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विश्वविद्यालय »
एक छात्र ♦ यहां जनसंचार विभाग में पीएचडी की प्रवेश परीक्षा में धांधली की गयी थी, जिस पर छात्रों के आक्रोश को देखते हुए यहां के प्रतिकुलपति ने पीड़ित विद्यार्थियों को आश्वासन दिया था कि अब भविष्य में राममोहन पाठक को इस विश्वविद्यालय में कभी नहीं बुलाया जाएगा। परंतु इसके बाद भी उन्हें विश्वविद्यालय प्रशासन लगातार जनसंचार विभाग में बुला रहा है। अभी 15 अप्रैल को जनसंचार विभाग में होने वाली DRC की बैठक में भी राममोहन पाठक को फिर से बुलाया जा रहा है। शायद इस विश्वविद्यालय में विवादों से घिरे व्यक्तियों को ही विभूति नारायण राय ने जगह देने की ठान रखी है। विद्यार्थियों को कुछ सिखाने की राय साहब की कोई मंशा ही नहीं है।
असहमति, नज़रिया »
एक छात्र ♦ कुछ दिन पहले मोहल्ला पर एक खबर आयी कि हिंदी विवि में नौकरियों के लिए जम कर पैसे लिये जा रहे हैं। दूसरे दिन वह खबर हटा दी गयी, माडरेटर की इस टिप्प्णी के साथ कि खबर की सत्यता संदिग्ध थी, लेकिन उन्होंने एक लाइन यह भी लिखा था कि “ज्यादातर खबरें व्यक्तियों को निशाने पर लेकर लिखी-भेजी जाती हैं…” उनकी यह बात 24 कैरेट सच है कि यहां से जाने वाली खबरें व्यक्ति-विशेष को केंद्र में रखकर लिखी जाती हैं, लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि लगभग खबरें सच के इर्द-गिर्द की ही होती हैं। और कुछ अपवादों को छोड़कर ये व्यक्ति-विशेष सचमुच गड़बड़ियों के कोर में होते हैं। ये अपवाद वाली खबरें जरूर गलत होती हैं जिन्हें यहां के प्रतिक्रियावादियों या प्रबंधनवादियों द्वारा लिखा-भेजा जाता है।
नज़रिया, मोहल्ला लाइव »
अरविंद शेष ♦ यह अजीब है कि मोहल्लालाइव के मॉडरेटर को किसी आलेख या टुकड़े की प्रस्तुति लिखने के कुछ समय बाद यह एहसास हो कि वह गलत था। नदीम हसनैन पर महाश्वेता देवी के ‘शब्द चित्र’ की प्रस्तुति में मॉडरेटर साहब ने महाश्वेता देवी, उनके स्तंभ और कृपाशंकर चौबे के बारे में एक बहुत छोटी टिप्पणी की थी, जो अब नहीं दिख रही। संभव है उससे कुछ लोगों को ‘दुख’ हुआ हो, लेकिन कई ऐसी टिप्पणियां भी आयीं, जिन पर विश्वास किया जाए तो वर्धा विश्वविद्यालय में जो कुछ चल रहा है, उसमें कृपाशंकर चौबे की भूमिका बेहद संदिग्ध और कुछ खास लोगों की ओर से सौदेबाजी करने की रही है।
नज़रिया »
संजीव/राजीव ♦ हमने बार-बार निवेदन किया कि विवि में कई स्वार्थ अलग-अलग सक्रिय है, हर सूचना पर आप सवालिया मुद्रा में होकर ही सत्य प्राप्त कर सकते हैं परंतु पता नहीं किस सूचना के प्रभाव में प्रो कारुण्यकारा को आपने नोटिस निर्गत कर दिया। आपके साथ खड़े लोगों की सूचनाओं का हित क्या बनता है और क्या प्रतिफल होता है, वह उभरकर सामने आया, जबकि इन स्थितियों का भय हमने दिल्ली में अपनी मुलाकात में आपको व्यक्त किया था। कौन से लोग आपके वृहद उद्देश्यों में आपके व्यक्तित्व के उज्ज्वल पक्ष के साथ खड़े होकर आपका साथ देना चाहते हैं, यह आपके अनुभव के सामने स्पष्ट होना चाहिए था – तबादला के लेखक का अनुभव।
नज़रिया, मीडिया मंडी »
डेस्क ♦ पिछले दिनों महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विवि, वर्धा से जुड़ी कुछ खबरें स्थानीय और राष्ट्रीय अखबारों में छपीं। चूंकि मोहल्ला लाइव में इस विश्वविद्यालय से जुड़ी तमाम खबरों पर हमारी बारीक नज़र रहती है – इसलिए वहीं के एक अध्यापक ने हमारे पास कुछ कटिंग्स भेजी हैं। आप भी देखें कि इस विश्वविद्यालय में कितने कितने षड्यंत्र किस किस स्तर पर चल रहे हैं और अखबारों में सारा खेल खुल जाने के बाद भी प्रशासन कितने आराम से इत्मीनान की मुद्रा में है।
ख़बर भी नज़र भी, खेल खेल में »
