Home » Archive

Articles tagged with: yogi adityanath

ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया »

[18 Jul 2009 | 5 Comments | ]
यंत्रणा और आत्‍मद्वंद्व के अंधेरे दिन

♦ उदय प्रकाश
मैंने और मेरे परिवार ने, एक बार नहीं कई कई बार लांछन, दंड, अपयश, अभाव और दुखों की ऐसी ही यंत्रणा झेली है। इस बार भी हमने पांच दिनों से न ठीक से खाया है, न सो सके हैं। मैंने बार-बार दुहराया है कि मैं कोई महान व्यक्ति नहीं हूं। कोई क्रांतिकारी, मठाधीश या सुपर स्टार नहीं। असली ज़िंदगी में एक बहुत साधारण मेहनत कश आम आदमी हूं। भाषा का मज़दूर। मेरा किसी भी राजनीतिक दल से कोई संबंध नहीं है। मेरे लिए सभी राजनीतिक दल अब लगभग एक …

ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया »

[17 Jul 2009 | 3 Comments | ]
हिंदी साहित्य में ब्लॉग का हस्तक्षेप और उदयप्रकाश विवाद का सबऑल्टर्न पाठ

अच्छा होता अगर योगी आदित्यनाथ के हाथों उदयप्रकाश कोई सम्मान न लेते। लेकिन उतना ही अच्छा होता अगर तमाम प्रगतिशील पत्रिकाओं में बीजेपी और कांग्रेसी और वामपंथी सरकारों के विज्ञापन न छपते (क्या ये बताने की जरूरत है कि भारत में सरकारों का चरित्र क्या होता है)। और शायद उससे भी अच्छा होता कि उदयप्रकाश के आदित्यनाथ से सम्मान लेने के खिलाफ गोलबंदी दिखाने वाले साहित्यकारों ने लालगढ़ में आदिवासियों के संहार के खिलाफ या नंदीग्राम और सिंगुर में राजकीय हिंसा के खिलाफ “भी” ऐसा ही एक वक्तव्य जारी किया होता (मैं जानता हूं कि ये बेहद अश्लील और सांप्रदायिक फासीवादी किस्म की अलोकतांत्रिक मांग है)।

ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया »

[16 Jul 2009 | 4 Comments | ]
उदय जी… यह व्यक्तिगत क्या होता है?

अशोक कुमार पाण्डेय
कई दिनों से बड़े दुखी मन से देख रहा था यह सब…
आज रहा नही गया। यह व्यक्तिगत क्या होता है? उदय जी आपको दिवंगत कुंवर साहब के प्रति पूरा आदर रखने की आजादी है पर उसके लिए सार्वजनिक समारोह में एक हत्यारे के साथ बैठना? इन व्यक्तिगतों से लड़कर ही लेखक विचार की राह पर आगे बढ़ता है। आप आज अपने ख़िलाफ़ बोलने वालों को जातिवादी कह रहे हैं। बहुत विनम्रता से बता दूँ किजिस कालेज में आपके दिवंगत अग्रज पढाते थे वह उसी गोरखनाथ मन्दिर द्वारा संचालित …

ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया »

[15 Jul 2009 | 3 Comments | ]
ये सूरत बदलनी चाहिए…

(मुझे खुशी है कि मैं गलत साबित हुआ। हिंदी में गलत को गलत कहने वाले वीरों की कोई कमी नहीं है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण नीचे का विरोधपत्र है। हिंदी के 50 से ज्यादा महत्वपूर्ण लेखकों ने योगी आदित्यनाथ के हाथों सम्मानित होने के लिए उदयप्रकाश की निंदा की है। नीचे हस्ताक्षर करने वाले कुछ लेखकों ने सक्रियता दिखाते हुए बाकी लेखकों से टेलीफोन पर विरोधपत्र जारी करने पर सहमति ली है। क्या उदय प्रकाश अब भी कहेंगे कि उनकी आलोचना जातिवादी फासीवादियों की साजिश का नतीजा है: पंकज श्रीवास्‍तव, …

ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया »

[14 Jul 2009 | 11 Comments | ]
साथियो, ये निवेदन प्रार्थना के शिल्‍प में नहीं है!

