Articles tagged with: vibha rani
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विभा रानी ♦ नाटक की प्रयोगधर्मिता अपने चरम पर थी। मन की उलझन और जीवन की आसक्ति में मन का जीवन जाल में फंसने के प्रतीक के रूप में जाल का इतना सुंदर प्रयोग हुआ है कि बस, मुंह से वाह निकल जाए। अब तक नाटक में इतना लंबा प्रणय दृश्य मैंने नहीं देखा था। लेकिन उस प्रणय दृश्य की कलात्मकता देखिए कि आप उसे किसी प्रेम कविता की तरह महसूस करते हैं। आप खुद भी उस प्रणय काव्य का एक भाग बन कर रह जाना चाहेंगे। इतनी सुंदर और अश्लीलता से कोसों दूर प्रेम की विकलता, विह्वलता का ऐसा बांसुरीमय तान कि देह का रेशा-रेशा इस तान में पूरे-पूरे उतर जाने को चाहे। और यह प्रणय दृश्य सवा घंटे के नाटक में दो बार आता है और दोनों ही बार कलात्मकता के शिखर पर।
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विभा रानी ♦ रोशनी की एक लकीर के सहारे ट्रेन की पटरी, तेज भागती ट्रेन की आवाज़, ट्रेन के हेडलाइट्स की पास आती रोशनी और तखत के बीच में बैठी तीनों बहनें ये बता देते हैं कि यहां आत्महत्या होने जा रही है। यह आपको जड़ बना देने के लिए काफी है। इसी तरह से तखत पर ही बैठे लोगों के ट्रेन में बैठने का आभास दे कर आत्महत्या से लेकर धार्मिक अंधत्व को बड़ी कुशलता से बुना गया है। मन के अंतर्द्वद्व और बेचैनी को प्रकाश के जरिये ही पूरी की पूरी ट्रेन और उसके कंपार्टमेंट के सहारे दिखाना और उसके साथ-साथ दर्शक के मन में भी वह अंतर्द्वद्व और बेचैनी पैदा करना एक कुशल निर्देशन की मांग करता है। बीच-बीच में चुटीले संवाद और हालात हास्य बिखेरने का काम करते रहे।
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विभा रानी ♦ नेहरु सेंटर थिएटर फेस्टिवल में नाटक की अलग अलग प्रस्तुतियों के बाद इस बार दास्तानेगोई पर एक प्रस्तुति “हम कहें आप सुनें” नादिरा ज़हीर बब्बर ने अपने “एकजुट थिएटर ग्रुप” की तरफ से की। लिलेट दुबे के “ब्रीफ कैंडल” के बाद यह दूसरा नाटक रहा, जो किसी महिला निर्देशक का था। सामान्यत: होता यह है कि लोग कहते हैं, आप कहें, हम सुनें, मगर चूंकि यह नाटक था, जिसमें नाट्यकर्मियों को अपनी बात कहनी होती है, इसलिए वे कहते हैं, दर्शकगण सुनते हैं। यह नाटक भी दर्शकों से ऊपर उठकर श्रोता के स्तर पर पहुंचकर अपनी बात कहता है, क्योंकि यह नाटक है ही दास्तानगोई यानी किस्सागोई अर्थात स्टोरी टेलिंग। नादिरा बब्बर आज के युवाओं की अपनी संस्कृति को लेकर उदासीनता से चिंतित हैं।
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विभा रानी ♦ तकरीबन डेढ़ सौ साल पहले की घटना पर आधारित इस प्रेम गाथा में आदिवासी चरित्र होने के कारण अहिरानी बोली का प्रयोग किया गया है। अहिरानी बोली का प्रयोग 1980 में मराठी के सुप्रसिद्ध नाटककार भालचंद्र झा ने अपने एकांकी “चित्रकथी” में भी किया था। संयोग की बात है कि “अजिंठा” की तरह “चित्रकथी” भी मनोहर वाकोडे के काव्य पर आधारित है। अहिरानी का प्रयोग आज की आधुनिक भाषा बोल रहे लोगों के लिए एक चुनौती भरा काम होता है। मराठी संवाद के लिए तो अहीरानी का प्रयोग किया गया, मगर हिंदी गंवई ज़बान के लिए बंबइया हिंदी फिल्मों वाली ज़बान इस्तेमाल कर ली गयी, जो मखमल में टाट के पैबंद की तरह लगती रही।
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विभा रानी ♦ नेहरू सेंटर थिएटर फेस्टिवल की अगली प्रस्तुति के रूप में सलीम आरिफ निर्देशित और जावेद सिद्दीक़ी लिखित नाटक “हम सफ़र” का मंचन किया गया। इस बार के नेहरू सेंटर थिएटर फेस्टिवल में मंचित अब तक के नाटकों में से यह पहला नाटक रहा है, जो आपके अपने जीवन के ज़्यादा नज़दीक है। रिश्ते जीवन का आधार होते हैं। इसमें टूटन इंसान से ही नहीं, बल्कि उससे संबंधित अन्य रिश्तों से भी बहुत कुछ छीन लेता है। पति व पत्नी के रिश्ते वैसे भी बहुत बारीक धागे से बंधे होते हैं, जिस पर अहम की मोटी-मोटी बोशीदा चादरें टांग दी जाती हैं। नतीज़न धागे को टूटना ही होता है।
