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Articles tagged with: vibha rani

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[3 Oct 2009 | One Comment | ]
मुंबई में शुरू हुआ थिएटर फेस्टिवल

विभा रानी ♦ नेहरु सेंटर, मुंबई का 13वां थिएटर फेस्टिवल आज से शुरू हो गया। यह फेस्टिवल 14 अक्तूबर तक चलेगा। 12 दिनों तक चलनेवाले इस फेस्टिवल में मलयालम, उर्दू और बांग्ला के कुछ पुरस्कार विजेता नाटकों की भी प्रस्तुति की जा रही है। आज फेस्टिवल की शुरुआत मराठी संगीत नाटक के “मदन भूल” से हुई। “मदन भूल” गिरीश कर्नाड के मशहूर नाटक “फूल” या “फ्लावर्स” से अभिप्रेरित है। इसे नेहरु सेंटर, मुंबई प्रस्तुत कर रहा है। इसके अलावा इस फेस्टिवल में अलग अलग भाषाओं के 14 नाटक प्रस्तुत किए जा रहे हैं। यह फेस्टिवल नेहरु सेंटर की ओर से मुंबईकरों के लिए एक उपहार है। इसलिए इसके पास पर “निमंत्रण” शब्द छपा है, जो दर्शकों को एक भावात्मक संतुष्टि देता है।

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[2 Oct 2009 | 3 Comments | ]
कालिया को कोसिए, ज्ञानपीठ को नहीं

विभा रानी ♦ जिसने भी मोहल्ला पर बेनामी पोस्ट डाला है और जिसके लिए लोग हाय तौबा कर रहे हैं कि अगर वह ख़ुद इतना बड़ा ईमानदार है तो नाम बताये, तो भैया, ऐसे मामलों में नाम छुपाना लेखक के लिए ज़रूरी हो जाता है। क्योंकि बाक़ी समय भले प्रकाशक एक दूसरे पर छींटाकशी करते रहें, मगर हैं सभी एक ही थैले के चट्टे-बट्टे। और पैसों के मामले में सभी दूध शक्कर हो जाते हैं। मुंहामुंही बात फैलती है कि अमुक लेखक पैसे के लिए बहुत किच-किच करता है और सभी प्रकाशक लामबंद हो जाते हैं और एक अघोषित नीति के तहत उस लेखक को छापना बंद कर देते हैं।

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[27 Sep 2009 | One Comment | ]
कन्‍या जिमाइए, छुट्टी पाइए!

विभा रानी ♦ कहावत है न कि जहां चाह, वहां राह। सो न तो डॉक्टरों की कमी है न क्लिनिकों की। कमी है तो सिर्फ अपनी इच्छा शक्ति की। मेरी सलाह मानिए, अपनी इच्छा शक्ति जगाइए और कन्या गर्भ से मुक्ति पाइए। देवी-पूजा और कन्या भोजन की चिंता ना करें, देवी तो तय ही है, न तो वो बदलनेवाली हैं, न तो उनकी संख्या में कोई कमी या इज़ाफा होनेवाला है। रह गयी कन्याएं, तो देश में सिरफिरों की कमी तो है नहीं। कोई न कोई कन्या पैदा करेगा ही। आप उसी को जिमा कर पुण्य कमा लीजिएगा। आखिरकार, सभी तो मंदिर नहीं बनाते न। मंदिर तो कोई-कोई ही बनाता है, पूजा तो मगर सभी करते हैं कि नहीं। सो मेरी सलाह पर गौर फरमाइए।

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[26 Sep 2009 | 4 Comments | ]
तुलसीदास जी, अच्छा हुआ, आप मोहल्‍ला युग में नहीं हैं!