निरंजन श्रोत्रिय
यह सब ग़लत हो रहा है। अब हिंदी साहित्य उस निम्न स्‍तर तक आ पहुंचा है, जब लेखक के हगने, मूतने, खांसने से उसकी प्रतिबद्धता तय की जा रही है। जो लोग बात का बतंगड़ बना रहे हैं, उन्हें इतना तो सोचना चाहिए था की क्या उदय दंगाइयों के पक्ष में खड़ा कोई छद्म लेखक है? जो कवि जनसत्ता में गुजरात विभीषिका पर ध्रुपद जैसी अद्भुत और मार्मिक कविता लिख रहा हो, उसके बारे में ऐसे शक कई दूसरे शक पैदा करते हैं। जो लोग उदय और अशोक वाजपेयी …

ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया »

[14 Jul 2009 | No Comment | ]
कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीरे नीमकश को

मैं कबाड़खाना पर उदय प्रकाश को लेकर आखिरी पोस्ट लिख रहा हूँ। दो मुद्दे स्पष्ट रूप से मेरे सामने हैं। जिन पर लिखना बहुत जरूरी लगा।
1- क्या यह उदय प्रकाश के खिलाफ साजिश थी ?
2-क्या यह किसी के कातर दुख के वशीभूत हो किए कर्म पर हमला था ?
मेरे लिए इन दोनों प्रश्नों के उत्तर “नहीं” है। उदय प्रकाश के लिए “हाँ” है।
उदय प्रकाश अपने लेखों से ऐसा जाहिर करने की कोशिश कर रहे हैं कि कुछ लोगों ने उनके निहायत पीड़ा भरे क्षणों में उन पर सुनियोजित आक्रमण किया …

ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया, स्‍मृति »

[13 Jul 2009 | One Comment | ]
फ़ासीवाद की सुरंग में मृत भाई से मुलाक़ात

♦ उदय प्रकाश
जब फ़ांसी की सज़ा से बचने के लिए गैलेलिओ ने चर्च से क्षमा मांग ली तो उसके एक अनुयायी ने गुस्से और निराशा में टिप्पणी की: ‘कितना अभागा होता है वह समाज, जिसका कोई नायक नहीं होता।’
महान वैग्यानिक गैलेलियो का उत्तर था :’ लेकिन उससे अभागा होता है वह समाज, जिसे नायक की ज़रूरत होती है।’
स्मृतिशेष : कुंवर नरेंद्र प्रताप सिंह
कुंवर नरेंद्र प्रताप सिंह मेरे भाई थे। मेरी तीसरी फुआ के बेटे। मेरे पिता उनके मामा थे। मां के पक्ष से उनकी और पिता के पक्ष से मेरी …

ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया »

[13 Jul 2009 | One Comment | ]
वकील के कोट में शुगर-फ्री बताशा

♦ अनिल यादव
भाई मुनीश ने तो शराब के दो नामचीन ब्रांडों के काकटेल के साथ अखंड मैत्री की कामना करते हुए अपने कंधे पर रखा, मुहावरेदार काल्पनिक गंडासा (हैचेट) जमींन में दफना दिया। फिर उस पर वह किताब भी रख दी जिसके अध्याय सदा के लिए बंद कर दिए गए हैं, परदे भी खैंच दिए। यह कुछ और नहीं मुनीश की सदाशयता है जो इस विवाद का अंत चाहती है। मैं भी यही चाहता हूं।
उदय प्रकाश के कुछ भी बकने से अशोक का कभी कुछ नहीं बिगड़ेगा। वह हमारी नजरों में …

ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया »

[13 Jul 2009 | One Comment | ]
पूर्ण- विराम

“अगर मैं क्षोभ या हताशा में कुछ ऐसा कह गया होऊं, जिससे आप में से किसी को कुछ अप्रिय लगा हो तो यह मान कर क्षमा करें कि इस उम्र और आपा-धापी में कभी-कभी ऐसा हो जाता है। रही ‘कबाड़खाना’ के अशोक पांडेय की बात, तो वे मेरे इसलिए प्रिय रहे हैं क्योंकि उनमें शायद वही संवेदना, अध्यवसाय और निस्संगता है, जो मैं अपने में पाता हूं। उन्हें समझने में भूल हुई है।”
With these lines of Mr. Uday Prakash, for me this chapter is hereby closed forever. I wish him …

ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया »

[13 Jul 2009 | No Comment | ]
जीतेंगे डोमा जी उस्ताद!

(बन्दर के हाथों कुत्ते की लेंडी को पुरुस्कार की तरह लेना बन्द करो दोस्तो! और अपनी भाषा का सम्मान करना सीखो!…..ब्राह्मणवाद मुर्दाबाद! ठाकुरवाद मुर्दाबाद!–योगी उदयप्रकाश प्रकरण पर कवि वीरेन डंगवाल की टिप्पणी: पंकज श्रीवास्‍तव)
चलिए दिल से बोझ कुछ कम हुआ। वरना लग रहा था कि गोबर पट्टी वाकई वीर विहीन हो गई है। वीरेन जी ने खुलकर जो बात कही है वो बहुत लोगों के दिल की बात हो सकती है। फिलहाल वे चुप हैं। चुप हैं क्योंकि उन्हें उदय प्रकाश के नाराज होने का डर है। वैसे उदय प्रकाश …