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इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यों है?

➧ विजय कुमार सीने में जलन आंखों में तूफान सा क्यों है? इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यों है? पिछले दिनों मुंबई के बांद्रा–कुर्ला कॉम्पलेक्स में एक भव्य इमारत में किसी कार्यक्रम...

इच्‍छा मृत्‍यु के सामाजिक निहितार्थ भारत के लिए भयावह हैं 0

इच्‍छा मृत्‍यु के सामाजिक निहितार्थ भारत के लिए भयावह हैं

विजय कुमार ♦ इच्‍छा-मृत्‍यु के सामाजिक निहितार्थ तो, खासकर तीसरी दुनिया के गरीब लोगों के लिए, और भी अधिक भयावह है। तीसरी दुनिया में जहां स्‍वास्‍थ्‍य सेवाएं आम आदमी के बस से बाहर हो चुकी हैं, जहां व्यक्ति के लिए रोटी-कपड़ा-मकान हासिल करना मुहाल है, वहां यदि इच्‍छा-मृत्‍यु को कानूनी रूप दे दिया जाए तो असहाय एवं गंभीर रोगियों की इच्‍छा-मृत्‍यु के नाम पर हत्याओं की बाढ़ आ सकती है। पूंजीवादी समाज में जहां मानवीय सरोकार दिनों-दिन समाप्त होते जा रहे हैं, वहां पर इच्‍छा-मृत्‍यु के नाम पर लाखों मरणासन्न लोगों को अनइच्छित मौत की तरफ धकेला जा सकता है।

आठ महीने हो गये, पोस्‍टमार्टम रिपोर्ट नहीं आयी… 5

आठ महीने हो गये, पोस्‍टमार्टम रिपोर्ट नहीं आयी…

विकास वैभव ♦ शशि की मृत्यु के बाद जो कुछ हुआ, उसमें एनएसडी की भूमिका हमेशा ही संदिग्ध रही है। एनएसडी ने हमेशा यही कोशिश की कि किसी भी तरह से इस प्रकरण को जल्द से जल्द समाप्त किया जाए। एक तरह से उसकी भूमिका पल्ला झाड़ने वाली ही रही है क्यूंकि इस प्रकरण में अगर जांच बढ़ती, तो एनएसडी और अस्पताल प्रशासन की सांठ-गांठ के कच्चे-चिठ्ठे सामने आने का डर था। इसके अलावा भी एनएसडी में जिस तरह की धांधलियां निरंतर चलती रहती हैं, उसका भी बाहर आने का खतरा था। यही कारण रहा कि एनएसडी प्रशासन और उसके निदेशक ने पूरे प्रकरण पर पानी डालने की कोशिश की और इसे सामान्य मौत बताया और पोस्टमार्टम करवाने की भी जरूरत नहीं समझी।

एनएसडी से मांगा शशि भूषण की मौत का हिसाब 4

एनएसडी से मांगा शशि भूषण की मौत का हिसाब

डेस्‍क ♦ शशि जैसे लोग जो बिना किसी पारिवारिक बैकग्रांउड से आते हैं, और अपनी पहचान बनाने को लालायित होते हैं, अकसर व्यवस्था की छलनाओं के शिकार हो जाते हैं। जरूरत इस बात की है कि हम यह जिम्मेदारी तय करें कि आखिर उसकी मौत का जिम्मेदार कौन है? डेंगू जैसी एक मामूली बीमारी के कारण उसकी मौत हो जाती है, तो इसमें अस्पताल की भूमिका बनती है। अस्पताल से इलाज में लापरवाही हुई है जो मेडिकल रिपोर्ट में भी साफ दिखती है। इसलिए राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय को चाहिए कि वह अस्पताल के सामने इस मुद्दे को उठाये और अगर वह नहीं उठाता है तो हम जो शशि के दोस्त हैं, इस मुद्दे को उठाएंगे।

राष्‍ट्रीय नाट्य विद्यालय के छात्र शशि भूषण की डेंगू से मौत 14

राष्‍ट्रीय नाट्य विद्यालय के छात्र शशि भूषण की डेंगू से मौत

अविनाश ♦ एक निहायत ही मामूली बीमारी और एक निहायत ही गंभीर लापरवाही ने पटना के मशहूर रंगकर्मी और राष्‍ट्रीय नाट्य विद्यालय के फर्स्‍ट ईयर के छात्र शशि भूषण को हमसे छीन लिया है। शशिभूषण की पूरी ट्रेनिंग अभियानों और आंदोलनों से जुड़ी रंग-प्रक्रियाओं के बीच हुई थी। जनसंस्‍कृति मंच की पटना ईकाई हिरावल के साथ उनका रंग सफर शुरू हुआ अनिल अंशुमन, जो सीपीआईएमएल के सांस्‍कृतिक कार्यकर्ता हैं, ने ही उन्‍हें नाटकों की पगडंडी दिखायी थी। लिहाजा वे आंदोलनी गीतों के साथ बहुत सहज थे।

तुलसीदास जी, अच्छा हुआ, आप मोहल्‍ला युग में नहीं हैं! 4

तुलसीदास जी, अच्छा हुआ, आप मोहल्‍ला युग में नहीं हैं!

विभा रानी ♦ छम्मकछल्लो को लगता है, इससे अच्छे तो हिंदी फिल्म इंडस्ट्री है। भाई लोग पूरी की पूरी फिल्म नकल कर के बना डालते हैं, सेट दर सेट, संवाद दर संवाद, संगीत दर संगीत, मगर लोग उसे “इंस्पायर्ड बाइ” बोलते हैं। “इंस्पायर्ड बाइ” भी बोल दिया तो बड़ी बात हो गयी। अभी हॉलीवुड में बॉलीवुड की बहार है। उसे भी लोग “इंस्पायर्ड बाइ” कहते हैं। ना कहें तो क्या घमासान मचाएं? मचा कर फायदा? मगर शायद मोहल्ला लाइव को है, लोगों को है। आखिर, धींगा मुश्ती देखने का मज़ा ही कुछ और है ना! किसी के दिल के तेल में अपने घर का भी दिया जला लो भाई!

अरविंद चतुर्वेद की कविता “प्‍यार” पहले छपी थी 5

अरविंद चतुर्वेद की कविता “प्‍यार” पहले छपी थी

डेस्‍क ♦ अब हमारे लिए तय करना सचमुच मुश्किल है कि अरविंद चतुर्वेद की कविता प्‍यार और प्रदीप सौरभ की कविता उसने मुझसे कहा में से पहले कौन लिखी गयी। वैसे ये मामला हमारे तय करने का है भी नहीं। जैसे जैसे तथ्‍य सामने आ रहे हैं, वैसे वैसे उसकी व्‍याख्‍याएं बदल रही हैं। पहले नया ज्ञानोदय के प्रेम महाविशेषांक में छपी प्रदीप सौरभ की कविता को हमने अरविंद चतुर्वेद की कव‍िता की नकल कहा। लेकिन जब प्रदीप सौरभ ने हमें साप्‍ताहिक हिंदुस्‍तान की 88 की फाइल से अपनी उस कविता का पेज स्‍कैन करके हमें भेजा, तो हमें लगा कि नकल अरविंद चतुर्वेद ने की है। अब अरविंद चतुर्वेद ने अनल नाम की पत्रिका में मार्च 83 में छपी अपनी उस कविता की स्‍कैन कॉपी हमें भेजी है। यानी मामला और उलझ गया है।