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Articles tagged with: vineet kumar

शब्‍द संगत, स्‍मृति »

[22 Aug 2010 | 7 Comments | ]
जनकवि “गिरदा” नहीं रहे, हमने उनको संजोया ही नहीं

विनीत कुमार ♦ गिरदा के बारे में न तो हमें बहुत अधिक जानकारी है और न ही वो जो अब तक गाते आये हैं, उसकी कोई गहरी समझ। कविता और गीत के प्रति एक नकारात्मक रवैया शुरू से रहा है, इसलिए इसकी जानकारी मं शुरू से बाधा आती रही है। सुबह के विमर्श और तीन घंटे के लिए मसूरी से लौटने के बाद पेट में हायली रिच खाना गया तो न तो कुछ और सुनने की इच्छा हो रही थी और न ही कुछ कहने की। हम कुर्सी में धंसकर सोना चाहते थे, बैठना नहीं। तभी गिरदा दूसरे सत्र में मंच पर होते हैं। ये वो सत्र रहा, जिसमें गिरदा सहित बाकी लोगों ने उत्तराखंड के लोगों के दर्द को गाकर या कविता की शक्ल में हमसे साझा किया। गिरदा ने जब गाना शुरू किया, तो लगातार भीतर से आत्मग्लानि का बोध होता रहा।

विश्‍वविद्यालय, शब्‍द संगत »

[8 Aug 2010 | 7 Comments | ]
कालिया जी के पास गिरवी नहीं रखी है कलम!

विनीत कुमार ♦ प्रिय पाठक, तुमने लिखा कि उम्मीद है कि विनीतजी की कलम कालियाजी के पास गिरवी नहीं पड़ी होगी। अब तुम ही बताओ न, पच्चीस-पचास की कलम होती तो गिरवी रख भी दी होती। लेकिन पचास हजार रुपये का लैपटॉप (इसमें अलग से कीबोर्ड की कीमत पता नहीं – इसलिए पूरा दाम लिखा) भला कालियाजी के यहां गिरवी कैसे रख दूं? जिसे मैंने बड़े जतन से खरीदा, जिसके कागज को कोर्ट में जमानत के मामले में नहीं जाने दिया, उसे मैं कालियाजी के पास धूल खाने के लिए कैसे रख दूं? आपने जिस लेखक की मंशा और भरोसे पर शक किया, उससे ये कैसी मोहब्बत है कि चाहते हो वो कालियाजी के खिलाफ खुलकर सामने आये और उसका आगे से उस पत्रिका में लिखना बंद हो जाए?

विश्‍वविद्यालय, शब्‍द संगत »

[3 Aug 2010 | 9 Comments | ]
विभूति-छिनाल प्रसंग में पिट गया नामवर का ब्रांड

विनीत कुमार ♦ बाजार में ब्रांड के वर्चस्व और उसके कायम रखने के तरीके और नामवर सिंह का ब्रांड, वर्चस्व और कायम रखने के तरीके में कोई अंतर नहीं है। लेकिन सालों से ब्रांड और बाजार के फार्मूले पर नामवर सिंह को इस्तेमाल में लानेवाले मीडिया और साहित्यिक मंचों पर लांच करते रहनेवाले लोगों ने विभूति-छिनाल प्रसंग में जिसे कि वर्चुअल स्पेस में हंटर साहब की कोतवाली जुबान के तौर पर भी जाना जाने लगा है, नामवर सिंह को इस मसले पर ब्रांड के तौर पर सामने लाने की कोशिशें नहीं की। नहीं की इसलिए कि अगर की भी होगी और उन्होंने मना भी कर दिया होगा तो भी कहीं भी ये लाइन नहीं आयी कि इस मसले पर उन्होंने कुछ भी बोलने से मना कर दिया।

मोहल्ला दिल्ली, शब्‍द संगत »

