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Articles tagged with: vineet kumar

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[26 Feb 2010 | 3 Comments | ]
टीवी चैनलों की फूहड़ हिंदी में बेमज़ा बजट भाषण, ओह…

विनीत कुमार ♦ कुल मिलाकर कहानी ये है कि जब भी हिंदी के चैनल बजट जैसे अंग्रेजी कार्यक्रमों को हिंदी में दिखाने के दावे करते हैं, उनकी खोखली और व्यावसायिक घोषणा ही होती है कि अपनी भाषा में बात समझी जाए, बहुत ही फूहड़ हो जाती है। उसके भीतर अचानक से दूरदर्शन की आत्मा घुस जाती है। मामला उबाऊ और बोझिल लगने लग जाता है। ऐसे में किशोर आजवाणी और अभिसार शर्मा जैसे काबिल एंकरों की भद्द पिटती है, मिसब्रैंडिंग होती है। अगर वो भाषाई स्तर के बदलाव को बारीकी स्तर पर नहीं समझ पाते हैं, इस काम के लिए पैसे खर्च नहीं करते हैं और सिर्फ हिंदी के नाम पर भुनाने के चक्कर में होते हैं, तो वो अपनी रेगुलर ऑडिएंस भी खो देते हैं, इसकी संभावना बनी रह जाती है।

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[26 Jan 2010 | 10 Comments | ]
तुम्‍हारे पास कांव-कांव, हमारे पास कट्ठा कट्ठा अखबार!

विनीत ♦ एक-दो वेबसाइटों के बहाने कैसे उन्होंने पूरे हिंदी वेबमीडिया को परिभाषित करने का काम किया, ये हम सबसे छिपा नहीं है। इसलिए ये लेख पाठकों के प्रति ईमानदारी बरतते हुए किसी भी तरह की नॉलेज शेयरिंग के बजाय अखाड़ों के पैंतरे बतलाने के लिए लिखे गये। बदले की उस भावना के तहत लिखे गये कि तुम्हारे पास कांव-कांव करने के लिए ब्लॉग या वेबसाइट का छज्जा है, तो मेरे पास दहाड़ने के लिए संपादकीय और कॉलम के डेढ़ से दो कठ्ठे की जमीन में फैली अटारी है। यकीन न हो तो जनसत्ता के लेख की भाषा में ही देख लीजिए, ब्लॉग-जगत के चंद नियतिहीन कोनों में हिंदी के कुछ मीडियाकर्मी न्यूयॉर्क की सड़कों पर पखावज बजा कर कीर्तन करने वाले हरे-कृष्ण अनुयायियों की तरह कुछेक सुरीले-बेसुरे नारे जरूर उठा रहे हैं; पर उनके सुरों में दम नहीं।

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[14 Jan 2010 | 4 Comments | ]
कनफ्यूजन हुआ, गलती हुई, माफी : मनीषा पांडेय

मनीषा पांडेय ♦ उस दिन जब आपने सच्‍चाई का खुलासा किया, तो मैंने कहा था, सॉरी, आई गेस, कोई कनफ्यूजन हो गया है। ये बात सिर्फ आपके और मेरे बीच हुई। मैंने सॉरी कहा था, लेकिन कोई टेपरिकॉर्डर तो है नहीं और न ही कोई कानूनी प्रमाण पत्र। लेकिन मेरे मुंह से ये शब्‍द जरूर निकले थे। कोई टेपरिकॉर्डर तो है नहीं और न ही कोई कानूनी प्रमाण पत्र। आपको खुद को बड़ा या छोटा कुछ भी समझने की जरूरत नहीं है। आप अच्‍छा लिखती हैं। अखबार में क्‍या छपेगा, ये तय करना मेरा काम नहीं है। ये घटना कतई इस निष्‍कर्ष तक नहीं पहुंचाती कि मेरी सोच ऐसी है, जो बड़े ब्रांड वालों को बड़ा लेखक मानती है। इससे ज्‍यादा सफाई देने की कोई जरूरत नहीं। कनफ्यूजन हुआ, गलती हुई, माफी।

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[3 Jan 2010 | 25 Comments | ]
क्‍या संदीप चौधरी में भाषाई शऊर नहीं है?

