खुद लिखें और खेलें … यह प्रक्रिया हालांकि तभी आगे बढ़ेगी, जब कामगार वर्ग के लोगों की सामाजिक-माली हालत बदलेगी। जब यह होगा, थर्ड थिएटर के पास अपना ऐसा कोई खास काम नहीं रहेगा और तब उसका विलय ‘फर्स्ट थिएटर’ में हो जाएगा।

स्‍मृति »

[1 Jun 2011 | 2 Comments | ]

सदानंद मेनन ♦ बादल दा की खोज किसी अमूर्त की ओर नहीं थी। वे कहते थे कि मैं एक ऐसे अस्त-व्यस्त समय में रह रहा हूं, जो विरोधाभासों का ढेर है। जगत के एब्सर्ड रूप में से भी वे अपने लिए थीम निकाल लेते थे। कई बार तो अपनी नोटबुक में से ही वे विषय निकाल लेते। कट एंड पेस्ट वाले रूप को वे अपनाते थे। छोटे और कसे शब्दों से वे अपने नाटक की बेलबूटागिरी करते थे। एक विचार से दूसरे विचार तक वे बेखटके आया-जाया करते। थिएटर के प्रमुख कारकों – लाइट, सेट कॉस्ट्यूम की तो उन्होंने ऐसी की तैसी कर दी।

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[23 Feb 2011 | No Comment | ]

नरेंद्र ♦ एकपात्रीय नाटक की प्रस्तुति अत्यंत चुनौती और जोखिम भरी होती है। पूरे समय मंच पर अकेले स्वयं को प्रस्तुत करना और नाटक में आए सभी चरित्रों को उसके स्वरूप, स्वर व प्रस्तुति से साकार करना और इससे भी बढकर दर्शकों को पूरे समय बांधे रखना बहुत कठिन होता है। विभा ने इस कठिनतम चुनौती को स्वीकार किया और द्रौपदी के मूल चरित्र के अतिरिक्त आए अन्य स्त्री पात्रों सहित पुरुष पात्रों, यथा द्रुपद, युधिष्ठिर, अर्जुन और कृष्ण के रूप को अपने अभिनय, भाव भंगिमा, मुद्राओं तथा स्वर के साथ साकार किया।

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[10 Oct 2010 | 2 Comments | ]

विभा रानी ♦ (प्रियदर्शिनी मट्टू की ओर से) क्या मेरा या मुझ जैसी हजारों अभागनों का मामला तभी “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” माना जाएगा, जब वह दरिंदगी की सारी हदें पार कर दे? मेरे या मुझ जैसियों के अंग-प्रत्‍यंग काट कर अलग अलग बिखेर दिये जाते, उन्हें पका कर किसी पार्टी में परोस दिया जाता, हमारे एक एक अंग की भरे बाजार में नीलामी होती, हमारे एक एक अंग का सौदा किया जाता, या उस पूरे घटनाचक्र की फिल्म बनाकर मंहगे दामों में बेचकर उससे घर की छत तक दौलत का अंबार लगा लिया जाता। तब तो प्रकारांतर से संदेशा जाता है लोगों तक कि ऐ इस देश के वीर वासियों, आओ, और इस देश की लड़कियों से खेलो, तनिक सावधानी के साथ, इतना तक कि उसे “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” की श्रेणी में मत आने देना।

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[21 Apr 2010 | One Comment | ]

विभा रानी ♦ “मि जिन्ना” का मंचन दिल्ली के अस्मिता थिएटर द्वारा किया जानेवाला था, मगर ऐन वक्‍त पर इस पर बैन लग गया। नाटक चर्चित हो गया। बैन के ये अपने फायदे हैं। अभिव्यक्ति के खतरों पर फिर से बहसें शुरू हुईं और उसके बाद सब कुछ शांत पड़ गया। मगर 2007 में हिंदी थिएटर के सुप्रसिद्ध निर्देशक आरएस विकल ने इस नाटक में सम्भावित तमाम खतरों को जानते हुए भी इसके मंचन की सोची और “विराट कलोद्भव” के बैनर से इसे मुंबई में मंचित किया। अभी विगत 4 अप्रैल, 2010 को इंदौर के सामाजिक मंच “सूत्रधार” के सौजन्य से यहां के माई मंगेशकर हॉल में ‘मि जिन्ना’ के दो शो हुए।

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[28 Dec 2009 | 2 Comments | ]

