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छाने का संदेश दे कर खुद चले गये अशोक सर 3

छाने का संदेश दे कर खुद चले गये अशोक सर

प्रभात पांडेय ♦ उनसे मेरा परिचय साल 2008 के अप्रैल माह में हुआ था। तब वो वीओआई में आउटपुट के शिफ्ट इंचार्ज थे। पहले दिन की मुलाकात में ही अशोक सर मेरे आदर्श बन गये। उन्हें लोगों की बड़ी अच्छी समझ थी। वो हुनर को परखना और उसे निखारने की कला जानते थे। टीवी की कॉपी कैसे लिखी जाती है, ये मुझे उन्होंने ही सिखाया। अशोक सर मुझे मेरे बॉस कम और पिता तुल्य दोस्त ज़्यादा लगते थे। वीओआई ज्वाइन करने के बाद जब वो अपनी फैमिली को लाने हैदराबाद गये थे, तो आते वक्त वहां से मिठाई लेकर आये थे। सबको एक-एक मिठाई देने के बाद मुझे पूरा पैकेट ही दे दिया और कहा कि बेटा खाते रहो और लिखते रहो।

अशोक जी चले गये, इस मातम का कोई नाम नहीं! 6

अशोक जी चले गये, इस मातम का कोई नाम नहीं!

आशीष जैन ♦ फोन किया तो पता चला कि फोन नहीं उठा रहे थे। तबीयत ख़राब थी। शायद दवा लेने गये हों। आवाज़ आयी… यह आवाज़ एक लड़की की थी, जो डेस्क पर थी… जबकि कुर्सी पर उनकी जेकेट रखी हुई थी… वक्त बीतता रहा, वक्त अब घर जाने का था… हम निकलने लगे… अशोक सर की कार से गुज़र रहे थे तो यह क्या… सर कार में बेहोशी की हालत में लेटे हुए थे। मैंने उनके सीने को देखा और मेरे साथी विपिन ने उनकी नब्ज़ देखी… एक गहरी ख़ामोशी… और कुछ नहीं… हमने तुरंत ऑफिस में जाकर कहा… तुरंत उनको मेट्रो में ले जाया गया… जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया…

एक आईपीओ था… और एक वीओआई भी था… 4

एक आईपीओ था… और एक वीओआई भी था…

देवेंद्र शर्मा ♦ जिस तरह शेयर बाजार का नियमन करने के लिए सेबी जैसी संस्था है, जो किसी कंपनी के आईपीओ को तय मापदंडों पर विचार करने के बाद मंजूरी देती है, कंपनी के शेयर की ट्रेडिंग या फिर कंपनी में किसी तरह की गड़बडी की शिकायत के बाद कंपनी की गतिविधियों पर रोक भी लगाती है, उसी तरह न्यूज़ चैनल के लिए लाइसेंस जारी करने से लेकर चैनल चलाने के तरीकों पर भी नजर रखने के लिए कोई नियामक संस्था होनी चाहिए। चैनल का लाइसेंस देते वक्त खासकर इन बातों पर ध्यान जरूर देना चाहिए कि चैनल के लिए लाइसेंस मांग रहे शख्स के पत्रकारिता से सरोकार रहे हैं या नहीं। पत्रकार ये सबक भी लें कि न सिर्फ शेयर बाजार में बल्कि मापदंडों को ताक पर रख पत्रकारिता के फलते-फूलते बाजार में भी फूंक फूंक कर कदम रखें।