विभा रानी ♦ छम्मकछल्लो को लगता है, इससे अच्छे तो हिंदी फिल्म इंडस्ट्री है। भाई लोग पूरी की पूरी फिल्म नकल कर के बना डालते हैं, सेट दर सेट, संवाद दर संवाद, संगीत दर संगीत, मगर लोग उसे “इंस्पायर्ड बाइ” बोलते हैं। “इंस्पायर्ड बाइ” भी बोल दिया तो बड़ी बात हो गयी। अभी हॉलीवुड में बॉलीवुड की बहार है। उसे भी लोग “इंस्पायर्ड बाइ” कहते हैं। ना कहें तो क्या घमासान मचाएं? मचा कर फायदा? मगर शायद मोहल्ला लाइव को है, लोगों को है। आखिर, धींगा मुश्ती देखने का मज़ा ही कुछ और है ना! किसी के दिल के तेल में अपने घर का भी दिया जला लो भाई!

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[21 Sep 2009 | One Comment | ]
कम्बख्त इस आम आदमी को पैदा किसने कर दिया?

विभा रानी ♦ छम्‍मकछल्‍लो के पास शब्द नहीं थे, उसे याद आ रहा था, खास लोगों द्वारा उचारे जानेवाले शब्द, आम लोगों के लिए, ये लोग जानवर हैं, सुअरबाड़े में रहते हैं। हवाई जहाज़ को भी पशुशाले में तब्दील कर देते हैं। अंग्रेज़ी में एक शब्द चल गया है – इकॉनॉमी। यह आपके आर्थिक स्तर से जुड़ जाता है। जहां किफायत की बात आती है, यह शब्द उसके साथ जुड़ जाता है। अब किफायत की बात तो आम आदमी ही करेगा ना। उसी की आमदनी सीमित है, उसे ही अपनी सीमित आमदनी में घर चलाना होता है, दुनिया के सारे कर्म निपटाने होते हैं। तरह-तरह के टैक्स भरने होते हैं। खास लोगों को इन सबसे मतलब नहीं होता। वे आम जन के पैसे पर अपने खास मकसद पूरे करते हैं।

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[17 Sep 2009 | 2 Comments | ]
छम्‍मकछल्‍लो कहिस : बड़ा कौन, छोटा कौन? बूझो तो जानें

विभा रानी ♦ ये सभी शब्बीर मास्टर, उस्तानी जी, यूसुफ मियां, शकूर या रहमान, मजिस्ट्रेट साहब, ए राम साहब वगैरह छम्मकछल्लो या अन्यों के घरों का सब कुछ खाते-पीते। न खाना किसी क्रांति जैसी घटना होती और उस शहर में ऐसी कोई क्रांति आई नहीं। सब इसी में मगन थे कि ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई उनके हाथ का नहीं खाए? मगर यही शब्बीर मास्टर, उस्तानी जी, यूसुफ मियां, शकूर या रहमान, मजिस्ट्रेट साहब, ए राम साहब वगैरह जब ईद या शबे बरात में सेवई, बर्फी आदि भेजते तो उसे कोई नहीं खाता था। उसे जलेश्वरी, फुलेसरी, सोमीदास या ऐसे ही किसी को दे दिया जाता। खुद जलेश्वरी के यहां से कोई प्रसाद या पकवान आता तो उसे किसी और जलेश्वरी या फुलेसरी या चनिया के हवाले कर दिया जाता।

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[14 Sep 2009 | 2 Comments | ]
आप करते रहें हिंदी हिंदी, हिंदी हमारे ठेंगे पे

विभा रानी ♦ हिंदी में हम केवल कविता, कहानी, उपन्यास लिख कर साहित्य की खानापूरी करते रहते हैं। विषय विविध हैं, मगर उस पर लिखने का वक़्त नहीं है। वक़्त से ज़्यादा उन पर लिखने-काम करनेवालों का सम्‍मान नहीं है। शब्दकोश, विकासात्मक, विज्ञान, समाज, रहस्य-रोमांच जैसे विषयों पर मौलिक किताबें नहीं हैं। हैरी पॉटर जैसी किताबें किशोरों के लिए आज कहां हैं? नर्सरी राइम्स जैसी किताबें भी हिंदी में बमुश्किल मिलती हैं। अभी भी लेखकों की लंबी क़तार है, जो नेट और उसके फायदे से कोई साबका नहीं रखते। राजभाषा हिंदी से तो साहित्यकारों का खासा बैर भाव है ही। सरकार के बड़े-बड़े पदों पर रहे स्वनामधन्य लेखक भी यही कहते रहे कि राजभाषा हिंदी तो केवल हिंदी अधिकारी ही समझ सकता है।