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विभा रानी ♦ आखिर क्या बात है कि पौराणिक आख्यानों का बार-बार हम मंचन करते हैं? इसके उत्तर में कहा जा सकता है कि उनमें से आज के लिए प्रासंगिकता की खोज। यह नाटक भी इसी की एक खोज है। मैंने यह नाटक पढ़ा नहीं है, मगर महाभारत की प्रस्तुति और आर्य-अनार्य की चर्चा के बाद अचानक हिटलर का प्रसंग ले आना और फिर महाभारत प्रसंग ला कर नाटक ख़त्म करना एकाएक नाटक की तंद्रा में बड़ा भारी झोल पैदा करता है। हो सकता है कि हिटलर के समय में भी वही शुद्धतावादी रक्त का आग्रह था, इसलिए इसे यहां डाला गया हो, मगर यह आग्रह तो अभी भी अपने समाज में ही है।
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विभा रानी ♦ नेहरु सेंटर थिएटर फेस्टिवल की अगली प्रस्तुति थी मनोज जोशी कृत नाटक चाणक्य। नीति और राजनीति के बात आने पर कौटिल्य चाणक्य का नाम ना आये, यह असंभव है। राजनीति और छल-प्रपंच राजनीत का अभिन्न हिस्सा है। यह राजनीति जब व्यक्ति से उठकर समाज की ओर जाती है, तो हितकारी होती है। इसी हित की साधना में, आर्यावर्त को एक सूत्र में पिरोने का सपना देखा था चाणक्य ने। चाणक्य के चरित्र का तेज, तप, उसकी निष्ठा, उसकी ज़िद, उसकी लगन, उसका आत्माभिमान एकबारगी ऋषि विश्वामित्र की याद दिलाता है। जाहिर है कि ऐसे चरित्र, जिसमें परस्पर विवाद हो, लोगों को लुभाता है और अपने-अपने क्षेत्र में उस पर काम करने के लिए उकसाता है।
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विभा रानी ♦ नेहरू सेंटर थिएटर फेस्टिवल की अबतक की उपलब्धि के रूप में मलयालम नाटक आयुस्सिंते पुस्तकम (The Book of Life) को माना जा सकता है। रविवर्मा कलानीलयम थिएटर के लिए प्रतिबद्ध लोगों का मंच है। मूलत: कीवी बालाकृष्णन के उपन्यास पर आधारित यह नाटक धर्म और इसके आडंबर तले कुचले सेक्स की धारणा की धज्जियां उड़ाता है। कथा केरल के एक गांव के ईसाई समुदाय के लोगों की है। वर्जनाओं और दमित इच्छाओं की सामाजिक, मनोवैज्ञानिक अवधारणा और उनसे उपजे सवाल और हालात इस पूरे नाटक का आधार है।
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विभा रानी ♦ नाटक में हास्य के पल आते हैं, जब मृतक मरीज़ द्वारा लिखे गये नाटक का रिहर्सल होता है। कुछ तथाकथित बोल्ड दृश्य भी हैं और कुछ बोल्ड संवाद भी, जो भाषाई दर्शकों को शायद थोड़ा असहज करता है, मगर अंग्रेज़ी के दर्शकों के लिए यह सामान्य है। भाषाई दर्शकों में भी थिएटर या रचनात्मकता के आग्रहियों के लिए ऐसे संवाद सामान्य हैं। फिर उन संवादों के साथ विषय की गंभीरता तुरंत ही उन संवादों पर से ध्यान हटा कर विषय वस्तु पर केंद्रित कर देती है। अमर तलवार, सुचित्रा पिल्लई, जॉय सेनगुप्ता, ज़फर कराचीवाला, मानसी पारेख और सत्चित पुराणिक परिचित अभिनेता हैं। दर्शक उन्हें फिल्म खासकर टीवी पर देखते रहे हैं।
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विभा रानी ♦ “इस्मत आपा के नाम – II” में इस्मत आपा के 3 अफसानों “अमरबेल” “नन्हीं की नानी” और “दो हाथ” की नाटकीय प्रस्तुति की गयी, जिन्हें क्रमश: मनोज पाहवा, लवलीन मिश्रा और सीमा पाहवा ने प्रस्तुत किया। अफ़सानागोई करते हुए पात्र में बदल जाना और फिर पात्र से अफ़सानागो बन जाने की इस अंतर्यात्रा को इन तीनों कलाकारों ने बडी कुशलता से पेश किया। सभी अफसाने इतने दमदार थे और उनमें समाज और उसकी रवायतों के प्रति इतना तंज भरा हुआ था कि सभी कहानियां व्यंग्य की शक्ल लेते हुए कभी टीस तो कभी हास्य पैदा कर रहे थे। सभी कलाकार अपनी बयानबाज़ी और अभिनय में सहज थे।