विनीत ♦ मुद्दा में ज़ोर-शोर से बहस चल रही है। चेतन भगत नॉर्मल अंदाज़ में अपनी बात रख रहे हैं। इसी बीच संदीप चौधरी ने दूसरी ही तान छेड़ दी। हैलो फिल्म जब आयी थी तब भी आपको क्रेडिट नहीं दिया गया था, तब तो आप चुप थे लेकिन अब आप हल्ला कर रहे हैं। क्या 3 इडियट्स फिल्म अगर इतनी पॉपुलर नहीं होती तब भी आप ऐसा ही करते। मुझे याद आ रहा कि संदीप ने शायद ये भी कहा, पक्का नहीं कह सकता लेकिन भाव यही थे कि तब भी आप इसी वाल्यूम में बात करते। इसी के जवाब में चेतन ने कहा कि मैं कौन-सा छत पर जाकर चिल्ला रहा हूं। एक लेखक को अपनी बात रखने का हक़ है। लेकिन संदीप उन्‍हें सुनते ही नहीं, चिल्लाते हैं, अपनी ही रौ में बहे चले जाते हैं। सवाल ये है कि संदीप चौधरी या फिर देश का कोई भी मीडियाकर्मी जिस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करता है, क्या उसमें लेखक को अपनी बात रखने की आज़ादी शामिल नहीं है।

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[31 Dec 2009 | 2 Comments | ]
रंगकर्मी ने कहानी पढ़ी, पाठकों ने कहानी सुनी

विनीत कुमार ♦ पाठकों का रचना से सीधा रिश्ता कायम हो, इस क्रम में यात्रा बुक्स और पेंग्विन इंडिया का प्रयोग सफल रहा। दिल्ली की कंपकंपा देनेवाली ठंड में भी इंडिया हैबिटेट सेंटर का गुलमोहर सभागार लगभग भरा हो तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि रचना पाठ को लेकर पाठक अब भी कितने उत्‍सुक हैं। एक प्रकाशक की हैसियत से यात्रा बुक्स और पेंग्विन इंडिया ने इस बात की पहल की है कि रचना और पाठक के बीच एक स्वाभाविक संबंध विकसित हो। एक ऐसा संबंध, जो कि अख़बारों की फॉर्मूलाबद्ध समीक्षाओं और आलोचकों की इजारेदारी के बीच विकल्प के तौर पर काम कर सके। यह संबंध पाठक की गरिमा को बनाये रखे, उसे विज्ञापनदार समीक्षा पढ़ कर ग्राहक बनने पर मजबूर न करे।

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[2 Dec 2009 | 5 Comments | ]
मीडिया वर्कशॉप में आज विनीत कुमार का व्‍याख्‍यान

डेस्‍क ♦ टेलीविज़न का कोई सचमुच एक्टिव ऑडिएंस हो सकता है? दिल्ली विश्वविद्यालय से टेलीविजन की भाषिक संस्कृति पर शोध कर रहे विनीत कुमार सफर और सीएसडीएस सराय के संयुक्त प्रयास से हो रहे वैकल्पिक मीडिया वर्कशॉप (दिसंबर 01-03) में इन्हीं सवालों के आसपास अपनी बात रखेंगे। Watching Television : From Passive Consumption Of Sounds And Images To An Active Prosumer/Audience? विषय के तहत बातचीत के जरिये वो उन संभावनाओं की तरफ इशारा करेंगे जहां एक ऑडिएंस की हैसियत से टेलीविजन में भागीदारी की जा सके। इससे पहले इस वर्कशॉप में अभय कुमार दुबे, शिवम विज, दिलीप मंडल अपनी बात रख चुके हैं।

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[27 Nov 2009 | 2 Comments | ]
26/11…. क्‍या महज एक मीडिया इवेंट है?

