Tagged: Yogendra Yadav

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तुम बिल्कुल हम जैसे निकले!

➧ आकार पटेल तुम बिल्‍कुल हम जैसे निकले अब तक कहां छिपे थे भाई वो मूरखता, वो घामड़पन जिसमें हमने सदी गंवायी आखिर पहुंची द्वार तुम्‍हारे अरे बधाई, बहुत बधाई! ➧ फहमीदा रियाज़ आम...

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मयंक गांधी ने बाहर की अंदर की बात

आम आदमी पार्टी की पॉलिटिकल अफेयर्स कमेटी से योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को बाहर किये जाने का फैसला जिस बैठक में लिया गया है, उस बैठक के मिनिट्स पार्टी के वरिष्‍ठ नेता मयंक...

विकल्प की तलाश में है जनाक्रोश का अश्वमेधी घोड़ा 0

विकल्प की तलाश में है जनाक्रोश का अश्वमेधी घोड़ा

♦ योगेंद्र यादव जनाक्रोश के रूप में सामने आई यह अधपकी और अधबुनी लेकिन नयी राजनीति फिलहाल व्यवस्था की तंद्रा तोड़ने के लिए उसे झकझोरने का काम कर रही है। सत्ता के जमे-जमाये समीकरणों...

अन्‍ना के आंदोलन को यहां देखिए, कुछ ठीक ठाक दिखेगा 14

अन्‍ना के आंदोलन को यहां देखिए, कुछ ठीक ठाक दिखेगा

योगेंद्र यादव ♦ ‘सिविल सोसायटी’ जैसे गलत मुहावरे के चलते इस आंदोलन की तुलना मुंबई के संभ्रांत एनजीओ जमावड़ों से करना भी नासमझी का लक्षण है। फिर भी केवल इसी वजह से आंदोलन की तमाम आलोचनाओं को खारिज कर देना तंगदिली और अपरिपक्‍व्‍ाता का नमूना होगा। गंभीर आलोचनाओं को समझना और उनसे सीखना इस आंदोलन के भविष्य के लिए बेहद जरूरी है। असली सवाल यह है कि क्‍या यह आंदोलन लोकतंत्र की जड़ें मजबूत करेगा, या कि यह जड़ें खोदने वाला काम है? अनेक सदाशय आलोचकों को इस आंदोलन की नीयत और नतीजों के बारे में शक है।

दैनिक भास्‍कर ने सर्वेक्षण में चालाकी से सवाल पूछे थे 7

दैनिक भास्‍कर ने सर्वेक्षण में चालाकी से सवाल पूछे थे

योगेंद्र यादव ♦ दैनिक भास्कर के सर्वेक्षण के जो अंश यहां उद्धृत हैं (मैंने इसके सिवा और कोई हिस्सा नहीं पढ़ा है और मेरी जानकारी अधूरी हो सकती है), उसमें कुछ सवाल और उनके उत्तर दिये गये हैं। कई बार ऐसा होता है कि सर्वेक्षण में सवाल कुछ और पूछा जाता है और उसे सामान्य पाठक के लिए पेश करते वक्त कुछ मसाला लगा कर लिख दिया जाता है। अगर भास्कर के डेस्क से ऐसा कुछ किया गया हो तो मैं कह नहीं सकता। लेकिन अगर सर्वेक्षण में शब्दश: वही सवाल पूछे गये थे जो अखबार की रपट में छपे हैं, तो यह कहना होगा कि सवाल निहायत एकतरफा झुकाव रखने वाले हैं और सर्वेक्षण की पद्धति के बुनियादी उसूलों का उल्लंघन करते हैं।

अनिल चमड़िया मामले में निष्पक्ष नहीं थीं मृणाल जी 9

अनिल चमड़िया मामले में निष्पक्ष नहीं थीं मृणाल जी

दिलीप मंडल ♦ खतरनाक अनिल चमड़िया को, जो पत्रकारिता और समाज के अनकहे पक्ष को सामने लाता है, सत्य के संधान में उन पथों पर चलता है, जिससे होकर लोग नहीं गुजरते, उसे कैसे किसी विश्‍वविद्यालय में टिकने, काम करने और शोध कराने दिया जा सकता है? उसे हटाने के लिए कुलपति से लेकर मृणाल पांडे और गंगा प्रसाद विमल तक का एकजुट हो जाना ही तो स्वाभाविक है। इसलिए एक्‍जीक्‍यूटिव कौंसिल में ये फैसला आम राय से हुआ। किसी ने विरोध नहीं किया। किसी ने नहीं कहा कि एक बार अनिल चमड़िया से भी उसका पक्ष जान लेते हैं या किसी ने ऐसा सुझाव भी नहीं दिया कि वीसी जो कह रहे हैं, उसकी जांच करा ली जाए।