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Articles tagged with: yogi adityanath

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[30 May 2011 | No Comment | ]

नागरिक मोर्चा ♦ गोरखपुर में मज़दूरों के दमन और उत्तर प्रदेश सरकार की मजदूर विरोधी नीतियों के विरोध में कोलकाता में सैकड़ों मज़दूरों ने प्रदर्शन किया तथा राज्यपाल के माध्यम से मुख्यमंत्री मायावती को ज्ञापन भेजा। श्रमिक संग्राम समिति के बैनर तले कोलकाता इलेक्ट्रिक सप्लाई कारपोरेशन, हिन्दुस्तान इंजीनियरिंगएंड इंडस्ट्रीज लि., भारत बैटरी, कोलकाता जूट मिल, सूरा जूट मिल, अमेरिकन रेफ्रिजरेटर्स कं. सहित विभिन्न कारखानों के 500 से अधिक मज़दूरों ने कल कोलकाताके प्रशासकीय केंद्र एस्प्लेनेड में विरोध प्रदर्शन किया। दिल्ली, पंजाब तथा महाराष्ट्र में भी कुछ संगठन इस मुद्दे को लेकर प्रदर्शन की तैयारी कर रहे हैं।

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[27 May 2011 | No Comment | ]

नागरिक मोर्चा ♦ कहा जा रहा है कि कुछ ”बाहरी तत्व” मज़दूरों को भड़का रहे हैं। ऐसा कहने वाले मंडलीय कमिश्नर, पुलिस के अफ़सर और भाजपा सांसद योगी आदित्‍यनाथ सीधे-सीधे संविधान का उल्लंघन कर रहे हैं। क्या वे नहीं जानते कि देश का क़ानून किसी भी व्यक्ति को कहीं भी जाकर अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाने की इजाज़त देता है? ट्रेड यूनियन एक्ट, 1926 भी मजदूरों को बाहर से अपने प्रतिनिधि चुनने का अधिकार देता है। वार्ताओं में मज़दूरों की ओर से उनके प्रतिनिधि के रूप में गैर-मज़दूर समर्थक पहले भी भागीदारी करते रहे हैं। मगर अपने अहंकार और मालिकपरस्ती की रौ में आकर इन्होंने गोरे शासकों को भी पीछे छोड़ दिया है।

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[26 May 2011 | One Comment | ]

नागरिक मोर्चा ♦ दो महिला कार्यकर्ताओं श्वेता तथा सुशीला देवी को जमानत मिलने के बाद कल देर रात जेल से रिहा कर दिया गया था। रिहा होने के बाद आज जारी एक बयान में श्वेता ने पुलिस पर गिरफ्तार मजदूर नेताओं के साथ दुर्व्‍यवहार करने और लगातार डराने-धमाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि पुलिस के कुछ अधिकारी मालिकों की ओर से मजदूरों को ”देख लेने” और उनके नेताओं को ”ठिकाने लगाने” की धमकियां दे रहे हैं।

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[29 Jul 2009 | 4 Comments | ]

अनिल ♦ कहीं ऐसा तो नहीं कि उदय प्रकाश पर इस बहाने जो बहस हुई, वह एक लेखक की लोकप्रियता को उठाने-गिराने के एजेंडे से संचालित रही हो? जबकि रायपुर के साहित्यिक आयोजन से जो राजनीतिक सवाल उभरे हैं, वे मौजूदा समय में समग्र साहित्यिक-सांस्कृतिक परिदृश्य की दुखती रग को छूते हैं। हिंदी में रचनारत समाज सिर्फ़ उदय की प्रतिबद्धताओं और सरोकार पर बहस करके एक सुविधाजनक संतुष्टि की ओर उन्मुख दिख रहा है। एक मित्र बता रहे थे कि हिंदी की एक साहित्यिक पत्रिका उदय प्रकाश प्रकरण पर विशेषांक निकालने जा रही है। हिंदी रचना संसार को छत्तीसगढ़ जैसे आयोजनों और उसमें शामिल होने वाले लेखकों के बारे में बात करने से, समूचे हिंदी रचनाशील दुनिया के खोखलेपन के उजागर होने का डर तो नहीं है?