ये मीडियाकर्मी किसी के नहीं होते, न हमारे न अपने मालिक के 1

ये मीडियाकर्मी किसी के नहीं होते, न हमारे न अपने मालिक के

विनीत कुमार ♦ आज वीओआई चैनल बंद है। सैकड़ों मीडियाकर्मी सड़कों पर आ गये हैं। उनकी जिम्मेवारी लेनेवाला कोई नहीं है। मैंने तब भी कहा कि चैनल धार्मिक विश्‍वासों के बूते नहीं, मार्केट स्ट्रैटजी के दम पर चलते हैं और अमित सिन्हा को चाहिए कि वो एक भावुक भक्त के बजाय एक प्रोफेशनल की तरह सोचें और काम करें। मेरी इस बात पर चैनल के ही एक एंकर-प्रोड्यूसर को इतनी मिर्ची लगी कि उन्होंने संजय मोरवाल, एक फर्जी नाम से हम पर बहुत ही बेहूदे और अपमानजनक तरीके से कमेंट किया। हम पर आरोप लगाये कि हमें कुछ भी पता नहीं है। हम लिखने के नाम पर बकवास कर रहे हैं। इस मामले में हमें कुछ भी बोलने की औकात नहीं है।

क्‍या वीओआई कर्मियों की आवाज़ अनसुनी ही रह जाएगी? 4

क्‍या वीओआई कर्मियों की आवाज़ अनसुनी ही रह जाएगी?

अविनाश ♦ हम मीडिया के लोग इस मायने में विपन्‍न हैं कि हमारे अधिकारों की लड़ाई हमारा अख़बार और हमारा टेलीविज़न नहीं लड़ सकता। प्रेस से जुड़े संगठनों का हाल सब जानते ही हैं। शायद ही कभी इन संगठनों ने कभी किसी मीडियाकर्मी का खोया हुआ वाज़‍िब अधिकार उसे वापिस दिलाया हो। दूसरे संगठनों और आंदोलनकारियों को इसलिए मतलब नहीं है क्‍योंकि संघर्षरत मीडियाकर्मियों का साथ देकर वो मीडिया-संस्‍थानों से बैर नहीं ले सकते। हमारे देश में तो बहुत सारे आंदोलन मीडिया अटेंशन की वजह से ही तो राष्‍ट्रीय ख्‍याति के बन गये! मीडियाकर्मियों का साथ देकर वो इस अटेंशन का आसमान क्‍यों खोना चाहेंगे?

शर्तें मानी गयीं, वीओआई की हड़ताल ख़त्‍म, ब्‍लॉग बंद 2

शर्तें मानी गयीं, वीओआई की हड़ताल ख़त्‍म, ब्‍लॉग बंद

वीओआईकर्मी ♦ वीओआई के संघर्षरत कर्मचारियों की सभी मांगें मान ली गयी। आज का दिन जश्न मनाने का दिन है। हमारा उद्देश्य चैनल बंद कराना नहीं था। हम तो अपना मेहनताना चाहते थे। अब तनख्वाह आ रही है। जो हुआ सो हुआ। हमारे मन में किसी के प्रति कोई दुर्भावना नहीं। जो हमारे साथ थे उन्हें धन्यवाद और जो लोग दगा दे गए उन्हें साधुवाद!!! हमारे मन में उनके प्रति भी कोई मैल नहीं। कोई बात नहीं, हम साथ काम करेंगे। हां दुख ज़रूर है, लेकिन दिल के घाव वक्त के साथ भर जाते हैं। हम उन्हें भी दिल से लगाते हैं। जिन लोगों ने सम्मान खो दिया है, वो लोग दोबारा सम्मान तो हासिल नहीं कर पाएंगे लेकिन हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। जब वो अभिनय कर सकते हैं तो हम भी कर लेंगे।