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[23 Aug 2009 | 53 Comments | ]
प्रभाष जी की मति भ्रष्‍ट हो गयी है, आप सब रहम करें

विभा रानी ♦ सरकार भी साठ साल की उम्र के बाद लोगों को सेवा से निवृत्त कर देती है। मगर हम हैं कि प्रभाष जोशी जैसे लोगों की उम्र पर रहम ही नहीं करना चाहते हैं। क्या हिंदी साहित्य और पत्रकारिता में नये लोग आज के आइकन बनने की कूवत नहीं रखते या हमारे भीतर इतनी भी अक्ल नहीं है कि ऐसे लोगों की बातों को एक बूढ़े का प्रलाप मान कर उसे या तो उपेक्षित कर दें या उसे भूल जाएं। याद रखें कि ये सब सेलेब्रेटी हैं और इन्हें अपने को ख़बर में बनाये रखना आता है और इसके लिए ये हर चाल चलेंगे ही चलेंगे। हम क्यों ऐसे शिकारियों के जाल में फंसते हैं, यह रटते हुए कि “शिकारी आएगा, जाल बिछाएगा, दाना डालेगा, लोभ से उसमें फंसना नहीं।”

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[14 Aug 2009 | No Comment | ]
जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण ने मोहल्‍ले की रचना छापी

डेस्‍क ♦ एक बार फिर मोहल्‍ला लाइव में छपी रचना को दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण ने अपने पन्‍नों पर जगह दी है। इस बार उन्‍होंने विभा रानी का परि-आलेख गांधी “कहते” क्‍यों हैं और मार्क्‍स “कहता” क्‍यों है? छापा है। इससे पहले अब्राहम हिंदीवाला की जिस ख़बर को जागरण ने अपने फिर से वाले कोने में छापा था, उसका शीर्षक था – सावधान, जिसेल मोंटेरियो आ गयी हैं। लेकिन तब असावधानीवश साभार में मोहल्‍ला लाइव के ज़‍िक्र की जगह ‘अब्राहम हिंदीवाला से’ छप गया था। इस बार जागरण ने दुरुस्‍त किया है। अच्‍छी बात यह है कि मोहल्‍ला लाइव के कंटेंट और विमर्श को अख़बारों में जगह मिल रही है। हम अपने रचनाकारों का शुक्रिया अदा करते हैं।

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[12 Aug 2009 | 4 Comments | ]
गांधी “कहते” क्‍यों हैं और मार्क्‍स “कहता” क्‍यों है?

विभा रानी ♦ हमारे महापुरुष हमेशा “कहते” हैं। राम “कहते” हैं, कृष्ण “कहते” हैं, बुद्ध “कहते” हैं, महावीर “कहते” हैं, नेता जी “कहते” हैं, गांधी जी “कहते” हैं, टैगोर “कहते” हैं, बंकिम “कहते” हैं, शरत “कहते” हैं… आदि-आदि। अगर वह “कहता” है तो यह हमारा, हमारी संस्कृति, हमारी सभ्यता, हमारे महापुरुषों का अपमान है। लेकिन दूसरे देशों के महापुरुष कभी भी कुछ “कहते” नहीं हैं। वे सब केवल “कहता” है। प्लेटो “कहता” है, अरस्तू “कहता” है, कंफ्यूसियस “कहता” है, मार्क्स “कहता” है, नीत्शे “कहता” है… आदि-आदि। यह हिंदीवालों की मति के क्या कहने और हम भी हिंदी ही पढ़ कर बड़े हुए हैं तो और कोई दूसरी भाषा समझ में ही नहीं आती। यह हिंदीवालों का व्याकरण इतना कठिन करने की ज़रूरत ही क्या थी?