[1 Aug 2010 | 35 Comments | ]
विभूति और आलोक मेहता ने हिंदी को शर्मसार किया

विनीत कुमार ♦ अभी तक हमने किसी भी पत्रकार को इस तरह सार्वजनिक रूप से बेआबरू होते नहीं देखा है। ऑडिएंस के वाजिब गुस्से से आप इस बात का अंदाजा लगा सकते हैं कि सत्ता के गलियारों में चमकनेवाले सफल पत्रकार और होते हैं और जो लोगों के दिलों पर राज करते हैं, वो और ही पत्रकार होते हैं। ऐवाने गालिब जैसे भरे सभागार में हमें एक शख्स भी ऐसा नहीं मिला, जिसने ये कहा कि अरे बैठ जाइए, मेहता साहब को बोलने दीजिए। ये अलग बात है कि उसी सभागार में आलोक मेहता के कूल्हे के नीचे काम करनेवाले नई दुनिया के पत्रकार भी मौजूद थे और मीडिया की नामचीन हस्तियां भी। एक भी स्वर, एक भी हाथ आलोक मेहता के पक्ष में न सही, बोलने देने के आग्रह के लिए नहीं उठे।

मीडिया मंडी, मोहल्ला दिल्ली »

[30 Jul 2010 | 5 Comments | ]
“खबरों की खबर : क्यों और कितना जरूरी” पर बहस आज

विनीत कुमार ♦ मीडिया और चैनलों की बाढ़ के बीच जहां छोटी से छोटी खबर के ब्रेकिंग न्यूज बनने की लगातार संभावना बनी रहती है, देश की हर लड़की, हर स्त्री एक पैकेज है की गुंजाइश में देखी-समझी जाती है, वहीं देश के सबसे तेज कहे जानेवाले चैनल की एक मीडियाकर्मी की देर रात काम की शिफ्ट से लौटने के दौरान हत्या कर दी जाती है और चैनल पर बारह घंटे तक कोई खबर नहीं आती। देश में हजारों ऐसे मीडियाकर्मी हैं, जो एक मजदूर से भी ज्यादा बदतर जिंदगी जीने के लिए मजबूर हैं। उन बदतर स्थिति में जीनेवाले मजदूरों पर रवीश कुमार फिर भी कभी आधे घंटे की स्टोरी बना देते हैं लेकिन इन मीडियाकर्मियों की सुध लेनेवाला कोई नहीं है।

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[16 Jul 2010 | 4 Comments | ]
मीडिया पर जमकर हुई बहसतलब, कई सीन साफ हुए

विनीत कुमार ♦ बाजार का मीडिया और जैसा बाजार चाहे, वैसा मीडिया। बाजार का कोई सपना नहीं होता, बाजार मुनाफे से चलता है और वो किसी का नहीं होता। बाजार मीडिया को पूरी तरह नियंत्रित कर रहा है। बहसतलब 3 में “किसका मीडिया कैसा मीडिया” बहस का जो मुद्दा रखा गया, इस पर बात करते हुए मणिमाला की ये लाइन पूरी बहस के बीच सबसे ज्यादा असरदार रही। ये वो लाइन है, जिसके वक्ताओं के बदल जाने के वाबजूद बहस का एक बड़ा हिस्सा इसके आगे-पीछे चक्कर काटते हैं। इस लाइन को आप पूरी बहस के निष्कर्ष के तौर पर भी देख सकते हैं या फिर बहस का वो सिरा, जिसे लेकर सूत्रधार सहित कुल चारों वक्ता सहमत नजर आये। मीडिया को बाजार का हिस्सा मानने से हमारे कई भ्रम दूर होते हैं।

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[26 Jun 2010 | 8 Comments | ]
गर्व से कहो हम चमार हैं!