विभा रानी ♦ आपके नारायण जब साठ हज़ार के साथ महारास रचाते थे, वह भी राजा होकर, तब तो उन्हें कोई कुछ नहीं कहता था, अब उनके ही पदचिन्हों पर जब आज के हम नारायण लोग चलते हैं तो लोग लानत मलामत भेजने लगते हैं। संजयवाला दूर का दर्शन तब भी था, मगर देश तब इतना राजद्रोही नहीं हुआ था कि किसी के गले लगने या चुंबन लेने को बुरा मान लिया जाए। पुष्‍पक विमान तब भी थे, पर लोग इतने खराब नहीं हुए थे कि किसी के विमान पर चढ़ने का कारण बताओ नोटिस जारी कर दे। लोग कहते रहते हैं कि बुढ़ापा मन से आता है, तन से नहीं, तो क्या फर्क़ पड़ता है मुनिवर कि हम साठ के हैं या छियासी के या सोलह के? फिल्मवाले लिख गये हैं ना कि “दिल को देखो, चेहरा न देखो” दिल दरिया होना चाहिए। लोग बाग ऐसे ऐसे दिलदारों से जलते हैं और खुद उस दरिया में बहने, उसमें डूबने का मौका नहीं लगता है, तो मारे ईर्ष्या के भर जाते हैं और दिल के दरिया में डूबती उनकी नैया को डुबाने लगते हैं, जो इस नैया पर प्रेम के हिंडोले की तरह झूल रहे होते हैं।

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[19 Dec 2009 | 8 Comments | ]

डेस्‍क ♦ पहला राजीव सारस्वत स्मृति सम्मान सुप्रसिद्ध लेखिका विभा रानी को दिया गया है। राजीव सारस्वत हिंदुस्‍तान पेट्रोलियम में प्रबंधक (राजभाषा) के रूप में कार्य कर रहे थे। पिछले साल यानी 2008 के 26/11 के आतंकवादी हमले के वे शिकार हो गये। हादसे के वक़्त वे ताज होटल में कंपनी की तरफ से दी गयी अपनी ड्यूटी पर थे। ताज होटल, ट्राइडेंट होटल, छत्रपति शिवाजी टर्मिनस, नरीमन हाउस -इन सभी पर उस रात आतंकवादियों ने कहर ढाया था, जिसकी चपेट में सैकडों लोग आ गये थे। राजीव सारस्वत भी उनमें से एक थे। विभा रानी हिंदी व मैथिली की सुपरिचित कथाकार, नाटककार, रंगमंच की कुशल अभिनेत्री व सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

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[2 Dec 2009 | 7 Comments | ]

विभा रानी ♦ आप कहते हैं कि इससे और भी व्यभिचार बढ़ेगा। दरअसल इससे नज़रिया और उदार हुआ है। हम बचपन में मेले ठेले में पान की दुकान पर फ्रेम मढ़ी तस्वीरें देखते थे, उन तस्वीरों में एक महिला या तो केवल ब्रा में रहती थी या उसे ब्रा का हुक लगाते हुए दिखाया जाता था। ये तस्वीरें इसलिए लगायी जाती थीं ताकि पान की दुकान पर भीड बनी रहे। लोग भी पान चबाते हुए इतनी हसरत और कामुक भरी नज़रों से उन तस्वीरों को देखते थे कि लगता था कि यदि वह महिला सामने आ जाए तो शायद वे सब उसे कच्चा ही चबा जाएं। मगर अब या तो पश्चिम की देन कहिए या अपना बदलता नज़रिया या महानगरीय सभ्यता, आज लड़कियां कम कपड़े में भी होती हैं, तो कोई उन्हें घूर-घूर कर नहीं देखता।

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[23 Nov 2009 | 3 Comments | ]

विभा रानी ♦ उसका नाम प्रवीण है। वह प्राइवेट टैक्सी का ड्राइवर है। नरोदा पटिया में रहता है। समय बिताना था। हमारी गाड़ी अपने गंतव्य को भागी जा रही थी। अहमदाबाद का नया बसा इलाका – सेटेलाइट सिटी। विकास की दौड़ में भागता शहर। चौड़ी सड़कें, चौतरफा मॉल से पटा इलाक़ा। एक फाइव स्टार होटल खुल चुका है। चार और खोलने की तैयारी है। सड़क बनने का काम हो रहा है। अभी इसके ऊपर फ्लाइओवर बननेवाला है। तब यहां का ट्रैफिक और भी कम हो जाएगा। इसरो का एक कार्यालय भी उधर दिखा। तब लगा कि एक ज़माने में यह कितना वीरान इलाका रहा होगा। आज यह अहमदाबाद का सबसे महंगा इलाक़ा है।

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[6 Nov 2009 | 2 Comments | ]

डेस्‍क ♦ विभा रानी के बेहद चर्चित नाटक “दूसरा आदमी दूसरी औरत” का नाट्य पाठ मुंबई में स्त्री मुक्ति संघटना एवं एकेडेमी ऑफ थिएटर आर्ट, मुंबई विश्वविद्यालय के सौजन्य से 1-7 नवम्बर, 2009 तक आयोजित WPI (WOmen Playwright International) यानी अंतर्राष्ट्रीय महिला नाट्य लेखक कांफ्रेंस में 6 नवम्बर, 2009 को दोपहर 12 बजे होने जा रहा है। प्रेम और संबंध के एक नये रूप पर आधारित इस नाटक का पाठ विभा रानी एवं अजय रोहिल्ला करेंगे। विभा रानी हिंदी और मैथिली की लेखक, नाट्य लेखक, नाट्य समीक्षक, रंगमंच अभिनेत्री व सामाजिक कर्मी हैं। अब तक उन्होंने 10 से अधिक नाटक लिखे हैं।