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देख भाई देख, ताल ठोंक के देख! 1

देख भाई देख, ताल ठोंक के देख!

विभा रानी ♦ छम्मक्छल्लो ने पहले भी लिखा था कि गाली देना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और उसमें मां बहन का इस्तेमाल हमारा आपद धर्म. इससे आप हमें बेदखल नहीं कर सकते. दूसरे हमारे भीति भाव को तो तुलसीदास जी भी अपने समय में अनुभव कर गए थे, इसीलिए लिख भी गये कि ‘बिन भय होंहि न प्रीति’ तो, जबतक आप किसी बात का भय नहीं दिखाएंगे, लोग आपकी बात नहीं मानेंगे. गांधी जी के सत्य, अहिंसा और प्रेम के मार्ग पर चलते हुए किसी से अनुरोध वाली भाषा में कहेंगे कि भाई साहब, यहां पर अपनी शंका का समाधान मत करें तो वह पलट कर आपसे ही कह बैठेगा कि “क्यों? यह ज़मीन क्या तेरे बाप की है?” फिर आप क्या कर लेंगे?

काग़ज़ पर काफ़्का… फेसबुक पर पंकज नारायण… 17

काग़ज़ पर काफ़्का… फेसबुक पर पंकज नारायण…

पंकज नारायण ♦ मेरे बचपन की प्यारी दोस्त गरीबी। अभी भी समय-समय पर साथ रहने आ जाती है। मैं उसे भी पूरा प्यार देता हूं। जब मेरे पास से जाने लगती है तब उसे डांटता हूं – देखो, मेरे पास आ कर रहने लगती हो तो कोई बात नहीं। मेरे दोस्तों के घर मत जाना वरना टांगें तोड़ दूंगा। फिर वह मेरी अमीरी पर मुस्कुराती है… वैसे मेरी यह दोस्त सबके पास जाती है, लेकिन टिकती उसी के पास है, जो इससे नफरत करता है…