विनीत कुमार ♦ रवीश ने अपनी रिपोर्ट में जिन माध्यमों के जरिये दलितों की नयी पहचान बनने की बात की है, उन माध्यमों के विश्लेषण से दलित विमर्श के भीतर एक नये किस्म की बहस और विश्लेषण की पूरी-पूरी गुंजाइश बनती है। जिन माध्यमों को कूड़ा और अपसंस्कृति फैलानेवाला करार दिया जाता रहा है, वही किसी जाति के स्वाभिमान की तलाश में कितने मददगार साबित हो सकते हैं, इस पर गंभीरता से काम किया जाना अभी बाकी है। इलीटिसिज्म के प्रभाव में मशीन औऱ मनोरंजन के बीच पैदा होनेवाली संस्कृति पर पॉपुलर संस्कृति का लेबल चस्‍पां कर उसे भ्रष्ट करार देने की जो कोशिशें विमर्श और अकादमिक दुनिया में चल रही हैं, उसके पीछ कोई साजिश तो जरूर लगती है।

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[22 Jun 2010 | 21 Comments | ]
हमारे साथ चार घंटे वही अनुराग कश्‍यप थे, वही!

विनीत कुमार ♦ इस बीच चार घंटे कैसे बीते, पता तक नहीं चला। पार्किंग तक में आधे घंटे से ऊपर हो गया, कई बार एक-दूसरे ने आपस में कहा कि सुबह निकलना भी तो है… लेकिन फिर कुछ छिड़ जाता… फिर, फिर… अच्छा तो अब फाइनली विदा लेते हैं, फिर मिलते हैं, कुछ बड़ा करते हैं, जल्द ही मिलते हैं, संपर्क में रहेंगे। आपके पास मोहल्लालाइव का लिंक तो है न, बहस यहां भी होगी देखिएगा। अरे हां, सच में बहुत दिनों के बाद मजा आएगा, ये शाम याद रहेगी। कुछ-कुछ वैसे ही इमोशनल हुए जैसे माल रोड, निजामुद्दीन, नयी दिल्ली पर सीनियर को सीऑफ करते हुए। सीनियर से मिलना ऐसे ही तो होता है।

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[20 Jun 2010 | 4 Comments | ]
त्रिपुरारी शर्मा की बातें बहस तलब 2 की उपलब्धि रही

ब्रजेश कुमार झा ♦ कुछ अटकाव के बावजूद बहसतलब-दो कायदे का रहा। बड़ी सहजता से नाटक की दुनिया से जुड़ीं त्रिपुरारी शर्मा ने इसे समझाया भी। सवाल हुए तो बड़े उदात्त भाव से कहा, “बहस कहां हो रही है, मेरे लिए यह सवाल महत्व का नहीं है। महत्व की बात तो इतनी भर है कि आम आदमी के लिए बहस जारी है।” दरअसल यही वह बिंदु है, जो बहसतलब में जान डालती है। उसके मतलब को बताती है। साथ ही उसे आगाह भी करती है। कुल मिलाकर त्रिपुरारी शर्मा की बातें बहसतलब की उपलब्धियां रहीं। वहां न कोई आक्रामकता थी, न दंभ। न ही अपने खास होने का बोध। दरअसल आज वही तो है आम आदमी।

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[20 Jun 2010 | No Comment | ]
अब ऑडियो सुनें, बहसतलब दो में किसने क्‍या कहा…

विनीत कुमार ♦ 18 जून को मोहल्ला लाइव, जनतंत्र और यात्रा बुक्स की साझा पेशकश के दौरान अभिव्यक्ति माध्यमों में आम आदमी में जिस बहस की शुरुआत हुई, उसके कई संस्करण अब वर्चुअल स्पेस की दुनिया में पसर रहे हैं। इस बहस में जो भी लोग शामिल हुए, वो वक्ताओं से या तो असहमत हैं या उनकी बातों को सिरे से खारिज करते हैं या फिर उन्हें लग रहा है कि इस तरह के आयोजन आम आदमी के सवाल को ईमानदारी से उठाने में बहुत मददगार साबित होंगे, इसे लेकर पक्के तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता। तमाम वक्ताओं को लेकर लगातार असहमति और बहस जारी रहे, अच्छा रहेगा। लेकिन उन्होंने दरअसल कहा क्या, उससे हम हूबहू सुनकर लगातार टकरा सकें, अपनी बात के बीच उनकी बात को उसी शक्ल में रख सकें, फिलहाल उस नीयत से उनकी बात ऑडियो की शक्ल में सुनिए…