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नज़रिया, विश्वविद्यालय, शब्द संगत »
ईपीडब्ल्यू ♦ उनका लेखन यौन संबंधों या स्त्री यौनिकता पर महिलाओं के परिप्रेक्ष्य को छूता है, तो उन्हें असहजता चुभने लगती है और वे उसे खारिज करने पर तुल जाते हैं। 1980 में, हिंदी साहित्य संसार मृदुला गर्ग के खिलाफ लगाये गये अश्लीलता के आरोपों से हिल गया था, जिनके उपन्यास चितकोबरा में एक नायिका है, जिसके लिए यौन-कार्य बहुत उबाऊ और मशीनी होता है, जिससे वो दूसरे मुद्दों की ओर अपना दिमाग घुमाती है। इस लेखन के लिए मृदुला गर्ग को यहां तक कि गिरफ्तार कर लिया गया था। दूसरी ओर कुछ लेखिकाओं ने चिंता और नाराजगी जतायी है कि कुछ प्रकाशन घरानों ने उन महिलाओं के लेखन को प्रकाशित करने से इनकार किया है, जिन्हें वे व्याख्यायित करते हैं कि वह “पर्याप्त साहसी नहीं” है।
मोहल्ला लाइव, विश्वविद्यालय, शब्द संगत »
विनीता भारती ♦ मोहल्ला, जो वीएन राय के दलित विरोधी, जातिवादी चरित्र का भंडाफोड़ कर रहा था और वर्धा के उत्पीड़ित छात्रों के सघर्ष का साथी बना हुआ था, वहां होने वाली नियुक्तियों की अनियमियतताओं का सच सामने ला रहा था, ‘चोरगुरु’, महाश्वेता देवी के नाम का टकसाली व्यापार करने वाले कृपाशंकर चौबे का पर्दाफाश कर रहा था, ‘ब्रूनो की बेटियों’ के कवि आलोकधन्वा और उन्हें कोसने वाले पत्रकार राजकिशोर के खुद उसी ‘हरम’ में पहुंच जाने पर ‘मुंह में कालिख’ पोतने की बात कर रहा था, वह खुद इसी खेल में शामिल हो गया। क्या यह सच नहीं कि अब ‘मोहल्ला’ और कुछ नहीं, ओम थानवी के रिमोट पर चलने वाला ‘जनसत्ता’ का ‘एक्स्टेंडेड वेब एडीशन’ बन चुका है। चुका हुआ और बिका हुआ।
नज़रिया, विश्वविद्यालय, शब्द संगत »
गिरिराज किराड़ू ♦ यह कहना जल्दबाजी होगी कि मामले का पटाक्षेप हो गया है। अव्वल तो यही कि माननीय राष्ट्रपति महोदया से लेखकों की मुलाकात और ज्ञानपीठ न्यास की बैठक के नतीजे अभी आने बाकी हैं। और जैसा कि अपने विवादास्पद लेख में विष्णु खरे ने कहा है, यह संघर्ष सिर्फ सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं रह जाना चाहिए। उनके लेख की इस सबसे सार्थक बात का पाठ यह किया जाना चाहिए कि अगर बर्खास्तगी न हो तो आने वाले दिनों में साहित्य में ऐसी गुटबाजियां, मिलीभगत और गुपचुप कारगुजारियां नहीं चलने दी जाएं। अगर बर्खास्तगी की मांग का ‘वामपंथी’ तरीका कामयाब नहीं होता है तो वर्तमान कुलपति और निदेशक संपादक के बने रहने तक दोनों संस्थाओं से असंबद्धता का ‘गांधीवादी’ तरीका अपनाया जाना चाहिए।
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जनसत्ता संवाददाता ♦ साहित्य अकादेमी की गोवा के कलंगूट तट पर आयोजित सामान्य परिषद जनरल काउंसिल की बैठक अपूर्व हंगामे के साथ संपन्न हुई। बैठक में विभूति नारायण राय और रवींद्र कालिया के आचरण के विरोध में एक सदस्य ने निंदा का प्रस्ताव रखा। अकादेमी के नियमों में न होने की वजह से उसे स्वीकार नहीं किया गया। लेकिन उपाध्यक्ष सतिंदर सिंह नूर सहित सदस्यों ने लेखिकाओं को ‘छिनाल’ कहने-छापने की अनौपचारिक रूप से भर्त्सना की। निंदा प्रस्ताव सभा में हरीश नारंग ने रखा। इसका फौरी समर्थन नंदकिशोर आचार्य ने किया। नारंग ने कहा कि वीएन राय का महिला लेखकों के बारे में दिया गया आपत्तिजनक वक्तव्य साहित्य जगत में अपूर्व हादसा है।
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अजितकुमार ♦ इस नयी लहर की झोंक में पड़ कर किन्हीं लेखिकाओं ने अगर आत्मकथाओं में अपने पराक्रमों की सच्ची-झूठी गाथाएं लिख कर वाहवाही लूटी और इससे व्यथित होकर पुरानी चाल का कोई व्यक्ति इसे ‘छिनरपन’ समझ बैठा… तो उचित था कि उसकी दकियानूसी हंस कर बिसरा दी जाती। जरूरी न था कि तमाम लेखिकाएं – लेखक व्यग्र हो स्त्री की सीता-सावित्री-छवि बरकरार रखने में जुट जाएं। अभियान चलाने से वह छवि लौटने वाली नहीं – अगर वह होगी या रहेगी तो स्त्री-पुरुषों के और पूरे समाज के संयत-मर्यादित आचरण से ही… स्वेच्छाचार की नकारात्मकता के आंतरिक बोध से ही… इसका अभियान तो केवल कुंठित-प्रतिबंधित ही करेगा – सबसे अधिक उस स्वतंत्रचेता नारी समुदाय को ही…