मॉडरेटर ♦ वर्धा विश्वविद्यालय से जुड़ी बहुत सारी खबरें मोहल्ला लाइव के पास आती रहती हैं। उन खबरों के साथ मुश्किल ये है कि तथ्यों को लेकर वे बड़ी बेपरवाह होती हैं। हमारे पास इतने संसाधन नहीं हैं कि हम उन तथ्यों की तस्दीक कर सकें। एक बात और कि ज्यादातर खबरें व्यक्तियों को निशाने पर लेकर लिखी-भेजी जाती हैं। आग्रह है कि वहीं खबरें भेजें जो विश्वविद्यालय के माहौल को बेहतर बनाने में मददगार हो।
ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया »
संजीव चंदन ♦ पिछले दो दिनों में में मेरे दो मित्रों ने मुझसे बात की। श्री राय के प्रसंग में। एक थे रामजी यादव और दूसरे राकेश बिहारी। रामजी यादव ने कहा कि राय असंतुष्टों के हमले से क्षत-विक्षत हैं, मेरा जवाब था असंतुष्टों से ज्यादा यारों के शिकार हैं। इस आदमी की नियति रही है कि इनकी अच्छाइयों को भी कई लोग सामंती बोध की संज्ञा से कोड़े लगाते हैं। एक ऐसा व्यक्ति, जिसका पूरा गांव उसे दलितों का हितैषी मानकर ‘चमार वंशीय’ संज्ञेय करता हो वह व्यक्ति वर्धा में आकर दलित विरोधी छवि अर्जित करता है और पूरी जिद के साथ उस छवि को पोषता भी रहता है! संकट यार-बाजी का है जिसके कारण एक जातिवादी प्रोफेसर के हर निर्णय को हर स्थिति में वे सेव करते चलते हैं।
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विनोद ♦ भाषा प्रौद्योगिकी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर पद के लिए होने वाला साक्षात्कार वैसे तो रोस्टर के हिसाब से अवैध है, परंतु इस पद पर भी विश्वविद्यालय में ही पढ़ा रहे दो व्याखाता अनिल पांडे या अनिल दुबे की नियुक्ति तय है। अनिल पांडे की पैरवी विश्वविद्यालय का ही एक कथाकार कर रहा है। जिसके बदले में श्री पांडे दारू की बोतलों की कमी नहीं होने दे रहे हैं। उधर दूसरे उम्मेदवार श्री दुबे के लिए विभागाध्यक्ष ने आश्वासन दे रखा है। इन दोनों ही उम्मीदवारों की व्याख्याता पद पर नियुक्ति को राष्ट्रपति ने मान्यता नहीं दी है तथा प्रसिद्ध इतिहासकार विपिन चंद्रा ने इन्हें शिक्षक होने के काबिल नहीं पाया था। वैसे पिछली बार चयन समिति ने इसी पद के लिए नानसुटेबल घोषित किया था।
ख़बर भी नज़र भी, मीडिया मंडी »
आर कांबे ♦ आपके अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय में नवीन नियुक्त डॉ अख्तर आलम कहीं से भी व्याख्याता के पद के लायक नहीं हैं क्योंकि प्राप्त सूचनाओं के मुताबिक डॉ आलम साक्षात्कार के समय किसी भी संस्थान मे किसी भी प्रकार अपनी सेवाएं नहीं दे रहे थे। दीन दयाल उपाध्याय, गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर के “इंस्टीट्यूट ऑफ जर्नलिज़्म एंड मास कम्युनिकेशन” से इन्हें दिसंबर 2007 में न सिर्फ निलंबित बल्कि समन्वयक डॉ राम दरस राय समेत सभी स्टाफ को बर्खास्त कर दिया गया था। कुलपति डॉ गजभिए ने व्याप्त अनियमितताओं को गंभीरता से लिया था। किंतु डॉ आलम ने अपने आवेदन पत्र में स्वयं को ठीक इसी संस्थान मे “अतिथि व्याख्याता” के तौर पर “कार्यरत” दर्शाया है, जो एक “अपराधिक मामला” है।
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आलोक तोमर ♦ यह विभूति नारायण राय की बहादुरी की एक कहानी है, जिसमें मुजरिम के तौर पर मैं भी शरीक हूं। इसलिए मुझे हैरत नहीं होती कि अगर विभूति नारायण राय ने अनिल राय अंकित को बचाने का जेहादी रास्ता अपना ही लिया है, तो वे आखिरी दम तक कोशिश करेंगे। मगर विभूति भाई मित्र हैं इसलिए उन्हें बता देना अपना फर्ज है कि जेहादियों का आखिर में होता क्या है? अंकित पुराना चोर है और चोरी के लिए नया ठिकाना तलाश कर लेगा, मगर विभूति भाई आप नाहक शहीद हो जाएंगे।




