Articles tagged with: yogi adityanath
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अनिल ♦ कहीं ऐसा तो नहीं कि उदय प्रकाश पर इस बहाने जो बहस हुई, वह एक लेखक की लोकप्रियता को उठाने-गिराने के एजेंडे से संचालित रही हो? जबकि रायपुर के साहित्यिक आयोजन से जो राजनीतिक सवाल उभरे हैं, वे मौजूदा समय में समग्र साहित्यिक-सांस्कृतिक परिदृश्य की दुखती रग को छूते हैं। हिंदी में रचनारत समाज सिर्फ़ उदय की प्रतिबद्धताओं और सरोकार पर बहस करके एक सुविधाजनक संतुष्टि की ओर उन्मुख दिख रहा है। एक मित्र बता रहे थे कि हिंदी की एक साहित्यिक पत्रिका उदय प्रकाश प्रकरण पर विशेषांक निकालने जा रही है। हिंदी रचना संसार को छत्तीसगढ़ जैसे आयोजनों और उसमें शामिल होने वाले लेखकों के बारे में बात करने से, समूचे हिंदी रचनाशील दुनिया के खोखलेपन के उजागर होने का डर तो नहीं है?
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रविभूषण ♦ विचारधारा से लेखक बंधे हुए हों या नहीं, लेकिन मानव जीवन, समय और समाज से वह सदैव बंधा हुआ है। कवियों, लेखकों, आलोचकों, संस्कृतिकर्मियों और बुद्धिजीवियों से यह सदैव अपेक्षा की जाती है और हिंदी में इसके अनेक नायाब उदाहरण हैं कि वे उन लोगों के साथ न हों, मंचस्थ भी नहीं, एवं सांप्रदायिक शक्तियों का अपने लेखन-वाचन में विरोध करना और समय-समय पर उनके साथ, कुछ समय के लिए ही सही, खड़े होना किसी भी दृष्टि से मुनासिब नहीं।
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उदय कह रहे हैं कि वे गोरखपुर के कार्यक्रम योगी की उपस्थिति का राजनीतिक पाठ नहीं कर पाये। लेकिन उदय का ये रूप उनके विचारों में आये ज़बरदस्त परिवर्तन का नतीजा है। इस बात को वे स्वीकार भी कर चुके हैं। दिक्क़त ये है कि उनके चाहने वाले उस उदय को खोज रहे हैं, जो प्रगतिशील मूल्यों का पक्षधर होने का दावा करता था। वे नहीं देख पा रहे कि आजकल उदय ‘औलिया’ की रहमत में दुनिया का मुस्तकबिल देख रहे हैं, और मानते हैं कि लेखक को विचारों की बाड़बंदी से ऊपर होना चाहिए।
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बहुत से लोग यह कह रहे हैं कि उदय प्रकाश का सत्यार्थ प्रकाशित हो गया। अब उन्हें छोड़ दिया जाए। कबाड़खाने में भी बहस थोड़ी तल्ख हुई तो अशोक पांडे ने अपने अधिकार का “नाजायज” इस्तेमाल करते हुए बहस बीच में रोक दी। क्यों भई, आपने ऐसा किस सिद्धांत के तहत किया। कहीं आप सब अपने को “नित्शे” का सुपरमैन तो नहीं समझते हैं कि आप चाहें तो बहस शुरू होगी और मना करें तो थम जाएगी? जब आप सबने अपनी राय रख ली तो बाकी लोगों को भी हक़ है कि वो भी अपनी बात कहें।
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हिंदी भाषा अभी तक पंडिताऊ शब्दकोश से पूरी आज़ाद भी नहीं हुई थी कि इसे कीचड़ (पंक) में ढकेलने की कोशिशें जारी हो गयी हैं। पाठकों हिंदी भाषा को संपन्न और सामर्थ्यवान बनाने के इनके प्रयासों को आप अपना आशीर्वाद दीजिए। जो पाठक किसी कारणवश हिंदी साहित्य का इतिहास न पढ़ पाएं हों, उन्हें बता दें कि एक ज़माने में शुद्धतावादी ब्राह्मणीय हिंदी का बड़ा जोर था। लोग उससे ऊब गये, तब जाकर वो सहज भाषा की तरफ बढ़े। अब आपकी प्यारी हिंदी में विष्ठावाद आ चुका है। आप सब इसके लिए तैयार रहिए। ये न जाने कब जाएगा??