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राजकिशोर ♦ कुछ कहेंगे, नमक अदायगी कर रहा है; कुछ का मत होगा, यह टिप्पणीकार अंतर्विरोधों का मारा हुआ है, कुछ इसे पतन की पहली सीढ़ी बताएंगे। लेकिन जैसे किसी स्त्री को छिनाल करार देने भर से वह छिनाल नहीं हो जाती, उसी तरह मैं ऐसे विशेषणों से विचलित नहीं होता। विष्णु खरे की तरह मुझे भी पता है कि हिंदी जगत में आरोप लगाने के पीछे अक्सर किस तरह के इरादे होते हैं। जब मैत्रेयी पुष्पा पर अश्लीलता का इलजाम लगाया जा रहा था, तब मैंने उनके बचाव में लिखा था। जब अशोक वाजपेयी को दारूकुट्टा कहा गया था, तब मैंने पीने को नैतिकता या चरित्र से जोड़ने का प्रतिवाद किया था। न मैं मैत्रेयी की कृपा पर अवलंबित था न वाजपेयी की उदारता पर। आज भी अपनी जीविका के मामले में आत्मनिर्भर हूं।
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संजीव चंदन ♦ ज्ञानपीठ के न्यासियों की बैठक के पहले यदि वैसे लेखक-लेखिका, जिन्होंने किसी न किसी रूप में विभूति-कालिया-द्वय के खिलाफ इस प्रसंग में पहल की है, यदि अपनी किताबें वापस लेने की घोषणा करते हैं, तो निश्चित ही ज्ञानपीठ को कालिया के लिए अपने संस्थान में बनाये रखना मुश्किल हो जाएगी। वैसा ही राय के संदर्भ में संभव है – अगर संसद के शीत सत्र में सारे लेखक इंडिया गेट से मानव शृंखला बना कर राय के खिलाफ संसद का ध्यानाकर्षण करते हैं और राय के होने तक हिंदी विवि के बहिष्कार की घोषणा करते हैं। आखिर सरकार को भी तय करना होगा कि विवि को एक सिपाही की जागीर बने रहने देना है या उसे हिंदी समाज और संस्कृति का प्रतिनिधि संस्थान बनाना है!
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अशोक वाजपेयी ♦ ‘जनसत्ता’ (17 अगस्त) में छपे दिनेश मौर्य के पत्र के संदर्भ में यह कहना है कि नेक काम है या नहीं, मैं ‘कभी-कभार’ स्तंभ में दूसरे लेखकों से भारतीय ज्ञानपीठ का बहिष्कार करने की मांग करने के साथ ही, ज्ञानपीठ से अपनी दोनों पुस्तकें ‘शहर अब भी संभावना है’ और ‘कवि कह गया है’ वापस ले चुका हूं। उसके एक आजीवन न्यासी के इस कदम पर पुनर्विचार करने के आग्रह को अस्वीकार भी कर चुका हूं। गिरिराज किशोर और प्रियंवद पहले ही अपनी पुस्तकें वापस ले चुके हैं। अब बाकी लेखक आगे आएंगे, इसका इंतजार है।
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मृणाल पांडे ♦ हाल में एक ऐसे ही साक्षात्कार की कृपा से नारीवाद तथा नारीवादी लेखन दोनों विषयों की अधकचरी समझ रखने वालों के बीच अजीब-सी लट्ठमलट्ठा हमने देखी। अब तक वह साक्षात्कार देने-लेने तथा छापने वाले माफी मांग चुके हैं। अत: मामला औपचारिक स्तर पर निबटा मान लिया जा सकता है पर फिर भी प्रकरण में काफी कुछ है, जो समझदार लोगों के बीच एक संवेदनशील बहस का मुद्दा बनना चाहिए। महिला लेखन को लेकर जब विवाद उठता है, तो पक्ष या विरोध में बोलने वालों में से अधिकतर सिर्फ शब्दों का घटाटोप फैलाकर स्त्रियों या निजी दुश्मनों के प्रति अपने मन में अन्यान्य वजहों से पल रही चिड़चिड़ाहट का सार्वजनिक विरेचन कर देते हैं। बहस जड़ तक नहीं जा पाती।
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राकेश बिहारी ♦ वे कौन से लोग हैं, जो आज विभूति नारायण राय के तथाकथित माफीनामे से संतुष्ट हैं या उन्हें रवींद्र कालिया की मुंहजोर गलती और ढीठ अपराध के लिए ज्यादा से ज्यादा लापरवाही जैसा आसान सा शब्द सूझ रहा है? उत्तर बहुत आसान है… इस जमात मे तीन तरह के लोग हैं। एक वे जो इन दोनों संस्थानों में नौकरी करते हैं या किसी न किसी तरह इन दोनों लोगों से उपकृत हैं, दूसरे वे जो इन दोनों के पुराने मित्र हैं, या फिर तीसरे वे जिन्हें अब भी इन दोनों ‘महापुरुषों’ से किसी विशेष कृपा की उम्मीद है। बिगाड़ के डर से हम कब तक ईमान की बात नहीं कहेंगे? यदि अब भी हम वृहत्तर समाज और उसके मूल्यों की रक्षा के लिए आगे आ कर उदाहरण नहीं रखते तो इतिहास हमें कभी माफ नहीं करेगा।


