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विभा रानी ♦ आपके नारायण जब साठ हज़ार के साथ महारास रचाते थे, वह भी राजा होकर, तब तो उन्हें कोई कुछ नहीं कहता था, अब उनके ही पदचिन्हों पर जब आज के हम नारायण लोग चलते हैं तो लोग लानत मलामत भेजने लगते हैं। संजयवाला दूर का दर्शन तब भी था, मगर देश तब इतना राजद्रोही नहीं हुआ था कि किसी के गले लगने या चुंबन लेने को बुरा मान लिया जाए। पुष्पक विमान तब भी थे, पर लोग इतने खराब नहीं हुए थे कि किसी के विमान पर चढ़ने का कारण बताओ नोटिस जारी कर दे। लोग कहते रहते हैं कि बुढ़ापा मन से आता है, तन से नहीं, तो क्या फर्क़ पड़ता है मुनिवर कि हम साठ के हैं या छियासी के या सोलह के? फिल्मवाले लिख गये हैं ना कि “दिल को देखो, चेहरा न देखो” दिल दरिया होना चाहिए। लोग बाग ऐसे ऐसे दिलदारों से जलते हैं और खुद उस दरिया में बहने, उसमें डूबने का मौका नहीं लगता है, तो मारे ईर्ष्या के भर जाते हैं और दिल के दरिया में डूबती उनकी नैया को डुबाने लगते हैं, जो इस नैया पर प्रेम के हिंडोले की तरह झूल रहे होते हैं।
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डेस्क ♦ पहला राजीव सारस्वत स्मृति सम्मान सुप्रसिद्ध लेखिका विभा रानी को दिया गया है। राजीव सारस्वत हिंदुस्तान पेट्रोलियम में प्रबंधक (राजभाषा) के रूप में कार्य कर रहे थे। पिछले साल यानी 2008 के 26/11 के आतंकवादी हमले के वे शिकार हो गये। हादसे के वक़्त वे ताज होटल में कंपनी की तरफ से दी गयी अपनी ड्यूटी पर थे। ताज होटल, ट्राइडेंट होटल, छत्रपति शिवाजी टर्मिनस, नरीमन हाउस -इन सभी पर उस रात आतंकवादियों ने कहर ढाया था, जिसकी चपेट में सैकडों लोग आ गये थे। राजीव सारस्वत भी उनमें से एक थे। विभा रानी हिंदी व मैथिली की सुपरिचित कथाकार, नाटककार, रंगमंच की कुशल अभिनेत्री व सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता हैं।
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विभा रानी ♦ आप कहते हैं कि इससे और भी व्यभिचार बढ़ेगा। दरअसल इससे नज़रिया और उदार हुआ है। हम बचपन में मेले ठेले में पान की दुकान पर फ्रेम मढ़ी तस्वीरें देखते थे, उन तस्वीरों में एक महिला या तो केवल ब्रा में रहती थी या उसे ब्रा का हुक लगाते हुए दिखाया जाता था। ये तस्वीरें इसलिए लगायी जाती थीं ताकि पान की दुकान पर भीड बनी रहे। लोग भी पान चबाते हुए इतनी हसरत और कामुक भरी नज़रों से उन तस्वीरों को देखते थे कि लगता था कि यदि वह महिला सामने आ जाए तो शायद वे सब उसे कच्चा ही चबा जाएं। मगर अब या तो पश्चिम की देन कहिए या अपना बदलता नज़रिया या महानगरीय सभ्यता, आज लड़कियां कम कपड़े में भी होती हैं, तो कोई उन्हें घूर-घूर कर नहीं देखता।
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विभा रानी ♦ उसका नाम प्रवीण है। वह प्राइवेट टैक्सी का ड्राइवर है। नरोदा पटिया में रहता है। समय बिताना था। हमारी गाड़ी अपने गंतव्य को भागी जा रही थी। अहमदाबाद का नया बसा इलाका – सेटेलाइट सिटी। विकास की दौड़ में भागता शहर। चौड़ी सड़कें, चौतरफा मॉल से पटा इलाक़ा। एक फाइव स्टार होटल खुल चुका है। चार और खोलने की तैयारी है। सड़क बनने का काम हो रहा है। अभी इसके ऊपर फ्लाइओवर बननेवाला है। तब यहां का ट्रैफिक और भी कम हो जाएगा। इसरो का एक कार्यालय भी उधर दिखा। तब लगा कि एक ज़माने में यह कितना वीरान इलाका रहा होगा। आज यह अहमदाबाद का सबसे महंगा इलाक़ा है।
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डेस्क ♦ विभा रानी के बेहद चर्चित नाटक “दूसरा आदमी दूसरी औरत” का नाट्य पाठ मुंबई में स्त्री मुक्ति संघटना एवं एकेडेमी ऑफ थिएटर आर्ट, मुंबई विश्वविद्यालय के सौजन्य से 1-7 नवम्बर, 2009 तक आयोजित WPI (WOmen Playwright International) यानी अंतर्राष्ट्रीय महिला नाट्य लेखक कांफ्रेंस में 6 नवम्बर, 2009 को दोपहर 12 बजे होने जा रहा है। प्रेम और संबंध के एक नये रूप पर आधारित इस नाटक का पाठ विभा रानी एवं अजय रोहिल्ला करेंगे। विभा रानी हिंदी और मैथिली की लेखक, नाट्य लेखक, नाट्य समीक्षक, रंगमंच अभिनेत्री व सामाजिक कर्मी हैं। अब तक उन्होंने 10 से अधिक नाटक लिखे हैं।