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[27 Jul 2009 | 2 Comments | ]

रविभूषण ♦ विचारधारा से लेखक बंधे हुए हों या नहीं, लेकिन मानव जीवन, समय और समाज से वह सदैव बंधा हुआ है। कवियों, लेखकों, आलोचकों, संस्‍कृतिकर्मियों और बुद्धिजीवियों से यह सदैव अपेक्षा की जाती है और हिंदी में इसके अनेक नायाब उदाहरण हैं कि वे उन लोगों के साथ न हों, मंचस्‍थ भी नहीं, एवं सांप्रदायिक शक्तियों का अपने लेखन-वाचन में विरोध करना और समय-समय पर उनके साथ, कुछ समय के लिए ही सही, खड़े होना किसी भी दृष्टि से मुनासिब नहीं।

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[25 Jul 2009 | 7 Comments | ]

उदय कह रहे हैं कि वे गोरखपुर के कार्यक्रम योगी की उपस्थिति का राजनीतिक पाठ नहीं कर पाये। लेकिन उदय का ये रूप उनके विचारों में आये ज़बरदस्त परिवर्तन का नतीजा है। इस बात को वे स्वीकार भी कर चुके हैं। दिक्क़त ये है कि उनके चाहने वाले उस उदय को खोज रहे हैं, जो प्रगतिशील मूल्यों का पक्षधर होने का दावा करता था। वे नहीं देख पा रहे कि आजकल उदय ‘औलिया’ की रहमत में दुनिया का मुस्तकबिल देख रहे हैं, और मानते हैं कि लेखक को विचारों की बाड़बंदी से ऊपर होना चाहिए।

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[23 Jul 2009 | 13 Comments | ]

बहुत से लोग यह कह रहे हैं कि उदय प्रकाश का सत्यार्थ प्रकाशित हो गया। अब उन्हें छोड़ दिया जाए। कबाड़खाने में भी बहस थोड़ी तल्ख हुई तो अशोक पांडे ने अपने अधिकार का “नाजायज” इस्तेमाल करते हुए बहस बीच में रोक दी। क्यों भई, आपने ऐसा किस सिद्धांत के तहत किया। कहीं आप सब अपने को “नित्शे” का सुपरमैन तो नहीं समझते हैं कि आप चाहें तो बहस शुरू होगी और मना करें तो थम जाएगी? जब आप सबने अपनी राय रख ली तो बाकी लोगों को भी हक़ है कि वो भी अपनी बात कहें।

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[23 Jul 2009 | 8 Comments | ]

हिंदी भाषा अभी तक पंडिताऊ शब्दकोश से पूरी आज़ाद भी नहीं हुई थी कि इसे कीचड़ (पंक) में ढकेलने की कोशिशें जारी हो गयी हैं। पाठकों हिंदी भाषा को संपन्न और सामर्थ्यवान बनाने के इनके प्रयासों को आप अपना आशीर्वाद दीजिए। जो पाठक किसी कारणवश हिंदी साहित्य का इतिहास न पढ़ पाएं हों, उन्हें बता दें कि एक ज़माने में शुद्धतावादी ब्राह्मणीय हिंदी का बड़ा जोर था। लोग उससे ऊब गये, तब जाकर वो सहज भाषा की तरफ बढ़े। अब आपकी प्यारी हिंदी में विष्ठावाद आ चुका है। आप सब इसके लिए तैयार रहिए। ये न जाने कब जाएगा??

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[23 Jul 2009 | 5 Comments | ]

♦ अनंत विजय
हिंदी के जादुई यथार्थवादी कहानीकार उदय प्रकाश इन दिनों फिर से विवादों में घिरे हैं। विवाद की जड़ में है – पांच जुलाई को गोरखपुर में गोरक्षपीठ के कर्ताधर्ता और बीजेपी सांसद योगी आदित्यनाथ के हाथों पहला नरेंद्र स्मृति सम्मान लेना। जबसे यह ख़बर छपी है, पूरे साहित्य जगत में उदय की जम कर आलोचना शुरू हो गयी है। उदय प्रकाश सार्वजनिक जीवन में कई दशकों से वामपंथी आदर्शों की दुहाई देते रहे हैं, लेकिन इस सम्मान ग्रहण के बाद उनके चेहरे का लाल रंग धुंधला होकर भगवा …

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[21 Jul 2009 | 2 Comments | ]

उदय हिंदी के एक महत्वपूर्ण लेखक हैं, जिन्हें एक ख़बर की हैडिंग और एक फोटो की बिना पर लगातार जलील किया जा रहा है। बिना यह देखे कि उनकी रचनाएं क्या कहीं भी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद या हत्यारों के पक्ष में खड़ी हैं? हम क्यों भूल जाते हैं कि ये वही उदय हैं, जिनकी कहानी ‘और अंत में प्रार्थना’ पर इन्हीं सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों ने हंगामा खड़ा किया था। गुजरात दंगों पर अपनी झूठी प्रतिबद्धता सिद्ध करने के लिए नकली कविताएं लिखने वाले उनकी अस्मितावादी कहानी ‘मोहनदास’ पढ़ें और देखें कि विचारधारा कोई हो, सत्ता के आगे एक व्यक्ति के अकेले पड़ जाने का हश्र क्या होता है।