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♦ अनंत विजय
हिंदी के जादुई यथार्थवादी कहानीकार उदय प्रकाश इन दिनों फिर से विवादों में घिरे हैं। विवाद की जड़ में है – पांच जुलाई को गोरखपुर में गोरक्षपीठ के कर्ताधर्ता और बीजेपी सांसद योगी आदित्यनाथ के हाथों पहला नरेंद्र स्मृति सम्मान लेना। जबसे यह ख़बर छपी है, पूरे साहित्य जगत में उदय की जम कर आलोचना शुरू हो गयी है। उदय प्रकाश सार्वजनिक जीवन में कई दशकों से वामपंथी आदर्शों की दुहाई देते रहे हैं, लेकिन इस सम्मान ग्रहण के बाद उनके चेहरे का लाल रंग धुंधला होकर भगवा …
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उदय हिंदी के एक महत्वपूर्ण लेखक हैं, जिन्हें एक ख़बर की हैडिंग और एक फोटो की बिना पर लगातार जलील किया जा रहा है। बिना यह देखे कि उनकी रचनाएं क्या कहीं भी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद या हत्यारों के पक्ष में खड़ी हैं? हम क्यों भूल जाते हैं कि ये वही उदय हैं, जिनकी कहानी ‘और अंत में प्रार्थना’ पर इन्हीं सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों ने हंगामा खड़ा किया था। गुजरात दंगों पर अपनी झूठी प्रतिबद्धता सिद्ध करने के लिए नकली कविताएं लिखने वाले उनकी अस्मितावादी कहानी ‘मोहनदास’ पढ़ें और देखें कि विचारधारा कोई हो, सत्ता के आगे एक व्यक्ति के अकेले पड़ जाने का हश्र क्या होता है।
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♦ धीरेश सैनी
(एनबीटी यानी समीर जैन के नवभारत टाइम्स के एक प्रगतिशील क्रांतिकारी मुलाज़िम धीरेश ने उदय प्रकाश प्रकरण पर जनसत्ता में छपे लेख की प्रतिक्रिया में अपनी यह टिप्पणी लिखी है। इस टिप्पणी का तेवर ज़्यादा स्वाभाविक होता, अगर कुछ आरोपों का ज़िक्र करते हुए वे तथ्यात्मक ग़लतियों के रूप में अपना प्रतिशोध ज़ाहिर नहीं करते। बहरहाल हम इसे बिना किसी काट-छांट के पेश कर रहे हैं : मॉडरेटर)
उदय प्रकाश और उनके समर्थक उनकी करतूत को एक ट्रेंड के रूप में स्थापित करने को उतावले हैं। ऐसा इस मसले पर …
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इस प्रतिक्रियावादी हिंदी समाज में माफी और सार्वजनिक आत्म-स्वीकार ही उदय प्रकाश की नयी स्वीकृत रचना हो सकता था, जिसे रच कर उन्होंने अपनी शख्सियत को ऊंचा ही किया है। अपने ब्लॉग पर उन्होंने योगी के साथ अपनी मौजूदगी और उनके हाथों सम्मान लेने के लिए पाठकों से क्षमायाचना की है। क्षमायाचना के साथ ही यह अप्रिय विवाद ख़त्म हो जाना चाहिए। मगर उदय प्रकाश की अंतर्राष्ट्रीय ख्याति और प्रशस्ति से रश्क करने वाले उनके ख़िलाफ़ अभियान चलाने के मौक़े से जैसे चूकना नहीं चाहते थे, आसानी से छूटना भी क्यों चाहेंगे।
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उदय प्रकाश ने अपनी ग़लती मान ली। हिंदी के मिट्टी-प्रदेश का इतना बड़ा लेखक अपनी ग़लती को लिख कर स्वीकार कर ले, तो मान लिया जाना चाहिए कि यह महान लेखक इस वक्त अफ़सोस के घोर क्षणों में जी रहा होगा। मुझे विश्वास है कि ऐसे मुश्किल क्षणों से गुज़र कर यह लेखक पहले से और बेहतर हो जाएगा। इतनी ही अपेक्षा की थी कि वे अपनी ग़लती मान लें। उन्होंने मान ली। उदय प्रकाश ने एक अच्छी शुरुआत की है। उनको स्कूल से बर्खास्त करने की आततायी प्रिंसिपली मानसिकता से बचना चाहिए।