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विभा रानी ♦ क्या फर्क़ रह जाता है सकुबाई या उसकी मालकिन में कि दोनों के ही पति के विवाहेतर संबंध हैं। विरोध करने पर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर मालकिन भी पति के हाथों बुरी तरह पिटती है, मगर बच्चों की खातिर घर नहीं छोड़ पाती। मगर, फर्क़ है। सकुबाई के पति के संबंध जग जाहिर हैं। मालकिन के पति के संबंध सामाजिकता की खोल में छुपा। नौकरानी हो कर भी सकुबाई इतनी ईमानदार है कि मालकिन अपना पूरा घर उसके ऊपर छोड़ देती है। मुंबई में आपको ऐसी ईमानदार बाइयों की फौज़ मिलेगी। बल्कि यूं कहें कि जिस तरह हर सफल पुरुष के पीछे किसी स्त्री का हाथ होता है, उसी तरह हर सफल औरत के पीछे उसकी बाई का हाथ होता है।
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विभा रानी ♦ मुंबई में 8वां महिला नाट्यलेखक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन यानी Women Playwright International (WPI) 1 से 7 नवंबर, 2009 तक मुंबई विश्वविद्यालय के अकेडमी ऑफ थिएटर आर्ट तथा स्त्री मुक्ति संघटना, मुंबई के सौजन्य से आयोजित किया जा रहा है। WPI के गठन का उद्देश्य थिएटर के क्षेत्र में काम कर रही महिलाओं को बिना किसी भेदभाव के अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ाना है। इस बार के सम्मेलन की थीम है, उदारता व सहिष्णुता (Liberty and Tolerance)। इसके सब थीम में हैं, अपनी पहचान, संस्कृति और उसकी विभिन्नता, अहिंसा के रास्ते जीवन जीना, पितृसत्तात्मकता की चुनौतियां, सामाजिक-राजनीतिक विश्व में थिएटर की भूमिका, थिएटर में हास्य आदि हैं।
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विभा रानी ♦ पूरे नाटक में आशीष एक कुशल अभिनेता की तरह दिखे, लेकिन साथ ही, कहीं कहीं वे चूके भी। खासकर लड़की या महिला का अभिनय करते वक़्त। लडकियां सभी समय एकदम नाजुक, कोमलांगी नहीं रहतीं। पर यह हमारी साइकी है। सम्वाद अदायगी बहुत अच्छी थी, मगर भदेस बोली के चक्कर में वे पूर्वी उत्तर प्रदेश के बदले कभी कभी हरियाणा के लग जा रहे थे। प्रकाश व्यवस्था कहीं कहीं तो बेहद सटीक थी। नादिरा जी के नाटकों में प्रकाश पर काफी ध्यान दिया जाता है, एक साथ वे कई कई लाइट्स के प्रयोग करती हैं। संगीत थोडा लाउड था, जो नाटक की गंभीरता के बदले उसे कहीं कहीं तमाशाई फील दे रहा था।
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विभा रानी ♦ छम्मक्छल्लो ने पहले भी लिखा था कि गाली देना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और उसमें मां बहन का इस्तेमाल हमारा आपद धर्म. इससे आप हमें बेदखल नहीं कर सकते. दूसरे हमारे भीति भाव को तो तुलसीदास जी भी अपने समय में अनुभव कर गए थे, इसीलिए लिख भी गये कि ‘बिन भय होंहि न प्रीति’ तो, जबतक आप किसी बात का भय नहीं दिखाएंगे, लोग आपकी बात नहीं मानेंगे. गांधी जी के सत्य, अहिंसा और प्रेम के मार्ग पर चलते हुए किसी से अनुरोध वाली भाषा में कहेंगे कि भाई साहब, यहां पर अपनी शंका का समाधान मत करें तो वह पलट कर आपसे ही कह बैठेगा कि “क्यों? यह ज़मीन क्या तेरे बाप की है?” फिर आप क्या कर लेंगे?
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विभा रानी ♦ नाटक की प्रयोगधर्मिता अपने चरम पर थी। मन की उलझन और जीवन की आसक्ति में मन का जीवन जाल में फंसने के प्रतीक के रूप में जाल का इतना सुंदर प्रयोग हुआ है कि बस, मुंह से वाह निकल जाए। अब तक नाटक में इतना लंबा प्रणय दृश्य मैंने नहीं देखा था। लेकिन उस प्रणय दृश्य की कलात्मकता देखिए कि आप उसे किसी प्रेम कविता की तरह महसूस करते हैं। आप खुद भी उस प्रणय काव्य का एक भाग बन कर रह जाना चाहेंगे। इतनी सुंदर और अश्लीलता से कोसों दूर प्रेम की विकलता, विह्वलता का ऐसा बांसुरीमय तान कि देह का रेशा-रेशा इस तान में पूरे-पूरे उतर जाने को चाहे। और यह प्रणय दृश्य सवा घंटे के नाटक में दो बार आता है और दोनों ही बार कलात्मकता के शिखर पर।