विनीत कुमार ♦ जगह-जगह संगठनों और पार्टियों की ओर से कैंडिल जलाये जा रहे हैं। चैनलों ने एक लौ जलाने का कॉन्सेप्ट ईजाद किया है। क्या ये देश के किसी भी शहीद को याद करने का सही तरीका है, जब इसमें ताम-झाम पैदा करके शहर के हर चौक को जाम कर दें। लौ जल जाने के बाद भी कैमरे के चूक जाने पर दोबारा जलाएं… हम चाहते क्या हैं? दरअसल हमारा देश कर्मकांडों को इतनी तवज्‍जो देता आया है कि हर घटना को एक कर्मकांड में बदल देने के लिए हम बेचैन हो उठते हैं। दुर्भाग्य से देश का टेलीविजन इसी के बीच अपनी भूमिका खोजता नज़र आता है। इससे आगे वो कभी नहीं जाता।

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[22 Nov 2009 | 9 Comments | ]
IBN7 पर हमला लोकतंत्र पर हमला नहीं है!

विनीत कुमार ♦ देश की सत्तर फीसदी आबादी को जब पीने को पानी नहीं है, बच्चों के हाथों में स्लेट नहीं है, स्त्रियों की आंखों में सपने नहीं है – टेलीविजन पर कीनले है, विसलरी है, पॉकेमॉन है, बार्बी है, मानव रचना यूनिवर्सिटी है, लक्मे है, झुर्रियों को हटाने के लिए पॉन्डस है। एक धब्बेदार, बदबूदार और लाचार लोकतंत्र टेलीविज़न पर आते ही चमकीला हो उठता है। पिक्चर ट्यूब से गुज़रते ही देश का सारा मटमैलापन साफ हो जाता है। सवाल यहां बनते हैं कि टेलीविज़न के दम पर जो आइस संस्कृति एक ठंडी संस्कृति के बतौर पनप रही है, क्या उसी लोकतंत्र पर हमला हो रहा है और उसी को बचाये जाने की बात की जा रही है? हम वर्गहीन समाज जैसे मार्क्सवादी यूटोपिया से बाहर निकलकर भी सोचें तो क्या ज़रूरी है कि इस आइस संस्कृति के बूते देशभर के लोगों को खींच-खींचकर मध्यवर्गीय मानसिकता के खांचे में लाया जाए।

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[7 Nov 2009 | No Comment | ]
न्‍याय ही इतिहास को दुरुस्‍त कर सकता है : जरनैल

विनीत कुमार ♦ 1984 के सिख दंगे के बारे में जिसे कि मैं दंगा नहीं नरसंहार मानता हूं, देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहीं कहा है कि हमें इसे भूल जाना चाहिए। मैं मानता हूं कि इतिहास भूलने की चीज़ नहीं होती। आज से पता नहीं कितने हज़ार साल पहले रावण ने ग़लती की और हम आज तक उसे जलाते हैं। 1984 में सिक्खों के साथ जो कुछ भी हुआ, वो आगे के जेनरेशन में भी जाएगा और ये शायद ज़्यादा ख़तरनाक रूप में जाए। इसलिए इसे करेक्ट करने की ज़रूरत है। सिर्फ जस्टिस के जरिये ही इतिहास की इस भूल को करेक्ट किया जा सकता है। जरनैल सिंह ने ये बातें अपने किताब के लोकार्पण के मौके पर ज़ुबान की प्रकाशक और चर्चित लेखिका उर्वशी बुटालिया से पूछे गये सवालों का जबाब देते हुए कहीं।

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[6 Nov 2009 | No Comment | ]
जरनैल की किताब पेंग्विन से छपी, लोकार्पण आज

विनीत कुमार ♦ एक पत्रकार की हैसियत से अपने लंबे मीडिया करियर के दौरान जरनैल सिंह ने क्या किया, किन-किन मसलों और मुद्दों को रिपोर्टिंग के दौरान लोगों के सामने लाने की कोशिश की, ये बताने की ज़रूरत शायद ही किसी न्‍यूज़ चैनल या अख़बारों ने की हो। हमें सिर्फ इतना भर बताया गया कि जरनैल सिंह ने मौजूदा गृहमंत्री पर जूते फेंकने का काम किया और रातोंरात वो इसी काम को लेकर चर्चित कर दिये गये। इस हिसाब से पेंगुइन से प्रकाशित होनेवाली उनकी किताब कब कटेगी चौरासी : सिख क़त्लेआम का सच जिसका कि आज लोकार्पण होना है, जरनैल सिंह की कोशिश से ये दोतरफा कार्रवाई है।