वीओआई की घटना ज्‍वालामुखी के सुलगने की शुरुआत है 14

वीओआई की घटना ज्‍वालामुखी के सुलगने की शुरुआत है

विनीत कुमार ♦ किसी पत्रकार के बच्चों का स्कूल से नाम कट गया, कोई पत्रकार अपनी पत्नी को खर्च से बचने के लिए उसके मायके पटक आया है, किसी ने पान-बीड़ी पर कटौती करके छोटे झोले में सब्जी दूध लाना शुरु कर दिया है। आपको ये सब सुनकर कैसा लगता है? क्या सिर्फ उनके प्रति संवेदना पैदा होती है, रहम खाकर कुछ मदद करने का मन करता है। क्या मेरी तरह आपके मन में भी घृणा, अफसोस, दया, सहानुभूति और गुस्सा एक साथ नहीं पनपता? लगता है कि इससे तो अच्छा होता वो बदहाल होकर भी अपने हक की लड़ाई लड़ने की स्थिति में होते, प्रोफेशन के स्तर पर लोगों के लिए हक की लड़ाई लड़ने के नाम पर स्वांग तो करते ही रहते हैं।

वीओआई प्रकरण : यही मौक़ा है, आओ संगठित हो जाएं 2

वीओआई प्रकरण : यही मौक़ा है, आओ संगठित हो जाएं

मज़्कूर आलम ♦ मीडिया कंपनियों वाले खबरदार हो जाएं। वॉयस ऑफ इंडिया के बहाने पत्रकार संगठित हो रहे हैं। बीच में लगभग सब कुछ बिखर गया था। बहुत दिन पहले की बात नहीं, जब श्रमजीवी पत्रकारों का संघ मज़बूत हालत में होता था और उससे जुडऩे में पत्रकार फख्र महसूस करता था। हमारे सीनियर साथी आज भी बीते ज़माने की गौरवगाथाएं गाते रहते हैं। किस तरह उन्होंने सेंटर टेबल टॉक में अपनी बात (श्रमजीवी पत्रकारों की) मालिकान से मनवायी। वे सारे संगठन हैं तो आज भी, लेकिन निष्क्रिय पड़े हैं। श्रमजीवी पत्रकारों के हकूक को लेकर उनके अभियान थम चुके हैं। नवोदित पत्रकारों को भी तरक्की की जल्दी रहती है। उनके पास इन संगठनों के लिए वक्त नहीं बचा।

दलाल पत्रकारों की न सुनें, वीओआई कर्मियों का साथ दें 30

दलाल पत्रकारों की न सुनें, वीओआई कर्मियों का साथ दें

डेस्‍क ♦ वॉयस ऑफ इंडिया न्यूज चैनल मीडिया में टाइटैनिक जहाज की तरह आया। आज वो उसी टाइटैनिक की तरह डूब रहा है। किसी ने कल्‍पना भी नहीं की होगी की यहां के पत्रकारों को भूखे रहने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। जो दूसरों के हक़ की बात करते हैं, आज उनका ही हक़ मारा जा रहा है। वॉयस ऑफ इंडिया के पत्रकार अब भी हड़ताल पर है। कई महीनों से बकाया अपनी तनख्वाह पाने के लिए वे धरने पर बैठे हैं। वीओआईकर्मियों ने तब तक धरने पर बैठने का फैसला किया है, जब तक उन्हें सारे पैसे न मिल जाएं। कर्मचारियों के इस क़दम से मालिकान हर चतुराई निबटने की कोशिश कर रहे हैं।

पत्रकार वो है, जो अवज्ञा करे और नयी इबारत ल‍िखे!

पत्रकार वो है, जो अवज्ञा करे और नयी इबारत ल‍िखे!

कथादेश डेस्क ♦ वीओआई ने राजस्‍थान में एक प्रयोग किया। वह प्रयोग था, अब तक मीडिया में अहम स्थान रखने वाली जातियों के साथ उन दूसरी जातियों के पत्रकारों का जगह दी गयी, जिन्‍हें अमूमन टेलीविजन मीडिया में जगह बनाने के लिए लंबे संघर्ष और मानसिक पीड़ा से गुज़रना पड़ता है। मीडिया के कई ठेकेदारों को न सिर्फ इस प्रयोग से आपत्ति हुई बल्कि उन्होंने पहले इस पर आपत्ति दर्ज करवायी और कोई असर नहीं देख पुरजोर तरीके से इसे रोकने की कोशिशें शुरु की।